नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं

एन.सी.तिवारी से बातचीज
डॉ.पंकज उप्रेती
यह सच्चाई है कि सुख-दुःख के साथी और समय हर हमेशा मस्तिष्क में छाए रहते हैं। वर्तमान की दिखलावटी दुनिया में भले ही बहुत रंगीन नजारे खुशनुमा दिखते होंगे लेकिन इनकी रंगीनियत वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। जीवन के गहरे अनुभव और समाज में हमेशा सक्रियता निभाने वाले श्रीमान नवीन चन्द्र तिवारी (एन.सी.तिवारी) जीवन के उत्तरार्द्ध में भी समाज के लिये जीवट बने रहने का जोश अपने साथियों और युवाओं को दिलाते हैं। हल्द्वानी के जगदम्बानगर निवासी तिवारी जी की यादों में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी तक लम्बा सपफर है जिसमें नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं। बातचीज में वह कहते हैं- ‘दुर्गा-आनन्द स्मृतियों में हर वक्त हैं।’ ‘पिघलता हिमालय’ की स्थापना के समय और उससे पहले से ही इसके संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ जिस प्रकार की प्रगाढ़ता इनकी रही है वह परिवार के सयाने की ही हो सकती है।
अल्मोड़ा के शैल ग्राम निवासी श्रीबल्लभ तिवारी के सुपुत्र थे- कृष्णानन्द तिवारी। ये परिवार मूल रूप से सोमेश्वर के बेगनिया ग्राम का हुआ। माता दुर्गा देवी और पिता कृष्णानन्द जी के परिवार में 8 सन्तानें हुईं, जिनमें सबसे छोटे थे- नवीन तिवारी। 5 भाई 3 बहिनों में एन.सी.तिवारी बेशक छोटे रहे हों लेकिन अवसरों पर आगे बढ़ते हुए इन्होंने अपने रास्ते तय किये और सन् 1971 मंे इनका विवाह निर्मल जी के साथ हुआ। इनके परिवार में दो बेटियां प्रीति, संगीता (गुड़िया) और पुत्र विजय हुए। सभी गृहस्थ आश्रम के साथ अपनी परम्पराआंे से जुड़े हैं, जो उन्होंने श्रीमती निर्मल-श्री एन.सी.तिवारी से पाया।
अल्मोड़ा से बीएससी करने के बाद तिवारी जी इलाहाबाद पढ़ने गये लेकिन स्कूल-कालेज की शिक्षा से ज्यादा व्यवहारिक शिक्षा में रमने वाले एन. सी.तिवारी के भाग्य में कुछ और ही था। अल्मोड़ा में पढ़ाई के दौरान उनके साथियों में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी थे। यह विज्ञान वर्ग में थे जबकि मर्तोलिया कला वर्ग में। वह बताते हैं- ‘हमारे ग्राम शैल के प्रतिष्ठि व्यापारी नारायण तिवारी जी ने अल्मोड़ा के जिस जगह पर देवालय बनाया, उस स्थान को नारायण तिवारी देवाल बाजार कहने लगे और धीरे-धीरे एनटीडी नाम प्रचलित हो गया। इसी क्षेत्र में सीमान्त क्षेत्रा के व्यापारी आते थे और यही जोहारी भाईयों का मुख्य केन्द्र था। ज्यादातर डॉ.दरवान सिंह के आवास पर भी रहते थे। बाद में और ज्यादा विस्तार हुआ। सन् 1947 में रिफ्रयूजी भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे थे। इनके स्कूल के साथी गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, बीरशिवा स्कूल के संस्थापक एन.एन.डी.भट्ट, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, दरवान सिंह, उत्तम सिंह वहीं मिले थे। उस दौर में पढ़ाई के बाद ज्यादातर शिक्षक बने और फिर उच्चपदों पर आसीन रहे। हल्द्वानी दोनहरिया निवासी लक्ष्मण निवास का नाम हमेशा से अग्रणीय रहा है इस परिवार के बाला सिंह, सत्यवान सिंह जंगपांगी, सेल्सटैक्स कमिश्नर पुष्कर सिंह, जज उत्तम सिंह पांगती, दुर्गा सिंह अच्छे साथी रहे हैं।’
इण्टर के बाद इलाहाबाद पढ़ाई गये तिवारी जी अधूरी पढ़ाई से जब लौटे तो कुछ महीने कौसानी में अध्यापकी करने लगे। इसके बाद बिड़ला मिल सिरपुर कागजनगर, आन्ध्रप्रदेश मेें अपने बड़े भाई के पास चले गये जो बिरला कागज फैक्ट्री में थे। 1938 में स्थापित भारत की सबसे पुरानी यह पेपर मिल्स को हैदराबाद मिर उस्मान अली खान द्वारा स्थापित किया गया था। 1950 में बिरला परिवार ने इसका अधिग्रहण किया और 2018 में जे.के. पेपर लि. ने इस मिल का अधिग्रहण कर लिया। बिरला की इस फैक्ट्री में एन.सी.तिवारी क्वालिटी कन्ट्रोल का काम देखने लगे, कुछ समय बाद पेपर मैकर बन गये। सन् 1968 में मशीन में दुर्घटना होने के बाद इन्होंने विचार बदला और अपने गाँव से इतनी दूर आ चुका हँू, भाई भी यहीं है, क्यों न घर चल जाउँ। फिर से शैल ग्राम अल्मोड़ा आ गये। कुछ दिन रुकने के बाद हल्द्वानी का रुख किया। अल्मोड़ा में जहाँ इनकी मुलाकात दुर्गा सिंह मर्तोलिया से हुई थीं वहीं हल्द्वानी में आनन्द बल्लभ उप्रेती से हुई। तब तक ‘पिघलता हिमालय’ अखबार के बारे में चिन्तन नहीं हुआ था। हल्द्वानी में स्वरोजगार के क्रम में यह अपने को आजमाते रहे और सफल नहीं हो रहे थे। खुली चाय का कार्य भी किया लेकिन इसका प्रचलन न होने से उसे छोड़ पेपर एजेंसी ले ली। अनुभव तो था लेकिन दूर-दूर तक उधरबाजी से इस काम को भी बन्द कर दिया। उन दिनों में आनन्द बल्लभ उप्रेती का छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ खुला और वह पत्रकारिता में पहले से सक्रिय थे ही। तिवारी जी बताते हैं कि युवाओं और गपोड़ियों के बैठने का अड्डा कालाढूंगी रोड स्थित ‘शक्ति प्रेस’ हुआ करता था। दाँतों के डाक्टर बी.सी.पन्त, वकील जीवन जोशी, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह डसीला तमाम लोगों का मिलना जुलना बराबर था। कुछ अन्तराल में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी ‘शक्ति प्रेस’ में आए और उप्रेती जी के साथ एक प्रण सा हो गया कि अपना अखबार निकालना है। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ की शुरुआत हो गई। जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव सभी साथियों ने देखे और एक-दूसरे की परेशानियों को समझा-महसूस किया।
तिवारी जी बताते हैं कि स्वरोजगार के क्रम में उन्होंने पहली बार सोपस्टोन इन्डस्ट्रीज की स्थापना कर डाली। छोटी मुखानी हल्द्वानी में 1973 में इसे स्थापित किया गया। बागेश्वर में खड़िया कार्य के शुरुआती दिन थे। बहुत मुश्किलों से तब खड़िया कारोबार का बाजार बना था, एक प्रकार से इसका परिचय ही हुआ। कुछ सालों तक सपफल कार्य करने के बाद तिवारी ने इस कारोबार को समेट दिया। आज भी छोटी मुखानी का वह क्षेत्र खड़िया फैक्ट्री नाम से ही जाना जाता है। अपने कारोबार और घर-परिवार के साथ कदम से कदम आगे बढ़ रहे तिवारी जी ने अपने साथियों और समाज की भलाई के लिये भी कदमताल कम नहीं की। होली हो या दीपावली उसकी रंगत बनी रहे इसके लिये इनका ध्यान पूरा था। वह बताते हैं कि हल्द्वानी में छोटा सा बाजार और दूर-दूर तक छिटके आवास थे। साइकिल से आना-जाना होता था और होली मिलने के लिये एक दूसरे के वहाँ अनिवार्य रूप से जाते थे, एक बार जेलरोड में पत्थरबाजी की घटना ने माहौल खराब किया था। पहाड़ की होली के लिये हीराबल्लभ पन्त जी के वहाँ सभी जुटते थे। रामपुर रोड में बालमुकुन्द तिवारी के घर में बैठकी होली के अलावा जगदम्बा नगर में इनके अपने आवास पर होली की बैठक जमती थी। रेंजर हीरा बल्लभ जी, रमेश चन्द्र, अल्मोड़ा से तारा प्रसाद ‘तारी मास्साब’, जगदीश उप्रेती ‘जग्गन’ से रातभर रागों में भरी होलियों सुनने को मिलती थीं।
सामाजिक सरोकारों से जुड़े एन.सी. तिवारी जी जनमुद्दों को लेकर हमेशा अगुवाई करते रहे हैं। जमरानी बांध बनाने के आन्दोलन के क्रम में श्री नवीन चन्द्र वर्मा के साथ मिलकर इन्होंने पीआईएल तक डाली जिसमें विभाग को जुर्माना पड़ा था। व्यापारी हितों के लिये भी इनकी भागीदारी कम नहीं रही। वह बताते हैं कि सन् 1992 में अलीगढ़ में व्यापार मण्डल का सम्मेलन हुआ, तब बाबूलाल जी को कुमाउँ का प्रभारी बनाया गया और उन्हें कोषाध्यक्ष। पृथक पर्वतीय राज्य के बाद सन् 2001 में उ.प्र. से अलग होकर उत्तराखण्ड का व्यापार मण्डल बना। इसके लिये गाजियाबाद में यूपी के अध्यक्ष श्याम विहारी एमपी सहित तमाम साथी थे। उत्तराखण्ड व्यापार मण्डल के लिये रीषिकेश के यशपाल अग्रवाल अध्यक्ष, हल्द्वानी से बाबूलाल गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष, देहरादून से अनिल गोयल महामंत्री, नवीन वर्मा उप महामंत्राी, एनसी तिवारी कोषाध्यक्ष बने। राज्य आन्दोलन के दौरान अगुवाई करने वाले एन.सी.तिवारी कहते हैं- मुलायम सिंह का जमाना था और पुलिस का सख्त पहरा। आरक्षण विरोधी आन्दोलन में सुलग रहे युवाओं को जेल भेजा जा रहा था तब हल्द्वानी में छात्र अभिभावक संघर्ष समिति का गठन हुआ जिसमें वह सह संयोजक बने। इस बीच अज्ञात उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा द्वारा इन्हें जान से मारने की ध्मकी तक दे दी गई। मानसिक तनाव व अन्य प्रकार से दबाव देने वाले तिवारी जी के पीछे लगे रहे लेकिन ये विचलित नहीं हुए बल्कि और सूझबूझ से कमान संभाली। राज्य आन्दोलन का स्वरूप बढ़ता गया और सारे सरकारी संगठन इस समिति से जुड़ गये। जब दिल्ली में प्रदर्शन की बात हुई तो शासन-प्रशासन का पहरा था। जाने की अनुमति नहीं थी, ऐसे में कोर्ट से चालीस बसों को ले जाने की अनुमति ले ली गई। वह कहते हैं कि पुलिस का इरादा था आन्दोलनकारियों को हल्द्वानी से आगे ही न बढ़ने दिया जाए। गढ़वाल में भी ऐसा ही हुआ और दिल्ली जा रहे आन्दोलनकारियों के साथ रामपुर तिराहा काण्ड हुआ था। हल्द्वानी मे भी रामपुर तिराहा काण्ड कराने की पूरी साजिश थी लेकिन किसी प्रकार पूरे आन्दोलन को सही दिशा दी गई और आन्दोनकारी युवाओं को बचाया गया।
बातचीज में तिवारी जी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं- जितना किया बहुत था, अब नई पीढ़ी ने इस शहर और प्रदेश को संवारने में जुटना चाहिए। पिघलता हिमालय परिवार में संरक्षक की भूमिका रखने वाले श्री तिवारी के सुपुत्र विजय तिवारी भी सुलझे हुए युवा उद्यमी हैं और उन पुरानी परम्पराओं को अपने बचपन से समझते हुए आगे बढ़ रहे हैं। कामना है उनकी चाह सफल रहे।

‘शक्ति प्रेस’ हल्द्वानी के इतिहास में प्रमुख गढ़ रहा है

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी।
कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा।
‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’
27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत शक्ति प्रेस डाॅ. पंकज उप्रेती
‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी।
कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा।
‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’
27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत
पड़ने पर अन्य कमरे भी प्रेस में जुड़ गये और छापेखाने का कार्य विस्तार पा गया। तब हमारा पूरा परिवार भी यहाँ रहता था। रूलिंग मशीन की सरसराहट के बीच शानदार बाइडिंग का कार्य, प्रिंटिग कार्य, बाद के दिनों में शादी कार्ड की छपाई भी होती। उस छोटे आकार की पुस्तकें जैसे भजन संग्रह, होली संग्रह इत्यादि भी छपते रहे। यहीं 30 अक्टूबर 1978 में साप्ताहिक पिघलता हिमालय का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ। 19 दिसम्बी 1979 में इसे दैनिक समाचार पत्रा का रूप दे दिया गया था। कुछ अड़चनों के बाद 1 दिसम्बर 1986 को पुनः यहीं से पिघलता हिमालय जारी हुआ, जिसका प्रकाशन पता पिता आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद 2013 में जे.के.पुरम् सेक्टर डी, मुखानी हल्द्वानी में कर दिया गया था और प्रयास था कि ‘शक्ति प्रेस’ को भी पूरी तरह इसी जगह लाया जाए। 2018 में पिघलता हिमालय की सम्पादक और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी माता जी श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद से लगातार यह विचार था कि अपने प्रेस को भी वहीं स्थापित करें जहाँ परिवार रहने लगा है लेकिन जिस जगह वर्षों की यादें जुड़ी हों उसे एकदम छोड़ना शायद हमारे लिये भी कठिन था। अन्ततः 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट होना परिवार को सुखद लगा है। और इस बीच हमें कई नये अनुभव और सीख मिली कि कौन हमारे कितने करीब है। ऐशबाग मोहल्ले के पुराने पड़ोसी तो सब पहले ही जा चुके थे और जो दो-चार परिवार मकान मालिक की हैसियत से रहते हैं, उनकी इच्छा भी यही रही है कि अब समेट लिया जाए। समेटने की इस होड़ में वह भी अकेले हो चुके हैं। फिलहाल हम खुशनुमा माहौल में ऐसबाग से विदा हो गये। यह जरूरी भी था क्योंकि हल्द्वानी शहर की घिचपिच के बीच जिस प्रकार से सड़क चैड़ीकरण इत्यादि हो रहा है उसमें बदलाव तो होना ही है। ऐसे में हमेशा से पूरे सम्मान के साथ मान्यता रखने वाला ‘शक्ति प्रेस’ भी अच्छी जगह शिफ्रट हो जाए, खुशी की बात है।
बात पुरानी है कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ला जिसमें हमारा प्रेस था, तब शहर में ही बहुत कम वाहन हुआ करते थे। रोड के दोनों ओर आम के बड़े-बड़े पेड़ सुन्दरता बढ़ाते थे। प्रेस से थोड़ा आगे एक बड़ा सा नाला हुआ करता था, जो घिर चुका है, इसी से होकर नालियों का पानी-कचरा निकासी होता था। वर्तमान की कालाढूंगी रोड बरसात में भर जाती है। प्रेस के सामने ही हल्द्वानी फर्नीचर मार्ट पुराने प्रतिष्ठानों में से रहा है। इस मोहल्ले की कई यादों को पिता जी ने अपनी कृति ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ में लिखा है।
पुराने हल्द्वानी में जब मुख्य मार्ग सिंगल रोड के थे, सड़क से लगा हमारा मोहल्ला ऐशबाग कुछ परिवारों का गुलदस्ता था। घरों में ताले नहीं लगते थे, ‘शक्ति प्रेस’ में ताले कभी नहीं लगे क्योंकि दिन-रात गपोड़ियों, आन्दोलन कारियों के अलावा विचारवान लोगों की बैठकें और प्रिंटिंग का कार्य होता था। पड़े लिखे बेरोजगार भी इसे अपने संरक्षण का अड्डा मानते रहे हैं। कई ऐसी लड़ाईयां भी यहीं से शुरू हुई जिन्हें सुनकर आश्चर्य हो सकता है। एकदम शान्त रहने वाले पिता जी गलत पर झल्ला जाते। फिर चाहे कोई नेता या कोई अधिकारी हो, वह अपना विरोध् दर्ज करते। समय बदलता रहा और सड़क से बहुत उपर होने वाले मकान गड्ढों में ध्ंसते दिखाई देने लगे। हमारा घर/प्रेस भी सड़क से एक सीढ़ी नीचे हो गया था और बरसात में पानी भरने लगता था। पहले समय में पूरा मोहल्ला गर्मी के दिनों में खुले में सोता था। अपनी-अपनी चारपाई में मच्छरदानी लगाकर सारे परिवार सड़क किनारे ही दिखाई देते। सन् 2000 के बाद से थोड़ा बदलावा आया और मोहल्ले में पुराने परिवार दूसरे स्थानों पर अपना निवास स्थान बनाकर जा चुके थे। ‘शक्ति प्रेस’ के बाहर पाखड़ का पेड़ लग चुका था, जिसकी आड़ में बैठने वाले कम हो गये। सड़क भी सिंगल से चैड़ी होकर इसमें डिवाइडर बन गया। याद आ रहा है कि पुराने समय में संचार व्यवस्था भी सीमित थी। ‘शक्ति प्रेस’ में डायल करने वाला पुराना फोन था। ‘193’ नम्बर के इस पफोन पर सुख-दुःख भरी सूचनाओं के लिये दूर-दूर से लोग आया करते थे। कई लोगांे ने अपने सगे-सम्बन्ध्यिों-मित्रों को इस पफोन नम्बर को दिया था ताकि विशेष स्थिति में पफोन कर जानकारी मिल सके। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर को जाने वाली बसों का प्राइवेट बस अड्डा भी इस प्रेस के पास खुला तो कालाढंूगी चकलुवा इत्यादि से लोग प्रचलन के हिसाब से शादी कार्ड छपवाने यहीं आते थे। कुछ वर्षों के अन्तराल में छपाई के तरीके बदले और छापेखानों में मशीनरी का तरीका भी बदलने लगा। तब स्क्रीन प्रिटिंग का कार्य भी शक्ति प्रेस में होने लगा और पहली बार कार्डों में ऐपण के डिजाइन बनाए गए। इस प्रकार के प्रयोग पिता जी किया करते थे, इन सबके बीच संगीत सभा का होना भी कम आश्चर्य नहीं था। हम भाई-बहन भी अपने बचपन से उबर कर युवा अवस्था में थे और खुला आसमान बना ‘शक्ति प्रेस’ हमारा घर था। इसी में पढ़ाई और संगीत का रियाज करना बहुतों को आश्चर्य ही लगता होगा। पुराने जमाने के छोटे-छोटे कमरे वाले मकान में रेलगाड़ी जैसा हमारा आवास हमें संरक्षित करता रहा। हमें ही नहीं, उन आन्दोलनकारियों को भी पनाह मिली जिनकी तलाश होती थी। कई आन्दोलनों में जब पकड़-धकड़ होती तो अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से तक प्रदर्शन करने वाले यहाँ आ जाते। सीमान्त क्षेत्रा से लेकर मैदान तक के व्यापारियों के मिलन का अड्डा यह बन गया। जम्बू-गन्द्रायणी से लेकर रिंगाल तक के कारोबारियों का पता शक्ति प्रेस था, इनकी व्यापारिक बैठक धर्मशाला में होती थी क्योंकि बिजनौर इत्यादि जगह से व्यापारी धर्मशालाओं में आकर रुकते थे। इसी प्रकार गंगावली क्षेत्रा से आने वालों के लिये हमारा घर ही मुख्य केन्द्र बना हुआ था। छोटे से शहर में तब लोग अपनों को तलाशते हुए मिलते-जुलते थे। प्रेम-व्यहार के उस समय में सभी जगह यह रिवाज रहा है। आज भी पुराने परिवार अपने रिवाजों को बनाए हुए हैं। शहर होने का कतई यह मतलब नहीं है कि मेहमानों को होटल में रुकवाया जाए या मेहमान चुपचाप होटलों में रुककर चले जाएं। वर्तमान में सुविधाओं को देखते हुए बहुत बदलाव हुआ है और हल्द्वानी जैसा सुन्दर शहर भी एकदम बदलने जा रहा है। इसमें पहाड़ और मैदान से आकर बसने वालों की भीड़ ने इतना दबाव बना दिया है कि मुख्य शहर में पैदल चलना भी दिक्कत भरा होता जा रहा है। यही सब देखते हुए सड़क चैड़ीकरण करण सहित अन्य तोड़पफोड़ होनी ही है।
जिस सिंगल सड़क पर कोई भी व्यक्ति उतर कर किसी के घर या दुकान पर जा सकता था, उस सड़क पर अब दिनभर दौड़ रहे वाहनों व डिवाइडर के कारण कोई रुकना पसन्द नहीं करता है। बदलते शहर में आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रा जुड़ चुके हैं और खेत-खलिहानों का कार्य बहुत कम हो चुका है। ऐसे में अपराधिक गतिविधियों भी बहुत तेजी से बड़ी हैं। बाजारबाद और सोशल मीडिया के प्रभाव में नई पीढ़ी को हल्द्वानी शहर की पुरानी तहजीब का पता ही नहीं है जब इस गुलस्दते में होली-रामलीला से लेकर हर रंग था और एक-दूसरे की मदद को लोग आगे आते थे। दानपुण्य करते लोगों के अलावा गर्मी में प्याउ अपनी ओर से लगवाने वाले भी थे। वर्तमान का हल्द्वानी दिखावे में डूबा है। कुछ दिनों के अन्तराल में कोई न कोई महोत्सव या जुलूस होने लगे हैं। चहक रहे युवाओं को इससे कोई मतलब नहीं की क्या हो रहा है। सोशल मीडिया के लिये फोटो-रील उनका लक्ष्य लगता है।
‘शक्ति प्रेस’ में बैठकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ हमेशा दस्तावेज के रूप में कार्य करेगी। इस शहर के बनने से लेकर वर्तमान तक में कौन लोग किन-किन स्थानों से आए और किस तरह से एक सुसज्जित शहर बसासत हुई। किस समय में कौन कितना प्रभावशाली था और कौन नगर पालिका चैयरमैन, कौन बड़ा व्यापारी था और कौन समाजसेवी, सबकुछ इस कृति में है। यही कारण है कि इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। जब शहर का स्वरूप ही बदलने जा रहा हो तो यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि आंखिर किसी शहर में दबाव के बाद किस प्रकार से बदलाव होता है। लिखने के लिये बहुत है लेकिन इतना भर कहना है कि प्रेम भाईचारा के जो पुराने दिन थे, वह सभी स्थानों पर बना रहे।
कालाढूंगी रोड स्थित शक्ति प्रेस का एक कक्ष

ऐसे थे हमारे दीवान दा ‘दीवान सेठ जी’

एम.एस.सयाना
दीवान सेठ जी मूलतः चिलकिया, पिथौरागढ़ के रहने वाले थे। उनके पिता स्व. चन्द्र सिंह पांगती समाजसेवी थे। उन्होंने अपने समय में गाँव में स्कूल खुलवाए, घराट बनवाए तथा रास्ते का निर्माण किया।
दीवान सेठ जी अपने समय के जोहार समाज के जानेमाने सेठ थे, तिब्बत व्यापार के समय बागेश्वर उत्तरायणी मेले में तिब्बती भेड़ का उन गांधी आश्रम वालों को बेचा करते थे। एक बार उन का दाम इतना बढ़ गया कि सूठ जी दो बक्सा नोट अपने खच्चरों में लाद कर चिलकिया गये, व्यापार घटने के बाद उन्होंने भैंसखाल में आरामशीन लगवाई परन्तु लकड़ी के अभाव से मशीन बन्द करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने जंगलात का कार्य किया, उसमें भी अपेक्षाकृत लाभ नहीं हुआ। इस कार्य को छोड़कर उन्होंने ‘दीवान ट्रान्सपोर्ट’ की स्थापना की। अपने समय में सेठ जी ने सभी गरीब तबके लोगों की खूब मदद की। किसी की बेटी की शादी हो या कोई दुःख बीमार हो, सेठ जी सभी को उधर दिया और कभी किसी से भी पैसे लौटाने के लिये तकाजा नहीं नहीं करते थे। जिसने लौटाया तो ठीक नहीं लौटाया तो उनको कहना तौहीन समझते थे। सेठ जी को अनेकों लोगों ने पैसे नहीं लौटाये। वे सही मायने में गरीबों के मसीहा थे। जब वे हल्द्वानी में आकर बसे तो भोटिया पड़ाव में 52 बीघा जमीन जोहार संघ के नाम से लीज पर थी, यदि वे चाहते तो कई बीघा अपने नाम कर सकते थे परन्तु उनकी इतनी महानता कि उन्होंने एक इंच जमीन अपने नाम नहीं की तथा औरों को जमीन दिलाई। जमीन के सम्बन्ध् में अनेक विवाद भी होते रहते, लोग अपनी समस्याएं लेकर सेठ जी के घर जाते थे, वे आसानी से उनका समाधान कर देते थे। उनका निर्णय सर्वमान्य हुआ करता था। सभी पड़ाववासी उनका आदर करते थे क्योंकि उनका कहीं पर भी किसी प्रकार लोभ लालच नहीं था। ऐसे निस्वार्थ व्यक्तित्व को जोहार रत्न से नवाजा जाना चाहिये।
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स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे’ में भी स्व.दीवान सिंह जी के सीमान्त ट्रान्सपोर्ट सहित तमाम रोचक जानकारियों का उल्लेख है।

जोहार महोत्सव : समय बदलने की आहट है

डाॅ.पंकज उप्रेती
जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी हल्द्वानी द्वारा इस बार भी दो दिवसीय जोहार महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। महोत्सवों की बाढ़ में इस आयोजन की जो विशेषता दिखाई देती है वह एक घाटी की संस्कृति तो है ही लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और द्वन्द के बीच यह साफ हो चुका है कि ‘समय बदलने की आहट है’।
हल्द्वानी की बसासत के साथ किस प्रकार से भोटिया पड़ाव बसा वह लम्बी कहानी है। (पिघलता हिमालय के सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से’ विस्तार से दिया गया है।) तब तिकोनिया पर से घोड़े-बकरियों के झुण्ड लम्बी कतार में लग जाया करते थे। डीएफओ हीरासिंह पांगती साहब सहित दो-तीन परिवार सबसे पुराने परिवार यहाँ बसे। दोनहरिया में लक्ष्मण निवास भी मिलने जुलने वालों का केन्द्र बना। पुष्कर सिंह जंगपांगी जी का आवास ‘प्रताप भवन’ बनते समय नहर के पास बहुत संघर्ष की कहानी है। ‘शंकर निवास’ पुरानी यादों का परिवार है। खैर पहाड़ में कुछ परिवारों का जम-जमाव हो गया। पड़ाव के बीचोंबीच पांगती परिवार का ‘मिलम निवास’ भी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा बन गया। उस दौर में हल्द्वानी के होल्यार बंजारा होली के रूप में दोनहरिया शिवमन्दिर तक जाया करते थे।
समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है परन्तु भोटिया पड़ाव में जाते ही अलग प्रकार की अनुभूति होती थी। हाँ, यहाँ मोहल्ले में आबादी घनी होने लगी थी और जोहार-मुनस्यार से आने वाले व्यापारियों का अड्डा दीवान सिंह जी का ‘सीमान्त ट्रान्सपोर्ट’ हो चुका था। मुख्य बाजार में ओके होटल के पास इस ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की धक थी। 1968 में कालाढूंगी रोड स्थित हमारा छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ जन मिलन का बड़ा केन्द्र बन चुका था, जहाँ पहाड़ के हर कौने से आने-जाने वाले मिलते थे। बाद में यहीं पर बाजपुर बस अड्डा बन गया और तराई क्षेत्रा के लोगों का मिलन केन्द्र भी हुआ। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ शुरु होते ही शक्ति प्रेस व्यापारियों के मिलन का केन्द्र भी बना। संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने रिंगाल के कारोबार के लिये यूपी के व्यापारियों से सम्पर्क बनाए थे। ‘रहमत अली शेख फारुखी’ नाम मुझे आज भी याद है। कई व्यापारी रिंगाल के लिये आते और हिन्दू धर्मशाला इत्यादि स्थानों में रुकते थे। व्यापारियों की अपनी इशारों की भाषा थी जिसे वह हाथ मिलाते हुए रुमाल से ढक कर एक-दूसरे के सौदा कर लेते।
हल्द्वानी का पर्वतीय उत्थान मंच का कार्यालय भी पिघलता हिमालय शक्ति प्रेस ही बना। रामलीला मैदान से शुरुआती शोभा यात्रा निकाली गई थी। बाद में हीरानगर में इसे स्थापित किया गया लेकिन जब तक भवन नहीं बन गया, उत्थान मंच की सारी गतिविधियों का केन्द्र शक्ति प्रेस ही रहा। मुझे भली भांति याद है हल्द्वानी में उत्तरायणी जुलूस को मेले का स्वरूप देने के लिये प्रथम बार स्टाल लगाने का विचार आया तो पिता जी ने सबसे पहले मिलम के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ उत्तम सिंह सयाना और दुम्मर से उनी कपड़ों के लिये जंगपांगी जी को बुलाया। मात्र दो-चार स्टाल लगे थे। अगले साल भी ऐसा ही हुआ। बाद में यह मेला स्टालों की भरमार का बना। समाज में बढ़ती उच्छंृखलताओं को देख पिता जी ने उत्थान मंच को हमेशा के लिये छोड़ दिया। जिस मंच के लिये वह दिन-रात समर्पित थे, उन्होंने क्यों छोड़ा होगा, यह आज आज समझ में आने लगा है……….
पिता जी लेखन में जुटे रहते। तब उन्हें ‘राजजात के बहाने’ कृति के लिये राहुली सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मान मिला था। लगातार धारदार लेखन वह करते रहे। हीरसिंह राणा, गोपालबाबू गोस्वामी मिलने प्रेस में ही आ जाया करते थे। मेले की भीड़ क्या होती है, इस प्रश्न को पिता जी बहुत रोचक तरीके से हमें समझा देते थे। साथ ही पहाड़ के तमाम कौतिकों का उदाहरण देते, जो स्वयंस्पफूर्त होते हैं। पिछले एक दशक में तो हल्द्वानी सहित आसपास उत्तरायणी महोत्सव नाम के ही ढेर लग चुके हैं। तमाम मंच जगह-जगह सजने लगे हैं। इसके अलावा फैलते जा रहे हल्द्वानी में कई प्रकार के जलसे-जुलूसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की संस्कृतियों का गुलदस्ता यह भाबर है लेकिन हर कोई चाहेगा कि वह अपनी जड़ों को पल्लवित करे और अपने संस्कार अगली पीढ़ी तक पहँुचाए। ऐसी ही कोशिश जोहार समाज में भी हुई। शुरुआत में अपने स्थानीय तीज-त्यौहारों साथ जो शुरुआत हुई थी वह होली पूजा के रूप में बेहतर शुरुआत बन गई। माघ की खिचड़ी का आयोजन भी ध्यैनियों के सम्मान में मिलने-जुलने का बड़ा आयोजन बनने लगा। जोहार मिलन केन्द्र आपस में मेल-जोल का शानदार केन्द्र स्थापित हो गया, जिसमें हर आयुवर्ग के लोग आते हैं। ऐसे में उर्जावान युवाओं ने विचार किया कि क्यों न आधुनिक समय को देखते हुए किसी ऐसे आयोजन को अंजाम दिया जाए जिसकी सपफलता बड़ा परिणाम दे।
जोहार की बात और व्यवहार को लेकर कई संगठन हैं लेकिन जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी ने इसे कर दिखाया और ‘जोहार महोत्सव’ के रूप में जो वृक्ष रोपा वह आज हरा है। इसके पहले आयोजन में अनुभव कम था लेकिन उत्साह ज्यादा, जिसका परिणाम यह हुआ कि तमाम जगह से जोहारी बन्धु आयोजन में भागीदार बने। पहले अनुभव के बाद सोसाइटी ने अगले वर्ष इसके स्वरूप में बदलाव किये बगैर आयोजन को तरीके से समेट लिया। इसके बाद आयोजन का स्वरूप लगभग तय हो चुका था और समझ आने लगा था कि हल्द्वानी भाबर मेें किस प्रकार से सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसके स्टालों में जोर दिया गया और व्यावसायिक गतिविधियां द्रुत हुईं। सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिये उन कलाकारों को बुलाया जाने लगा। सांगीतिक दृष्टि से आयोजन का यह हिस्सा बहुत असरकारी होता है, इसका प्रभाव दूरगामी होता है। खैर, आयोजकों ने जोहार की प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा बाहर से कलाकार आमंत्रित किये।
‘जोहार-महोत्सव-मेला-संस्कृति’ की समग्र पड़ताल के बाद आयोजकों को बधाई दी जानी चाहिये कि वह इस बड़े आयोजन को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। साथ ही सुझाव भी है कि आयोजन के ‘जोहार’ नाम अनुरूप इसकी हर हरकत उस संस्कृति की ठहस से भरपूर हो। जिस जोहार नगर (भोटिया पड़ाव) के बसने के समय घोर संघर्ष हुए थे तब इसके फैलाव के बारे में विचार भी नहीं आता था। वर्तमान में हल्द्वानी के अलग-अलग स्थानों पर जोहार वासियों की बसासत है। सारे साधन-संसाधन होने के बावजूद अब वह स्थिति है कि अधुना समय में इसकी चमक और ज्यादा हो।
यह सच भी स्वीकार लेना चाहिये कि समय बदलने की आहट इस बार के महोत्सव में दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोग हमारे बीच नहीं हैं। कुछ समर्पित जन अस्वस्थ्य होने के बावजूद समाज की बेहतरी के लिये जुटे हैं। कई जुझारु जन अपने अनुभवों के साथ इस अभियान को बनाये रखने की कसक लिये हुए दिखाई दिये। देखना होगा समय का चक्र किस दिशा को तय करेगा….

यह पहचान मिटने न दो

डाॅ.पंकज उप्रेती
पिघलता हिमालय के संस्थापक सम्पादक अपने पिता स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुण्यतिथि पर पिछले सालों की तरह इस बार भी आपस में मिलने-बैठने का यह यह अवसर बनाया है। उनकी अष्टम पुण्यतिथि 22 फरवरी 2021 के आयोजन के लिये इस बार का विषय ‘दानवीरांगना लला जसुसी शौक्याणी’ है। वैसे भी हम लोग हिमालय को लेकर हमेशा बातें करते रहते हैं। इस अवसर पर पिघलता हिमालय के संस्थापक चाचा स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया जी का स्मरण भी बना रहता है। पिता और मर्तोलिया जी ने 1978 में जिस मिशन को शुरु किया था, उसी के अनुरूप हम आज 43 साल बाद तक उसे अनवरत बनाए हुए हैं। साथ ही अपनी पूज्य माता और पिघलता हिमालय की सम्पादक रही स्व.कमला उप्रेती के त्याग को याद करते हुए किसी भी आयोजन का साहस कर पाते हैं।
जब-जब हिमालय की बात चलती है मेरे मस्तिष्क में हिमालयी संस्कृति के बहुत से रंग बादलों की तरह उमड़ने लगते हैं, इसके गीत-संगीत, कला-विज्ञान सबकुछ आंखों के सामने होता हैं। हालांकि वर्तमान की उच्छृंखलता ने पहाड़ों को भी दूषित करने की शुरुआत कर दी है। खैर, जो कुछ भी हमारी विरासत बहुत भरी हुई है। जिस काज में ईमानदारी हो, वह हमेशा स्मरण में रहते हैं। हिमालय की तमाम संस्कृतियों की पवित्रता अपनी जगह है, आपाधपी में चाहे कोई कैसा ही चित्रा बनाने लगे पर हिमालय का अपना चित्र है। वह पल-पल रंग बदलता है पर अडिग रहता है, जीवन देता है।
हिमालय की इस गोद में ही लला जसुली देवी हुईं। आश्चर्य होता है कि जिस देवी ने चार सैकड़ों धर्मशालाएं बनवाकर समाज को उपहार में दीं, उसकी ध्रोहरों को हम अपने सामने खण्डहर होता देख रहे हैं। कई में कब्जा हो चुका है और कई का नामोनिशान तक मिटा दिया गया है। यह निशानियाँ किसी एक परिवार की या एक समाज की नहीं बल्कि हम सबकी पवित्रा धरोहरें हैं। लला जसुली शौक्याणी ने तो हिमालय के अनुरूप अपना धर्म निभाया। हिमालय हमेशा से दाता है और फिर भी अडिग है।
मैंने बचपन से अनगिनत किस्से- कहानियाँ अपने माता-पिता से सुने और हिमालयी संस्कृति के उत्साह को देखा। ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में हमारे परिवार का जितना व्यापक सम्पर्क सीमान्त घाटियों में चारों ओर है, उसके लिये में मैं अपने को धन्य मानता हूँ क्योंकि जिस हिमालय में तप के लिये रिषिमुनि रमते रहे हैं, जो शिव की तपस्थली है उसके वासियों से हम जुड़े हैं। अपनी सैकड़ों और मीलों लम्बी यात्राओं में मैने भी कई धर्मशालाएं चारों ओर देखी हैं। आश्चर्य होता था कि दुर्गम स्थानों में कितने मोह के साथ इन्हें निर्मित किया गया था। अपने स्वभाव के अनुरूप इन पवित्र धरोहरों को देख मेरी अश्रुधारा बह जाती है। किस नीयत और किस उदारता के साथ इनका निर्माण करवाया गया था और आज इनको मलवे का ढेर सा मानकर बिसरा दिया गया है। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संगीत विभागाध्यक्ष के रूप में रहते हुए जब भी अवसर मिलता मैं नाग मन्दिर के पुराने अवशेष ;जो महाविद्यालय परिसर के उपर एक टीले में झाड़ियों से घिरा है, लला जसुली की धर्मशाला ;जो थाने के पास झाड़ियों से घिरी है, देखने जरूर जाता। अनगिनत बार इनके पास जाकर देखा और फिर कहीं कल्पनाओं में खो जाता कि अहा, कैसे बनाये हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों में भी इस प्रकार की धरोहरों को देखा है। देखा ही नहीं, उपेक्षित बने हुए इन धर्मार्थ सरायों के भीतर जाकर भी देखा कि कितने जतन से इन्हें बनाया गया था और आज इन्हें उजाड़ने वाले ताक में बैठे हैं। चूंकि सीमान्त की घाटियों में आना-जाना रहा है तो जसुली आमा के बारे में भी बेहद जिज्ञासी थी और मेरे अनगिनत मित्र जो रं समुदाय हैं, वह जानकारी देते रहे। धरमघर के समाजसेवी शौका गंगा सिंह पांगती अक्सर फली सिंह दताल साहब के बारे में बताते रहते थे। लला जसुली के वंशज फली सिंह जी हमारे पिघलता हिमालय के संस्थापक भी हैं। अपनी बंश परम्परा अनुसार इनकी उदारदा और सच्चाई हर किसी को प्रभावित करती है। अपने पूज्य पिता की स्मृति में होने वाले आयोजन में इन्हें भी सम्मानित करने का गौरव मिला। उस अवसर पर श्री दताल द्वारा जिस प्रकार से अपनी पीड़ा को प्रकट किया गया वह हम सबकी पीड़ा थी। लला जसुली के त्याग और तपस्या को पहली बार खुले मंच से उन्होंने इतनी भावुकता से बताया कि उपस्थित गणमान्य जन चकित थे। उस अवसर पर विद्वान प्रोफेसरों ने इस विषय को महत्वपूर्ण बताया और शोध् छात्रों को भी नई जानकारियां मिलीं। मुझे तब भी आश्चर्य हुआ कि जिस दान वीरांगना का इतना बड़ा योगदान समाज में रहा है और उसकी सातवीं पीढ़ी आज भी उन ध्रोहरों को बचाने की गुहार लगा रही है, उसके बारे में अधिकांश को पता ही नहीं है। हमने उसी दिन तय कर लिया था कि इस प्रकरण पर अब चुप नहीं बैठेंगे और ‘पिघलता हिमालय’ बराबर इस प्रकरण पर लोगों का ध्यान आकृष्ट करता रहा है। खुशी होती है कि हमारे प्रशासन ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। साथ ही जागरुक जन हमारे इस अभियान में साथ हैं। यह हम सबका पुनीत कर्तव्य भी है। भाई, यह पहचान मिटने न दो………..

संघर्षमय रहा जिनका पूरा जीवन

पत्रकारिता के मिशन को जिस लगन से स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने शुरू किया था, उसे बनाये रखने वाली कमला उप्रेती की 15 सितम्बर 2019 को प्रथम पुण्यतिथि है।
जिन्दगी को आन्दोलन बना चुके आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हुए आपने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जिन्दगी के सफर में रोग-शोक से लड़कर भी बच्चों को हौंसला दिया। घर-परिवार और गाँव के सारे लोगों को आपका ममतामयी स्पर्श हमेशा बांधे रहा। अपने सीमित साधनों में घर-गृहस्थी चलाते हुए सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका आपने निभाई। बहुत विपरीत स्थितियों में भी आपके बोल संस्कारों से भरे थे। ‘जशौदा मैया तेर कन्हैया बड़ो झगड़ी, झन लगाया गोरु-ग्व्ाला हमन दगड़ी’ जैसे भजनों से लेकर होली के आशीष तक के गीत गाने वाली इस माँ ने जीवन की सच्चाई को हमेशा सामने रखा और गुनगुनाया- ‘संग्राम जिन्दगी है लड़ना इसे पड़ेगा….।’
66 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस तक अपने मिशन के लिये जिस साहस से आप लड़ीं वह चिंगारी बुझ नहीं सकती है। पिघलता हिमालय का यह अंक आपको समर्पित।

सामाजिक आन्दोलनों में राजनीति ठुकराई कमला जी ने

टी.सी.पपनै
कमला बहिन जी से मेरा सम्पर्क सन् 1990 से था जब मैं लोक चेतना मंच से जुड़ा। बहिन जी एक प्रखर समाज सेविका के साथ महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रबल कार्यकर्ता भी थी। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से तो मेरा सम्पर्क वर्ष 1980 से था ही जब हम लोग साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मिला करते थे। उप्रेती परिवार से मेरा पारिवारिक सम्बन्ध् रहा है। एक दुर्घटना में जब मेरा हाथ फैक्चर हुआ था और मैं अस्पताल में भर्ती था तो बहिन जी ने जिस आत्मभाव से साथ दिया मैं कभी नहीं भूल सकता।
श्रीमती कमला उप्रेती आन्दोलनों की अगुवाई में कभी अग्रिम पंक्ति में रहती थीं तो कभी सबको धकेलने के लिये पीछे अपने साथियों के साथ। आन्दोलनों में उनका यह स्वभाव ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन’ में खूब दिखाई दिया। पृथक राज्य के लिये लड़ी गई लड़ाई में उन्हें भी आम आन्दोलनकारियों की तरह कोई गुमान नहीं था। बस, आन्दोलनकारी होने की खुशी थी। राज्य के लिये छिड़े ऐतिहासिक आन्दोलन में वह हल्द्वानी की सड़कों पर महिला शक्ति के साथ निरन्तर रहीं। होने वाली सभाओं की अध्यक्षता करते हुए वह युवा आन्दोलनकारियों को ललकाती थीं- ‘यह लड़ाई बच्चों के भविष्य की लड़ाई थी। इसका नेतृत्व स्वयं करना होगा।’
राज्य आन्दोलन के दौरान हल्द्वानी में हुए पुलिस लाठीचार्ज में घायलों में वह भी थीं। लेकिन उन्होंने प्रतिदिन होने वाले प्रदर्शन में जाना नहीं छोड़ा। राज्य बनने और उसके नाम पर सुविधा लेने वालों की होड़ कमला जी को बेचैन करती थी। वह कहतीं- ‘राज्य की लड़ाई नेता बनने के लिये थोड़ा ही लड़ी है।’ बाद को जब राज्य आन्दोलनकारियों को सरकार की ओर से प्रमाण पत्र दिये गये तो उन्हें भी इसके लिये बुलवाया गया। जब सरकार द्वारा राज्य आन्दोलनकारियों के लिये पेंशन प्रावधन किया गया, वह हँसती और कहती- ‘‘अब मैं पेंशन वाली हो गई हँू।’ क्योंकि जरूरत के समय भी उन्होंने सरकार से ऐसी याचना नहीं की थी। न ही उनके मन में कभी ऐसा विचार आया।
नेतृत्व का गुण उन्हें नेता बनाये हुआ था लेकिन अपने संस्कार और गृहस्थी के साथ सामंजस्य रखते हुए वह केवल सामाजिक आन्दोलनों का हिस्सा बनी। भ्रष्टाचार के खिलापफ वह एकदम गरज पड़ती थी। उनकी सभी महिला साथी आज उन्हें याद करती हैं, जो जानती हैं कि सामाजिक आन्दोलनों के आगे पहली जिम्मेदारी घर-गृहस्थी है। घर को संवार देना किसी भी महिला का सबसे बड़ा आन्दोलन है। वह धर्मपरायण थी लेकिन मंच सजाकर ढोंग का प्रवचन करने वालों के खिलाफ मुखर थीं। श्रीमती उप्रेती के सामने राजनीति के कई मौके आये लेकिन वह टाल गईं। वह जानती थी कि एक-एक, दो-दो व्यक्तियों की पार्टी भी उत्तराखण्ड में बनी हुई है। उत्तराखण्ड क्रान्तिदल को क्षेत्रीय पार्टी के रूप में वह पसन्द करती थीं। इसके अलावा बड़ी पार्टियों की नीतियाँ उन्हें रास नहीं आई। भीड़ एकत्रित करने के लिये वह मनोनीत होने से भी मना कर देती। हाँ, किसी भी पार्टी की जो बात उन्हें भा जाती उसमें वह समर्थन करती। इसके लिये वह भाकपा माले के प्रदर्शन में भी शामिल हुई थी। कांग्रेस के समर्थन में जुटी थीं। कांग्रेस की अकड़ पर भाजपा के नेता का समर्थन किया था। स्पष्ट निर्णय लेने वाली समाजवादी पार्टी के लिये भी वह बोली और जनता पार्टी के समय उसकी नीतियों पर भी उसके साथ थी। राष्ट्रीय दलों से कई बार उनके मनोनयन के लिये पत्रा आए लेकिन वह टाल गईं और न ही उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता ली। नेतृत्व के गुण होने के कारण ही वह पालिका चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक बूथ में गड़बड़ करने वाले किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को झिड़क देती थीं।
राजनीति की हलचल को परखने और जानने के बाद वह अपने मिशन पर अडिग थीं। महिला संगठनोें के साथ जुड़कर वह शिक्षा व सामाजिक कार्यों में रुचि लेती। इसके लिये कई बार उन्हें सम्मानित किया गया था। बेवाक बोलने वाली कमला जी पत्रकारिता के घराने से थीं तो उन्हें किसी भी अधिकारी या नेता से सम्वाद करने में झिझक नहीं थी लेकिन वह अपने दायरे में रहकर ही सम्वाद करतीं। सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर वह कार्यों में जुड़ी रहीं। लोक चेतना मंच की सक्रिय महिला सदस्य के रूप में उनकी भूमिका थी। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में उन्होेंने जनपक्षीय मुद्दों को उठाया और हिमालय संगीत शोध् समिति की अध्यक्ष के रूप में बच्चों और बड़ों का मार्गदर्शन किया।
सेनि. तहसीलदार, समाजसेवी

जन चेतना का गढ़ रहा है शक्ति प्रेस

धीरज उप्रेती
महानगर की शक्ल ले चुके हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड की सूरत भी अब बदलती जा रही है। कभी इस सड़क पर फड़ों का छोटा सा बाजार और दूर जाकर पीलीकोठी मुख्य स्थान हुआ करता था। उसके बाद उँचापुल। तब कहीं जाकर कठघरिया, फतेहपुर का ग्रामीण इलाका। मुखानी नहर चैराहे के बाद यह सारे गाँव बसे थे। आज कुछ पहचान नहीं आता है। चारों ओर फैल रहा शहर महानगर का आकार ले चुका है। कालाढूंगी चैराहा शहर का मुख्य चैराहा है, इसी सड़क पर हमारा छापाखाना शक्ति प्रेस तमाम सामाजिक आन्दोलनों का मुख्यालय बनकर रहा। इस पुराने भवन में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेसवार्ता, आन्दोलनकारियों की भीड़ हमेशा रही। यही मेरा जन्म स्थान है। बचपन के खेलकूद, पढ़ाई और संगीत सबकुछ इसी माहौल में हुआ। जन चेतना के इस गढ़ का अपना इतिहास है।
समय के साथ सब बदलता जायेगा लेकिन कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो केन्द्रबिन्दु बनकर इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। शक्ति प्रेस का यह ठिकाना भी ऐसा ही है। मैंने बचपन से प्रेस/घर के हिस्से में अन्तर ही महसूस नहीं किया। सबकुछ तो हँसीखुशी के माहौल में होता था। आज घुट से रहे हल्द्वानी शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है लेकिन अपनापन नहीं है। अपनों के बीच बसने की चाह लेकर पलायन कर रहे लोग भीड़ में खो चुके हैं। बैठने के पुराने अड्डे नहीं रहे। दौड़भाग की शक्ल वाला यह शहर सिर्फ बाजार बनकर खड़ा है, जिसमें बेचने और बिकने वालों की बात हो रही है। ऐसे में सावधान रहने की जरूरत है। पुराने जमाने की लकीर भले न पीटी जाए लेकिन उसकी मान्यताओं को रखना जरूरी है।
हमारे गाँव कुंजनपुर, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के सीमान्त से ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों के अलावा तमाम जगह से लोगों का आना-जाना था। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर के लिये चार-पाँच बसों का अड्डा हमारे छापाखाने के बगल में खुल गया। वर्षाें बाद 80 के दशक में यह बस अड्डा बड़ा आकार ले चुका था और करीब अस्सी बसें इसमें थीं लेकिन इसे हटाना जरूरी था। तब कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के लिये शासन-प्रशासन बौना दिखाई दिया। ऐसे में उग्र आन्दोलन ही सहारा था। मैंने यह पहला आन्दोलन देखा जिसकी अगुवाई ईजा ने की। इसमें धरना- प्रदर्शन, ज्ञापन से कुछ होने वाला नहीं था। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती ने कई बसों के शीशे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के शीशे तोड़ने को खेल मानकर जुट जाते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग बस अड्डे से जुड़ चुके थे और मनमानी चाहते थे। ऐसे में सबकी नज़रे ‘शक्ति प्रेस’ पर होती। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में डीआईजी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके शीशे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्ध जनों की बैठक यहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में जुड़ीं। गायत्री परिवार के अभियान से जुड़कर उन्हें सहयोग किया। आन्दोलन के साथ विचार-विमर्श के इस अड्डे से कई अन्य आन्दोलन भी संचालित हुए, जो सामाजिक सौहार्द व दिशा देने वाले थे।

फरवरी 2019

उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था

मथुरादत्त मठपाल
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से मेरा परिचय कोई 37-38 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं एक कुमाउनी काव्य समारोह में भाग लेने हेतु हल्द्वानी आया हुआ था। एक अति साधरण सा दिखने वाला व्यक्ति वहाँ एक मकान की छत लगाई गई रसोई में भोजन व्यवस्था में संलग्न था। पास ही एक दुबली-पतली सी महिला बैठी उनका हाथ बटा रही थी। उन्होंने अपना परिचय स्वयं ही दिया कि वे आनन्द बल्लभ उप्रेती हैं, ये कमला जी हैं। मैंने मजाक में कहा, ‘आप दोनों एक ही पार्टी के लगते हैं।’ हम तीनों ही हँस पड़े। तब से मैं जब भी हल्द्वानी आता प्रायः उनके ‘शक्ति प्रेस’ में कुछ देर अवश्य बैठता था। वही सैंतिस-अड़तिस वर्ष पूर्व देखे गये आनन्द जी-कमला जी में कोई फर्क मैंने कभी अनुभव नहीं किया। भीतर के अंधेरे कमरे में उनका ट्रेडिल प्रेस चलता रहता, बाहर के कमरे में ‘पिघलता हिमालय’ साप्ताहिक पत्र का काम चलता रहता। दो-तीन अति साधरण सी कुर्सियाँ-एक बैंच और कोने पर सटा कर रखा हुआ एक बड़ा सा बैंच। आगे चलकर जब कम्प्यूटर- फोटोस्टेट का काम खोला कमरे का हुलिया वही रहा। हाँ भीतर के कमरे में खटर-पटर अब नहीं होती थी। बहुत धीरे से स्वर में आनन्द जी बतियाते- प्रायः कुमाउंनी में ही। ‘ओहो, और्री है गो’ जैसा कोई तकिया कलाम बीच-बीच में लगता रहता।
समय के साथ-साथ ज्यों-ज्यों आनन्द जी से मेरा परिचय गहराता गया मुझे उनके अन्दर एक बालक की तरह सरल-निष्कपट- सपाट व्यक्ति के दर्शन होते गये। एक पत्राकार की उनकी गहरी ईमानदारी, आर से पार तक और बहुत दूर तक देखने की सामथ्र्य वाली उनकी दृष्टि, बिना लाग- लपेट या कोई मुलम्मा चढ़ाये पत्रकारिता के अपने मिशन के प्रति कर्तव्य निष्ठता, सुख-दुःख में समभाव रख सकने की उनकी चारित्रिक विशेषता, अपने समकालीन समाज और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले एक जागरूक मनीषि की सी मेध से सम्पन्न व्यक्तित्व आदि गुणों के कारण में उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व का कायल होेता गया। लेकिन उनके जीवन के अनेक पहलू मेरी नजरों में तब उजागर हुए जब मैंने उनके विस्तृत साहित्य का अध्ययन किया। अपने प्रारम्भिक प्रकाशन तो उन्होंने स्वयं ही मुझे दिये थे, बाद वाली कृतियाँ उनके परिजनों ने मुझे सुलभ करवायीं थीं। मुझे सुखमय विस्मय होता है कि आनन्द जी जितने प्रखर पत्रकार थे उतने ही मेधावी रचनाकार भी। वे एक भावुक कवि, मानव मन के सफल चितेर कहानीकार, एक सतत यायावर, निबन्धकार आदि बहुत कुछ थे।
कमला जी के साथ आनन्द जी का विवाह फरवरी 1971 में हुआ था। कमला जी रानीखेत के एक सम्भ्रान्त परिवार की कन्या थी। मुझे याद है वर्षों पहले रानीखेत सदर बाजार में ज्वाला प्रसाद एण्ड सन्स में हम लोग जाया करते थे, जो इन्हीं परिवार का है। प्रतिष्ठित व्यवसायी ज्वालाप्रसाद जी स्वयं गद्दी पर बैठे दिखाई देते थे। शहर में रहने के कारण कमला जी ने गाँव का जीवन कम ही देखा था। उप्रेती जी का जीवन एक फक्कड़ का जीवन था। ‘काम-क्रोध्-मद-मान न मोहा’ वाली स्थिति थी। सौभाग्य से उन्हें जीवन-संगिनी के रूप में एक ऐसी महिला मिली जो उनके साथ पग से पग मिला कर चलीं। इससे एकदम अकेले संघर्ष कर रहे उप्रेती जी को जीवन का एक स्थायी सम्बल प्राप्त हुआ। वे हल्द्वानी में अपना प्रेस चलाते, पत्र निकालते और सामाजिक- सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी करते रहते थे।वे किसी दल, धड़े या मोर्चे से कभी नहीं जुड़े। एक ईमानदार पत्रकार की भाँति वे आम जन के सुख-दुःखों को ही अपनी लेखनी से उजागर करते रहे। उधर कमला जी को अपनी ससुराल गंगोलीहाट में अपने बड़े परिवार के साथ रहना था। ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने ग्राम्य जीवन के सारे काम-काज सम्भाल लिये थे। बड़े पुत्र के जन्म के पश्चात पति-पत्नी एक माह के नन्हें शिशु को लेकर हल्द्वानी चले आये। ‘शक्ति प्रेस’ भवन में गृहस्थी जम गई। छोटे पुत्र और कन्या के जन्म के पश्चात कमला जी अस्वस्थ रहने लगीं। घर-गृहस्थी और व्यवसाय की सारी जिम्मेदारी आनन्द जी के कन्धें पर आ पड़ी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने अपने पत्र ‘पिघलता हिमालय’ का प्रकाशन बनाये रखा। कमला जी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थीं। इस अन्धकार में प्रकाश की किरण के रूप में उनके सामने तीनों बच्चे ही थे। समय बीता, कमला जी भी कुछ स्वस्थ हो गईं, ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं उन्हें संस्कारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘पिघलता हिमालय’ भी गति पकड़ चुका था। नन्हा पंकज भी पिता के कामों में हाथ बटाने लगा था।
समय ने अपने कितने ही रूप दिखाये- रंग दिखाये लेकिन उप्रेती दम्पत्ति ने न अपना धैर्य छोड़ा और न अपना पत्रकारिता का मिशन ही छोड़ा। वे स्वयं में एक संस्था थे- एक आन्दोलन थे। कुछ पँूजी का प्रबन्ध् हुआ तो उन्होंने जे.के.पुरम्, सेक्टर-डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में अपने परिवार की आवश्यकता भर की पूर्ति कर सकने में सक्षम एक छोटे से आशियाने को बनाया। इसी बीच 22 फरवरी 2013 ई. के दिन वे आनन्द जी एकाएक चिरनिद्रा में सो गये। ऐसे में उनकी अद्र्धांगिनी कमला जी ने साहस के साथ उनके मिशन को संभाला और अपने बच्चों को सौंपकर 15 सितम्बर 2018 को वह भी विदा हो गईं। उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था। सामाजिक कार्यों में उनका हस्तक्षेप दिशा देने वाला था।

आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!

हरीश पन्त
कहते हैं तूफान में जब दिशा बोध् असम्भव हो जाता है तो दीप स्तम्भ की बत्ती अपने स्थान से उठ जहाज के आगे पानी में तैरते हुए नाविकों का मार्ग दर्शन करती है। कुछ ऐसी ही व्यक्तित्व था पिघलता हिमालय परिवार के लिए स्व. कमला उप्रेती का।
अस्वस्थ्य होने के बावजूद विषम परिस्थितियों में आनन्द बल्लभ उप्रेती जी के सारे संघर्षों, उपलब्धियों और पारिवारिक सामाजिक कार्यों को संवारने की विलक्षणता उनमें अद्वितीय थी।
वेदना में एक शक्ति है जो दृष्टि देती है और जो वेदना में है वही दृष्टा हो सकता है। सन् 1977-78 के दौरान नैनीताल समाचार के प्रकाशन शुरू होने के बाद ही पिघलता हिमालय परिवार यानि उप्रेती जी के संसर्ग में कालाढूंगी रोड शक्ति प्रेस से सम्पर्क हुआ तो आज तक वह अपना ही लगता है बावजूद न उप्रेती जी रहे न कमला जी! पर वह आत्मीयता आज भी पंकज, धीरज व परिवार के साथ यथावत है।
स्व. उप्रेती दम्पति के साथ औपचारिक दाज्यू-भाभी वाला सम्बोधन न हो कर आनौपचारिक साहब! और काँ छाँ हो, कै कर्न छा हो! ही रहा।
90 के दशक में गम्भीर बीमार हो कर हल्द्वानी में चैकअप के दौरान एक महीने तक जिस ममत्व से उन्होंने मेरी देखभाल की उससे उरिण तो मैं ता जिन्दगी नहीं हो पाउँगा पर उनका यह भाव बिना किसी लाग लपेट के सभी आगंतुक परेशानी में घिरे लोगों के साथ निस्वार्थ रहता था।
शक्ति प्रेस व पिघलता हिमालय की आर्थिकी को सम्भालने में कमला उप्रेती की विशेष भूमिका रहती थी जो कि उदारमना उप्रेती जी में कम ही थी।
वह बहुत ही स्पष्ट खरी-खरी कहने की वजह से शायद कुछ लोगों को खटकती हो पर वह खुली व स़ापफगोई पसन्द व्यक्तित्व की स्वामिनी थी।
उप्रेती जी के नहीं रहने के बाद जिस कुशलता और एकजुटता से पूरे परिवार को खराब होते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने संभाला वह हिमालय संगीत शोध् समिति की उत्तरोत्तर प्रगति का स्पष्ट प्रमाण है। होली आयोजन, उप्रेती जी की पुण्यतिथि के आयोजन व सम्मान समारोह, संगीत की बैठकें सब में उनका सक्रिय सहयोग, मार्गदर्शन और आतिथ्य अद्भुत व पूरे परिवार को साहस से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था और अब उनके ना रहने पर भी उनकी अमिट छाप पिघलता हिमालय व हिमालय संगीत शोध् समिति पर छाई रहेगी। कवि रुस्तम की कविता के साथ-
समय कुछ ढँूढता था।
समय कुछ टटोलता था।
रात को, अकेला,
शहर की गलियों में
अपने आप कुछ बोलता था।
उसकी आँखों में क्या बिम्ब होते थे?
समय क्या सोचता था?
किसे याद करता था समय?
किसी अन्य समय को?
और किसे भूलता?
मैं दूर से उसके पीछे पीछे घूमता था,
सिर्फ दूर से।
कमला उप्रेती आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!