‘शक्ति प्रेस’ हल्द्वानी के इतिहास में प्रमुख गढ़ रहा है

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी।
कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा।
‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’
27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत शक्ति प्रेस डाॅ. पंकज उप्रेती
‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी।
कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा।
‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’
27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत
पड़ने पर अन्य कमरे भी प्रेस में जुड़ गये और छापेखाने का कार्य विस्तार पा गया। तब हमारा पूरा परिवार भी यहाँ रहता था। रूलिंग मशीन की सरसराहट के बीच शानदार बाइडिंग का कार्य, प्रिंटिग कार्य, बाद के दिनों में शादी कार्ड की छपाई भी होती। उस छोटे आकार की पुस्तकें जैसे भजन संग्रह, होली संग्रह इत्यादि भी छपते रहे। यहीं 30 अक्टूबर 1978 में साप्ताहिक पिघलता हिमालय का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ। 19 दिसम्बी 1979 में इसे दैनिक समाचार पत्रा का रूप दे दिया गया था। कुछ अड़चनों के बाद 1 दिसम्बर 1986 को पुनः यहीं से पिघलता हिमालय जारी हुआ, जिसका प्रकाशन पता पिता आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद 2013 में जे.के.पुरम् सेक्टर डी, मुखानी हल्द्वानी में कर दिया गया था और प्रयास था कि ‘शक्ति प्रेस’ को भी पूरी तरह इसी जगह लाया जाए। 2018 में पिघलता हिमालय की सम्पादक और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी माता जी श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद से लगातार यह विचार था कि अपने प्रेस को भी वहीं स्थापित करें जहाँ परिवार रहने लगा है लेकिन जिस जगह वर्षों की यादें जुड़ी हों उसे एकदम छोड़ना शायद हमारे लिये भी कठिन था। अन्ततः 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट होना परिवार को सुखद लगा है। और इस बीच हमें कई नये अनुभव और सीख मिली कि कौन हमारे कितने करीब है। ऐशबाग मोहल्ले के पुराने पड़ोसी तो सब पहले ही जा चुके थे और जो दो-चार परिवार मकान मालिक की हैसियत से रहते हैं, उनकी इच्छा भी यही रही है कि अब समेट लिया जाए। समेटने की इस होड़ में वह भी अकेले हो चुके हैं। फिलहाल हम खुशनुमा माहौल में ऐसबाग से विदा हो गये। यह जरूरी भी था क्योंकि हल्द्वानी शहर की घिचपिच के बीच जिस प्रकार से सड़क चैड़ीकरण इत्यादि हो रहा है उसमें बदलाव तो होना ही है। ऐसे में हमेशा से पूरे सम्मान के साथ मान्यता रखने वाला ‘शक्ति प्रेस’ भी अच्छी जगह शिफ्रट हो जाए, खुशी की बात है।
बात पुरानी है कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ला जिसमें हमारा प्रेस था, तब शहर में ही बहुत कम वाहन हुआ करते थे। रोड के दोनों ओर आम के बड़े-बड़े पेड़ सुन्दरता बढ़ाते थे। प्रेस से थोड़ा आगे एक बड़ा सा नाला हुआ करता था, जो घिर चुका है, इसी से होकर नालियों का पानी-कचरा निकासी होता था। वर्तमान की कालाढूंगी रोड बरसात में भर जाती है। प्रेस के सामने ही हल्द्वानी फर्नीचर मार्ट पुराने प्रतिष्ठानों में से रहा है। इस मोहल्ले की कई यादों को पिता जी ने अपनी कृति ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ में लिखा है।
पुराने हल्द्वानी में जब मुख्य मार्ग सिंगल रोड के थे, सड़क से लगा हमारा मोहल्ला ऐशबाग कुछ परिवारों का गुलदस्ता था। घरों में ताले नहीं लगते थे, ‘शक्ति प्रेस’ में ताले कभी नहीं लगे क्योंकि दिन-रात गपोड़ियों, आन्दोलन कारियों के अलावा विचारवान लोगों की बैठकें और प्रिंटिंग का कार्य होता था। पड़े लिखे बेरोजगार भी इसे अपने संरक्षण का अड्डा मानते रहे हैं। कई ऐसी लड़ाईयां भी यहीं से शुरू हुई जिन्हें सुनकर आश्चर्य हो सकता है। एकदम शान्त रहने वाले पिता जी गलत पर झल्ला जाते। फिर चाहे कोई नेता या कोई अधिकारी हो, वह अपना विरोध् दर्ज करते। समय बदलता रहा और सड़क से बहुत उपर होने वाले मकान गड्ढों में ध्ंसते दिखाई देने लगे। हमारा घर/प्रेस भी सड़क से एक सीढ़ी नीचे हो गया था और बरसात में पानी भरने लगता था। पहले समय में पूरा मोहल्ला गर्मी के दिनों में खुले में सोता था। अपनी-अपनी चारपाई में मच्छरदानी लगाकर सारे परिवार सड़क किनारे ही दिखाई देते। सन् 2000 के बाद से थोड़ा बदलावा आया और मोहल्ले में पुराने परिवार दूसरे स्थानों पर अपना निवास स्थान बनाकर जा चुके थे। ‘शक्ति प्रेस’ के बाहर पाखड़ का पेड़ लग चुका था, जिसकी आड़ में बैठने वाले कम हो गये। सड़क भी सिंगल से चैड़ी होकर इसमें डिवाइडर बन गया। याद आ रहा है कि पुराने समय में संचार व्यवस्था भी सीमित थी। ‘शक्ति प्रेस’ में डायल करने वाला पुराना फोन था। ‘193’ नम्बर के इस पफोन पर सुख-दुःख भरी सूचनाओं के लिये दूर-दूर से लोग आया करते थे। कई लोगांे ने अपने सगे-सम्बन्ध्यिों-मित्रों को इस पफोन नम्बर को दिया था ताकि विशेष स्थिति में पफोन कर जानकारी मिल सके। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर को जाने वाली बसों का प्राइवेट बस अड्डा भी इस प्रेस के पास खुला तो कालाढंूगी चकलुवा इत्यादि से लोग प्रचलन के हिसाब से शादी कार्ड छपवाने यहीं आते थे। कुछ वर्षों के अन्तराल में छपाई के तरीके बदले और छापेखानों में मशीनरी का तरीका भी बदलने लगा। तब स्क्रीन प्रिटिंग का कार्य भी शक्ति प्रेस में होने लगा और पहली बार कार्डों में ऐपण के डिजाइन बनाए गए। इस प्रकार के प्रयोग पिता जी किया करते थे, इन सबके बीच संगीत सभा का होना भी कम आश्चर्य नहीं था। हम भाई-बहन भी अपने बचपन से उबर कर युवा अवस्था में थे और खुला आसमान बना ‘शक्ति प्रेस’ हमारा घर था। इसी में पढ़ाई और संगीत का रियाज करना बहुतों को आश्चर्य ही लगता होगा। पुराने जमाने के छोटे-छोटे कमरे वाले मकान में रेलगाड़ी जैसा हमारा आवास हमें संरक्षित करता रहा। हमें ही नहीं, उन आन्दोलनकारियों को भी पनाह मिली जिनकी तलाश होती थी। कई आन्दोलनों में जब पकड़-धकड़ होती तो अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से तक प्रदर्शन करने वाले यहाँ आ जाते। सीमान्त क्षेत्रा से लेकर मैदान तक के व्यापारियों के मिलन का अड्डा यह बन गया। जम्बू-गन्द्रायणी से लेकर रिंगाल तक के कारोबारियों का पता शक्ति प्रेस था, इनकी व्यापारिक बैठक धर्मशाला में होती थी क्योंकि बिजनौर इत्यादि जगह से व्यापारी धर्मशालाओं में आकर रुकते थे। इसी प्रकार गंगावली क्षेत्रा से आने वालों के लिये हमारा घर ही मुख्य केन्द्र बना हुआ था। छोटे से शहर में तब लोग अपनों को तलाशते हुए मिलते-जुलते थे। प्रेम-व्यहार के उस समय में सभी जगह यह रिवाज रहा है। आज भी पुराने परिवार अपने रिवाजों को बनाए हुए हैं। शहर होने का कतई यह मतलब नहीं है कि मेहमानों को होटल में रुकवाया जाए या मेहमान चुपचाप होटलों में रुककर चले जाएं। वर्तमान में सुविधाओं को देखते हुए बहुत बदलाव हुआ है और हल्द्वानी जैसा सुन्दर शहर भी एकदम बदलने जा रहा है। इसमें पहाड़ और मैदान से आकर बसने वालों की भीड़ ने इतना दबाव बना दिया है कि मुख्य शहर में पैदल चलना भी दिक्कत भरा होता जा रहा है। यही सब देखते हुए सड़क चैड़ीकरण करण सहित अन्य तोड़पफोड़ होनी ही है।
जिस सिंगल सड़क पर कोई भी व्यक्ति उतर कर किसी के घर या दुकान पर जा सकता था, उस सड़क पर अब दिनभर दौड़ रहे वाहनों व डिवाइडर के कारण कोई रुकना पसन्द नहीं करता है। बदलते शहर में आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रा जुड़ चुके हैं और खेत-खलिहानों का कार्य बहुत कम हो चुका है। ऐसे में अपराधिक गतिविधियों भी बहुत तेजी से बड़ी हैं। बाजारबाद और सोशल मीडिया के प्रभाव में नई पीढ़ी को हल्द्वानी शहर की पुरानी तहजीब का पता ही नहीं है जब इस गुलस्दते में होली-रामलीला से लेकर हर रंग था और एक-दूसरे की मदद को लोग आगे आते थे। दानपुण्य करते लोगों के अलावा गर्मी में प्याउ अपनी ओर से लगवाने वाले भी थे। वर्तमान का हल्द्वानी दिखावे में डूबा है। कुछ दिनों के अन्तराल में कोई न कोई महोत्सव या जुलूस होने लगे हैं। चहक रहे युवाओं को इससे कोई मतलब नहीं की क्या हो रहा है। सोशल मीडिया के लिये फोटो-रील उनका लक्ष्य लगता है।
‘शक्ति प्रेस’ में बैठकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ हमेशा दस्तावेज के रूप में कार्य करेगी। इस शहर के बनने से लेकर वर्तमान तक में कौन लोग किन-किन स्थानों से आए और किस तरह से एक सुसज्जित शहर बसासत हुई। किस समय में कौन कितना प्रभावशाली था और कौन नगर पालिका चैयरमैन, कौन बड़ा व्यापारी था और कौन समाजसेवी, सबकुछ इस कृति में है। यही कारण है कि इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। जब शहर का स्वरूप ही बदलने जा रहा हो तो यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि आंखिर किसी शहर में दबाव के बाद किस प्रकार से बदलाव होता है। लिखने के लिये बहुत है लेकिन इतना भर कहना है कि प्रेम भाईचारा के जो पुराने दिन थे, वह सभी स्थानों पर बना रहे।
कालाढूंगी रोड स्थित शक्ति प्रेस का एक कक्ष

उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी

डाॅ.पंकज उप्रेती
25 फरवरी 2023 की प्रातः सीमा का फोन आया- ‘ददा, पिता जी नहीं रहे। मैं सीमा बोल रही हूं कपिल जी की बेटी।’
सीमा (भुवन कपिल जी की सुपुत्री), मैं एकटक सोच में डूब गया।
81 वर्षीय भुवन कपिल सच्चे रंगकर्मी थे, पहाड़ की होली और रामलीला में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा। हल्द्वानी शहर के मुखानी में रहने वाले कपिल परिवारों का शुरु से दबदबा रहा है। एक जमाने में जब मुखानी में दादाओं का नाम लेकर लोग डर जाते थे, खुली नहर में उफनते पानी को देख भयभीत हो जाते थे, भुवन कपिल का आवास सुरलहरियों में भीगा रहता था। मुखानी में होने वाली पर्वतीय रामलीला का बहुत नाम हुआ करता था। रात्रि में होने वाली रामलीला की तालीम से लेकर तैयारी तक इनके आवास पर होती। इसके अलावा मंगलवार को होने वाले सुन्दरकांड में युवाओं की टीम सक्रिय रहती। कपिल जी का आवास पूरी तरह अखाड़ा बना हुआ था, रात्रि को होली की महफिलों का जमजमा अब इतिहास बन चुका है। शायद ही कोई कलाकार रहा हो जो पहाड़ी ढब की होली को सुनने, सुनाने, देखने के लिये इनके आवास में न गया हो। पुराने जमाने के मकान में एक कमरा गोल आकार में था जिसमें लगातार होली की बैठक जमी रहती। बीच-बीच में चाय की चुस्की, पान-बीड़ी-सिगरेट………हर प्रकार के लोग जुटते और होली के भस्सी और उस्ताद भीमताल, नैनीताल, अल्मोड़ा से तक आया करते। इनमें कपिल जी का अपना स्टाइल था जो सबको सजग कर जाता। चाहे कोई किसी पद-कद का हो, गोल कमरे में सजने वाली महफिल में सब एक हो जाते। बाद में हिमालय संगीत शोध समिति का प्रशिक्षण केन्द्र इसी गोल कमरे में बना। उनका संरक्षण हम सभी के लिये रहा। होली की तीन-चार महीने तक चलने वाली खूबसूरत महफिलों में धुंआ- धुरमण्ड कोई मायने नहीं रखता था। श्रीमती ज्ञान कपिल की सेवा को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिन्होंने कपिल जी का पूरा साथ दिया और हर आने-जाने वाले मेहमान व कलाकारों होल्यारों को निभाया।
किन्हीं कारणों से मुखानी की रामलीला बन्द हो गई लेकिन होली की बैठकें वर्तमान तक जारी रही। उनके साथ ही बैठकों में इधर-उधर जाने का अवसर भी मिला। उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी। वह बैठक के बीच किसी भी प्रकार की आवाज बेकार को पसन्द नहीं करते और गाने से पहले कह देते ‘या तो आप ही बोलो या मुझे गा लेने दो।’ उनका स्वभावत सरल और कलाकार के रूप में मूडी था। वह खुले मन ने जीने वाले लोगों में से थे। कलाकार के अलावा अपनी संस्कृति संरक्षण के लिये वह समर्पित थे। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद कपिल जी की अन्तिम चाह संगीत और महफिल रही। वर्तमान कें हल्द्वानी शहर में बहुत बदलाव आ चुका है, समय के साथ इस परिवार ने भी अपना को व्यवस्थित किया। जिस स्थान पर गोल कमरा हुआ करता था, उनके सुपुत्र मोहित का चिकित्सालय है और आवास कुछ ही दूरी पर है। अपने नये आवास में भी उन्होंने होली की बैठकें करवाई और पुरानी महफिलों की यादें को ताजा किया। स्वास्थ्य कारणों से वह लड़खड़ाए लेकिन उनकी धुन व जिद होली बैठक थी जिसके लिये वह हम दोनों भाई (पंकज-धीरज) को खूब याद करते और कहते- ‘मेरे हीरा-मोती हैं।’ महफिल सजती और होली के टीके की बैठक अनिवार्य रूप से की जाती। इस बार भी वह होली के लिये रुके थे लेकन ईश्वर की लीला को वही जाने। वह अपने पीछे पत्नी श्रीमती ज्ञान कपिल, सुपुत्र डाॅ.मोहित, विवाहित सुपुत्री सीमा सहित भरापूरा परिवार, मित्रों को छोड़ गये हैं। वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी प्रेरणा से वह अभियान चलता रहेगा जो शुरु हुआ था

जोहार महोत्सव : समय बदलने की आहट है

डाॅ.पंकज उप्रेती
जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी हल्द्वानी द्वारा इस बार भी दो दिवसीय जोहार महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। महोत्सवों की बाढ़ में इस आयोजन की जो विशेषता दिखाई देती है वह एक घाटी की संस्कृति तो है ही लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और द्वन्द के बीच यह साफ हो चुका है कि ‘समय बदलने की आहट है’।
हल्द्वानी की बसासत के साथ किस प्रकार से भोटिया पड़ाव बसा वह लम्बी कहानी है। (पिघलता हिमालय के सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से’ विस्तार से दिया गया है।) तब तिकोनिया पर से घोड़े-बकरियों के झुण्ड लम्बी कतार में लग जाया करते थे। डीएफओ हीरासिंह पांगती साहब सहित दो-तीन परिवार सबसे पुराने परिवार यहाँ बसे। दोनहरिया में लक्ष्मण निवास भी मिलने जुलने वालों का केन्द्र बना। पुष्कर सिंह जंगपांगी जी का आवास ‘प्रताप भवन’ बनते समय नहर के पास बहुत संघर्ष की कहानी है। ‘शंकर निवास’ पुरानी यादों का परिवार है। खैर पहाड़ में कुछ परिवारों का जम-जमाव हो गया। पड़ाव के बीचोंबीच पांगती परिवार का ‘मिलम निवास’ भी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा बन गया। उस दौर में हल्द्वानी के होल्यार बंजारा होली के रूप में दोनहरिया शिवमन्दिर तक जाया करते थे।
समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है परन्तु भोटिया पड़ाव में जाते ही अलग प्रकार की अनुभूति होती थी। हाँ, यहाँ मोहल्ले में आबादी घनी होने लगी थी और जोहार-मुनस्यार से आने वाले व्यापारियों का अड्डा दीवान सिंह जी का ‘सीमान्त ट्रान्सपोर्ट’ हो चुका था। मुख्य बाजार में ओके होटल के पास इस ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की धक थी। 1968 में कालाढूंगी रोड स्थित हमारा छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ जन मिलन का बड़ा केन्द्र बन चुका था, जहाँ पहाड़ के हर कौने से आने-जाने वाले मिलते थे। बाद में यहीं पर बाजपुर बस अड्डा बन गया और तराई क्षेत्रा के लोगों का मिलन केन्द्र भी हुआ। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ शुरु होते ही शक्ति प्रेस व्यापारियों के मिलन का केन्द्र भी बना। संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने रिंगाल के कारोबार के लिये यूपी के व्यापारियों से सम्पर्क बनाए थे। ‘रहमत अली शेख फारुखी’ नाम मुझे आज भी याद है। कई व्यापारी रिंगाल के लिये आते और हिन्दू धर्मशाला इत्यादि स्थानों में रुकते थे। व्यापारियों की अपनी इशारों की भाषा थी जिसे वह हाथ मिलाते हुए रुमाल से ढक कर एक-दूसरे के सौदा कर लेते।
हल्द्वानी का पर्वतीय उत्थान मंच का कार्यालय भी पिघलता हिमालय शक्ति प्रेस ही बना। रामलीला मैदान से शुरुआती शोभा यात्रा निकाली गई थी। बाद में हीरानगर में इसे स्थापित किया गया लेकिन जब तक भवन नहीं बन गया, उत्थान मंच की सारी गतिविधियों का केन्द्र शक्ति प्रेस ही रहा। मुझे भली भांति याद है हल्द्वानी में उत्तरायणी जुलूस को मेले का स्वरूप देने के लिये प्रथम बार स्टाल लगाने का विचार आया तो पिता जी ने सबसे पहले मिलम के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ उत्तम सिंह सयाना और दुम्मर से उनी कपड़ों के लिये जंगपांगी जी को बुलाया। मात्र दो-चार स्टाल लगे थे। अगले साल भी ऐसा ही हुआ। बाद में यह मेला स्टालों की भरमार का बना। समाज में बढ़ती उच्छंृखलताओं को देख पिता जी ने उत्थान मंच को हमेशा के लिये छोड़ दिया। जिस मंच के लिये वह दिन-रात समर्पित थे, उन्होंने क्यों छोड़ा होगा, यह आज आज समझ में आने लगा है……….
पिता जी लेखन में जुटे रहते। तब उन्हें ‘राजजात के बहाने’ कृति के लिये राहुली सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मान मिला था। लगातार धारदार लेखन वह करते रहे। हीरसिंह राणा, गोपालबाबू गोस्वामी मिलने प्रेस में ही आ जाया करते थे। मेले की भीड़ क्या होती है, इस प्रश्न को पिता जी बहुत रोचक तरीके से हमें समझा देते थे। साथ ही पहाड़ के तमाम कौतिकों का उदाहरण देते, जो स्वयंस्पफूर्त होते हैं। पिछले एक दशक में तो हल्द्वानी सहित आसपास उत्तरायणी महोत्सव नाम के ही ढेर लग चुके हैं। तमाम मंच जगह-जगह सजने लगे हैं। इसके अलावा फैलते जा रहे हल्द्वानी में कई प्रकार के जलसे-जुलूसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की संस्कृतियों का गुलदस्ता यह भाबर है लेकिन हर कोई चाहेगा कि वह अपनी जड़ों को पल्लवित करे और अपने संस्कार अगली पीढ़ी तक पहँुचाए। ऐसी ही कोशिश जोहार समाज में भी हुई। शुरुआत में अपने स्थानीय तीज-त्यौहारों साथ जो शुरुआत हुई थी वह होली पूजा के रूप में बेहतर शुरुआत बन गई। माघ की खिचड़ी का आयोजन भी ध्यैनियों के सम्मान में मिलने-जुलने का बड़ा आयोजन बनने लगा। जोहार मिलन केन्द्र आपस में मेल-जोल का शानदार केन्द्र स्थापित हो गया, जिसमें हर आयुवर्ग के लोग आते हैं। ऐसे में उर्जावान युवाओं ने विचार किया कि क्यों न आधुनिक समय को देखते हुए किसी ऐसे आयोजन को अंजाम दिया जाए जिसकी सपफलता बड़ा परिणाम दे।
जोहार की बात और व्यवहार को लेकर कई संगठन हैं लेकिन जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी ने इसे कर दिखाया और ‘जोहार महोत्सव’ के रूप में जो वृक्ष रोपा वह आज हरा है। इसके पहले आयोजन में अनुभव कम था लेकिन उत्साह ज्यादा, जिसका परिणाम यह हुआ कि तमाम जगह से जोहारी बन्धु आयोजन में भागीदार बने। पहले अनुभव के बाद सोसाइटी ने अगले वर्ष इसके स्वरूप में बदलाव किये बगैर आयोजन को तरीके से समेट लिया। इसके बाद आयोजन का स्वरूप लगभग तय हो चुका था और समझ आने लगा था कि हल्द्वानी भाबर मेें किस प्रकार से सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसके स्टालों में जोर दिया गया और व्यावसायिक गतिविधियां द्रुत हुईं। सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिये उन कलाकारों को बुलाया जाने लगा। सांगीतिक दृष्टि से आयोजन का यह हिस्सा बहुत असरकारी होता है, इसका प्रभाव दूरगामी होता है। खैर, आयोजकों ने जोहार की प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा बाहर से कलाकार आमंत्रित किये।
‘जोहार-महोत्सव-मेला-संस्कृति’ की समग्र पड़ताल के बाद आयोजकों को बधाई दी जानी चाहिये कि वह इस बड़े आयोजन को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। साथ ही सुझाव भी है कि आयोजन के ‘जोहार’ नाम अनुरूप इसकी हर हरकत उस संस्कृति की ठहस से भरपूर हो। जिस जोहार नगर (भोटिया पड़ाव) के बसने के समय घोर संघर्ष हुए थे तब इसके फैलाव के बारे में विचार भी नहीं आता था। वर्तमान में हल्द्वानी के अलग-अलग स्थानों पर जोहार वासियों की बसासत है। सारे साधन-संसाधन होने के बावजूद अब वह स्थिति है कि अधुना समय में इसकी चमक और ज्यादा हो।
यह सच भी स्वीकार लेना चाहिये कि समय बदलने की आहट इस बार के महोत्सव में दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोग हमारे बीच नहीं हैं। कुछ समर्पित जन अस्वस्थ्य होने के बावजूद समाज की बेहतरी के लिये जुटे हैं। कई जुझारु जन अपने अनुभवों के साथ इस अभियान को बनाये रखने की कसक लिये हुए दिखाई दिये। देखना होगा समय का चक्र किस दिशा को तय करेगा….

कथाकार शेखर जोशी की रटन अन्त तक रही

श्रद्धासुमन
डाॅ.पंकज उप्रेती
हिन्दी के जाने-माने कथाकार शेखर जोशी का गाजियाबाद के एक अस्पताल में 4 अक्टूबर 2022 को निधन हो गया। स्वास्थ्य कारणों से वह सप्ताह भर इस अस्पताल मेें रहे और सबसे विदा ले ली। लेखन-पढ़न में 90 वर्ष तक ईमानदार कार्य करने वाले जोशी जी सामाजिक मिलनसार थे। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, चेक, पोलिश, रूसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसाइटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है।
उम्र के उत्तराद्र्ध में आँखों की रोशनी कम होने के बावजूद वह लैंस के सहारे पुस्तकें, चिट्ठी-पत्राी पढ़ते थे। 11 सितम्बर को अपने जीवन के 90 साल पूरे करने वाले शेखर जोशी का जन्म अल्मोड़ा जिले के ओलिया गाँव में 10 सितम्बर 1952 को हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई थी। इण्टरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही सुरक्षा विभाग में जोशी जी का ई.एम.ई. अप्रेन्टिसशिप के लिये चयन हो गया, जहाँ वो सन् 1986 तक सेवा में रहे। तत्पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वतंत्र लेखन करने लगे।
दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों में शेखर जोशी को हिन्दी साहित्य के कथाकारों की अग्रणी श्रेणी में खड़ा कर दिया। उन्होंने नई कहानी को अपने तरीके से प्रभावित किया। पहाड़ के गाँवों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध्, उम्मीद और नाउम्मीदी से भरे औद्योगिक मजबूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति में जुड़ी रूढ़ियां- ये सभी उनकी कहानियांे के विषय रहे हैं। शेखर जोशी की प्रमुख रचनाओं में कोशी का घटवार 1958, साथ के लोग 1978, हलवाहा 1981, नौरंगी बीमार है 1990, मेरा पहाड़ 1989, डायरी 1994, बच्चे का सपना 2004, आदमी का डर 2011, एक पेड़ की याद, प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं।
हिन्दी साहित्य को अपनी कालजयी रचनाओं से समृ( करने वाले शेखर जोशी ने चिकित्सा शोध् के लिये अपने शरीर को दान किया था। जिस कारण उनकी पार्थिक देह को ग्रेटर नोएड के शारदा हाॅस्पिटल को दिया गया। शेखर जी के सुपुत्र प्रत्तुल जोशी पिछले महीने ही आकाशवाणी अल्मोड़ा केन्द्र से सेवानिवृत्त हुए है।। छोटे सुपुत्र संजय जोशी फिल्मकार हैं। ‘प्रतिरोध् का सिनेमा’ नाम से उनके अभियान चर्चित हैं।
शेखर जोशी जितना अपने लेखन पढ़न में डूबे थे उतना ही सामाजिकता में रमे रहे। उनका अधिकांश समय पहाड़ से बाहर बीता लेकिन उनके दिल-दिमाग में पहाड़ बसता था। इलाहाबाद में लम्बी यात्रा उनकी रही है। पत्नी के निधन के बाद जब उनसे उनका इलाहाबाद छूटा, वह भी उन्हें बहुत उदास कर चुका था लेकिन समय ने बहुत उलट किया वह लखनउ रहने लगे। अपने मित्रांे-साथियों के साथ बराबर पत्राचार करते, पुस्तकों की समीक्षा लिखते, स्वतंत्रा रूप से लेख लिखते। नव लेखकों को प्रोत्साहित करते और पहाड़ को आवाद करने की बात करते। पिघलता हिमालय परिवार के साथ ही भी उनका यह रिश्ता बना रहा। सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के कहानी संग्रह की भूमिका भी उन्होंने लिखी। इसके अलावा निरन्तर पत्राचार से सम्वाद होता रहता था। उप्रेती जी के निधन के बाद सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती को ढांढस बंधते हुए जोशी जी ने मार्मिक पत्रा लिख भेजा था, जिसमें उन्होंने अपने इलाहाबाद छूट जाने के दर्द को भी लिखा और कामना की कि संकट की इस घड़ी में पिघलता हिमालय को सींचना होगा।
इलाहबाद के समय से ही शेखर जोशी के तमाम संगी-साथी थे और उनका जुड़ाव-लगाव सभी से था लेकिन लखनउ आने के बाद पहाड़ के सभी प्रमुख जनों से उनकी मुलाकात थी। पत्रकार-लेखक नवीन जोशी उनकी लगातार टोह लेते रहते। वरिष्ठ पत्रकार महेश पाण्डे नियमित रूप से भेंटघाट करने के साथ ही उन्हें पहाड़ की सूचनाओं से जोड़े रहते। आज जब शेखर जोशी जी हमारे बीच नहीं हैं, सभी उनके रचना संसार के अलावा उनके व्यक्तित्व को याद कर श्रद्धासुमनअर्पित कर रहे हैं। वह हमेशा अपनी रचनाओं के माध्यम से याद रहेंगे।
वाकेई शेखर जोशी अपनी पीढ़ी के विराट व्यक्तित्व वाले रचनाकार थे, जिनकी रटन लिखने-पढ़ने-समझने की थी। उनकी सच्चाई थी कि वह गुंथते चले जाते, उन्हें सम्मान की चाह नहीं थी। पिघलता हिमालय परिवार स्व. शेखर जोशी को श्रद्धासुमन अर्पित करता है।
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साहित्यकार/कहानीकार शेखर जोशी 2016 में मुनस्यारी भी आये थे। दरअसल वह इस बार अपने ग्रीष्म प्रवास में परिजनों के साथ पहाड़ों की सैर में निकले थे। तब 84 वर्षीय श्री जोशी जी ने पिघलता हिमालय के साथ खूब बातचीज की। उनका जीवन इलाहाबाद पिफर लखनउ में बीता लेकिन उनकी यादों में पहाड़ का बचपन हमेशा रहा है। पिघलता हिमालय से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘गाँव-घरों में ताले लटक जाना दुर्भाग्य है जो हमारी परम्परा की जड़ रहे हैं।’’ उस समय लेखक मंच प्रकाशन से उनकी पुस्तक ‘मेरा ओलिया गाँव’ तैयार हो रही थी। जोशी जी अपनी पुरानी यादों में घिरते हुए कहने लगे- उनका गाँव परम्परा और आध्ुनिकता का मेल था, खेती भी अच्छी होती थी, लोगों के पास समय भी था, लोक संस्कृति- गीत, एंेपण सभी तो था। 12 घरों के इस गाँव में अब केवल 2 घर खुले रहते हैं। यह सब कैसे हुआ, उसी का वृत्तांत पुस्तक में है। कमोवेश यही स्थिति आज हर गाँव की है।

शौका बोली-भाषा को पुनर्जीवित करने का योजनाबद्ध प्रयास है यह

अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश
डाॅ.पंकज उप्रेती
किसी भी समाज की जो लोक मान्यता और बोली भाषा होती है, वह उसके पूरे बात-व्यवहार को बताती है। उस समाज की विशिष्ट शब्दावली उसके इतिहास, भूगोल और व्यवहार को बहुत सटीक बताती है जबकि उसका अनुवाद या दूसरी बोली भाषा में वही शब्द उसके पूरे अर्थ को व्यक्त करने में अधूरापन ही लगता है। ऐसा ही अधूरापन हमारी हिमालयी सीमा की बोली-भाषाओं को लेकर समाज मेें रहा है। जबकि हमारे सीमान्त क्षेत्र की विशिष्ट बोली-भाषा अपनी चाल के साथ अपने सटीक शब्दों के लिये बहुत समृद्ध है।
भारत सरकार के शब्दावली आयोग ने भी देश की विभिन्न बोली भाषाओं का अध्ययन करते हुए बहुत कार्य किया है परन्तु आज भी लगता है कि हमारी लोकभाषा का बहुत बड़ा हिस्सा उसमें नहीं है। बोली-भाषा उसके व्यवहार के साथ पनपनी है वरना दुनिया की सैकड़ों भाषाएं समय के साथ बुझ चुकी हैं। बोली भाषा के इस सच को जानते हुए शौका समाज के विद्वान गजेन्द्र सिंह पांगती ने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। श्री पांगती ने अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश के रूप में समाज को सजग किया है। दो खण्डों के इस शब्दकोष के पीछे उनकी सीधी सी मंशा है कि शौका बोली भाषा को पुनर्जीवित किया जाए, इसके लिये यह योजनाबद्ध प्रयास है। भाषा में जबर्दस्त पकड़ रखने वाले और अनुशासन प्रिय पांगती जी ग्रन्थ की भूमिका में शब्दकोष के बारे में बताने के साथ-साथ जितना भी उल्लेख करते हैं वह जानना शौका ही नहीं हर समाज के लिये जरूरी है। बहुत ही श्रम के साथ उन्होंने इस कार्य को किया है। शब्दकोष की भूमिका में उन्होंने इतिहास-भूगोल सहित जो जानकारी दी है वह इस प्रकार है-
भारत तिब्बत सीमा में स्थित गोरीगंगा की घाटी जोहार के मूल निवासी शौका नाम से जाने जाते हैं। यहाँ की अपनी विशिष्ट संस्कृति और भाषा रही है। प्राचीन काल में यहाँ की आबादी बहुत कम थी क्योंकि विकट होने के कारण यहाँ से तिब्बत जाने वाला दर्रा, उंटाधूरा से व्यापारिक आवागमन सबसे बाद में खुला। यहाँ के तत्कालीन लोग जो भाषा बोलते थे वह रंकस कहा जाता था। पूर्व मध्यकाल में तिब्बत व्यापार के लाभ से आकर्षित होकर जब कुमाउँ व पश्चिम नेपाल के राजदूत व खस लोग जोहार आये तो वे अपने साथ हिन्दू वैदिक धर्म व कुमाउंनी-हिन्दी भाषा ले आये। परिणामतः इस समुदाय ने न केवल वैदिक धर्म अपनाया बल्कि कुमाउंनी और रंकस के सम्मिश्रण से निर्मित एक विशिष्ट भाषा को भी अपनाया जिसे सूकिखून कहा जाता था। मध्यकाल में गढ़वाल और तिब्बत होते हुए मूल रूप से राजस्थान के राजपूत धाम सिंह जोहार मिलम में, काशी के पण्डित भट्ट मर्तोली में, गढ़वाल के शौका और कुमाउँ के व नेपाल के राजपूत बड़ी संख्या में आकर विभिन्न गाँवों में बसे तो जोहार में वैदिक धर्म के और सुदृढ़ होने के साथ ही कुमाउंनी की सहोदर एक ऐसी भाषा का जन्म हुआ जिसे सूकिबोलि/शौकी बोली कहा जाने लगा। इस विशिष्ट भाषा ने सूकिखून को चलन से बाहर कर दिया। शौका बोली में कुछ ऐसे शब्द है। जो न तो कुमाउंनी में पाए जाते हैं और न ही हिन्दी में। वे शब्द सूकिखून से आये हैं। उनमें से कुछ दारमा के रंगलू में पाए जाते हैं। और कुछ का मूल भाषा विज्ञानी ही बता सकते हैं।
तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने के कारण जब शौका लोग जोहार घाटी से पलायन करके देश के विभिन्न स्थानों में बस गए और उनके आर्थिक क्रियाकलापों में अमूलचूल परिवर्तन हो गया तो उनकी संस्कृति और भाषा मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी। परिवर्तन की यह दिशा व गति ऐसे ही जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब शौका संस्कृति और भाषा दोनों विलुप्त हो जायेंगे। इसलिए इस समाज के प्रबुद्ध लोग इनके संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। उनके प्रयास को सफल बनाने के लिये आवश्यक है कि, मेरी आयु वर्ग के लोग जिन्होंने बचपन में शौका जीवन जिया है, शौका संस्कृति से सम्बन्धित शोधग्रन्थ और रचना साहित्य लिखें। ऐसा किया भी जा रहा है। मै। खुद ऐसी कई रचनाएं कर चुका हूं लेकिन यह सब कुछ हिन्दी में किया गया है शौका भाषा में नहीं। शौका बोली को पुनर्जीवित करने के लिए अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है। वर्ष में तीन-तीन गाँवों में उत्क्रमण तथा व्यापार हेतु लम्बी अवधि के लिए तिब्बत और भारत के विभिन्न भागों में भ्रमणशील रहने के कारण शौकाओं को रचना साहित्य लेखन और भाषा को व्यापकरण की परिधि में लाने का कोई अवसर नहीं मिला। आधुनिक काल में भी इस भाषा का रचना साहित्य कुछ कविताओं के लेखन तक ही सीमित है। यदि यह कहा जाये कि शौका बोली कभी भी भाषा नहीं बन पायी तो गलत नहीं होगा। बोली वह होती है जो बोली जाती है। जब उस बोली में लेखन कार्य किया जाता है तो वह भाषा बन जाती है। शौका बोली के इतनी जल्दी चलन से बाहर होने का एक कारण यह भी है कि इसका लिखित साहित्य नहीं है जो इसे स्थायित्व दिला सकता था।
भाषा और संस्कृति का चोली-दामन का सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व बना नहीं रह सकता है। शौका भाषा को पुनर्जीवित किये बिना शौका संस्कृति को संरक्षित और सम्बर्धित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह भाषा अब मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी है जिसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके संरक्षित करने के लिये कोई आधर भी उपलब्ध् नहीं है। हमारी आयु-वर्ग के लोग इस भाषा को जानते और कुछ हद तक बोल भी सकते हैं। उनके बाद यदि यह भाषा भी सूकिखून की तरह विलुप्त हो जाये तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, ऐसा न हो इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास को सपफल बनाने के लिये आवश्यक है कि शौका भाषा का व्याकरण तैयार किया जाये। इसके मुहावरों और लोकोक्तियों को लिपिबद्ध किया जाये और एक बृहद शब्दकोष बनाया जाये, इसी कड़ी में शब्दकोष बनाने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है।
शब्दकोष में सामान्यतः मूल शब्द दिया जाता है। उसके साथ उसका अर्थ, वाक्य प्रयोग, समानार्थक व विलोम शब्द, उससे बने शब्द आदि दिए जाते हैं। और ऐस बने शब्द यथा संज्ञा, भाववाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण आदि में से क्या है यह संकेतकों के द्वारा दर्शाया जाता है। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि हर शब्द को अलग लिखने से शब्दकोष बहुत बड़ा हो जाता है। लेकिन अब सन्दर्भ बदल गया है। इन्टरनेट के कारण न तो शब्दकोष बड़ा होने की समस्या रह गयी है और न ही इसके छापने की आवश्यकता रह गयी है। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारा लक्षित वर्ग इस भाषा को जानता ही नहीं है। उसे किसी अंग्रेजी या हिन्दी शब्दकोष का समानार्थक शौका भाषा का शब्द ढूंढने के लिए उसके मूल शब्द जानने में भी कठिनाई होगी। इसलिए इस शब्दकोष में हर शब्द को अलग लिखा गया है। प्रोग्रामिंग के माध्यम से वे अपनी उंगुली से अंग्रेजी, हिन्दी और शौका भाषा के किसी भी शब्द को क्लिक करके अन्य दो भाषाओं में उनका समानार्थक शब्द ढूंढ सकते हैं। या यूं कहें कि जिस तरह आधुनिक टैक्नोलाॅजी के माध्यम से दुनिया उनकी मुट्ठी में है उसी तरह इन तीन भाषाओं के शब्द उनके फिंगरटिप में होंगे।
शब्दकोष उपयोगी होने के साथ बहुत बड़ा भी न हो इसके लिए संज्ञा और क्रिया दोनों बनाने वाले शब्दों में उनमें से केवल उस एक को लिया गया है जो ज्यादा चलन में है। यह इस आशा में किया गया है कि दूसरी शब्द रचना पाठक स्वयं आसानी से कर सकता है। जैसे लेख से लिखना आदि। फिर भी जहाँ भी कुछ भिन्न अर्थ का शब्द बनता हो उसे दिया गया है। इसी प्रकार हिन्दी और अंग्रेजी के समानार्थक शब्दों के साथ शौका बोली के केवल शब्द दिए गए हैं और उनका अर्थ इस विश्वास से छोड़ दिया गया है कि पाठक हिन्दी या अंग्रेजी के शब्दों से उसका अर्थ बखूबी समझ जाएंगे। आवश्क समझे जाने पर कुछ खास शब्दों का वाक्य प्रयोग बाद में दिया जा सकता है। जो शब्द इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं उनका अन्य भाषा का समानार्थक शब्द दिया गया है। उसके लिए (न) संकेतक दिया गया है। कोई भी भाषा पूर्ण रूप से न तो स्वतंत्रा है और न ही रह सकती है। भाषा की समृद्धि के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को हर भाषा में अपनाया जाता रहा है और यही हमें भी करना होगा। इसलिए हिन्दी, फारसी, उर्दू और अग्रेजी के प्रचलित तथा प्रचलित की जाने लायक शब्दों को बिना संकोच के शब्दकोष में स्थान दिया गया है।
शौका बोली का मूल स्वरूप जीवित रहे इसके लिए आवश्यक है कि इसका मूल उच्चारण कायम रहे। इसमें श तथा ष के लिए बहुधा स का प्रयाग किया जाता है। इसी तरह इ की जगह र का प्रयोग किया जाता है। ण के स्थान पर भी न का प्रयोग किया जाता है। मात्राओं में भी अन्तर है। जैसे अ की आ और आ की जगह आ। इसी तरह शब्दों में भी अन्तर है। जैसे ध् की जगह द आदि। मूल उच्चारण की इन विशेषताओं को मानये रखने का प्रयास किया गया है। इस भाषा की एक बहुत बड़ी खामी है इसमें संयुक्ताक्षर का अत्यधिक प्रयोग। इससे भाषा न केवल कर्ण कटु हो जाती है बल्कि इसके लेखन में भी कठिनाई आती है। भाषा के आम प्रचलन और सहज लेखन के लिए इसमें सरलता लाना आवश्कय है। इस हेतु जहाँ भी सम्भव है वहाँ संयुक्ताक्षर के स्थान पर सरल शब्दों का उपयोग किया गया है जो सम्भव है कुछ शुद्धता के पोषक लोगों को पसन्द न आये। उन विद्वानों से से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि भाषा के संरक्षण के लिए यह किया जाना आवश्यक है। फिर भी जो संयुक्ताक्षर न केवल बहुत आम है बल्कि शौका बोली की विशिष्टता है उनका स्वरूप यथावत रखा गया है।
इसमें कुछ शब्द छूटे हो सकते हैं और कुछ अन्य भाषाओं के शब्द शौका बोली में लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। शब्दकोष को छोटा और उपयोगी बनाने के लिये अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द छोड़ दिए गए हैं जो उपयोग में नहीं हैं। इसी प्रकार मूल शब्द से बने अन्य शब्दों में से उनको छोड़ दिया गया है जिनका प्रयोग आमतौर पर नहीं होता है। उपयोगी पाए जाने या हो जाने पर भविष्य में छोड़ गए कुछ शब्दों को शब्दकोष में लेने की आवश्कता पड़ सकती है। इसके लिये अपने वाले सुझावों के आधर पर एडमिन व सम्पादक द्वारा इसे अद्यतन व परिष्कृत कराते रहना होगा। इसके लिए मेरी पूर्व स्वीकृति है। वैसे भी अब हार्ड काॅपी का जमाना चला गया है। मैं आशा करता हूं कि नई पीढ़ी आन लाइन शब्दकोष को अधिक सहजता से स्वीकारेगी।
शौका बोली में दो ऐसे विशिष्ट शब्द हैं जिनको उच्चारण के अनुरूप देवनागरी में लिखना सम्भव नहीं है। इस पर अभी विचार विमर्श चल रहा है। क्योंकि हम देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं और करते रहेंगे इसलिए इसके अनुशासन के अन्तर्गत इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके तो अच्छा होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो हमें इसको भविष्य के लिए छोड़ना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारी बोली कुमाउनी के सबसे नजदीक है। फिर भी वह उससे बहुत भिन्न है। कुमाउनी में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दशाने के लिए उच्चारण भिन्नता को अपनाया गया है लेकिन हमारी बोली में इस भिन्नता को दर्शाने के लिए कुमाउनी के अ और आ का स्थान परिवर्तन कर दिया गया है या फिर व, य, ह जैसे अक्षर में ए आदि के ध्वनि के साथ नए शब्द का निर्माण कर दिया गया है। इस अर्थ में हमारी बोली कुमाउनी से अधिक समृद्ध है। लेकिन इसके कारण हमारी बोली कुछ कर्ण कटु हो गयी है। पिफर भी इसकी विशिष्टता को बनाए रखने के लिए हमें न केवल इस अन्तर को बनाए रखना होगा बल्कि इसे और भी सुदृढ़ करना होगा। इस विशिष्टता को बचाए रखने के लिए लघु ह्रस्व के लिए हलन्त और अति दीर्घ के लिए विसर्ग (:) का प्रयाग बहुत आवश्यक होने पर ही करना होगा अन्यथा हमारी भाषा कुमाउनी या हिन्दी में समाहित हो जायेगी। शौका बोली के जिन शब्दों का समानार्थक शब्द किसी अन्य भाषा में नहीं है उनको तथा उनके प्रयोग को संलग्नक में देने का प्रयास किया जाएगा। शब्दकोष को साॅफ्रटवेयर में डाने वाले युवा यह निर्णय लेंगे कि इसे शब्दकोष में कहाँ और किस रूप में स्थान दिया जाये।
शब्द और भाषा का समाज और उसकी संस्कृति से चोली दामन का साथ होता है। इसलिये कई शब्दों का समानार्थक शब्द कुछ अन्य भाषाओं में नहीं मिलता है। ऐसे ही अंग्रेजी के कुछ शब्दों का हिन्दी समानार्थक शब्द की तुलना में शौका शब्द अध्कि सटीक होने पर उसे अपनाया गया है। ऐसे में हिन्दी और शौका शब्द एक-दूसरे के समरूप नहीं मिलेंगे। पाठकों से अनुरोध् है कि ऐसे में अंग्रेजी शब्द देखें क्योंकि इस शब्दकोश की मूल भाषा अंग्रेजी और लक्षित भाषा शौका है। एक ही वस्तु, भाव व प्रकटीकरण के लिये शौका भाषा में कई शब्द हैं और समानार्थक शब्द अंग्रेजी व हिन्दी में नहीं हैं। ऐसे शब्दों को और विशिष्ट कार्य व्यवहार से सम्बन्धित शब्दों को एक ही जगह दिया गया है ताकि यह शब्दकोष एक सन्दर्भ पुस्तक के रूप में काम आ सके और भावी पीढ़ी को भाषा का उपयोगी ज्ञान हो सके। सन्दर्भ में आसानी के लिये सम्बन्धित अंग्रेजी शब्द को s Capital Ietter में दिया गया है।
शब्द चयन का आधर पफादर बुल्के का ‘अंग्रेजी हिन्दी कोश’ रहा है। जिसके लिये मै। उस महान आत्मा का रिणी हूं। उनके शब्दकोष के उन शब्दों को छोड़ दिया गया है जो न तो प्रयोग में हैं और न ही उनके प्रयोग में आने की सम्भावना है। उसमें जो कुछ शब्द छूट गये हैं उनको सम्मिलित कर लिया गया है। कुछ मित्रों ने शौका बोली के शब्द चयन में जो सहयोग दिया उनके लिये मैं उनका आभारी हूं।
इसमें संशोधन करने और कुछ शब्दों को इससे हटाने तथा कुछ और शब्दों को इसमें जोड़ने की प्रक्रिया दसकों तक जारी रखनी होगी। इसके लिए, इसके प्रकाशित कराने और इसके उ(रण की अनुमति देने के लिए मैं जोहार पुस्तकालय और मेरे पुत्रा नवीन को सम्मिलित रूप से अधिकृत करता हूं।

उत्तराखण्ड की रामलीला का संगीत

डाॅ.पंकज उप्रेती
विश्व रंगमंच पर राम के चरित्र को लेकर अनगिनत नाट्य खेले जाते हैं। वर्षों के काल क्रम बीतने पर भी विद्वानों ने नायक के रूप में राम को स्वीकारा है। इन्हीं की देन है- राम काव्य परम्परा तथा इसके आदिकवि हैं- वाल्मीकि। वेद-पुराणों में रामकथा के बीज देखने को मिलते हैं।
कल्याण के श्रीराम भक्ति अंक में रामकाव्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भगवान श्रीराम जैसे स्थावन-जंगमात्मक जगत् में सर्वत्र व्याप्त हैं, वैसे ही रामचरित्र भी किसी न किसी रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध है। रामचिरत्र के विषय में आर्ष ग्रन्थ के रूप में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, आध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, अद्भुत रामायण, भुशण्डिरामायण, श्रीरामचरित मानस आदि कतिपय ग्रन्थ सर्वाधिक मान्य हैं। इसके साथ ही विभिन्न पुराणों में, विभिन्न सम्प्रदायों में तथा विभिन्न भाषाओं में रामकथा का निरूपण बड़े समारोह से हुआ है। राम काव्य को लोकनाट्य के रूप में ऐसी मान्यता मिली कि जन-जन मर्यादापुरुषोत्तम की लीला मंचन करने और देखने में विश्वास करता है। रामलीला के रूप में इसका जगह-जगह मंचन होता है।
लोकनाट्य के रूप में रामलीला और इसके संगीत पर चर्चा करने से पूर्व रामकथा के प्रारम्भिक रूप के विषय में जानना आवश्यक है। वैदिक साहित्य में अनेक व्यक्ति, जिनका चरित्र रामायण में वर्णित है, उनका निर्देश उपलब्ध होता है। इक्ष्वाकुवा निर्देश ऋगवेद संहिता में यह मिलता है- जिस जनपद के इक्ष्वाकु राजा है, उनके रक्षा स्वरूप कर्म में वह प्रदेश बढ़ता है। अर्थवेद में भी इक्ष्वाकु के नाम का उल्लेख मिलता है- औषधे! जिस प्रसिद्ध प्राचीन इक्ष्वाकु राजा ने तुम्हें सभी व्याधियों के नाश के रूप में जाना।3 ‘मन्त्ररामायण’ नामक नामक ग्रन्थ जो पं.नीलकण्ठ ने लगभग चार सौ वर्ष पूर्व लिखा है, में ऋगवेद के मन्त्रों से रामायण कथा निकाली है। सायण आदि भाष्यों में यह अर्थ उपलब्ध नहीं है। इसका कारण यह है कि भाष्यकारों ने मन्त्रों का भाष्य यज्ञ-परक किया है। वेदों के अनेक अर्थ होते हैं। अतः इतिहासपरक नीलकण्ठ का भाष्य भी उपयुक्त है। जब रामायण को वेद का अवतार माना जाता है, तब मन्त्रों का रामपरक भाष्य निर्मूल है। ऋगवेद की ऋचा में रामायण का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि भगवान राम-सीता के साथ तपोवन में आये। दूसरे चरण में बताया गया है कि राम और लक्ष्मण पीछे रावण छिपकर सीता के पास आया और उसने उनका हरण कर लिया। तीसरे तरण में यह बताया गया है कि हनुमान ने लंका में आग लगा दी और चैथे चरण में कहा गया है कि रावण युद्ध के लिये राम के सम्मुख आ गया। दशरथ का उल्लेख भी ऋगवेद में मिलता है- ‘लाल रंग और भूरे रंग के दशरथ के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कैकेय का उल्लेख इस रूप में है- ‘उन्होंने कहा कि ये अश्वपति कैकेय इस समय वैश्वानर को जातने हैं।’ जनक का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में बहुधा हुआ है। ब्रहम्पुराण में रामकथा के अंश सर्वत्र विखरे पड़े हैं। अठारह पुराणों के गणनाक्रम में ब्रह्मपुराण की गणना सबसे पहले होती है, इसलिये इसे आदि पुराण भी कहा जाता है। देवताओं व दानवों के युद्ध में कोई निर्णय न हो पाने की स्थिति में आकाशवाणी होती है कि जिस पक्ष की ओर से राजा दशरथ लड़ेंगे, उसी की विजय होगी। पद्मपुराण में रामकथा का उल्लेख कई बार हुआ है। इसके सृष्टि खण्ड में भगवान की वनयात्रा, तीर्थयात्रा तथा पुष्कर में श्राद्धादि का वर्णन है। उत्तरखण्ड में 242 अध्याय से 246 अध्याय तक रामकथा पूरी कह दी गयी है।9 महापुराणों की के गणनाक्रम में शिव पुराण चैथे स्थान पर परिगणित है। इसमें श्रीराम की कथा कई स्थानों पर आयी है। एक उदाहरण प्रस्तुत है- रावण द्वारा सीता के हरण के बाद राम-लक्ष्मण जब सीता की खोज में निकलते हैं, उस समय शिव अपने आराध्य श्रीराम को देखते हैं और कहते हैं, ये मनुष्य नहीं साधुओं की रक्षा तथा हमारे कल्याण के लिये स्वयं परब्रह्म के रूप में अवतरित हुए है, इनके छोटे भाई लक्ष्मण शेषावतार हैं।
यद्यपि वेद पुराण में रामकथा के कई कथासूत्र मिलते हंै तथापि महर्षि वाल्मिकी ने रामायण काव्य में राम के सम्पूर्ण जीवन पर पहली बार प्रकाश डालते हुए संसार को राम-कथा महाकाव्य के रूप में अमूल्य निधि दी। भारतीय रामकाव्य के विकास में रामायण के पश्चात कई अन्य रामकाव्यों का उल्लेख मिलता है, उनमें आध्यात्म रामायण प्रमुख है। इसके अतिरिक्त अनेक रामायणों का योगदान रामकाव्य में है। जैसे- लोमेश रामायण, मन्जुल रामायण, सौहार्द रामायण, श्रवण रामायण, दुरन्त रामायण, देव रामायण इत्यादि परन्तु ‘श्रीमद्भागवत’ में श्रीराम के चरित्र का संक्षेप वर्णन होते हुए भी लालित्यपूर्ण है। इसके नवम् स्कन्ध में कहा गया है कि जिन्होंने भगवान राम का दर्शन और स्पर्श किया, उनका अनुगमन किया, वे सब तथा कौशलादेश के निवासी भी उसी लोक में गये, जहाँ बड़े-बड़े योगी योग साधना द्वारा जाते हैं। रामकाव्य की इस धारा में तुलसीदास ने जो अद्भुत कार्य किया वह गेय रूप में अमर है। रामचरित पर तुलसीदास का मंतव्य है कि कवितारूपी मुक्तमणियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित रूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुराग रूपी शोभा होती है, वे अत्यन्त आनन्द को प्राप्त करते हैं। काव्य के बाद मर्यादापुरुषोत्तम राम के चरित्र को लेकर नाट्य रूप में इसका प्रस्तुतिकरण भी होने लगा। इसी क्रम में उत्तराखण्ड की रामलीला है। जिसका मंचन गेय नाट्य के रूप में होता है। पहाड़ की रामलीला का सबसे महत्वपूर्ण अंग इसका संगीत ही है। इसीलिये सबसे अधिक ध्यान गेयता पर ही दिया जाता है। भारतीय शास्त्राीय संगीत का इसमें गहरा प्रभाव है। कई शास्त्रीय रागों की बहुलता इसके गीतों में दिखाई देती है। जैसे- विलावल, पीलू, देश, विहाग, जयजयवन्ती, भैरवी, झिंझोटी, मालकोंस आदि। मंचन के दौरान सम्वादों में प्रभावोत्पादकता लाने के लिये पात्र सस्वर मानस की चैपाईयों का पाठ भी करते हैं। तुलसीदास की चैपाईयों के साथ सम्वादों में प्राचीन कवित्त, सवैया आदि छन्दों, राधेश्याम की रामायण के उद्धरणों तथा नौटंकी शैली की लोकप्रिय धुन ‘बहरे तवील’ भी सुनने को मिलती है।
उत्तराखण्ड में गीतनाट्य रामलीला का शुभारम्भ अल्मोड़ा नगर से माना जाता है। इसका शुभारम्भ 18वीं सदी के अन्तिम भाग में कुमाऊँ की राजधानी अल्मोड़ा में हुआ। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उदीयमान कलाकार स्व.प्रगति साह ने अपने शोध प्रबन्ध में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रवक्ता स्व.मोहन उप्रेती की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया था- ‘‘सन् 1886 में अल्मोड़ा के श्री देवीदत्त जोशी ने पहले पहल रामलीला का प्रस्तुतीकरण गेयनाटक के रूप में किया। पहले अल्मोड़ा में केवल दशहरे के ही दिन राम जुलूस निकलता था और खुले मैदान में रावण का पुतला जलाते थे। सम्भव है कि श्री जोशी ने उत्तर भारत में रामलीला प्रदर्शनों की लोकप्रियता को देखकर स्वयं राम भक्त होने के नाते अपने निवास स्थान अल्मोड़ा में भी उसे आरम्भ करने का निश्चय किया हो और यह भी सम्भव है कि गेय शैली में प्रस्तुत करने की प्रेरणा उन्हें अपने संगीत प्रेम के कारण मिली होगी। अल्मोड़ा से प्रारम्भ हुई उनकी यह गेय रामलीला शीघ्र ही समूचे कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में दशहरे के उत्सव का प्रमुख आकर्षण का केन्द्र बन गई।’’ कुमाऊँ की सर्वप्रथम रामलीला के बारे में मतभेद हैं किन्तु सन् 1860 में प्रथम बार अल्मोड़ा में रामलीला के पक्ष में अधिक लोगों का मत है। वर्तमान में सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में लोकनाट्य के रूप में जो रामलीला मंचन होता है उसका मूल स्वरूप इसके कर्णप्रिय गीत-संगीत को लेकर है। राम सेना और रावण सेना के पात्रों के मुंह से विभिन्न राग-तालों में जिस प्रकार गीत, चैपाई, छन्द, सम्वाद सुनाई देते हैं वह लोकनाट्य होते हुए भी शास्त्रीय पक्ष को अपने में समेटे हुए है। प्रस्तुत हैं उत्तराखण्ड में मंचित होने वाली रामलीला के कतिपय गीत-
यमनकल्याण
सीता रावण से- अरे रावण तू धमकी दिखाता किसे,
मुझे मरने का खौफो खतर ही नहीं।
मुझे मारेगा क्या अपनी खैर मना,
तुझे होने की अपनी खबर ही नहीं।।
तू जो सोने की लंका का मान करे,
मेरे आगे वह मिट्टी का घर ही नहीं।
मेरे दिल का सुमेरू डिगे वो कहाँ,
मेरे मन में किसी का डर ही नहीं।।
उक्त गीत को कई बार ‘बहरे तवील’ नौटंकी की धुन में भी सुना जाता है परन्तु अभ्यास के लिये दीपचन्दी ताल में इसे यमन में पिरोया है और गाया जाता है।
भैरवी
राग भैरवी में कई गीत रामलीला नाट्य मंचन में सुनने को मिलते हैं। उदाहरण के लिये राम-कौशल्या सम्वाद का यह गीत प्रस्तुत है, जो कहरवा ताल में है-
आज पिता ने वनों का राज हमे दीन्हा।
पिता वचन नहिं टालना, यही हमारा काम।।
बरस चैदह वन जाइके पुनः मिलेंगे आय।
करो तुम पत्थर का सीना, वनों का राज हमें दीना।।
राग भैरवी का एक और गीत भी प्रस्तुत है जो वन जाने से पूर्व राम माता कौशल्या को समझाते हुए कह रहे हैं-
क्यों तू रुदन मचावे जननी, आँसू थाम-थाम-थाम।
नहिं दोषु मातु का माता, लिख दिया था यही विधाता।
अब क्या हाथ मले से आता, है विधि बाम-बाम-बाम।
लिखते हैं वेद अरु गीता, सब झूठी जग की रीत।
सदा रहा है नहिं कोई जीता, है एक नाम-नाम-नाम।
सिन्धभैरवी ताल दादरा का एक गीत प्रस्तुत है जिसे मन्थरा द्वारा गाया जाता है। मन्थरा रानी कैकयी को राम के विरुद्ध भड़काते हुए कहती है-
क्यों तुम हो भूल बैठी सुनिये हो राजरानी।।
कल राम राज पावें, राजा ने मन में ठानी।
संकट भरत को होगा, नहिं पावे राजधानी।।
इसी प्रकार सिन्ध भैरवी में एक और उदाहरण प्रस्तुत है जब बालक राम-लक्ष्मण वाटिका में भ्रमण करते हैं तो लक्ष्मण सीता को देख राम से कहते हैं-
देखो जी देखो महाराज यह ललनी।
संग सखी मिल मंगल गावें,
सिर पर सोहे देखो ताज यह ललनी।।
ललित मधुर चितवन अति नीकी,
फिरत है कौन से काज यह ललनी।।
खमाज
रामलीला की चैपाईयों में खमाज राग का प्रभाव है। एक उदाहरण (राग खमाज ताल विलम्बित कहरवा) प्रस्तुत है जब जनक दरवार में गुरु विश्वामित्र अचानक आ जाते हैं। दशरथ पूछते हैं-
केहि कारण आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लाउब बारा।
कृपा करहु मोहिं देहु बताई। कीन्ह पवित्र मोर गृह आई।
राम तर्ज के अलावा राक्षसी तर्ज भी गीतों के उदाहरण हैं। वन में राम-लक्ष्मण को देख ताड़िका कहती है-
बिलावल, ताल- कहरुवा
रे नृप बालक काल ग्रसाये। क्यों तुम सन्मुख मेरे आये।
जिनके आये करन सहाई। ते डरपोक विप्र मुनि राई।।
बिलावल में एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है जब सूर्पनखा राम-लक्ष्मण को वन में अकेला पाकर रिझाती है-
प्रभु जी हमें वर लेओ, हमें वर लेओ।
एक तो मैं नीकी नार, हमें वर लेओ।
एक तो मैं बाली मैं बाली, मैं भोली मैं भोली।
दूजे भाई दसशीश, हमें वर लेओ।
दूजे मस्त जवानी, हमें वर लेओ।
गारा
विभीषण रावण को सझाते हुए कहते हैं राम से युद्ध मत करो-
मेरी मानो कहँु भईया, वे तो हैं रघुवीर।।
मैं तुमसे कहँू समुझाई, चित्त करके सुनो मम भाई,
पर नारी न लावो चुराई, तुम तो हो रणधीर।।
उस कुमति बसी विपरीती, ताते तुम करहु अनीती,
हित अनहित मानत प्रीती, सुनिये हो अति धीर।।
मांड
धनुषयज्ञ के समय जब रावण अभिमान के साथ सम्वाद करता है तब बाणासुर कहता है-
वृथा अभिमान क्यों करता अरे रावण सभा के बीच।
नहीं शिव धनु पुराना है, बनाया बज्र विधाता ने,
लिये पहचान भगवत को पिता बलिदान दिया उनको।।
इसी प्रकार वनवास के समय सीता जी कहती हैं। मांड-
पड़ी है धूप गरमी से,
लगी है प्यास अति भारी।
कहीं छाया नहीं दीखे,
मैं चलती नाथ अब हारी।।
झिंझोटी-
राम-लक्ष्मण को वन में देख सूर्पणखा मुग्ध हो जाती है और लक्ष्मण से झिंझोटी के स्वरों में गाती हुए कहती है-
मैं तो छोड़ आयी लंका का राज,
लखन लाल तेरे लिये।।
भाई भी छोड़ा मैंने, बहिना भी छोड़ी,
छोड़ आयी सारा परिवार, लखन लाल तेरे लिये।।
बाग भी छोड़ा, बगीचा भी छोड़ा
छोड़ आयी सारा संसार, लखन लाल तेरे लिये।।
तिलककामोद-
लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद में यह गीत है-
लक्ष्मण परशुराम से- पिनाक पुराना, काहे रिस होत।।
ऐसे धनुष बहुत हम तोड़े, कबहँु न क्रोध नहिं कीन्हा।
या में ममता है केहि कारण, जो देखत भृगुनाथ रिसाना।।
बार-बार मोहे परशु दिखाकर, क्यों करते अभिमाना।
जो कायर तुम मिले मुनि जी, उन्हीं को तुम जा धमकाना।।
इस प्रकार कई राग-रागनियों, मिश्रित रागों, धुनों में रची-बसी उत्तराखण्ड का रामलीला नाटक अद्भुत है। ग्यारह दिनों तक रामलीला मंचन में जब गेयता चढ़ती जाती है तो श्रोता मुग्ध हो जाता है।

देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट के रूप में उनका सहयोग हमेशा याद किया जायेगा

स्मृतियां शेष:
डाॅ.पंकज उप्रेती
10 अक्टूबर 2020 को सायं 3 बजे श्रीमती देविन्द्रा (देवेन्द्रा) रावत का निधन हो गया। उनके साथ ही श्री एवं श्रीमती रावत की भरपूर सहयोग की कहानी यादें छोड़ गई है। 91 वर्षीय सबकी आंटी के रूप में पहचान रखने वाली श्रीमती देवेन्द्रा बलवन्त कालोनी, दोनहरिया, हल्द्वानी में निवास करती थीं। जीवन के उत्तराद्र्ध में भी वही बचपन सी उमंग और बहिनों का आपसी लाड़-प्यार सबकी जुवां पर था। इनकी कोशिश रहती है कि हर गतिविधियों में भागीदारी करूँ। उम्र के इस पड़ाव में भी, वह सभी आयोजनों में खुशी से सम्मिलित होती ताकि सबसे भेंटघाट हो सके। इधर-उधर सबकी कुशल पूछती थीं।
उनके निधन के समय ईष्ट-मित्रों का तांता लगा और चित्राशिला घाट, रानीबाग में उन्हें अन्तिम विदाई दी गई। अल्मोड़ा से आकर भतीजे दिग्विजय सिंह रावत ने अन्तिम संस्कार की क्रियाएं कीं। दिग्विजय ‘दीपू’ सामाजिक सरोकारों से जुड़े और रावत परिवार के समझदार व सहनशील युवाओं में से हैं।
बात करते हैं ‘ज्योति-देवेन्द्रा’ की। इस दम्पत्ति का अपने समाज के प्रति अटूट विश्वास था और सहयोग की भावना इनमें थी। कमाण्डर ज्योति सिंह रावत उच्च पदों पर रहते हुए भी सहज-सरल व्यक्ति थे। पारिवारिक विरासत का जो संस्कार उनमें था, वह तो था ही लेकिन स्वयं के बूते भी उन्होंने बहुत कुछ जोड़ा। उनके असमय निधन से श्रीमती देवेन्द्रा जी अकेले रह गईं और अपने इष्ट-मित्रों के साथ हल्द्वानी में रहने लगीं। बलवन्त कालोनी में श्री दुर्गा सिंह रावत और उनके परिवार के साथ देवेन्द्रा जी का समय व्यतीत हो रहा था। डाॅ.एन.एस.पांगती सहित उनके सभी पारिवारिक जन सुधबुध लेते रहते थे। और उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।
अपनों के बीच देविन्द्रा (देवेन्द्रा) सुख थीं। माघ की खिचड़ी, होली मिलन से लेकर जोहार महोत्सव तक के हर कार्यक्रम की दर्शकदीर्घा में उनकी उपस्थिति होती। ध्नबल जैसा कोई अहंकार उनमें कभी नहीं रहा। उनके संस्कार उन्हें रौबदार बनाए रहे। तभी वह कहीं भी अपने सहयोग में पीछे नहीं हटती। पिघलता हिमालय की आजीवन सदस्य होने के बावजूद वह हमेशा इसकी चिन्ता करती थी कि किन स्थितियों में यह प्रकाशित होता है और सभी को इससे जोड़ती। ज्योति-देवेन्द्रा दम्पत्ति ने महरौली दिल्ली में भी कापफी सम्पत्ति जोड़ी थी लेकिन सबकुछ सौदा कर समय के साथ इन्हें सिमटना पड़ा। ‘देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट’ के रूप में गठित समिति द्वारा नेक कार्यों के लिये निर्णय लिये जाने लगे। मुनस्यारी, अल्मोड़ा, हल्द्वानी सहित तमाम संस्थाओं में इनका योगदान याद रहेगा।
अब जबकि कमाण्डर ज्योतिसिंह व श्रीमती देवेन्द्रा हमारे बीच नहीं हैं, उनकी यादों को सजोने के लिये शुभचिन्तकों को बेहतर करना होगा। इनकी जीवनी हमें त्याग करना सिखाती है। स्व. देवेन्द्रा रावत को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजजि।

दरवारी और सामंती सीमा लांघकर जनता के बीच पहाड़ की होली गायन परम्परा

डाॅ.पंकज उप्रेती
लोकमंच वह है जहाँ हमारी पुरातन कथाएं-गाथाएं गीत-संगीत मिलता है, यह श्रुति परम्परा है। एक पीढ़ी से दूसरी तक अपनी बात-व्यवहार, कला-संस्कृति, इतिहास को हस्तान्तरित करने का बड़ा उपक्रम ‘होली’ भी है। इसमें हमारे ग्राम्य जीवन का अल्हड़पन, अख्खटपन, अपनापन है। तभी हम आसानी से गाने लगते हैं-
आओ सनमुख खेलें होरी।
अब घर जाने न दूंगी लला हो। आओ.
कंकर मारि छयल जसो भाजै,
मैं तो लोंगी मों बदला हो। आओ.
स्योंनि के माथे बिन्दी बिराजे,
नैनन बीच हों कजरा हो। आओ.
ताल मृदंगा और डफ बाजै,
मजीरन को झनकार लला हो। आओ.
उत्तराखण्ड के लोक जीवन में होली ने जो रंग घोले हैं उसकी खड़ी और बैठकी शैली यहाँ दिखाई देती है। इसमें जहाँ ग्रामीण सामुहिकता के सुर-ताल हैं वही नागर रौबदारी। बैठकी होली की गायन शैली दरवारी और सामंती सीमा लांघकर जनता के बीच सुहा रही है। जिसने एक परम्परा को जन्म दिया जो बनारस की ठुमरी, पंजाब के टप्पे की तरह अपना निराला अंदाज रखती है। चैती, कजरी, माण की तरह इसमें भी इसका भी अपना अंदाज है। कन्नौज व रामपुर की गायकी का प्रभाव इसमें है। इसके लिये अनामत अली उस्ताद का नाम ठुमरी के रूप को सोलह मात्रा में पिरोने के लिये याद किया जाता है। उस्तादों, पेशेवर गायकों का योगदान इसमें रहा है। मुगल शासकों को भी होली की बैठकी रिझा गई। तभी तो आज तक गाते हैं- ‘किसी मस्त के आने की आरजू है’। दरवारी शान और बादशाह के हाल को बैठ होली में गाया जाने लगा- ‘केशर बाग लगाया, मजा बादशाह ने पाया’। वर्तमान मंे मनोरंजनों के तमाम साधनों और बदलती जीवन शैली का प्रभाव हमारे त्यौहारों में पड़ा है। इसकी परम्परागत ठसक को बनाये रखने लिये संस्थागत प्रयास भी पिछले दो दशकों से हो रहे हैं जिसके सुखद परिणाम दिखाई दे रहे हैं। हालांकि होली गायन की हमारी शैली को ‘होली गजल’ के रूप में भी प्रस्तुत करने का अटपटा प्रयोग हुआ है लेकिन वह हजम होने वाला नहीं है। इसी प्रकार हमारे लोक जीवन की खड़ी होली के अधिकांश दिखाये जाने वाले वीडियो प्रदर्शन मूल से मेल नहीं खाते हंै। क्योंकि उसमें यह मान लिया गया है कि झोड़े की तरह वृत्ताकार घूमने मात्र से होली हो जाती है। जबकि हमारी होली शैली की अपनी विधा है। यहाँ पुरुषों और महिलाओं की पृथक-पृथक होलियों का रिवाज पहले से है और कई गाँवों में तो होली होती ही नहीं है। ऐसे गाँवों में आठू-सातू को होली से भी जबर्दस्त तरीके से मनाया जाता रहा है।
इस पर्वतीय प्रदेश में विशेषकर कुमाऊँ अंचल में होली का जबर्दस्त प्रभाव है। यहाँ एक ओर बैठकी यानी नागर होली आम जनता के बीच जगह बनाने की प्रक्रिया में आज भी है। वहीं खड़ी होली का रंग विशुद्ध लोक का रंग है। इसमें ढोल, मजीरे की थाप पर मस्त होकर होल्यार गाते-झूमते हैं। खड़ी होली में यद्यपि संगीत शास्त्र का अनुशासन न हो किन्तु परम्परा से सीखते हुए लोग लय-ताल के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हंे देख लगता है कि यह लय-ताल, पद संचलन का अभ्यास करते हैं। जबकि वास्तव में मदमस्त लोग सिर्फ इस त्यौहार में ही ऐसी भागीदारी करते हैं। बड़े-बूढ़ों को देख युवा व बच्चे भी उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। इसकी तालें भी ढोल में कर्णप्रिय लगती हैं। विष्णुपदी होली से इसकी शुरुआत हो जाती है-
श्याम मुरारी के दरसन को जब
विप्र सुदामा आये लला।।
बिप्र सुदामा द्वार खड़े हैं,
पूछत कृष्ण कहाँ हैं हरी। बिप्र.
हाँजर वासी गये जब भीतर,
द्वार खड़ो है बिप्र हरी। बिप्र.
बालापन के मित्र हमारे,
रोको नहीं क्षणमात्र हरी। बिप्र.
बांह पकड़ के निकट बैठाए,
रुकमणि चरण दबार हरी। बिप्र……
खड़ी होली गायन के गीतों में क्रम का बहुत ध्यान रखा जाता है। विष्णुपदी होली में कई गीत बैठकर गाये जाते हैं। जिसमें दो पक्ष बनाकर बैठा जाता है और एक पक्ष द्वारा गीत प्रारम्भ कर देने के बाद दूसरा पक्ष दोहराता है। पूरी लय ताल के साथ होल्यार इसमें भावाभिव्यक्ति करते हैं। ‘होली कैसो खेलन वन जाई’ जैसे गीत बैठकर गाये जाते हैं। इन गीतों को ढोल-मजीरे की ताल में समवेत स्वर में गाया जाता है। खड़ी होली गाने वाले गीतों में नृत्य की कुछ विशेषताएं हैं। पांवों को गीत के बोल के साथ विशेष तरीके से मोड़ा जाता है, कमर झुकाकर नाचना, हाथों को घुमाना, कहीं-कहीं पर हाथों में रूमाल और छड़ी पकड़कर नाचना इन गीतों को अधिक प्रभावपूर्ण बना देता है। इन गीतों की नई पंक्ति के बीच-बीच में एक प्रमुख होल्यार द्वारा ‘बखारा’ भी जाता है। ‘बृज कुंजन में धूम मचै होरी’ जैसे गीत इसमें गाये जाते हैं। खड़ी होली में ही बंजारा हाली का चलन भी है, जिसे समवेत स्वरों में टोली गाती है। ‘गोरी प्यारो लगो तेरो झनकारो’ जैसे गीत इसमें गाये जाते हैं। और फिर होली के बहाने पूरी चुलबुलाहट गूंजने लगती है-
वृन्दावन की कुंज गलिन में,
दधि लूटे नन्द जी को लाल,
बेचन ना जाइयो।
ना जाइयो मेरे लाल बेचन न जाइयो।।
सोल सौ गोपिनी न्हान चली,
जमुना जी को लम्बो घाट। बेचन.
कौन जाने जसोदा को लड़को,
वो है लौंडा लभार। बेचन.
आपूं जो कान्हा पार उतर गये,
हो धींवर मझधार। बेचन.
दधि माखन सब लूट लियो है,
उलटि मांग लगाई। बेचन…
ब्रज मण्डल की होली की तरह ही देवभूमि की होली भी आध्यात्म से धूम तक चलती है। यहाँ तक की इस होली में श्रृंगार का तड़का इसे और भी आगे ले जाता है-
अरे हाँ रे गोरी चादर दाग कहाँ लागो।।
अरे हाँ रे सासू पनिया भरन हँू चली,
गागर दे छलकाय सासू चादर दाग वहाँ लागो।।
अरे हाँ रे गोरी पनिया दोष न दीजिये,
वहीं खड़ो तेरो यार गोरी चादर दाग कहाँ लगो।।
अरे हाँ रे सासू यार को नौ मत लीजिये,
जहर खा मर जाऊँ यार को नौ मत लीलिये।
अरे हाँ रे सासू खरक दुहावन हँू चली,
बछड़ा मारे लात सासू चादर दाग वहाँ लागो।।
अरे हाँ रे गोरी बछिया दोष न दीजिये,
वहीं खड़ो तेरो यार गोरी चादर दाग कहाँ लागो।……
खड़ी होली की धूम के समानान्तर बैठकी होली पहाड़ में चलती है, जिसका शुभारम्भ पौष के प्रथम रविवार से कर दिया जाता है। इसमें भी पहले विष्णुपदी होली गीत गाने का रिवाज है, जिसे निर्वाण की होली कहते हैं। यह होली गीत विभिन्न राग-रागनियों में गाये जाते हैं। अनुमान है कि जब बाहर से लोगों का इस पर्वत प्रदेश में आगमन हुआ तो मनोरंजन के साधनों के अन्तर्गत राज्याश्रय में महफिलें होती थीं। मिरासी व पेशेवर कलाकारों के नृत्य-गीतों का क्रम चला। जब दरवार से निकल कर यह गायकी सम्भ्रान्त लोगों के पास आई, उस दौर में होली बैठक किसी सक्षम व्यक्ति के घर होने लगी। शिष्ट जनों की होली भ्ीा इसे कहा गया क्योंकि घरों में सीमित लोग इसमें जुटते थे। बस, यहीं से आम जन को चस्का लगा था बैठकी होली का। धमार के रूप में जोरदार आवाज में सुर गूंजने लगे-
‘दय्या आई री, सब गोपियन बन ठन, मोसे करत इतरार मुरार।
कोई चमकत कोई मटकत, कोई नाचत दे दे ताल मुरार।।’
अस्सी फीसदी गीत राग काफी के स्वरों में हैं। महफिल में नियमित बैठने वाले कुछ दिनों तक सुनने के बाद धड़ाधड़ गाने लगते हैं। राम, श्याम के प्रसंगों के अलावा बसन्त और शिव की स्तुति के बाद श्रृंगार की रचनाएं इस राग में सुनने को मिलती हैं-
‘सैय्या तू प्रीत न जाने, अंगिया मोरी रंग ही में साने।
अंग-अंग को रंग गया, कर होली के बहाने।’
राग काफी की भांति ही दिन में पीलू राग पर होल्यार खूब गाते हैं। एक रचना जिसमें मथुरा शहर के भीगने का वर्णन है-
‘मथुरा शहर के लोग सभी, भीगन लागे भिगावन लागे।
हमरी चुनरिया पिया की पगरिया, और केशरिया फाग।’
जंगलाकाफी में कर्णप्रिय रचनाओं का गायन पौष माह के प्रथम रविवार से लेकर टीके की होली तक होता रहता है। एक होली गीत-
‘गोरी धीरे चलो लुट जाओगी डगर,
तेरे सिर से ढुरक ना जाये गगर।
या रसिया है ब्रज को रंगीलो,
या को रहत घट-घट की खबर।’
पहाड़ की रामलीला की तरह होली में भी विहाग और जयजयवन्ती राग की मदमस्त करने वाली धुन रसिकों को मुग्ध करती है। एक रचना-
‘गोरी के नैनन में श्याम बसत हैं, लोग कहें वाके नैन कजरारे।
घूंघट ओट में झिलमिल चमकें, झीनी बदरिया जैसे नभ के तारे।’
इस प्रकार पहाड़ की होली में ठैठ ग्रामीण के साथ सामंती गोद से निकल कर आई नागर होली की सामुहिकता, भावाभिव्यक्ति मुखरित होती है। इसके गीत लगभग तीन माह तक रस घोलते हैं ओर टीके की बैठक में विदाई के साथ फिर से अगले वर्ष मिलने की कामना करते हैं। वाकेई जीवन का उल्लास होली के बिना अधूरा है। यह उल्लास हमारे जीवन को रंगों से सरावोर करता है और हमारे मन को तरंगित करता है।

वह सपने नहीं, सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल की आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीनों भाई बहन- पंकज, धीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। परीक्षा के इस दौर में दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। चल रहे संग्राम में पहाड़ ही टूट पड़ा। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपनी स्थितियों में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई धीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा पिफर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। फिर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और ट्रेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना-पराया क्या होता है………..। मुफलिसी कोई बात नहीं होती लेकिन आपकी प्रतिब(ता बनी रहनी चाहिये। अखबार निकालना हमारी प्रतिबद्धता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज इतमिनान से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते-मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आध्े रास्ते से लौट कर आई हँू।’’
ईजा की बातों मेें बहुतों को विश्वास नहीं हो सकता है। वह बहुत चैकन्नी थी कि किसी भी समय बुलावा आ सकता है। इसलिये वह अपने हिस्से की लड़ाई लड़ती रही। वह सपने नहीं सच्चाई जीती थी। नींद उसकी आँखों में नहीं थी और हर वक्त कुछ गुनने-बुनने-कहने-सुनने की आदी हो चुकी थी। उन्हें भरोसा था कि ईमानदार से काटा गया समय ईमानदारी लौटाता है। आने वाले कष्टों को वह पी जाती और समय का इन्तजार करती। उनकी दृढ़ता ही थी कि वह पिता जी के अखबारी मिशन, लेखन, सामाजिक आन्दोलनों में बराबर की भागीदार बनी। उन्होंने कभी भी बाबू जी से यह शिकायत नहीं की कि इन आन्दोलनों से क्या होगा, बच्चों की पढ़ाई नहीं हो रही है, सजने- संवरने के लिये साधन चाहिये, रहन-सहन के लिये बड़ी और खुली जगह चाहिये। वह ऐसे सपने कतई नहीं पालती थी। उनके यही सपने होते तो हमारा यह मिशन अध्ूरा रह जाता। यह ईजा का ही साहस था कि उन्होंने हर स्थितियों में अपना संसार बनाया। ऐसा संसार जिसमें सच्चाई हो। आम महिलाओं की तरह वह भी घर-गृहस्थी चलाती नाती-पौतों के साथ खेलती और गुनगुनाती लेकिन उससे पहले वह आन्दोलन थीं। उसने अपने को नहीं अपने मिशन को संवारा…..