कथाकार शेखर जोशी की रटन अन्त तक रही

श्रद्धासुमन
डाॅ.पंकज उप्रेती
हिन्दी के जाने-माने कथाकार शेखर जोशी का गाजियाबाद के एक अस्पताल में 4 अक्टूबर 2022 को निधन हो गया। स्वास्थ्य कारणों से वह सप्ताह भर इस अस्पताल मेें रहे और सबसे विदा ले ली। लेखन-पढ़न में 90 वर्ष तक ईमानदार कार्य करने वाले जोशी जी सामाजिक मिलनसार थे। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, चेक, पोलिश, रूसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसाइटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है।
उम्र के उत्तराद्र्ध में आँखों की रोशनी कम होने के बावजूद वह लैंस के सहारे पुस्तकें, चिट्ठी-पत्राी पढ़ते थे। 11 सितम्बर को अपने जीवन के 90 साल पूरे करने वाले शेखर जोशी का जन्म अल्मोड़ा जिले के ओलिया गाँव में 10 सितम्बर 1952 को हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई थी। इण्टरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही सुरक्षा विभाग में जोशी जी का ई.एम.ई. अप्रेन्टिसशिप के लिये चयन हो गया, जहाँ वो सन् 1986 तक सेवा में रहे। तत्पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वतंत्र लेखन करने लगे।
दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों में शेखर जोशी को हिन्दी साहित्य के कथाकारों की अग्रणी श्रेणी में खड़ा कर दिया। उन्होंने नई कहानी को अपने तरीके से प्रभावित किया। पहाड़ के गाँवों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध्, उम्मीद और नाउम्मीदी से भरे औद्योगिक मजबूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति में जुड़ी रूढ़ियां- ये सभी उनकी कहानियांे के विषय रहे हैं। शेखर जोशी की प्रमुख रचनाओं में कोशी का घटवार 1958, साथ के लोग 1978, हलवाहा 1981, नौरंगी बीमार है 1990, मेरा पहाड़ 1989, डायरी 1994, बच्चे का सपना 2004, आदमी का डर 2011, एक पेड़ की याद, प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं।
हिन्दी साहित्य को अपनी कालजयी रचनाओं से समृ( करने वाले शेखर जोशी ने चिकित्सा शोध् के लिये अपने शरीर को दान किया था। जिस कारण उनकी पार्थिक देह को ग्रेटर नोएड के शारदा हाॅस्पिटल को दिया गया। शेखर जी के सुपुत्र प्रत्तुल जोशी पिछले महीने ही आकाशवाणी अल्मोड़ा केन्द्र से सेवानिवृत्त हुए है।। छोटे सुपुत्र संजय जोशी फिल्मकार हैं। ‘प्रतिरोध् का सिनेमा’ नाम से उनके अभियान चर्चित हैं।
शेखर जोशी जितना अपने लेखन पढ़न में डूबे थे उतना ही सामाजिकता में रमे रहे। उनका अधिकांश समय पहाड़ से बाहर बीता लेकिन उनके दिल-दिमाग में पहाड़ बसता था। इलाहाबाद में लम्बी यात्रा उनकी रही है। पत्नी के निधन के बाद जब उनसे उनका इलाहाबाद छूटा, वह भी उन्हें बहुत उदास कर चुका था लेकिन समय ने बहुत उलट किया वह लखनउ रहने लगे। अपने मित्रांे-साथियों के साथ बराबर पत्राचार करते, पुस्तकों की समीक्षा लिखते, स्वतंत्रा रूप से लेख लिखते। नव लेखकों को प्रोत्साहित करते और पहाड़ को आवाद करने की बात करते। पिघलता हिमालय परिवार के साथ ही भी उनका यह रिश्ता बना रहा। सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के कहानी संग्रह की भूमिका भी उन्होंने लिखी। इसके अलावा निरन्तर पत्राचार से सम्वाद होता रहता था। उप्रेती जी के निधन के बाद सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती को ढांढस बंधते हुए जोशी जी ने मार्मिक पत्रा लिख भेजा था, जिसमें उन्होंने अपने इलाहाबाद छूट जाने के दर्द को भी लिखा और कामना की कि संकट की इस घड़ी में पिघलता हिमालय को सींचना होगा।
इलाहबाद के समय से ही शेखर जोशी के तमाम संगी-साथी थे और उनका जुड़ाव-लगाव सभी से था लेकिन लखनउ आने के बाद पहाड़ के सभी प्रमुख जनों से उनकी मुलाकात थी। पत्रकार-लेखक नवीन जोशी उनकी लगातार टोह लेते रहते। वरिष्ठ पत्रकार महेश पाण्डे नियमित रूप से भेंटघाट करने के साथ ही उन्हें पहाड़ की सूचनाओं से जोड़े रहते। आज जब शेखर जोशी जी हमारे बीच नहीं हैं, सभी उनके रचना संसार के अलावा उनके व्यक्तित्व को याद कर श्रद्धासुमनअर्पित कर रहे हैं। वह हमेशा अपनी रचनाओं के माध्यम से याद रहेंगे।
वाकेई शेखर जोशी अपनी पीढ़ी के विराट व्यक्तित्व वाले रचनाकार थे, जिनकी रटन लिखने-पढ़ने-समझने की थी। उनकी सच्चाई थी कि वह गुंथते चले जाते, उन्हें सम्मान की चाह नहीं थी। पिघलता हिमालय परिवार स्व. शेखर जोशी को श्रद्धासुमन अर्पित करता है।
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साहित्यकार/कहानीकार शेखर जोशी 2016 में मुनस्यारी भी आये थे। दरअसल वह इस बार अपने ग्रीष्म प्रवास में परिजनों के साथ पहाड़ों की सैर में निकले थे। तब 84 वर्षीय श्री जोशी जी ने पिघलता हिमालय के साथ खूब बातचीज की। उनका जीवन इलाहाबाद पिफर लखनउ में बीता लेकिन उनकी यादों में पहाड़ का बचपन हमेशा रहा है। पिघलता हिमालय से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘गाँव-घरों में ताले लटक जाना दुर्भाग्य है जो हमारी परम्परा की जड़ रहे हैं।’’ उस समय लेखक मंच प्रकाशन से उनकी पुस्तक ‘मेरा ओलिया गाँव’ तैयार हो रही थी। जोशी जी अपनी पुरानी यादों में घिरते हुए कहने लगे- उनका गाँव परम्परा और आध्ुनिकता का मेल था, खेती भी अच्छी होती थी, लोगों के पास समय भी था, लोक संस्कृति- गीत, एंेपण सभी तो था। 12 घरों के इस गाँव में अब केवल 2 घर खुले रहते हैं। यह सब कैसे हुआ, उसी का वृत्तांत पुस्तक में है। कमोवेश यही स्थिति आज हर गाँव की है।

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