
25 फरवरी 2023 की प्रातः सीमा का फोन आया- ‘ददा, पिता जी नहीं रहे। मैं सीमा बोल रही हूं कपिल जी की बेटी।’
सीमा (भुवन कपिल जी की सुपुत्री), मैं एकटक सोच में डूब गया।
81 वर्षीय भुवन कपिल सच्चे रंगकर्मी थे, पहाड़ की होली और रामलीला में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा। हल्द्वानी शहर के मुखानी में रहने वाले कपिल परिवारों का शुरु से दबदबा रहा है। एक जमाने में जब मुखानी में दादाओं का नाम लेकर लोग डर जाते थे, खुली नहर में उफनते पानी को देख भयभीत हो जाते थे, भुवन कपिल का आवास सुरलहरियों में भीगा रहता था। मुखानी में होने वाली पर्वतीय रामलीला का बहुत नाम हुआ करता था। रात्रि में होने वाली रामलीला की तालीम से लेकर तैयारी तक इनके आवास पर होती। इसके अलावा मंगलवार को होने वाले सुन्दरकांड में युवाओं की टीम सक्रिय रहती। कपिल जी का आवास पूरी तरह अखाड़ा बना हुआ था, रात्रि को होली की महफिलों का जमजमा अब इतिहास बन चुका है। शायद ही कोई कलाकार रहा हो जो पहाड़ी ढब की होली को सुनने, सुनाने, देखने के लिये इनके आवास में न गया हो। पुराने जमाने के मकान में एक कमरा गोल आकार में था जिसमें लगातार होली की बैठक जमी रहती। बीच-बीच में चाय की चुस्की, पान-बीड़ी-सिगरेट………हर प्रकार के लोग जुटते और होली के भस्सी और उस्ताद भीमताल, नैनीताल, अल्मोड़ा से तक आया करते। इनमें कपिल जी का अपना स्टाइल था जो सबको सजग कर जाता। चाहे कोई किसी पद-कद का हो, गोल कमरे में सजने वाली महफिल में सब एक हो जाते। बाद में हिमालय संगीत शोध समिति का प्रशिक्षण केन्द्र इसी गोल कमरे में बना। उनका संरक्षण हम सभी के लिये रहा। होली की तीन-चार महीने तक चलने वाली खूबसूरत महफिलों में धुंआ- धुरमण्ड कोई मायने नहीं रखता था। श्रीमती ज्ञान कपिल की सेवा को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिन्होंने कपिल जी का पूरा साथ दिया और हर आने-जाने वाले मेहमान व कलाकारों होल्यारों को निभाया।
किन्हीं कारणों से मुखानी की रामलीला बन्द हो गई लेकिन होली की बैठकें वर्तमान तक जारी रही। उनके साथ ही बैठकों में इधर-उधर जाने का अवसर भी मिला। उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी। वह बैठक के बीच किसी भी प्रकार की आवाज बेकार को पसन्द नहीं करते और गाने से पहले कह देते ‘या तो आप ही बोलो या मुझे गा लेने दो।’ उनका स्वभावत सरल और कलाकार के रूप में मूडी था। वह खुले मन ने जीने वाले लोगों में से थे। कलाकार के अलावा अपनी संस्कृति संरक्षण के लिये वह समर्पित थे। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद कपिल जी की अन्तिम चाह संगीत और महफिल रही। वर्तमान कें हल्द्वानी शहर में बहुत बदलाव आ चुका है, समय के साथ इस परिवार ने भी अपना को व्यवस्थित किया। जिस स्थान पर गोल कमरा हुआ करता था, उनके सुपुत्र मोहित का चिकित्सालय है और आवास कुछ ही दूरी पर है। अपने नये आवास में भी उन्होंने होली की बैठकें करवाई और पुरानी महफिलों की यादें को ताजा किया। स्वास्थ्य कारणों से वह लड़खड़ाए लेकिन उनकी धुन व जिद होली बैठक थी जिसके लिये वह हम दोनों भाई (पंकज-धीरज) को खूब याद करते और कहते- ‘मेरे हीरा-मोती हैं।’ महफिल सजती और होली के टीके की बैठक अनिवार्य रूप से की जाती। इस बार भी वह होली के लिये रुके थे लेकन ईश्वर की लीला को वही जाने। वह अपने पीछे पत्नी श्रीमती ज्ञान कपिल, सुपुत्र डाॅ.मोहित, विवाहित सुपुत्री सीमा सहित भरापूरा परिवार, मित्रों को छोड़ गये हैं। वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी प्रेरणा से वह अभियान चलता रहेगा जो शुरु हुआ था
