पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
एन.सी.तिवारी से बातचीज डॉ.पंकज उप्रेती यह सच्चाई है कि सुख-दुःख के साथी और समय हर हमेशा मस्तिष्क में छाए रहते हैं। वर्तमान की दिखलावटी दुनिया में भले ही बहुत रंगीन नजारे खुशनुमा दिखते होंगे लेकिन इनकी रंगीनियत वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। जीवन के गहरे अनुभव और समाज में हमेशा सक्रियता निभाने वाले श्रीमान नवीन चन्द्र तिवारी (एन.सी.तिवारी) जीवन के उत्तरार्द्ध में भी समाज के लिये जीवट बने रहने का जोश अपने साथियों और युवाओं को दिलाते हैं। हल्द्वानी के जगदम्बानगर निवासी तिवारी जी की यादों में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी तक लम्बा सपफर है जिसमें नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं। बातचीज में वह कहते हैं- ‘दुर्गा-आनन्द स्मृतियों में हर वक्त हैं।’ ‘पिघलता हिमालय’ की स्थापना के समय और उससे पहले से ही इसके संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ जिस प्रकार की प्रगाढ़ता इनकी रही है वह परिवार के सयाने की ही हो सकती है। अल्मोड़ा के शैल ग्राम निवासी श्रीबल्लभ तिवारी के सुपुत्र थे- कृष्णानन्द तिवारी। ये परिवार मूल रूप से सोमेश्वर के बेगनिया ग्राम का हुआ। माता दुर्गा देवी और पिता कृष्णानन्द जी के परिवार में 8 सन्तानें हुईं, जिनमें सबसे छोटे थे- नवीन तिवारी। 5 भाई 3 बहिनों में एन.सी.तिवारी बेशक छोटे रहे हों लेकिन अवसरों पर आगे बढ़ते हुए इन्होंने अपने रास्ते तय किये और सन् 1971 मंे इनका विवाह निर्मल जी के साथ हुआ। इनके परिवार में दो बेटियां प्रीति, संगीता (गुड़िया) और पुत्र विजय हुए। सभी गृहस्थ आश्रम के साथ अपनी परम्पराआंे से जुड़े हैं, जो उन्होंने श्रीमती निर्मल-श्री एन.सी.तिवारी से पाया। अल्मोड़ा से बीएससी करने के बाद तिवारी जी इलाहाबाद पढ़ने गये लेकिन स्कूल-कालेज की शिक्षा से ज्यादा व्यवहारिक शिक्षा में रमने वाले एन. सी.तिवारी के भाग्य में कुछ और ही था। अल्मोड़ा में पढ़ाई के दौरान उनके साथियों में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी थे। यह विज्ञान वर्ग में थे जबकि मर्तोलिया कला वर्ग में। वह बताते हैं- ‘हमारे ग्राम शैल के प्रतिष्ठि व्यापारी नारायण तिवारी जी ने अल्मोड़ा के जिस जगह पर देवालय बनाया, उस स्थान को नारायण तिवारी देवाल बाजार कहने लगे और धीरे-धीरे एनटीडी नाम प्रचलित हो गया। इसी क्षेत्र में सीमान्त क्षेत्रा के व्यापारी आते थे और यही जोहारी भाईयों का मुख्य केन्द्र था। ज्यादातर डॉ.दरवान सिंह के आवास पर भी रहते थे। बाद में और ज्यादा विस्तार हुआ। सन् 1947 में रिफ्रयूजी भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे थे। इनके स्कूल के साथी गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, बीरशिवा स्कूल के संस्थापक एन.एन.डी.भट्ट, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, दरवान सिंह, उत्तम सिंह वहीं मिले थे। उस दौर में पढ़ाई के बाद ज्यादातर शिक्षक बने और फिर उच्चपदों पर आसीन रहे। हल्द्वानी दोनहरिया निवासी लक्ष्मण निवास का नाम हमेशा से अग्रणीय रहा है इस परिवार के बाला सिंह, सत्यवान सिंह जंगपांगी, सेल्सटैक्स कमिश्नर पुष्कर सिंह, जज उत्तम सिंह पांगती, दुर्गा सिंह अच्छे साथी रहे हैं।’ इण्टर के बाद इलाहाबाद पढ़ाई गये तिवारी जी अधूरी पढ़ाई से जब लौटे तो कुछ महीने कौसानी में अध्यापकी करने लगे। इसके बाद बिड़ला मिल सिरपुर कागजनगर, आन्ध्रप्रदेश मेें अपने बड़े भाई के पास चले गये जो बिरला कागज फैक्ट्री में थे। 1938 में स्थापित भारत की सबसे पुरानी यह पेपर मिल्स को हैदराबाद मिर उस्मान अली खान द्वारा स्थापित किया गया था। 1950 में बिरला परिवार ने इसका अधिग्रहण किया और 2018 में जे.के. पेपर लि. ने इस मिल का अधिग्रहण कर लिया। बिरला की इस फैक्ट्री में एन.सी.तिवारी क्वालिटी कन्ट्रोल का काम देखने लगे, कुछ समय बाद पेपर मैकर बन गये। सन् 1968 में मशीन में दुर्घटना होने के बाद इन्होंने विचार बदला और अपने गाँव से इतनी दूर आ चुका हँू, भाई भी यहीं है, क्यों न घर चल जाउँ। फिर से शैल ग्राम अल्मोड़ा आ गये। कुछ दिन रुकने के बाद हल्द्वानी का रुख किया। अल्मोड़ा में जहाँ इनकी मुलाकात दुर्गा सिंह मर्तोलिया से हुई थीं वहीं हल्द्वानी में आनन्द बल्लभ उप्रेती से हुई। तब तक ‘पिघलता हिमालय’ अखबार के बारे में चिन्तन नहीं हुआ था। हल्द्वानी में स्वरोजगार के क्रम में यह अपने को आजमाते रहे और सफल नहीं हो रहे थे। खुली चाय का कार्य भी किया लेकिन इसका प्रचलन न होने से उसे छोड़ पेपर एजेंसी ले ली। अनुभव तो था लेकिन दूर-दूर तक उधरबाजी से इस काम को भी बन्द कर दिया। उन दिनों में आनन्द बल्लभ उप्रेती का छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ खुला और वह पत्रकारिता में पहले से सक्रिय थे ही। तिवारी जी बताते हैं कि युवाओं और गपोड़ियों के बैठने का अड्डा कालाढूंगी रोड स्थित ‘शक्ति प्रेस’ हुआ करता था। दाँतों के डाक्टर बी.सी.पन्त, वकील जीवन जोशी, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह डसीला तमाम लोगों का मिलना जुलना बराबर था। कुछ अन्तराल में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी ‘शक्ति प्रेस’ में आए और उप्रेती जी के साथ एक प्रण सा हो गया कि अपना अखबार निकालना है। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ की शुरुआत हो गई। जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव सभी साथियों ने देखे और एक-दूसरे की परेशानियों को समझा-महसूस किया। तिवारी जी बताते हैं कि स्वरोजगार के क्रम में उन्होंने पहली बार सोपस्टोन इन्डस्ट्रीज की स्थापना कर डाली। छोटी मुखानी हल्द्वानी में 1973 में इसे स्थापित किया गया। बागेश्वर में खड़िया कार्य के शुरुआती दिन थे। बहुत मुश्किलों से तब खड़िया कारोबार का बाजार बना था, एक प्रकार से इसका परिचय ही हुआ। कुछ सालों तक सपफल कार्य करने के बाद तिवारी ने इस कारोबार को समेट दिया। आज भी छोटी मुखानी का वह क्षेत्र खड़िया फैक्ट्री नाम से ही जाना जाता है। अपने कारोबार और घर-परिवार के साथ कदम से कदम आगे बढ़ रहे तिवारी जी ने अपने साथियों और समाज की भलाई के लिये भी कदमताल कम नहीं की। होली हो या दीपावली उसकी रंगत बनी रहे इसके लिये इनका ध्यान पूरा था। वह बताते हैं कि हल्द्वानी में छोटा सा बाजार और दूर-दूर तक छिटके आवास थे। साइकिल से आना-जाना होता था और होली मिलने के लिये एक दूसरे के वहाँ अनिवार्य रूप से जाते थे, एक बार जेलरोड में पत्थरबाजी की घटना ने माहौल खराब किया था। पहाड़ की होली के लिये हीराबल्लभ पन्त जी के वहाँ सभी जुटते थे। रामपुर रोड में बालमुकुन्द तिवारी के घर में बैठकी होली के अलावा जगदम्बा नगर में इनके अपने आवास पर होली की बैठक जमती थी। रेंजर हीरा बल्लभ जी, रमेश चन्द्र, अल्मोड़ा से तारा प्रसाद ‘तारी मास्साब’, जगदीश उप्रेती ‘जग्गन’ से रातभर रागों में भरी होलियों सुनने को मिलती थीं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े एन.सी. तिवारी जी जनमुद्दों को लेकर हमेशा अगुवाई करते रहे हैं। जमरानी बांध बनाने के आन्दोलन के क्रम में श्री नवीन चन्द्र वर्मा के साथ मिलकर इन्होंने पीआईएल तक डाली जिसमें विभाग को जुर्माना पड़ा था। व्यापारी हितों के लिये भी इनकी भागीदारी कम नहीं रही। वह बताते हैं कि सन् 1992 में अलीगढ़ में व्यापार मण्डल का सम्मेलन हुआ, तब बाबूलाल जी को कुमाउँ का प्रभारी बनाया गया और उन्हें कोषाध्यक्ष। पृथक पर्वतीय राज्य के बाद सन् 2001 में उ.प्र. से अलग होकर उत्तराखण्ड का व्यापार मण्डल बना। इसके लिये गाजियाबाद में यूपी के अध्यक्ष श्याम विहारी एमपी सहित तमाम साथी थे। उत्तराखण्ड व्यापार मण्डल के लिये रीषिकेश के यशपाल अग्रवाल अध्यक्ष, हल्द्वानी से बाबूलाल गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष, देहरादून से अनिल गोयल महामंत्री, नवीन वर्मा उप महामंत्राी, एनसी तिवारी कोषाध्यक्ष बने। राज्य आन्दोलन के दौरान अगुवाई करने वाले एन.सी.तिवारी कहते हैं- मुलायम सिंह का जमाना था और पुलिस का सख्त पहरा। आरक्षण विरोधी आन्दोलन में सुलग रहे युवाओं को जेल भेजा जा रहा था तब हल्द्वानी में छात्र अभिभावक संघर्ष समिति का गठन हुआ जिसमें वह सह संयोजक बने। इस बीच अज्ञात उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा द्वारा इन्हें जान से मारने की ध्मकी तक दे दी गई। मानसिक तनाव व अन्य प्रकार से दबाव देने वाले तिवारी जी के पीछे लगे रहे लेकिन ये विचलित नहीं हुए बल्कि और सूझबूझ से कमान संभाली। राज्य आन्दोलन का स्वरूप बढ़ता गया और सारे सरकारी संगठन इस समिति से जुड़ गये। जब दिल्ली में प्रदर्शन की बात हुई तो शासन-प्रशासन का पहरा था। जाने की अनुमति नहीं थी, ऐसे में कोर्ट से चालीस बसों को ले जाने की अनुमति ले ली गई। वह कहते हैं कि पुलिस का इरादा था आन्दोलनकारियों को हल्द्वानी से आगे ही न बढ़ने दिया जाए। गढ़वाल में भी ऐसा ही हुआ और दिल्ली जा रहे आन्दोलनकारियों के साथ रामपुर तिराहा काण्ड हुआ था। हल्द्वानी मे भी रामपुर तिराहा काण्ड कराने की पूरी साजिश थी लेकिन किसी प्रकार पूरे आन्दोलन को सही दिशा दी गई और आन्दोनकारी युवाओं को बचाया गया। बातचीज में तिवारी जी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं- जितना किया बहुत था, अब नई पीढ़ी ने इस शहर और प्रदेश को संवारने में जुटना चाहिए। पिघलता हिमालय परिवार में संरक्षक की भूमिका रखने वाले श्री तिवारी के सुपुत्र विजय तिवारी भी सुलझे हुए युवा उद्यमी हैं और उन पुरानी परम्पराओं को अपने बचपन से समझते हुए आगे बढ़ रहे हैं। कामना है उनकी चाह सफल रहे।
चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है….। चार-छः जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल के बच्चे समवेत स्वरों में गाकर सरकार द्वारा आवंटित क्वाटर से बाहर मुझे समाचार पत्रा पिघलता हिमालय देने के लिए खड़े थे। मैंने पूछा कि तुम आज पंकज उदास की गज़ल क्यों गा रहे हो? बच्चों ने कहा कि सर आपको आपकी वतन की चिट्ठी आई है। मैं आश्चर्यचकित था मेरी चिट्ठी!! तब बच्चों ने पिघलता हिमालय दिखाते हुए कि सर आप इसे चिट्ठी ही तो कहते हैं। ये चिट्ठी ही हमें गाँव गोठार, मेले ठेले, बांज बुरांश, सुख-दुःख, तीज त्यौहारों की खबरें/निमंत्राण लेकर आती हैं। तब मुझे याद आया कि एक दिन मैं अपने वार्डन रूम के बाहर पिघलता हिमालय पढ़ रहा था कि बच्चों ने पूछा कि सर आप कौन सासमाचार-पत्र पढ़ रहे हो तो प्रत्युत्तर मैने चिट्ठी- पाती कहा।और बताया कि यह हिमालय की आवाज है, यह सीमांत लोगों की सांसें है। तब से मेरे स्कूल के बच्चे भी कहने लगे कि सर हम भी चिट्ठी – पाती पढ़ेंगे। मैने बताया यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र है जो सप्ताह में नियमित रूप से पोस्टऑफिस से आता है पहले आप लोग पढ़ लेना फिर मेरे पास भिजवा देना। मुझे भी तो पढ़ना है! तब से बच्चे हर सप्ताह चिट्ठी के इंतजार में रहते हैं। जैसे ही पोस्टमैन विद्यालय में डाक देने पहुंचता है तब विद्यालय के छात्र पिघलता हिमालय के लिए दौड़ लगाते है वैसे भी छात्र जो घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं वे सब अपने आसपास गांव घरकी आदिल कुशल जानने के लिए बेताब होते हैं।आज के सोशल मीडिया के दौर में भी पिघलता हिमालय अपनी पाती द्वारा लोगों को अपनेपन की भावों से जोड़े रखने के प्रयासों की बच्चे खूब सराहना करते हैं। वेदांग ढौंढियाल जो कक्षा 11वीं का छात्र है पिघलता हिमालय के बारे में विचार देते हुए बताता कि यह समाचार पत्र नहीं हमारे संस्कृति की संवाहिका है। प्रणव कुमार कक्षा 11वीं छात्र को झकरुवा भूली के फ़सक बहुत पसंद है। कक्षा 9 वीं के छात्र श्रेष्ठ सिंह को हमारे संरक्षक/ बुजुर्ग पर आलेख बहुत पसंद है। तन्मय ध्यानी कक्षा 10 वीं के छात्र को हमारी संस्कृति विरासत फीचर/प्रसंग बहुत भाता है। कक्षा 9 वीं के छात्र यशपाल पर्यटन स्थलों की जानकारी से संबंधित लेख पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है। विनय कुमार को हमारे प्राकृतिक संसाधनों की उपेक्षा पर प्रसंग रुचिकर व ज्ञानवर्धक लगता है। कक्षा 12 के छात्र मोहित सती पिघलता हिमालय की मुहिम हमारी संस्कृति हमारी विरासत संरक्षण के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है। विद्यालय के छात्र गौरव को ज्वलंत विषयों पर दाज्यु की लेखनी बहुत पसंद है। इन बच्चों के बाइट्स सुनकर/जानकार मैं सहसा अपने अतीत में खो गया। मैं भी सन् 1987/88 में इन्हीं बच्चों की तरह राजकीय इंटर कॉलेज मुनस्यारी काछात्र था मैं गांव से दूर मुनस्यारी के एक धुएंवाली एक छोटी सी कोठरी किराए पर रहकर पढ़ाई करता था। जिसका मासिक किराया 10 रुपए था । मुनस्यारी बाजार में सबसे कम किराए का यही कमरा था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।मुनस्यारी बाजार मेरे लिए कनॉटप्लेस से कम नहीं था। जिस कमरे में रहता था उसके नीचे होटल था।जिसमें जलेबी, बालूशाही, समोसे अरजी व भुटुवा बनता था।सुबह बांज बुरांश की गीली लकड़ी से चीची आवाज व धुएं से कमरा रहने योग्य नहीं रहता था।पर क्या किया जाए इससे अधिक सुविधा वाले कमरे का किराया देना सामर्थ्य में नहीं था।सोमवार से शनिवार तक स्कूल ,दोस्तों के डेरे में समय व्यतीत होता पर रविवार को अपने कमरे के आसपास बैठा करता। मेरे डेरे के पास देव सिंह पाना जी की चाय की टपरी थीं।दुकानदार रविवार को सुबह की धूप के साथ आनंद लेते थे। मैं भी उन्हीं के आसपास बैठा रहता था एक दिन कुछ दुकानदार पिघलता हिमालय पर छपी खबरों के बारे में चर्चा कर रहे थे।कह रहे थे कि उप्रेती जी ने क्या बढ़िया लिखा है। वे सब पिघलता हिमालय पर छपी वर्ष वा साप्ताहिक खबरों पर विमर्श कर रहे थे।मैं भी पढ़ने के लिए उत्सुक था। पर मैं शर्मीले स्वभाव कारण उनसे जानकारी प्राप्त नहीं कर सका।सभी दुकानदार अपनी अपनी दुकानों में चले जाने के बाद बिंद्रा (शु-मेकर) और मैं हम दोनों बैठे धूप सेक रहे थे। बिंद्रा (शु-मेकर) पढ़ा लिखा था, दुनियादारी देखी थी। मैने पूछा यह पिघलता हिमालय पढ़ने को कहां मिलेगा? तो उसने बताया कि श्री आनंद वल्लभ उप्रेती जी हल्द्वानी वाले और श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया आपस में मिलजुलकर अखबार छपवाते हैं। और कहा यदि तुम श्री दुर्गासिंह जी से बात करो तो वे तुम्हें पढ़ने के लिए दे देंगे ।वे भले और नेक इंसान हैं। उस दौर में अमर-उजाला तीसरेचौथे दिनमुनस्यारी पहुंचता था।उस पर भी कुछ संभ्रांत लोग ही पढ़ पाते थे। साथ ही सोरघाटी प्रिंटिंग प्रेस से छपने वाली पर्वत- पीयूष साप्ताहिक समाचार – पत्र आता था। जिसमें कुछ अभिजात्य वर्ग का ही कब्जा था। जो मुझे बात मेंप ताचला।श्री दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी बहुत सहृदय, विनोदप्रिय, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। सबसे मिलजुल कर रहते थे। जनप्रिय थे इसलिए लोग उन्हें नेता जी कहते थे। शायद शनिवार का दिन था। कोई सार्वजनिक अवकाश के कारण आज बाजार मेंखास चहल-पहल नहीं थीं। मैने देखा एक सामान्य कद-काठी, पर हिमालय जैसे धीर गंभीर ,घनी मूंछें , गोल चेहर , हरे रंग की पारका जैकेट पहने श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया जी अपनी दुकान के आगे लोहे की एक फोल्डिंग कुर्सी में बैठकर पिघलता हिमालय पढ़ रहे थे। मुझे प्रथम बार दूर से पिघलता हिमालय समाचार पत्र और संस्थापक संपादक के दर्शन हुए। मैने इससे पहले कोई क्षेत्रीय ,सांस्कृतिक मुद्दों पर छपने वाली समाचार पत्र नहीं पढ़ा था। मैने हिम्मत जुटाई और मर्तोलिया जी के पास उनके दुकान में पहुंचा। उन्होंने एक ग्राहक समझकर पूछा क्या चाहिए। मैने कहा समान तो कुछ नहीं चाहिए, पर मैं पिघलता हिमालय पढ़ना चाहता हूं। तो वे मुस्कुराते हुए बोले यह कल ही डाक से मिली है। आज मैं पढ़ लेता हूं कल सुबह दुकान खुलने पर आना। तब लेकर पढ़ लेना। जी कहकर मैं वापस लौट आया। दिन किसी तरह बीत गया, रातभर उत्सुकता में नीद नहीं आई। आज रविवार था, मैं सुबह से ही दुकान खुलने का इंतजार में था। आज कमरे में धुआं अत्यधिक था। इस लिए बाहर एक लकड़ी के बैंच में बैठा उनकी राह देख रहा था। सुबह दोनों भाई दुकान में पहुंच गए थे। तब उनकी दो दुकानें थी। एक किराना दूसरा रेडिमेड जनरल स्टोर था। छोटे भाई मंगल सिंह मर्तोलिया जी ज्यादातर किराना संभालते थे श्री दुर्गासिंह जी दोनों में बैठते थे। दूसरे दिन मैं हिम्मत करके अखबार मांगने गया। अरे! हां……कहते हुए मुस्कुराए, पहले मेरे बारे में जानकारी ली, कौन सी कक्षा मे पढ़ते हो तुम्हारा ना क्या है? कहां के रहने वाले हो? मैने सबकुछ बताया बहुत खुश हुए। और कहने लगे कि एक गांव का लड़का इतना पढ़ने के लिए लालायित है। मैं अखबार लेकर अपने कमरें में चला गया। होटल से धुआं कम हो गया था। मैने अच्छी तरह देखा पलटाया और एक एक खबर को पढ़ने लगा। उस दिन आकाश साफ था पंचाचुली की धवल श्वेत शिखरों से सूर्य की स्वर्णिम किरणें चमक रही थी। उस साप्ताहिक में भिटोली पर कहानी छपी हुई थी किस तरह एक भाई भिटौली के पर्व पर अपनी बहिन गौरीधाना मिलने जाता है। ननद और सास द्वारा कुचक्र रचना, एक अंतहीन कहानी पढ़कर मेरे आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। उस दिन मैं खूब रोया। यह थी मेरे पिघलता हिमालय से प्रथम साक्षात्कार। मैने पढ़ने के बाद सही सलामत अखबार वापस कर दिया। मर्तोलिया जी बोले जब भी पढ़ने का मन हो मुझसे मांग लेना और पढ़ते रहना। फिर दो चार बार ही लिया होगा। वे अपने कार्यों में ही व्यस्त रहते थे। यदि वे आज होते और मैं ये प्रसंग सुनता तो उन्हें अच्छा लगता। पर वह विराट हिमालय समय से पूर्व पिघल गया उनसे पिघली अमृतधारा आज भी पिघलता हिमालय रूप में निरन्त प्रवाहित है। नारायण सिंह धर्मशक्तू जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल।
जीवन सिंह दुग्ताल श्रदेय पिता श्री पर यह कहावत सही बैठता है :-“कभी हार न मानने की आदत ही, आप एक दिन जीत के कारण बनते है” पिता स्व. ऊपर सिंह दुग्ताल पुत्र स्व. तिका सिंह एक नेक इन्सान, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, अपने काम के प्रति बहुत कठिन मेहनत, निडर छवि के व्यक्तित्व रहे है I यद्यपि बचपन बहुत गरीबी से गुजरा था क्युकि दादा जी स्व. तिंका सिंह का महामारी के दोरान अल्पायु में स्वर्गवास होने के कारण बेसहारा का कारण बना I माता जी का भी देहान्त होश संभालने से पूर्व हो चुका था I जिस वजह से पढाई के प्रति गहन लगाव रखने के बाबजूद घर की गरीबी के कारण स्कूल जाने में असमर्थ रहे I उनके सहपाठी गाव के रहे थे श्री शेर सिंह दुग्ताल, श्री दोलत सिंह दुग्ताल, श्री जगत सिंह दुग्ताल इत्यादि I पिता जी बताते थे- परिवार को इस स्थर में पहुचाने में काफी समय लग गया था I बहुत ही अल्प आयु से ही रोजी रोटी के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा था I बाल्यावस्था में भेड़ बकरी चुकाने का काम किया करता था थोडा जब बड़ा हुआ और होश सभाला फिर अपने कुछ बकरियों से काम काज किया लेकिन उसमे भी कोई खास लाभ नहीं हुआ था विवाह के बाद चाय के अपने दुकान से रोजी रोटी खुशहाल बनाने का भरसक प्रयास लेकिन यह कार्य भी विफल ही रहे I पिता जी आगे बताते है कि हमारे घर के पास पड़ोस में ही एक पटवारी जी रहते थे नाम याद नहीं आ रहा है जो कि हमेशा दुकान में आया जाया करते थे I उन्होंने पिता जी के मेहनतऔर कार्य के प्रति लगन को लम्बे समय से देखा था एक दिन अपने कमरे में बुलाया और कुछ अहम् बात बताया कि भारत सरकार ने भेड़ पालकों को एक बिशेष योजना प्रदान की है जो इस कार्य में कठिन परिश्रम और मेहनत करेगा उसे बहुत फायदा हो सकता है यह कार्य आप सकते है मैंने आपके मेहनत और कठिन परिश्रम को साक्षात् देखा है इसी कारण आपके अपने भविष्य को देखते हए भेड़ पालन के लिए सरकारी योजना के लिए आपका फार्म मैंने भर दिया है अब इसमें केवल हस्ताक्षर ही करने बाकी है I सोचकर बता देना फार्म को आगे भेजना है I यह सुनकर पिता जी को फिर से भेड़ पालन के दल दल में जाने का विचार से मना करने का विचार आया था फिर सोचा कि एक बार घर परिवार से भी विचार बिमर्श किया जाये I घर में इस विषय में काफी विचार किया गया लेकिन अंतिम फेसला करना काफी कठिन था I फिर भी इस कठिन फैसले को स्वय की जिम्मेदारी लेते हुये फार्म को भरवा दिया I यही फ़ेसला पिताजी का टर्निंग पॉइंट रहा I उसके बाद सरकारी भेड पालन का कार्य दो साल से अधिक समय तक अपने जिंदगी के सारे मेहनत, कठिन परिश्रम इसी कार्य में लगा दिये I दारमा से गाव निगाल्पनी और उसके बाद टनकपुर भेड पालन के लिए लगातार आना पड़ा तब में शायद दो ढाई साल का रहा होगा, मुझे धुधली यादे है अभी भी है लेकिन दो साल में अपने तथा परिवार के द्वारा कड़ी मेहनत ने अपना फल देना शुरु कर दिया था 45 भेड़ से 120 तक पंहुचा दिया था I सरकारी नियम से अनुसार 50 भेड़ वापस लिया गया फिर भी काफी भेड़ अपने पास बच गये थे यही पूंजी पिता जी की भविष्य सवर गयी I इसी भेड़ से बाद में पिता जी ने नेपाल में भी व्यापार कर अपने सम्पति में इजाफा किया और मुझे पढाई में कोई कमी नहीं की I जिसकी वजह से आज इस मुकाम तक पहुच पाया हु I भेड़ पालन के दोरान काफी कुछ पिता जी ने सीखा और अपने लगन के कारण ही बाद में व्यापार हिसाब किताब में भी पारंगत हुए थे I अपने दुग्तू गाव का सबसे बड़े बुजुर्ग पिता जी को 95 साल से ऊपर होने का गर्व हासिल कर चुके है अंतिम समय तक अपने पुराने यादो को हमेशा ताजा करने का भरसक प्रयास किया करते थे और हर कथा को नये सिरे से शुरू कर अंतिम छोर तक ज्यों का त्यों सुनाया करते थे हमेशा की तरह बहुत संतोष नजर आते थे I पिता जी ने कभी भी हार नहीं मानी थी कठिन से कठिन स्थिति पर भी डटकर सामना किया था I मेहनत, कठिन परिश्रम ईमानदारी का ही उनका मूल मन्त्र था हमे उन्ही से सीख मिली है I पिता जी के अपने जीवन काल में अपने पारिवारिक कार्य के अलावा समाज को बहुत भी बहुत योगदान दिये है I कतिपय घटनाओ को कर्मानुसार करने एक प्रयास मात्र है; . • वनों से विशेष लगाव:- पिता जी ग्राम सभा दुग्तू के लगभग 20 साल लगभग बन पंचायत की देखरेख की जिम्मेदारी उनके कड़क स्वाभाव् व् ईमानदारी के कारण दिया गया था I जिसे उन्होंने बड़े जिम्मेदारी से निभाया था I गाव की सुन्दरता एवं बुनियाद को मजबुत करने के लिए पेड़ को बचाना बहुत जरुरी था उन्होंने भरसक प्रयास किया और सफल भी हुआ I यह काम उतना आसान भी नहीं था जैसा कहने और सुनने में लगता है I रोज सुबह 4 बजे निस्वार्थ भाव से जंगल का भ्रमण कर अनावश्यक पेड़ जो कटे है चेक करना और कटे हुए पेड़ को गिनना और पता लगाना एक महत्वपूर्ण कार्य था I गाव पंचायत में दण्ड में वसुल किये गये धनराशी को जमा करना हर एक रोज का काम था I इसमें गाववासियो का भी सहयोग सराहनीय होता था I गाव के ठीक पीछे जंगल जो आज काफी बड़े रूप में देखते है I उस पर भी काफी पाबंधी कर रखी थी जिससे यह सभी पेड़ो को पनपने का मोका मिला था I आज इसी पेड़ के कारण गाव काफी सुरक्षित लगता है I आज जो छवि गाव दुग्तू सोन गाव जंगलो का जो सोंदर्य हम देखते है उसके पीछे पिता जी ने वन पंचायत पद में रहते हुए काफी मेहनत किया गया था I मुझे याद है यह बन पचायत का काम पिता जी ने 2014 को इस पद से त्याग पत्र देकर गांव के अन्य लोगो को यह सोप दिया था I तत्पश्चात गाव वासियों ने बिना पाबन्दी के देवदार के लगभग सारे बड़े पेड़ काटकर आज पूरा जंगल खाली कर दिया है l अब मात्र भोज पत्र के पेड़ ही दिखते है I मैंने भी इस बात को रखने का प्रयास किया कि पेड़ के बदले नये पेड़ भी तो बोया या लगया जा सकता है इस पर अभी किसी का ध्यान नहीं है बाद में गाव वासियों को चिंतन मनन करना ही होगा I • कृषि एवं भेड़ पालन पर विशेष लगाव :- गाव दुग्तू काफी उपजाऊ भूमि पहले से ही रहा है I पिता जी को कृषि कार्य व् भेड़ पालन में हमेशा से ही विशेष लगाव रहा है I अपने समय में अपने खेतो में बहुत परिश्रम किया करते थे जिसे देख देखी में हम लोग भी बचपन में कोशिश करते थे I गाव दुग्तू में बर्फ काफी देर तक टिकने के कारण मिटटी में नमी काफी रहती है तथा पूर्व में भेड़ बकरिया, गाय, बेल, झुपू, घरेलु जानवर काफी मात्र में होने के कारण खेतो में पर्याप्त मात्र में खेत खलिहान में खाद भी पहुच जाता था I जिसके कारण पुरे दारमा घाटी में कुट्टू के खेती सबसे बढ़िया पैदावार अपने गाव दुग्तू- सोन में होती थी I मेरे विचार में पिता जी के समय 70-80 का दशक कृषि के लिए स्वर्ण युग कहना उचित होगा I क्युकि सभी परिवारों का खेती के प्रति विशेष लगाव मेहनत, पशुपालन पर विशेष रूचि ने गाव के कृषि को नई उच्चाई मिली I जिसे मैंने भी साक्षात् रूप में देखा था तब में गाव के जूनियर हाई स्कूल दुग्तू- गोठी में कक्षा 6 से 8 तक पढ़ा करता था I उस समय गाव में काफी परिवार थे गाव के चारो तरफ कट्टु के पोधे व् फाफ़र के पोधे गुलाबी तथा पीले रंगों से खेत दंग्तो गबला मेला अगस्त के महीने के दोरान रंगीन दिखाई देता था इसके अतिरिक्त आलू, मूली का पैदावार भी काफी मात्र में होता था I पैदावार इतना कि जमीन के अंदर विशेष रूप से बनाये गये कोल्ड स्टोरेज में कुट्टू के अनाज रखे जाते थे और घर में लकड़ी के तख्तो से बनाये गये अलमारी जिसे र भाषा में बजम कहा जाता था रखने का व्यवस्था किया गया था I बकरी का बोझ कुन्चा आने से पूर्व कुट्टू का अनाज व् आलू धारचूला पहुंचाया जाता था I • गाव के आय बढ़ाने के साधन:- गाव के हितार्थ आय के साधन के लिए पिता जी के समय गाव में विचार विमर्श कर तिब्बत से याक का ले आना जिससे यहाँ घर -2 में याक के बच्चे जुप्पू जुमो, तलभो का बहुत अधिक मात्र में कई सालो तक प्रचार प्रसार हुआ I जिस कारण प्रत्येक परिवार से कुछ शुल्क लिया जाता था जिससे गाव के आय में इजाफा होता था I खेतो को घरेलु जानवरों से देखभाल के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त किया गया था जिसका काम रोज खेतो में जाकर घरलु जानवरों को देखना था जिससे खेती को कोई नुकसान न हो यदि कोई जानवर खेत में मिलता तो लाकर बंद में किया जाता था दंड के रूप में रूपये देने के बाद ही छोड़ा जाता था I इसके अलावा गाव की सुरक्षा के लिए कुन्चा जाने के दोरान एक परिवार को गार्ड या चोकीदार के तोर पर रखा जाता था जिसे गाववासी राशन कुछ धनराशि दिया जाता था जिससे गाव में सभी के सम्पति सुरक्षित रहे I • खनन पर रोक:- गाव निगाल्पनी जो कि काली नदी के एकदम किनारे टापू पर स्थित है गोठी गाव कि तरह हमेशा काली नदी के तेज वेग से गाव हमेशा खतरे में दिखता है अतः जब भी पिता जी गाव में रहे थे गाव के निचले भाग में रेता, बजरी खनन रोकने का लगातार भरसक प्रयास किया गया था यदि समय पर खनन नहीं रोका जाता, तो आज यह गाव गोठी कि तरह आधा गाव का बाढ़ में बह जाता I गाव के किनारे पेड़ बोने का आइडिया भी उन्ही का था जो कि आज जगल के रूप में पेड़ विकसित हो रहे है I भविष्य में भी गाववासियो से भी इस तरह के नेक कार्य निस्वार्थ भाव से करने की ढेर सारे उम्मीदे है I गाव में पीपल का पेड़ भी 1972-1973 में लगाया था I जो आज विशाल वृक्ष्य का रूप घारण कर चुका है I उन्ही के प्रयास से पीपल के पेड़ के नीचे बैठने का चबूतरा बनाया गया है जो कि कोई भी पथिक छाये का आनन्द ले सके I सन 1970 के आसपास निगाल्पनी में खोला के पानी में बादल फटने के कारण बाढ़ ने विशाल रूप लेकर आधे गाव को बहा ले गया जिसमे हमारा घर भी था I • उपरोक्त के अलावा गाव पंचायत में भी पिता जी का बहुत नाम था स्पष्टवादी, सत्यवादी महापुरुष के कारण ही गाव के न्याय पंचायत में पिता जी का उपस्थित होना तत्कालीन समय में आवश्यक होता था I पिता जी के सदगुण आज भी गाव वासी याद कर भावुक हो जाते है I पिघलता हिमालय पत्र में दो शब्द लिखकर श्रदेय स्वर्ग्रीय पिता श्री को सादर विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहता हूं।
सीमान्त क्षेत्र में प्राचीन धार्मिक दर्शनीय स्थल जगदीश सिंह बृजवाल जहाँ त्रिदेव के रूप में एक साथ भीमकाय पाषाण खण्ड खुबसूरत जलाशय, कुण्ड बालचन देवता का प्राचीन काल से ही पाषाण निर्मित मन्दिर प्रतिष्ठापित है। इस स्थल का जुड़ाव अवश्य ही अतीत में भी धार्मिक आस्था से है। देवल पाषाण खण्ड का शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ से है। जिस पावन पाषाण की पवित्रता आज के सात्विक पूजा विधि-विधान से स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। प्रतिवर्ष बैशाख पूर्णिमा को पूजा पाठ के लिए श्रृद्धालु द्योल ढुघ पहुँचते हैं। जहाँ पहुँचने पर श्रृद्धालुओं के तन-मन में अलौकिक शक्ति की अनुभूति होती है। मुनस्यारी तहसील मुख्यालय मुख्यालय से उत्तर दिशा की की ओर जोहार मोटरमार्ग के चिलमधार से लगभग 2 किमी दूरी पश्चिम की ओर लिंक मोटरमार्ग से क्वीरी जिमीया = क्वीरीजिमिया है भारत-तिब्बत सीमा का भी अन्तिम स्थाई गाँव है। यह तहसील मुख्यालय से लगभग 15 किमी की दूरी पर है, जहाँ तक मोटरमार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। क्वीरी गाँव के पश्चिम दिशा की ओर घने जंगलों से कुछ चढ़ाई चढ़ते पैदल मार्ग से लगभग 4 किमी दूरी पर द्योल ढुड. अवस्थित है। जहाँ पहुँचने पर आश्चर्य व अद्भुतता का दर्शन होता हैं। तीन आश्चर्य अवस्थित तीनों का देवत्व के रूप में सदियों से पूजा-अर्चना की जाती है। क्वीरीजिमिया शब्द में दो गाँवों का समुच्चय बोधक सम्बन्ध स्थापित है। पूर्व मे आने वाला गाँव जिमिया जहाँ के मूल निवासी जिमियाल अब वर्तमान में एक भी परिवर का वसासत यहाँ नहीं है। कालान्तर में ये सब नामिक गाँव के अतिरिक्त अन्य गाँव में विस्थापित हो गये हैं। जिमियाल जाति के गाँव छोड़ने की जो कहानी के पीछे का राज आज भी लोगों के बीच प्रचलित है। जिमियाल बरपटिया जनजाति जो मुनस्यारी के भी मूल जनजातियो में से एक है, अपने जनजाति लोकदेवता भरारी देव की पूजा-अर्चना करते थे। कारण बस, कुछ दिनों पश्चात उनके कोपभाजन के शिकार भी हो गये थे। लोगो का कथन है कि मन्दिर के पास स्थिति केमू(शहतूत) के बड़े पेड़ के बीचों-बीच लोहे की कील गाढ़ दिया था। जिनका मकसद पेड़ को बढ़ने से रोका जाना था। भरारी देव को यह कार्य रास न आया जिमियालां में खुजली की बीमारी का प्रकोप पफैल गया। जिनको मजबूरी में गांव छोड़ने को भी मजबूर होना पड़ा था। दिवास्वप्न भविष्य में इस गाँव का अस्तित्व मिट जायेगा। आज जीमिया का जमीदोज होना तथा जिमियालो का एक भी परिवार अपने मूल स्थान पर न मिलना, कुछ तो संशय पैदा करता है। आज भी साक्ष रूप में केमू;शहतूत का पेड़ मोटरमार्ग पर हरा-भरा मौजूद है। क्वीरीयाल अब जो बाद में दोनों गांवों में रहने लगे। तत्पश्चात रावत, मर्तोलिया, लस्पाल, ल्वांल, बृजवाल क्वीरी में बरपटिया पछाई परिवारों की बसासत भी सदीयों पुरानी है। बालचन देवता के विषय में कहा जाता है कि वह नेपाल से आया हुआ माना जाता है। स्यांकुरी नेपाल में हुस्कर देवता उनके पिता का मंदिर प्रतिष्ठापित है। धारचूला के जुम्मा रांती में भी हुस्कर मन्दिर प्रतिष्ठापित है। जहाँ अजबलि से पूजा-पाठ का विधि-विधान है। बालचन देवता को हुस्कर देवता क पुत्र माना जाता है। पिता के त्याग देने पर जोहार की ओर रुख कर लिया था। जिनका प्रभाव जोहार क्षेत्र में काफी रहा है। आज भी तल्ला जोहार क्षेत्रा में डुंगरी, डोर नामीक गाँव में बालचन देवता का मन्दिर प्रतिष्ठापित है धूम-धाम से पूजापाठ कही बलि प्रथा का चलन भी परम्परागत है। किन्तु द्योल ढुड. स्थित मन्दिर में सात्विक पूजा की ही परम्परा पुरातन काल से चली आ रही है। फल फूल, धूप नवैध, प्रसादी चढ़ावा की मान्यता है जिस पावन भूमि की पवित्रता की परम्परा को यथावत रक्खी गई है। क्वारी जिमीया से जब आगे लगभग 2 किमी पैदल चलने के पश्चात सुलाधार जगह पड़ता है। जहाँ घने जंगलों के बीच समतल खुबसूरत मैदान लगभग 100 मी लम्बा चौड़ा मैदान जिसके चारों ओर थूनेर, खरसु तिमसू, बांज-बूरांश के घने जंगल, निगाल की कयी प्रजाति की झाड़ियां तथा अति प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्यता, रमणीक स्थान दृष्टिगोचर होती है। जहाँ से दूर गोरी नदी पार का हिमाच्छादित हिमश्रृंखलाएं राजरम्भा, नागनी चोटी, रालमघाटी, पंचचूली हिमालय का विहंगम बर्फानी दृश्य का चित्त को शान्त तथा मन-मस्तिष्क को प्रपफुल्लित कर देती है। यदि भविष्य में इस स्थल को मुनस्यारी क्षेत्र के पर्यटन व धार्मिक पर्यटन स्थल के स्वरूप में विकसित देखते हैं तो मुनस्यारी के पास नन्दा देवी मन्दिर डाडांधार से प्रकृति का जो विहंगम दृश्य अवलोकन करने का मौका मिलता हैं उसी के सापेक्ष में द्योल ढुड., सुलाधार की सौन्दर्यता को भी आंकलन करेंगे। जिस क्षेत्र का इतिहास भी पौराणिकता से जुड़ा है। सुलाधार से आगे बढ़ने पर घने जंगलों के बीच स्थित द्योल ढुड., जब दर्शन होता है तो पहले पहल अद्भुत दृश्य देखकर मन के अन्दर कुछ भय सा भी आ जाता है। जहाँ जिसकी सम्भावना ही न हो वहाँ भीमकाय विशाल पाषाण खण्ड, जिसके किनारे जलाशय लम्बाई लगभग 50 मी व चौड़ाई 30 मी दिखाई देती है कुण्ड के बीच में स्थल का कुछ उभरा भाग जिसमें हरा घास उगा हुआ है। सामने छोटा सा प्राचीन पाषाण निर्मित मन्दिर बालचन देवता का जिसे ग्वाला ;पशुपालकद्ध पशुओं का देवता भी माना जाता है। भीमकाय पाषाण खण्ड (स्तूपनुमा टीलाद्) जिसके तलहटी में चारों ओर से सपाट पाषाण स्पष्ट दिखाई देती है, तथा सिरे वाले भाग में थूनेर के वृक्ष, निगाल की झाड़ियां, दुर्लभ वृक्ष रतङोली जो औषधीयुक्त पर जो छोटा गोलाकार लिए छिद्र से दो भागों में विभाजन करते आधा सुर्ख लाल व आधा काले रंग का होता है फल के रस को आँखों में डालने से आँख के सपफाई तथा रोशनी में इजाफा होने की बात बुजर्गों के मुंहवाणी से आज भी सुनी जा सकती हैं। देवतुल्य पाषाण खण्ड के लोग चारों लोग परिक्रमा कर प्रार्थना, आराधना करते हैं वास्तव में यदि उस पाषाण खण्ड की परिगणना करेंगे तो देश ही नहीं विदेश में भी इसे प्रथम स्थान आसानी से प्राप्त हो सकता है। जब द्योल ढुड. स्थित प्राचीन धरोहर का दर्शन कर वापस आते हैं तो दुसरे मार्ग का चुनाव करते हैं। अन्य मार्ग से ढलान की ओर बढ़ते हैं तो तब भी हमें एक अलग अंचभित दृश्य देखने को मिलता है लगभग 1 किमी के ढलान के अन्तर में 100 भी लम्बी व 50 भी चौड़ाई का जलाशय ;कुण्डद्ध स्थापित है, जिसे रागस कुंड (राक्षस जलाशय) नाम से भी जाना जाता ह। विशेषता द्योल कुण्ड से इस कुण्ड तक सर्पीली आकार से जल निकासी दिखाई देती है जो ऊपर से नीचे कुण्ड तक जुड़ा हुआ है इसके विषय में भी जो जनश्रुति है की इन जलधाराओं को नागों (सरिसर्प) द्वारा ही खुदवाया गया है, जो नागवंशी लोगों से सम्बन्ध होने का घोतक भी दिखाता है। बालचन देवता के विषय में जो अनुश्रुति, प्राचीन काल से चली आ रही है उसे उल्लेखित करना भी आवश्यक है। द्योल ढुड. में कुण्ड(जलाशय) निर्मित किए जाने के बिषय में अनुश्रुति इस कुण्ड का निर्माण पहले पहल साईंपोलू जिमिया गार (नदी) को रेणु नदी के नाम का उल्लेख श्री केदार विष्ट जी द्वारा 1987 के अपने लेख में किया गया था। पार के गाँव जहाँ सांई-पोलू से ऊपर स्थिति साई धुरा में देवताओं के द्वारा किया जा रहा था। जिस स्थल की सौन्दयता, भौगोलिक बनावट द्योल ढुड. समान ही है आज साई धूरा में बिष्ट जाति के लोगों की बसासत है। यह पूर्व मे पशुओं का चारागाह स्थल भी रहा होगा। पशुचारक अपने पशुओं को चुगाने के लिए जब-तब पहुँचे होंगे। जब जलाशय के निर्माण में देवता तथा उनके गण लगे ही थे। बालचन देवता को पशुओं का देवता भी माना जाता है, जिस कारण पशुओं के लिए जलापूर्ति हेतु जलाशय का निर्माण किया जा रहा था। अचानक साई पोलू गाँव के ही बिष्ट जाति की महिला का उस स्थान पर अपने पशुओं के साथ पहुँचना, अजनबियों द्वारा किए जाने वाले दुस्साहसिक कार्य की जानकारी से हतप्रभ रह जाती है। कुछ समझ से परे था। तब देवताओं के द्वारा इस विषय की जानकारी किसी को न बताने का अनुरोध महिला से किया गया था तथा उसे मुंह मांगी वरदान प्राप्ति के लिए आग्रह किया किन्तु महिला का गाँव प्रेम आशंकित खतरे से गाँव की ओर मुंह करके जोर-जोर से आवाज देकर गाँव के लोगों को घटना से अवगत कराया जाने लगा। जिससे क्रोधित देवताओं द्वारा महिला को पाषाण शिला खण्ड में तब्दील कर दिया गया। जिसका प्रमाण साक्ष के रूप साईधूरा में आज भी है। लोगो के कथनानुसार तब सम्प्रति साईधुरा जिमिया गार के पार क्वीरीजिमिया के द्योल ढुङघ स्थान पर कुण्ड का निर्माण किया गया। देवताओं के कोपभाजन का शिकार बिष्ट जाति के लोगों का अपने ईष्ट देव के रूप में स्वीकारते पूजा-अर्चना करने लगे। द्योल ढड. स्थित बालचन देवता की पूजा पूर्व में केवल साईं पोलू के बिष्ट जाति के द्वारा ही की जाती थी। गाँव के लोग गाजे-बाजे के साथ क्वीरीजिमिया अवस्थित मन्दिर तक पहुँचकर पूजा आराधना करते थे। धूप-नवैध, फल- फूल, महाभोग प्रसादी चढ़ावा तथा देवतरण प्रथा भी थी। लोगों का वन देवता (बालचन) यक्ष देवता (कुण्ड) प्रकृति देवता (महापाषाण खण्ड) के रूप में असीम आस्था सदैव बनी रही थी। प्रकृति देवता को अनावृष्टि से बचाने की प्रार्थना करते रहते थे। इन्द्र देवता के रूप में भी बारिश से होने वाले कार्य से किसी प्रकार का बिघ्न बाधा न पहुँचे प्रार्थना करते थे। एक भव्य मेले का आयोजन भी होता था, जो प्रथा आज समाप्त हो चुकी है। एक अन्य जनश्रुति सांई के निवासी बिष्ट जाति के लोग द्योल ढुड. स्थित बालचन मन्दिर में समय समय पर सामुहिक पूजा हेतु गाजे-बाजे के जाते रहते थे मन्दिर में सात्विक पूजा-पाठ देव अवतरण भी हो या कहा जाता है कि एक बार जब मन्दिर में बाजे गाजे के साथ देव अवतरण हो रहा था तो अचानक अवतारी व्यक्ति द्वारा जलकुण्ड में छलांग लगाकर जलसमाधि ले ली गईं। सभी श्रद्धालु इस घटना से हतप्रभ रह गये क्योंकि अवतारी व्यक्ति का सम्बन्ध किसी से पिता, पुत्रा, पति का मानवीय रूप में सम्बन्ध था। सभी निराशा लिए अपने घर वापस आ गए। अवतारी व्यक्ति के घर न पहुँचने पर पत्नी ने लोगों से रहस्य को बताने की अपील की तब लोगों ने घटना की सम्पूर्ण जानकारियों से अवगत कराया। अपनी पति के दुःख से द्रवित महिला को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका पति उससे बिछुड़ चुका है। उसका अन्तर्मन भरोसा दिलाते रहता कि वह एक दिन अवश्य लौट कर घर आयेगा। तब से कुछ वर्षों तक पूजा-पाठ बन्द हो चुका था। लोगों द्वारा पुनः द्योल ढड. में पूजा-अराधना किया जाने लगा तो बाजे की आवाज के साथ-साथ जलाशय का पानी हिलने लगा तब कुण्ड के बीच से लम्बी दाढ़ी मूंछें वाला जिसके शरीर पर मुंगा घास (मुलायम बारीक घास) उगे थे बाहर आ गया, जिनकी शक्ल अवतारी समाधि लेते व्यक्ति से मिलता-जुलता था। जिसे दूसरा नाम ‘फूकनी बूबू’ दिया गया। जलसमाधि लिए अवतारी व्यक्ति के पत्नी ने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था जो अपने साथ दिव्य पात्र ‘कांसे का कटोरा’ (ब्या्ल) भी संग लाया था। पति के इन्तजार में लम्बा अर्सा बीतते, महिला का धैर्य भी अब टूटने लगा था। अचानक बारह बरस बीत जाने के उपरान्त महिला का पति अवतारी व्यक्ति पुनः प्रकट हो गया। पत्नी का अपने पति प्राप्ति से प्रशन्नता कोई ठिकाना न रहा। पति के शरीर पर मुगा (बारीक घास) उगे हुए थे। पत्नी ने आदर सत्कार भोजन ग्रहाणादी के पश्चात इतने समय तक कहा रहने के विषय में जानना चाहा किन्तु पति द्वारा उस विषय में किसी प्रकार की बात न करने को कहा गया। पत्नी ने अपने हठ के आगे पति को जुबान खोलने को मजबूर कर दिया। तब पति द्वारा पत्नी से अपने संग लाया कटोरे (ब्याल) में दही लाने की बात कही गई। पत्नी द्वारा दही का कांसे का बड़ा सा कटोरा (ब्याल) पति के सामने रख दिया। पति स्वरूप मानव ने दही में फूंक मारते ही स्वयं भी कटोरी में ही समाहित हो गया पिफर वापस कभी नहीं आया। तब से अनुश्रुति है कि आगे फुकनि बूबू के रूप में देवतुल्य होकर चमत्कारों से प्रभावित करने लगा था। आज भी सांई पोलू गाँव में कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व घर में स्थापित फूकनी बूबू का पूजा-अर्चना सफेद टोपी मन्दिर में चढ़ाये जाने का रीति-रीवाज है। फूकनि बूबू द्वारा भेंट दिव्य पात्रा जो लोगों के लिए वरदान स्वरूप बन गया था। धूप व वर्षा के रूप में लोगों कथन- जब गाँव में कोई शुभ कार्य के दिन बारीष की सम्भावना पर बारीष को रोकने हेतु तुरन्त कटोरी को सुल्टा कर दिया जाता था, तुरंत मौसम सुहावना, धूप खिलने लगती थी तथा यदि कृषि हेतु बारिश की आवश्यकता होती तो कटोरी को उल्टा कर दिया जाता था. आसमान से बारीश होने लगती थी। चमत्कारी कटोरी का रहस्य के विषय में आसपास के गाँवों के लोगों को आज भी भली-भांति मालूम हैं कि फूंकनी बूबू का कटोरा कितना चमत्कारी था। सदियों का इतिहास, कथा-कहानी जनश्रुति के परम्पराओं ने आज भी लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाया है। पूर्व का जिमिया गाँव जो तीस-चालीस 40 वर्ष पहले आपदा की भेंट चढ़ गया है। जिस क्षेत्र की उपजाऊ कृषि आलू, राजमा, राई-गौबी मूली सब्जीयां पूरे क्षेत्र में एक अलग नाम क्वीरीजिमिया का होता था। आज केवल क्वीरी गाँव अपने पुराने अस्तित्व को बचाए है। कभी दो बैल की जोड़ी के समान दो गाँव दो होते हुए भी एक जैसे थे। जोडी की विछिन्ता, जोड़ीदार के बिछुड़ जोने से अकेले दूर निगाह लगाए टकटकी शून्य में अपने साथी को निहारते क्वीरी गाँव कल्पनातीत हो जाता है। उसे ऐसा लग रहा है कि कहीं मेरा मित्र भी देव कोपभाजन का शिकार तो नहीं हो गया? जिमिया गाँव में कोई भी सम्भावित आपदा की गुंजाइश ही नहीं थी। चारों ओर से बाज, बुरांश, खरसु तिमसू, निगार के घने जंगलों से घिरा जिमिया गाँव इस तरह भरभराकर कुछ ही समय में सारा गाँव जमीदोज हो जाना इतिहास के पन्नों को भी उलट-पलट देता है। आज जिमिया गाँव के अधिकांश निवासी अपने गाँव को छोड़कर अन्यत्रा भी चले गए हैं किन्तु कुछ असहाय, गरीब तथा कुछ वे लोग जो अपने गाँव से आत्मीयता से घनिष्ठ सम्बन्ध रखत थे, वे आज भी गाँव के आस-पास बंजर भूमि को आवाद कर अपनी वसासत बनाने में कामयाब हो गए हैं। मेहनत मजदूरी, कृषि,पशुपालन, कार्य कर अपनी आजिविका को साधन बनाकर जीवटता से जीवन व्यतीत करते हैं। द्योल ढुड. (देववल पाषाण खण्ड )शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ है। क्वीरीजिमिया से लगभग तीन, चार किमी दूरी पर स्थित है। जिसकी सिन्धु तल से ऊंचाई लगभग 5000 फिट है। जिसे मुनस्यारी का खूबसूरत पर्यटन व धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है। द्योल ढुड. से ही पर्वतारोहियों के लिए ट्रेकिंग रूट हीरामणि ग्लेशियर, हिमानी नामिक जाने का भी आसान रास्ता है। पर्वतारोही इस मार्ग से अपना अभियान चलाते रहते हैं। आलेखन के लेखन में क्वीरी निवासी प्राध्यापक श्री भगत सिंह पछाई, श्री गोकुल सिंह लस्पाल इंस्पेक्टर आईटीबीपी, मूल निवासी सांई- पोलू के महत्वपूर्ण सहयोग से अतीत की जानकारियां को आप तक पहुँचाने में कामयाब हो सका हूँ। अतीत के सांस्कृतिक परम्पराओ को लिपिबद्ध कर संजोए रखना हम सभी का कर्तव्य बनता है. किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है।
डाॅ. पंकज उप्रेती ‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी। कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा। ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’ 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत शक्ति प्रेस डाॅ. पंकज उप्रेती ‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी। कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा। ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’ 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत पड़ने पर अन्य कमरे भी प्रेस में जुड़ गये और छापेखाने का कार्य विस्तार पा गया। तब हमारा पूरा परिवार भी यहाँ रहता था। रूलिंग मशीन की सरसराहट के बीच शानदार बाइडिंग का कार्य, प्रिंटिग कार्य, बाद के दिनों में शादी कार्ड की छपाई भी होती। उस छोटे आकार की पुस्तकें जैसे भजन संग्रह, होली संग्रह इत्यादि भी छपते रहे। यहीं 30 अक्टूबर 1978 में साप्ताहिक पिघलता हिमालय का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ। 19 दिसम्बी 1979 में इसे दैनिक समाचार पत्रा का रूप दे दिया गया था। कुछ अड़चनों के बाद 1 दिसम्बर 1986 को पुनः यहीं से पिघलता हिमालय जारी हुआ, जिसका प्रकाशन पता पिता आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद 2013 में जे.के.पुरम् सेक्टर डी, मुखानी हल्द्वानी में कर दिया गया था और प्रयास था कि ‘शक्ति प्रेस’ को भी पूरी तरह इसी जगह लाया जाए। 2018 में पिघलता हिमालय की सम्पादक और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी माता जी श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद से लगातार यह विचार था कि अपने प्रेस को भी वहीं स्थापित करें जहाँ परिवार रहने लगा है लेकिन जिस जगह वर्षों की यादें जुड़ी हों उसे एकदम छोड़ना शायद हमारे लिये भी कठिन था। अन्ततः 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट होना परिवार को सुखद लगा है। और इस बीच हमें कई नये अनुभव और सीख मिली कि कौन हमारे कितने करीब है। ऐशबाग मोहल्ले के पुराने पड़ोसी तो सब पहले ही जा चुके थे और जो दो-चार परिवार मकान मालिक की हैसियत से रहते हैं, उनकी इच्छा भी यही रही है कि अब समेट लिया जाए। समेटने की इस होड़ में वह भी अकेले हो चुके हैं। फिलहाल हम खुशनुमा माहौल में ऐसबाग से विदा हो गये। यह जरूरी भी था क्योंकि हल्द्वानी शहर की घिचपिच के बीच जिस प्रकार से सड़क चैड़ीकरण इत्यादि हो रहा है उसमें बदलाव तो होना ही है। ऐसे में हमेशा से पूरे सम्मान के साथ मान्यता रखने वाला ‘शक्ति प्रेस’ भी अच्छी जगह शिफ्रट हो जाए, खुशी की बात है। बात पुरानी है कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ला जिसमें हमारा प्रेस था, तब शहर में ही बहुत कम वाहन हुआ करते थे। रोड के दोनों ओर आम के बड़े-बड़े पेड़ सुन्दरता बढ़ाते थे। प्रेस से थोड़ा आगे एक बड़ा सा नाला हुआ करता था, जो घिर चुका है, इसी से होकर नालियों का पानी-कचरा निकासी होता था। वर्तमान की कालाढूंगी रोड बरसात में भर जाती है। प्रेस के सामने ही हल्द्वानी फर्नीचर मार्ट पुराने प्रतिष्ठानों में से रहा है। इस मोहल्ले की कई यादों को पिता जी ने अपनी कृति ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ में लिखा है। पुराने हल्द्वानी में जब मुख्य मार्ग सिंगल रोड के थे, सड़क से लगा हमारा मोहल्ला ऐशबाग कुछ परिवारों का गुलदस्ता था। घरों में ताले नहीं लगते थे, ‘शक्ति प्रेस’ में ताले कभी नहीं लगे क्योंकि दिन-रात गपोड़ियों, आन्दोलन कारियों के अलावा विचारवान लोगों की बैठकें और प्रिंटिंग का कार्य होता था। पड़े लिखे बेरोजगार भी इसे अपने संरक्षण का अड्डा मानते रहे हैं। कई ऐसी लड़ाईयां भी यहीं से शुरू हुई जिन्हें सुनकर आश्चर्य हो सकता है। एकदम शान्त रहने वाले पिता जी गलत पर झल्ला जाते। फिर चाहे कोई नेता या कोई अधिकारी हो, वह अपना विरोध् दर्ज करते। समय बदलता रहा और सड़क से बहुत उपर होने वाले मकान गड्ढों में ध्ंसते दिखाई देने लगे। हमारा घर/प्रेस भी सड़क से एक सीढ़ी नीचे हो गया था और बरसात में पानी भरने लगता था। पहले समय में पूरा मोहल्ला गर्मी के दिनों में खुले में सोता था। अपनी-अपनी चारपाई में मच्छरदानी लगाकर सारे परिवार सड़क किनारे ही दिखाई देते। सन् 2000 के बाद से थोड़ा बदलावा आया और मोहल्ले में पुराने परिवार दूसरे स्थानों पर अपना निवास स्थान बनाकर जा चुके थे। ‘शक्ति प्रेस’ के बाहर पाखड़ का पेड़ लग चुका था, जिसकी आड़ में बैठने वाले कम हो गये। सड़क भी सिंगल से चैड़ी होकर इसमें डिवाइडर बन गया। याद आ रहा है कि पुराने समय में संचार व्यवस्था भी सीमित थी। ‘शक्ति प्रेस’ में डायल करने वाला पुराना फोन था। ‘193’ नम्बर के इस पफोन पर सुख-दुःख भरी सूचनाओं के लिये दूर-दूर से लोग आया करते थे। कई लोगांे ने अपने सगे-सम्बन्ध्यिों-मित्रों को इस पफोन नम्बर को दिया था ताकि विशेष स्थिति में पफोन कर जानकारी मिल सके। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर को जाने वाली बसों का प्राइवेट बस अड्डा भी इस प्रेस के पास खुला तो कालाढंूगी चकलुवा इत्यादि से लोग प्रचलन के हिसाब से शादी कार्ड छपवाने यहीं आते थे। कुछ वर्षों के अन्तराल में छपाई के तरीके बदले और छापेखानों में मशीनरी का तरीका भी बदलने लगा। तब स्क्रीन प्रिटिंग का कार्य भी शक्ति प्रेस में होने लगा और पहली बार कार्डों में ऐपण के डिजाइन बनाए गए। इस प्रकार के प्रयोग पिता जी किया करते थे, इन सबके बीच संगीत सभा का होना भी कम आश्चर्य नहीं था। हम भाई-बहन भी अपने बचपन से उबर कर युवा अवस्था में थे और खुला आसमान बना ‘शक्ति प्रेस’ हमारा घर था। इसी में पढ़ाई और संगीत का रियाज करना बहुतों को आश्चर्य ही लगता होगा। पुराने जमाने के छोटे-छोटे कमरे वाले मकान में रेलगाड़ी जैसा हमारा आवास हमें संरक्षित करता रहा। हमें ही नहीं, उन आन्दोलनकारियों को भी पनाह मिली जिनकी तलाश होती थी। कई आन्दोलनों में जब पकड़-धकड़ होती तो अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से तक प्रदर्शन करने वाले यहाँ आ जाते। सीमान्त क्षेत्रा से लेकर मैदान तक के व्यापारियों के मिलन का अड्डा यह बन गया। जम्बू-गन्द्रायणी से लेकर रिंगाल तक के कारोबारियों का पता शक्ति प्रेस था, इनकी व्यापारिक बैठक धर्मशाला में होती थी क्योंकि बिजनौर इत्यादि जगह से व्यापारी धर्मशालाओं में आकर रुकते थे। इसी प्रकार गंगावली क्षेत्रा से आने वालों के लिये हमारा घर ही मुख्य केन्द्र बना हुआ था। छोटे से शहर में तब लोग अपनों को तलाशते हुए मिलते-जुलते थे। प्रेम-व्यहार के उस समय में सभी जगह यह रिवाज रहा है। आज भी पुराने परिवार अपने रिवाजों को बनाए हुए हैं। शहर होने का कतई यह मतलब नहीं है कि मेहमानों को होटल में रुकवाया जाए या मेहमान चुपचाप होटलों में रुककर चले जाएं। वर्तमान में सुविधाओं को देखते हुए बहुत बदलाव हुआ है और हल्द्वानी जैसा सुन्दर शहर भी एकदम बदलने जा रहा है। इसमें पहाड़ और मैदान से आकर बसने वालों की भीड़ ने इतना दबाव बना दिया है कि मुख्य शहर में पैदल चलना भी दिक्कत भरा होता जा रहा है। यही सब देखते हुए सड़क चैड़ीकरण करण सहित अन्य तोड़पफोड़ होनी ही है। जिस सिंगल सड़क पर कोई भी व्यक्ति उतर कर किसी के घर या दुकान पर जा सकता था, उस सड़क पर अब दिनभर दौड़ रहे वाहनों व डिवाइडर के कारण कोई रुकना पसन्द नहीं करता है। बदलते शहर में आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रा जुड़ चुके हैं और खेत-खलिहानों का कार्य बहुत कम हो चुका है। ऐसे में अपराधिक गतिविधियों भी बहुत तेजी से बड़ी हैं। बाजारबाद और सोशल मीडिया के प्रभाव में नई पीढ़ी को हल्द्वानी शहर की पुरानी तहजीब का पता ही नहीं है जब इस गुलस्दते में होली-रामलीला से लेकर हर रंग था और एक-दूसरे की मदद को लोग आगे आते थे। दानपुण्य करते लोगों के अलावा गर्मी में प्याउ अपनी ओर से लगवाने वाले भी थे। वर्तमान का हल्द्वानी दिखावे में डूबा है। कुछ दिनों के अन्तराल में कोई न कोई महोत्सव या जुलूस होने लगे हैं। चहक रहे युवाओं को इससे कोई मतलब नहीं की क्या हो रहा है। सोशल मीडिया के लिये फोटो-रील उनका लक्ष्य लगता है। ‘शक्ति प्रेस’ में बैठकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ हमेशा दस्तावेज के रूप में कार्य करेगी। इस शहर के बनने से लेकर वर्तमान तक में कौन लोग किन-किन स्थानों से आए और किस तरह से एक सुसज्जित शहर बसासत हुई। किस समय में कौन कितना प्रभावशाली था और कौन नगर पालिका चैयरमैन, कौन बड़ा व्यापारी था और कौन समाजसेवी, सबकुछ इस कृति में है। यही कारण है कि इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। जब शहर का स्वरूप ही बदलने जा रहा हो तो यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि आंखिर किसी शहर में दबाव के बाद किस प्रकार से बदलाव होता है। लिखने के लिये बहुत है लेकिन इतना भर कहना है कि प्रेम भाईचारा के जो पुराने दिन थे, वह सभी स्थानों पर बना रहे।कालाढूंगी रोड स्थित शक्ति प्रेस का एक कक्ष
डाॅ.पंकज उप्रेती 25 फरवरी 2023 की प्रातः सीमा का फोन आया- ‘ददा, पिता जी नहीं रहे। मैं सीमा बोल रही हूं कपिल जी की बेटी।’ सीमा (भुवन कपिल जी की सुपुत्री), मैं एकटक सोच में डूब गया। 81 वर्षीय भुवन कपिल सच्चे रंगकर्मी थे, पहाड़ की होली और रामलीला में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा। हल्द्वानी शहर के मुखानी में रहने वाले कपिल परिवारों का शुरु से दबदबा रहा है। एक जमाने में जब मुखानी में दादाओं का नाम लेकर लोग डर जाते थे, खुली नहर में उफनते पानी को देख भयभीत हो जाते थे, भुवन कपिल का आवास सुरलहरियों में भीगा रहता था। मुखानी में होने वाली पर्वतीय रामलीला का बहुत नाम हुआ करता था। रात्रि में होने वाली रामलीला की तालीम से लेकर तैयारी तक इनके आवास पर होती। इसके अलावा मंगलवार को होने वाले सुन्दरकांड में युवाओं की टीम सक्रिय रहती। कपिल जी का आवास पूरी तरह अखाड़ा बना हुआ था, रात्रि को होली की महफिलों का जमजमा अब इतिहास बन चुका है। शायद ही कोई कलाकार रहा हो जो पहाड़ी ढब की होली को सुनने, सुनाने, देखने के लिये इनके आवास में न गया हो। पुराने जमाने के मकान में एक कमरा गोल आकार में था जिसमें लगातार होली की बैठक जमी रहती। बीच-बीच में चाय की चुस्की, पान-बीड़ी-सिगरेट………हर प्रकार के लोग जुटते और होली के भस्सी और उस्ताद भीमताल, नैनीताल, अल्मोड़ा से तक आया करते। इनमें कपिल जी का अपना स्टाइल था जो सबको सजग कर जाता। चाहे कोई किसी पद-कद का हो, गोल कमरे में सजने वाली महफिल में सब एक हो जाते। बाद में हिमालय संगीत शोध समिति का प्रशिक्षण केन्द्र इसी गोल कमरे में बना। उनका संरक्षण हम सभी के लिये रहा। होली की तीन-चार महीने तक चलने वाली खूबसूरत महफिलों में धुंआ- धुरमण्ड कोई मायने नहीं रखता था। श्रीमती ज्ञान कपिल की सेवा को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिन्होंने कपिल जी का पूरा साथ दिया और हर आने-जाने वाले मेहमान व कलाकारों होल्यारों को निभाया। किन्हीं कारणों से मुखानी की रामलीला बन्द हो गई लेकिन होली की बैठकें वर्तमान तक जारी रही। उनके साथ ही बैठकों में इधर-उधर जाने का अवसर भी मिला। उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी। वह बैठक के बीच किसी भी प्रकार की आवाज बेकार को पसन्द नहीं करते और गाने से पहले कह देते ‘या तो आप ही बोलो या मुझे गा लेने दो।’ उनका स्वभावत सरल और कलाकार के रूप में मूडी था। वह खुले मन ने जीने वाले लोगों में से थे। कलाकार के अलावा अपनी संस्कृति संरक्षण के लिये वह समर्पित थे। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद कपिल जी की अन्तिम चाह संगीत और महफिल रही। वर्तमान कें हल्द्वानी शहर में बहुत बदलाव आ चुका है, समय के साथ इस परिवार ने भी अपना को व्यवस्थित किया। जिस स्थान पर गोल कमरा हुआ करता था, उनके सुपुत्र मोहित का चिकित्सालय है और आवास कुछ ही दूरी पर है। अपने नये आवास में भी उन्होंने होली की बैठकें करवाई और पुरानी महफिलों की यादें को ताजा किया। स्वास्थ्य कारणों से वह लड़खड़ाए लेकिन उनकी धुन व जिद होली बैठक थी जिसके लिये वह हम दोनों भाई (पंकज-धीरज) को खूब याद करते और कहते- ‘मेरे हीरा-मोती हैं।’ महफिल सजती और होली के टीके की बैठक अनिवार्य रूप से की जाती। इस बार भी वह होली के लिये रुके थे लेकन ईश्वर की लीला को वही जाने। वह अपने पीछे पत्नी श्रीमती ज्ञान कपिल, सुपुत्र डाॅ.मोहित, विवाहित सुपुत्री सीमा सहित भरापूरा परिवार, मित्रों को छोड़ गये हैं। वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी प्रेरणा से वह अभियान चलता रहेगा जो शुरु हुआ था
डाॅ.पंकज उप्रेती जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी हल्द्वानी द्वारा इस बार भी दो दिवसीय जोहार महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। महोत्सवों की बाढ़ में इस आयोजन की जो विशेषता दिखाई देती है वह एक घाटी की संस्कृति तो है ही लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और द्वन्द के बीच यह साफ हो चुका है कि ‘समय बदलने की आहट है’। हल्द्वानी की बसासत के साथ किस प्रकार से भोटिया पड़ाव बसा वह लम्बी कहानी है। (पिघलता हिमालय के सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से’ विस्तार से दिया गया है।) तब तिकोनिया पर से घोड़े-बकरियों के झुण्ड लम्बी कतार में लग जाया करते थे। डीएफओ हीरासिंह पांगती साहब सहित दो-तीन परिवार सबसे पुराने परिवार यहाँ बसे। दोनहरिया में लक्ष्मण निवास भी मिलने जुलने वालों का केन्द्र बना। पुष्कर सिंह जंगपांगी जी का आवास ‘प्रताप भवन’ बनते समय नहर के पास बहुत संघर्ष की कहानी है। ‘शंकर निवास’ पुरानी यादों का परिवार है। खैर पहाड़ में कुछ परिवारों का जम-जमाव हो गया। पड़ाव के बीचोंबीच पांगती परिवार का ‘मिलम निवास’ भी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा बन गया। उस दौर में हल्द्वानी के होल्यार बंजारा होली के रूप में दोनहरिया शिवमन्दिर तक जाया करते थे। समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है परन्तु भोटिया पड़ाव में जाते ही अलग प्रकार की अनुभूति होती थी। हाँ, यहाँ मोहल्ले में आबादी घनी होने लगी थी और जोहार-मुनस्यार से आने वाले व्यापारियों का अड्डा दीवान सिंह जी का ‘सीमान्त ट्रान्सपोर्ट’ हो चुका था। मुख्य बाजार में ओके होटल के पास इस ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की धक थी। 1968 में कालाढूंगी रोड स्थित हमारा छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ जन मिलन का बड़ा केन्द्र बन चुका था, जहाँ पहाड़ के हर कौने से आने-जाने वाले मिलते थे। बाद में यहीं पर बाजपुर बस अड्डा बन गया और तराई क्षेत्रा के लोगों का मिलन केन्द्र भी हुआ। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ शुरु होते ही शक्ति प्रेस व्यापारियों के मिलन का केन्द्र भी बना। संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने रिंगाल के कारोबार के लिये यूपी के व्यापारियों से सम्पर्क बनाए थे। ‘रहमत अली शेख फारुखी’ नाम मुझे आज भी याद है। कई व्यापारी रिंगाल के लिये आते और हिन्दू धर्मशाला इत्यादि स्थानों में रुकते थे। व्यापारियों की अपनी इशारों की भाषा थी जिसे वह हाथ मिलाते हुए रुमाल से ढक कर एक-दूसरे के सौदा कर लेते। हल्द्वानी का पर्वतीय उत्थान मंच का कार्यालय भी पिघलता हिमालय शक्ति प्रेस ही बना। रामलीला मैदान से शुरुआती शोभा यात्रा निकाली गई थी। बाद में हीरानगर में इसे स्थापित किया गया लेकिन जब तक भवन नहीं बन गया, उत्थान मंच की सारी गतिविधियों का केन्द्र शक्ति प्रेस ही रहा। मुझे भली भांति याद है हल्द्वानी में उत्तरायणी जुलूस को मेले का स्वरूप देने के लिये प्रथम बार स्टाल लगाने का विचार आया तो पिता जी ने सबसे पहले मिलम के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ उत्तम सिंह सयाना और दुम्मर से उनी कपड़ों के लिये जंगपांगी जी को बुलाया। मात्र दो-चार स्टाल लगे थे। अगले साल भी ऐसा ही हुआ। बाद में यह मेला स्टालों की भरमार का बना। समाज में बढ़ती उच्छंृखलताओं को देख पिता जी ने उत्थान मंच को हमेशा के लिये छोड़ दिया। जिस मंच के लिये वह दिन-रात समर्पित थे, उन्होंने क्यों छोड़ा होगा, यह आज आज समझ में आने लगा है………. पिता जी लेखन में जुटे रहते। तब उन्हें ‘राजजात के बहाने’ कृति के लिये राहुली सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मान मिला था। लगातार धारदार लेखन वह करते रहे। हीरसिंह राणा, गोपालबाबू गोस्वामी मिलने प्रेस में ही आ जाया करते थे। मेले की भीड़ क्या होती है, इस प्रश्न को पिता जी बहुत रोचक तरीके से हमें समझा देते थे। साथ ही पहाड़ के तमाम कौतिकों का उदाहरण देते, जो स्वयंस्पफूर्त होते हैं। पिछले एक दशक में तो हल्द्वानी सहित आसपास उत्तरायणी महोत्सव नाम के ही ढेर लग चुके हैं। तमाम मंच जगह-जगह सजने लगे हैं। इसके अलावा फैलते जा रहे हल्द्वानी में कई प्रकार के जलसे-जुलूसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की संस्कृतियों का गुलदस्ता यह भाबर है लेकिन हर कोई चाहेगा कि वह अपनी जड़ों को पल्लवित करे और अपने संस्कार अगली पीढ़ी तक पहँुचाए। ऐसी ही कोशिश जोहार समाज में भी हुई। शुरुआत में अपने स्थानीय तीज-त्यौहारों साथ जो शुरुआत हुई थी वह होली पूजा के रूप में बेहतर शुरुआत बन गई। माघ की खिचड़ी का आयोजन भी ध्यैनियों के सम्मान में मिलने-जुलने का बड़ा आयोजन बनने लगा। जोहार मिलन केन्द्र आपस में मेल-जोल का शानदार केन्द्र स्थापित हो गया, जिसमें हर आयुवर्ग के लोग आते हैं। ऐसे में उर्जावान युवाओं ने विचार किया कि क्यों न आधुनिक समय को देखते हुए किसी ऐसे आयोजन को अंजाम दिया जाए जिसकी सपफलता बड़ा परिणाम दे। जोहार की बात और व्यवहार को लेकर कई संगठन हैं लेकिन जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी ने इसे कर दिखाया और ‘जोहार महोत्सव’ के रूप में जो वृक्ष रोपा वह आज हरा है। इसके पहले आयोजन में अनुभव कम था लेकिन उत्साह ज्यादा, जिसका परिणाम यह हुआ कि तमाम जगह से जोहारी बन्धु आयोजन में भागीदार बने। पहले अनुभव के बाद सोसाइटी ने अगले वर्ष इसके स्वरूप में बदलाव किये बगैर आयोजन को तरीके से समेट लिया। इसके बाद आयोजन का स्वरूप लगभग तय हो चुका था और समझ आने लगा था कि हल्द्वानी भाबर मेें किस प्रकार से सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसके स्टालों में जोर दिया गया और व्यावसायिक गतिविधियां द्रुत हुईं। सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिये उन कलाकारों को बुलाया जाने लगा। सांगीतिक दृष्टि से आयोजन का यह हिस्सा बहुत असरकारी होता है, इसका प्रभाव दूरगामी होता है। खैर, आयोजकों ने जोहार की प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा बाहर से कलाकार आमंत्रित किये। ‘जोहार-महोत्सव-मेला-संस्कृति’ की समग्र पड़ताल के बाद आयोजकों को बधाई दी जानी चाहिये कि वह इस बड़े आयोजन को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। साथ ही सुझाव भी है कि आयोजन के ‘जोहार’ नाम अनुरूप इसकी हर हरकत उस संस्कृति की ठहस से भरपूर हो। जिस जोहार नगर (भोटिया पड़ाव) के बसने के समय घोर संघर्ष हुए थे तब इसके फैलाव के बारे में विचार भी नहीं आता था। वर्तमान में हल्द्वानी के अलग-अलग स्थानों पर जोहार वासियों की बसासत है। सारे साधन-संसाधन होने के बावजूद अब वह स्थिति है कि अधुना समय में इसकी चमक और ज्यादा हो। यह सच भी स्वीकार लेना चाहिये कि समय बदलने की आहट इस बार के महोत्सव में दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोग हमारे बीच नहीं हैं। कुछ समर्पित जन अस्वस्थ्य होने के बावजूद समाज की बेहतरी के लिये जुटे हैं। कई जुझारु जन अपने अनुभवों के साथ इस अभियान को बनाये रखने की कसक लिये हुए दिखाई दिये। देखना होगा समय का चक्र किस दिशा को तय करेगा….
अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश डाॅ.पंकज उप्रेती किसी भी समाज की जो लोक मान्यता और बोली भाषा होती है, वह उसके पूरे बात-व्यवहार को बताती है। उस समाज की विशिष्ट शब्दावली उसके इतिहास, भूगोल और व्यवहार को बहुत सटीक बताती है जबकि उसका अनुवाद या दूसरी बोली भाषा में वही शब्द उसके पूरे अर्थ को व्यक्त करने में अधूरापन ही लगता है। ऐसा ही अधूरापन हमारी हिमालयी सीमा की बोली-भाषाओं को लेकर समाज मेें रहा है। जबकि हमारे सीमान्त क्षेत्र की विशिष्ट बोली-भाषा अपनी चाल के साथ अपने सटीक शब्दों के लिये बहुत समृद्ध है। भारत सरकार के शब्दावली आयोग ने भी देश की विभिन्न बोली भाषाओं का अध्ययन करते हुए बहुत कार्य किया है परन्तु आज भी लगता है कि हमारी लोकभाषा का बहुत बड़ा हिस्सा उसमें नहीं है। बोली-भाषा उसके व्यवहार के साथ पनपनी है वरना दुनिया की सैकड़ों भाषाएं समय के साथ बुझ चुकी हैं। बोली भाषा के इस सच को जानते हुए शौका समाज के विद्वान गजेन्द्र सिंह पांगती ने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। श्री पांगती ने अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश के रूप में समाज को सजग किया है। दो खण्डों के इस शब्दकोष के पीछे उनकी सीधी सी मंशा है कि शौका बोली भाषा को पुनर्जीवित किया जाए, इसके लिये यह योजनाबद्ध प्रयास है। भाषा में जबर्दस्त पकड़ रखने वाले और अनुशासन प्रिय पांगती जी ग्रन्थ की भूमिका में शब्दकोष के बारे में बताने के साथ-साथ जितना भी उल्लेख करते हैं वह जानना शौका ही नहीं हर समाज के लिये जरूरी है। बहुत ही श्रम के साथ उन्होंने इस कार्य को किया है। शब्दकोष की भूमिका में उन्होंने इतिहास-भूगोल सहित जो जानकारी दी है वह इस प्रकार है- भारत तिब्बत सीमा में स्थित गोरीगंगा की घाटी जोहार के मूल निवासी शौका नाम से जाने जाते हैं। यहाँ की अपनी विशिष्ट संस्कृति और भाषा रही है। प्राचीन काल में यहाँ की आबादी बहुत कम थी क्योंकि विकट होने के कारण यहाँ से तिब्बत जाने वाला दर्रा, उंटाधूरा से व्यापारिक आवागमन सबसे बाद में खुला। यहाँ के तत्कालीन लोग जो भाषा बोलते थे वह रंकस कहा जाता था। पूर्व मध्यकाल में तिब्बत व्यापार के लाभ से आकर्षित होकर जब कुमाउँ व पश्चिम नेपाल के राजदूत व खस लोग जोहार आये तो वे अपने साथ हिन्दू वैदिक धर्म व कुमाउंनी-हिन्दी भाषा ले आये। परिणामतः इस समुदाय ने न केवल वैदिक धर्म अपनाया बल्कि कुमाउंनी और रंकस के सम्मिश्रण से निर्मित एक विशिष्ट भाषा को भी अपनाया जिसे सूकिखून कहा जाता था। मध्यकाल में गढ़वाल और तिब्बत होते हुए मूल रूप से राजस्थान के राजपूत धाम सिंह जोहार मिलम में, काशी के पण्डित भट्ट मर्तोली में, गढ़वाल के शौका और कुमाउँ के व नेपाल के राजपूत बड़ी संख्या में आकर विभिन्न गाँवों में बसे तो जोहार में वैदिक धर्म के और सुदृढ़ होने के साथ ही कुमाउंनी की सहोदर एक ऐसी भाषा का जन्म हुआ जिसे सूकिबोलि/शौकी बोली कहा जाने लगा। इस विशिष्ट भाषा ने सूकिखून को चलन से बाहर कर दिया। शौका बोली में कुछ ऐसे शब्द है। जो न तो कुमाउंनी में पाए जाते हैं और न ही हिन्दी में। वे शब्द सूकिखून से आये हैं। उनमें से कुछ दारमा के रंगलू में पाए जाते हैं। और कुछ का मूल भाषा विज्ञानी ही बता सकते हैं। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने के कारण जब शौका लोग जोहार घाटी से पलायन करके देश के विभिन्न स्थानों में बस गए और उनके आर्थिक क्रियाकलापों में अमूलचूल परिवर्तन हो गया तो उनकी संस्कृति और भाषा मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी। परिवर्तन की यह दिशा व गति ऐसे ही जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब शौका संस्कृति और भाषा दोनों विलुप्त हो जायेंगे। इसलिए इस समाज के प्रबुद्ध लोग इनके संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। उनके प्रयास को सफल बनाने के लिये आवश्यक है कि, मेरी आयु वर्ग के लोग जिन्होंने बचपन में शौका जीवन जिया है, शौका संस्कृति से सम्बन्धित शोधग्रन्थ और रचना साहित्य लिखें। ऐसा किया भी जा रहा है। मै। खुद ऐसी कई रचनाएं कर चुका हूं लेकिन यह सब कुछ हिन्दी में किया गया है शौका भाषा में नहीं। शौका बोली को पुनर्जीवित करने के लिए अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है। वर्ष में तीन-तीन गाँवों में उत्क्रमण तथा व्यापार हेतु लम्बी अवधि के लिए तिब्बत और भारत के विभिन्न भागों में भ्रमणशील रहने के कारण शौकाओं को रचना साहित्य लेखन और भाषा को व्यापकरण की परिधि में लाने का कोई अवसर नहीं मिला। आधुनिक काल में भी इस भाषा का रचना साहित्य कुछ कविताओं के लेखन तक ही सीमित है। यदि यह कहा जाये कि शौका बोली कभी भी भाषा नहीं बन पायी तो गलत नहीं होगा। बोली वह होती है जो बोली जाती है। जब उस बोली में लेखन कार्य किया जाता है तो वह भाषा बन जाती है। शौका बोली के इतनी जल्दी चलन से बाहर होने का एक कारण यह भी है कि इसका लिखित साहित्य नहीं है जो इसे स्थायित्व दिला सकता था। भाषा और संस्कृति का चोली-दामन का सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व बना नहीं रह सकता है। शौका भाषा को पुनर्जीवित किये बिना शौका संस्कृति को संरक्षित और सम्बर्धित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह भाषा अब मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी है जिसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके संरक्षित करने के लिये कोई आधर भी उपलब्ध् नहीं है। हमारी आयु-वर्ग के लोग इस भाषा को जानते और कुछ हद तक बोल भी सकते हैं। उनके बाद यदि यह भाषा भी सूकिखून की तरह विलुप्त हो जाये तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, ऐसा न हो इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास को सपफल बनाने के लिये आवश्यक है कि शौका भाषा का व्याकरण तैयार किया जाये। इसके मुहावरों और लोकोक्तियों को लिपिबद्ध किया जाये और एक बृहद शब्दकोष बनाया जाये, इसी कड़ी में शब्दकोष बनाने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है। शब्दकोष में सामान्यतः मूल शब्द दिया जाता है। उसके साथ उसका अर्थ, वाक्य प्रयोग, समानार्थक व विलोम शब्द, उससे बने शब्द आदि दिए जाते हैं। और ऐस बने शब्द यथा संज्ञा, भाववाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण आदि में से क्या है यह संकेतकों के द्वारा दर्शाया जाता है। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि हर शब्द को अलग लिखने से शब्दकोष बहुत बड़ा हो जाता है। लेकिन अब सन्दर्भ बदल गया है। इन्टरनेट के कारण न तो शब्दकोष बड़ा होने की समस्या रह गयी है और न ही इसके छापने की आवश्यकता रह गयी है। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारा लक्षित वर्ग इस भाषा को जानता ही नहीं है। उसे किसी अंग्रेजी या हिन्दी शब्दकोष का समानार्थक शौका भाषा का शब्द ढूंढने के लिए उसके मूल शब्द जानने में भी कठिनाई होगी। इसलिए इस शब्दकोष में हर शब्द को अलग लिखा गया है। प्रोग्रामिंग के माध्यम से वे अपनी उंगुली से अंग्रेजी, हिन्दी और शौका भाषा के किसी भी शब्द को क्लिक करके अन्य दो भाषाओं में उनका समानार्थक शब्द ढूंढ सकते हैं। या यूं कहें कि जिस तरह आधुनिक टैक्नोलाॅजी के माध्यम से दुनिया उनकी मुट्ठी में है उसी तरह इन तीन भाषाओं के शब्द उनके फिंगरटिप में होंगे। शब्दकोष उपयोगी होने के साथ बहुत बड़ा भी न हो इसके लिए संज्ञा और क्रिया दोनों बनाने वाले शब्दों में उनमें से केवल उस एक को लिया गया है जो ज्यादा चलन में है। यह इस आशा में किया गया है कि दूसरी शब्द रचना पाठक स्वयं आसानी से कर सकता है। जैसे लेख से लिखना आदि। फिर भी जहाँ भी कुछ भिन्न अर्थ का शब्द बनता हो उसे दिया गया है। इसी प्रकार हिन्दी और अंग्रेजी के समानार्थक शब्दों के साथ शौका बोली के केवल शब्द दिए गए हैं और उनका अर्थ इस विश्वास से छोड़ दिया गया है कि पाठक हिन्दी या अंग्रेजी के शब्दों से उसका अर्थ बखूबी समझ जाएंगे। आवश्क समझे जाने पर कुछ खास शब्दों का वाक्य प्रयोग बाद में दिया जा सकता है। जो शब्द इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं उनका अन्य भाषा का समानार्थक शब्द दिया गया है। उसके लिए (न) संकेतक दिया गया है। कोई भी भाषा पूर्ण रूप से न तो स्वतंत्रा है और न ही रह सकती है। भाषा की समृद्धि के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को हर भाषा में अपनाया जाता रहा है और यही हमें भी करना होगा। इसलिए हिन्दी, फारसी, उर्दू और अग्रेजी के प्रचलित तथा प्रचलित की जाने लायक शब्दों को बिना संकोच के शब्दकोष में स्थान दिया गया है। शौका बोली का मूल स्वरूप जीवित रहे इसके लिए आवश्यक है कि इसका मूल उच्चारण कायम रहे। इसमें श तथा ष के लिए बहुधा स का प्रयाग किया जाता है। इसी तरह इ की जगह र का प्रयोग किया जाता है। ण के स्थान पर भी न का प्रयोग किया जाता है। मात्राओं में भी अन्तर है। जैसे अ की आ और आ की जगह आ। इसी तरह शब्दों में भी अन्तर है। जैसे ध् की जगह द आदि। मूल उच्चारण की इन विशेषताओं को मानये रखने का प्रयास किया गया है। इस भाषा की एक बहुत बड़ी खामी है इसमें संयुक्ताक्षर का अत्यधिक प्रयोग। इससे भाषा न केवल कर्ण कटु हो जाती है बल्कि इसके लेखन में भी कठिनाई आती है। भाषा के आम प्रचलन और सहज लेखन के लिए इसमें सरलता लाना आवश्कय है। इस हेतु जहाँ भी सम्भव है वहाँ संयुक्ताक्षर के स्थान पर सरल शब्दों का उपयोग किया गया है जो सम्भव है कुछ शुद्धता के पोषक लोगों को पसन्द न आये। उन विद्वानों से से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि भाषा के संरक्षण के लिए यह किया जाना आवश्यक है। फिर भी जो संयुक्ताक्षर न केवल बहुत आम है बल्कि शौका बोली की विशिष्टता है उनका स्वरूप यथावत रखा गया है। इसमें कुछ शब्द छूटे हो सकते हैं और कुछ अन्य भाषाओं के शब्द शौका बोली में लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। शब्दकोष को छोटा और उपयोगी बनाने के लिये अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द छोड़ दिए गए हैं जो उपयोग में नहीं हैं। इसी प्रकार मूल शब्द से बने अन्य शब्दों में से उनको छोड़ दिया गया है जिनका प्रयोग आमतौर पर नहीं होता है। उपयोगी पाए जाने या हो जाने पर भविष्य में छोड़ गए कुछ शब्दों को शब्दकोष में लेने की आवश्कता पड़ सकती है। इसके लिये अपने वाले सुझावों के आधर पर एडमिन व सम्पादक द्वारा इसे अद्यतन व परिष्कृत कराते रहना होगा। इसके लिए मेरी पूर्व स्वीकृति है। वैसे भी अब हार्ड काॅपी का जमाना चला गया है। मैं आशा करता हूं कि नई पीढ़ी आन लाइन शब्दकोष को अधिक सहजता से स्वीकारेगी। शौका बोली में दो ऐसे विशिष्ट शब्द हैं जिनको उच्चारण के अनुरूप देवनागरी में लिखना सम्भव नहीं है। इस पर अभी विचार विमर्श चल रहा है। क्योंकि हम देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं और करते रहेंगे इसलिए इसके अनुशासन के अन्तर्गत इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके तो अच्छा होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो हमें इसको भविष्य के लिए छोड़ना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारी बोली कुमाउनी के सबसे नजदीक है। फिर भी वह उससे बहुत भिन्न है। कुमाउनी में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दशाने के लिए उच्चारण भिन्नता को अपनाया गया है लेकिन हमारी बोली में इस भिन्नता को दर्शाने के लिए कुमाउनी के अ और आ का स्थान परिवर्तन कर दिया गया है या फिर व, य, ह जैसे अक्षर में ए आदि के ध्वनि के साथ नए शब्द का निर्माण कर दिया गया है। इस अर्थ में हमारी बोली कुमाउनी से अधिक समृद्ध है। लेकिन इसके कारण हमारी बोली कुछ कर्ण कटु हो गयी है। पिफर भी इसकी विशिष्टता को बनाए रखने के लिए हमें न केवल इस अन्तर को बनाए रखना होगा बल्कि इसे और भी सुदृढ़ करना होगा। इस विशिष्टता को बचाए रखने के लिए लघु ह्रस्व के लिए हलन्त और अति दीर्घ के लिए विसर्ग (:) का प्रयाग बहुत आवश्यक होने पर ही करना होगा अन्यथा हमारी भाषा कुमाउनी या हिन्दी में समाहित हो जायेगी। शौका बोली के जिन शब्दों का समानार्थक शब्द किसी अन्य भाषा में नहीं है उनको तथा उनके प्रयोग को संलग्नक में देने का प्रयास किया जाएगा। शब्दकोष को साॅफ्रटवेयर में डाने वाले युवा यह निर्णय लेंगे कि इसे शब्दकोष में कहाँ और किस रूप में स्थान दिया जाये। शब्द और भाषा का समाज और उसकी संस्कृति से चोली दामन का साथ होता है। इसलिये कई शब्दों का समानार्थक शब्द कुछ अन्य भाषाओं में नहीं मिलता है। ऐसे ही अंग्रेजी के कुछ शब्दों का हिन्दी समानार्थक शब्द की तुलना में शौका शब्द अध्कि सटीक होने पर उसे अपनाया गया है। ऐसे में हिन्दी और शौका शब्द एक-दूसरे के समरूप नहीं मिलेंगे। पाठकों से अनुरोध् है कि ऐसे में अंग्रेजी शब्द देखें क्योंकि इस शब्दकोश की मूल भाषा अंग्रेजी और लक्षित भाषा शौका है। एक ही वस्तु, भाव व प्रकटीकरण के लिये शौका भाषा में कई शब्द हैं और समानार्थक शब्द अंग्रेजी व हिन्दी में नहीं हैं। ऐसे शब्दों को और विशिष्ट कार्य व्यवहार से सम्बन्धित शब्दों को एक ही जगह दिया गया है ताकि यह शब्दकोष एक सन्दर्भ पुस्तक के रूप में काम आ सके और भावी पीढ़ी को भाषा का उपयोगी ज्ञान हो सके। सन्दर्भ में आसानी के लिये सम्बन्धित अंग्रेजी शब्द को s Capital Ietter में दिया गया है। शब्द चयन का आधर पफादर बुल्के का ‘अंग्रेजी हिन्दी कोश’ रहा है। जिसके लिये मै। उस महान आत्मा का रिणी हूं। उनके शब्दकोष के उन शब्दों को छोड़ दिया गया है जो न तो प्रयोग में हैं और न ही उनके प्रयोग में आने की सम्भावना है। उसमें जो कुछ शब्द छूट गये हैं उनको सम्मिलित कर लिया गया है। कुछ मित्रों ने शौका बोली के शब्द चयन में जो सहयोग दिया उनके लिये मैं उनका आभारी हूं। इसमें संशोधन करने और कुछ शब्दों को इससे हटाने तथा कुछ और शब्दों को इसमें जोड़ने की प्रक्रिया दसकों तक जारी रखनी होगी। इसके लिए, इसके प्रकाशित कराने और इसके उ(रण की अनुमति देने के लिए मैं जोहार पुस्तकालय और मेरे पुत्रा नवीन को सम्मिलित रूप से अधिकृत करता हूं।
नरेन्द्र न्यौला ‘पंचाचूली’ ‘हिम गिरी-देव भूमि’ उत्तराखण्ड देव- देवियों, सन्यासियों, रिषि-मुनियों व लामाओं का ध्यान साधना ‘तप केन्द्र भूमि’ आदि काल से ही रहा है। इस हिम देव भूमि में ऐसा भी एक ग्राम है। जहाँ देवाधिदेव जी का ‘साक्षात पदचिन्ह व आध्यात्मिक ध्यान साधना गुफा’ विद्यमान है। यह उस समय की बात है। जब दिव्य शक्ति प्राप्त विशेष व्यक्ति सन्यासी और भगवान देवों में विशेष क्षण पर परस्पर साक्षात्कार होता था। देवाधिदेव महादेव जी हिमालय क्षेत्रों से बाहर के ‘शिवालयों प्रवास’ से वापसी के दौरान दारमा से होते हुए जब वे अपने मूल निवास स्थान ‘कैलास मानसरोवर’ वापस जा रहे थे। इसकी सूचना मिलते ही दारमा लुंग्मा के सभी स्थानीय ‘सैं समा-देवी देवताओं’ व क्षेत्र जनों ने सैं ह्याजंगरी जी के मार्गदर्शन में अतिथि तपस्वी बाबा जी का न्यौंला पंचाचूली हिम शिखर के निकट भव्य रूप से स्वागत किया। तपस्वी भोले बाबा शिव ने स्थानीय देवी-देवताओं के प्रेम भाव और ग्राम जनों की आस्थामय पाठ-पूजन के साथ- साथ ग्राम सीपू क्षेत्र के आस-पास के प्राकृतिक, नैसर्गिकता, रंग बिरंगे पफूलों की फुलवारी भोज वृक्षों की सिलसिलेवार नर्सरी, जड़ीबूटी की सुगन्धता, कस्तूरी मृगों (देव मृगों) के विचरण और यहाँ की भौगोलिकता से प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने ग्राम सीपू में अपने पद को विराम दिया। इस क्षेत्र की ‘आध्यात्मिक ध्यान साधना ’ को महसूस करने के लिए यहीं रुके, ग्राम सीपू से कुछ दूर एकान्त क्षेत्रा में ध्यान साधना हेतु एक ही रात में ‘ध्यान साधना गुफा’ का निर्माण करवाया जिसे हम रं लुंग्बा जन ‘महादेव गुफा’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस ‘ध्यान साधना गुफा’ में महादेव जी ने महत्वपूर्ण दारमा प्रवास के लगभग तीन माह बिताए। बाद में रं लुंग्बा के सभी देवी-देवताओं ने सदा दारमा लुंग्बा को ही अपना स्थायी तपस्थली बनाने का बहुत अनुरोध् किया लेकिन महादेव जी स्थायी तपस्थली वाली बात को न मानते हुए, यहाँ प्रवास में प्रत्येक साल आने की बात पर सहमति दी और महादेव जी ने दारमा से दूसरे दिन प्रस्थान की तैयारी की परन्तु स्थानीय तपस्वी सै। ह्याजंगरी जी अपने तंत्रामंत्रा शक्तिबल से जिस दिन महादेव जी कैलास पर्वत जा रहे थे उसी दिन लगातार तेज बर्फबारी व ओलावृष्टि करा दी। महादेव जी जैसे-जैसे आगे कैलास की ओर जा ही रहे थे, ग्राम ढाकर के सामने बर्फीला पहाड़ी मार्ग से पैर फिसल कर गिर गये, जिससे उनका एक पैर जख्मी हो गया। तदोपरान्त ‘सैं ह्याजंगरी जी’ ने महादेव जी की मदद करते हुए उनको ग्राम सीपू महादेव तपस्थली गुफा की ओर वापस लौटे। वापस लौटते समय ग्राम सीपू क्षेत्र मार्ग पर स्थित पौराणिक शिलाखण्ड पर भोले शिव जी के पद पड़े और उस शिलाखण्ड पर पद चिन्ह के निशान पड़ गये, जो आज भी उस शिलाखण्ड पर विद्यमान है। महादेव जी के इस ‘पद चिन्ह युक्त पौराणिक शिलाखण्ड’ के पास ही मन्दिर स्थापित कर ग्राम जन सदियों से पूजा अर्चना करते आ रहे हैं व महादेव जी आशीर्वाद ग्राम जनों को ‘सुरक्षा सुख समृद्धि के रूप में प्राप्त होता रहता है। सैं ह्याजंगरी जब जब महादेव जी को ‘महादेव तपस्थली गुफा’ में छोड़कर लौट रहे थे। उस वक्त महादेव खौला के प्रवेश स्थल के पास में ही सैं ह्याजंगरी ने अपने हाथ में लिए सूखे भोज वृक्ष से बनी लट्ठी वाले ठण्डे पर मंत्रणा कर उसे रोप दिया और ग्राम जनों की उपस्थित में कहा कि अगर महादेव जी इस गुफा में प्रवेश के बाद भी हमेशा किसी भी रूप में यहाँ वास करेंगे-रहेंगे तो यह सूखी भोजवृक्ष लट्ठी ‘मेरा हमसफर भोज वृक्ष लट्ठी’ हरा-भरा होकर पेड़ का रूप ले लेगा अगर महादेव जी का अंश का वास यहाँ नहीं होगा तो यह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी हरित नहीं होगा। लेकिन चमत्कार हुआ। कुछ दिनों बाद सैं ह्याजंगरी जी द्वारा वह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी ने पौध्े स्थल में लोगों की आस्था केन्द्र के कारण पौराणिक पौध भोजवृक्ष विशाल हरा-भरा भोज वृक्ष के रूप में आज स्थित है। यह ध्यान देने वाली बात है कि उस विशाल पौराणिक भोज वृक्ष से लगभग डेढ़ किलो मीटर के परिक्षेत्र में कोई भी भोजवृक्ष का पेड़ नहीं है। इससे पूर्णतया प्रमाणित होता है कि यह भूमि भोले बाबा शिव की ‘ध्यान साधना तप भूमि’ रही है और उनका ग्राम सीपू व क्षेत्रा जनों के रक्षक रूप में हमेशा विराजमान रहता है। ऐसा माना जाता है कि ग्राम सीपू का नाम हमारे ग्राम पूर्वज बुजुर्गों व देव दूत ‘धामी जी’ ने भगवान महादेव शिव जी की आध्यात्मिक ध्यान साधना की तपस्थली होने के कारण ‘शिव से सीपू’ रखा। पौराणिक कथाओं और गाथाओं के अनुसार उत्तर पूर्व भोंट प्रान्त के भोले बाबा शिव ने जिस महादेव ध्यान साधना गुफा में तपस्या की थी तभी से देवाधिदेव प्रत्येक साल साक्षात प्रवास पर ग्राम सीपू महादेव गुफा में आते हैं। बाद में ग्राम जनों ने महादेव ध्यान साधना गुफा में ही ग्राम रक्षक शिव पूजा स्थल का चयन किया और प्रत्येक साल में एक बार उस पूजा स्थल में जाकर देवाधिदेव महादेव जी पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। ग्राम सीपू, शिव स्थापित स्थल पर ग्राम जन छः वर्ष में एक बार महापूजन का आयोजन कर धूमधाम से महादेव महा महोत्सव मनाते हैं। इस महोत्सव में देश प्रदेश के सभी ग्राम परिवार जन उपस्थित रहते हैं। कुछ श्रद्धालु जन महादेव गुफा पूजा स्थल में जाकर महादेव जी की पूजा अर्चना करते हैं। आज भी 500-600 साल पहले ग्राम बुजुर्ग जनों ने ग्राम रक्षक देवाधिदेव महादेव जी का ध्यान साधना भंग न हो व गुफा को संरक्षण प्रदान करने के वास्ते विशालकाय दरवाजे का निर्माण करवाकर गुफा के मुख्य द्वार पर लगवाया। इस प्राचीन महादेव ध्यान गुफा मुख्य द्वार में उस प्राचीन समय पर लगवाए गए दरवाजे के अवशेष वर्तमान समय में भी विद्यमान हैं। महादेव गुफा दुर्गम खतरनाक क्षेत्र में स्थित है। इस कारण आज से 120-130 साल पूर्व ग्राम जनों की एक राय बनाकर ‘शिव ध्यान गुफा’ से शिवलिंग लाकर गाँव के पश्चिमी छोर में मन्दिर की स्थापना कर पूजा अर्चना करने का निर्णय लिया। प्रत्येक साल ग्रामजन महादेव जी की पूजा अर्चना गाँव में स्थापित महादेव शिव स्थल में परम्परागत ढंग से करते हैं। महादेव जी की कृपा दृष्टि सदा सभी क्षेत्रा वासियों में बनी रहती है। इस महादेव गुफा के अन्दर अनेकों शिवलिंग विराजमान हैं। ग्राम सीपू भ्रमण के दौरान श्रद्धालु जन बताते हैं कि ‘महादेव गुफा’ परिसीमन के आसपास में सच्चे स्वच्छ निर्मल मन से उँ मंत्र का जाप करें तो पर्यावरण से उँ की ध्वनि तरंगों की गूंज सुनाई देती है। हजारों साल पहले देवाधिदेव महादेव जी ने जिस स्थान पर बैठकर साक्षात आध्यात्मिक ध्यान तप किया। देवाधिदेव महादेव जी के इस पवित्र भूमि शिव स्थल पर पहँुचकर एक क्षण में ही आत्मा में ऐसी शुद्धता का महसूस होता है। मानो सांसारिक दुनिया से ‘आत्मा का परमात्मा’ के साथ परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगती है। बहुत साल पूर्व गाँव वालों ने शिव अंश पंच धातु का त्रिशूल ‘शिव ध्यान साधना गुफा’ में स्थापित किया। समय-समय पर श्रद्धालु जन वहाँ पहँुचकर शिवमय हो जाते हैं। इन सभी पूर्व की घटना और वर्तमान में मन की आत्मीयता का अनुभव से सिद्ध होता है। सीपू महादेव जी की गुफा में महादेव शिव आदिकाल से ही विराजमान है और इस महादेव गुफा के अन्दर बहुत सारे शिवलिंग है। कुछ लोग बताते हैं कि सीपू प्रथम साक्षात प्रवास के बाद देवाधिदेव महादेव जी महादेव ध्यान साधना गुफा के पिछले द्वार से आदि कैलास (छोटा कैलास), उँ पर्वत होते हुए कैलास मानसरोवर अपने स्थायी तपस्थली को चले गए।
जैसा नाम वैसा काम –प्रयाग वनस्पतियों का नाम हमारे भारतीयों विद्वानों वैज्ञानिकों सहित अन्य विश्व कर प्रसिद्ध वनस्पतिक बैज्ञानिको ने पेड़ पौधों की जीवन शैली रूप रेखा जीवन चक्र के अनुसार रखे हैं। इनके सुंदर भाग वृक्ष जड़, छाल, लतायें, कोपले, फल ,फूल, तना, अन्य अनगिनत शाखाएं होती है जो हमे हवा पानी देती है जीवन देती हैं। इन्ही में एक पेड़ है मजनू जिसको संसार मे अलग अलग नामो से जाना जाता है । मुंस्यारी क्षेत्र में इस वनस्पति को मंछयन के नाम से जानते हैं जिसका तातपर्य /मतलब भी हिंदी के प्रचलित शब्द मजनू का क्षेत्रीय नाम है इसकी साथी पेड़ को लैला नाम से जाना जाता मजनू पेड़ का वानस्पतिक नाम salix bebylomica है । यह वनस्पति वर्तमान में भूजल की कमी को पूरा करने में सक्षम है । अधिकतर जलश्रोतों में इसकी लटकी हुये लताये शाखाएं देखे जाते हैं । जलश्रोतों को पुनर्जीवित करना हो तो अन्य जल उतपन्न करने वाले वनस्पतियों के साथ मजनू के पौधों का भी लगाये सकारात्मक परिणाम आयेंगे । मजनू के फूल और कोपले भी काफी असाध्य रोगों के उपचार में दवाओं अन्य औषधीय हर्बल उत्पादों के साथ मिश्रण कर उपचार में प्रयोग होता है । मजनूं के फूल बीज मधुमखियों, पक्षियों के पसंदीदा भोजनो मे से एक है । अधकितर पशु पक्षियों द्वारा ही हमारे विलुप्त हो रहे वनस्पतियों का संरक्षण किया जा रहा है । हम इंसान स्वार्थी है में खुद भी लेकिन में अब प्रयास कर रहा हूं की जितना भौतिक लाभ मुझे मिले इन वनस्पतियों से मिलता है उसमें का 80% भाग तन मन धन इनके बचाव और सुरक्षा में खर्च करूंगा । मेरे ओर टीम का प्रयास सम्पूर्ण वर्ष में वृक्षारोपण के साथ इनकी सुरक्षा देखभाल उपयोग ,स्वरोजगार, आत्मनिर्भर, ओर दोहन न करने पर भी रहेगा । हम जो धरातल के लोग हैं उन किसानों ,चरवाहों से लगातार वन उपज के दोहन ,सुरक्षा पर चर्चा करते हैं उनके बन परिसर में बिताये अनुभव का लाभ लेते हैं और वन्यजीव वनस्पतियों की जानकारी हेतु एक मार्गदर्शक के रूप में आंशिक पारिश्रमिक देकर भृमनशील जगहों पर लेके जाते हैं तब इन सयानो से हम कुछ सिख पाते हैं । पुनः टीम के साथ हिमालय के ग्रामीणों से विलुप्त हो रहे वन ,वनस्पतियों,वन्यजीव, पशु,पक्षियो को बचाया जाय अगर अपना स्वार्थ है तो पशु, पक्षी मधुमक्खी भी हमे इन्हें बचाने, इनकी बीज उतपत्ति में योगदान देते हैं कुछ पेड़ आर्थिक लाभ सजावट के लिये लगाएं कुछ पेड़ जंगली जानवरों के भोजन निवाला हेतु लगाएं कुछ पेड़ पक्षियो के खाने बसासत घोषलो हेतु लगाएं हिमालय को हरा भरा करने में अपना योगदान दे सलाह मार्गदर्शन हेतु सम्पर्क करें टीम जौहारी फ़सक मुंस्यारी हाउस पिघलता हिमालय 95577771959761665084 9557777264/8394811110