महापुरुष की गाथा – श्रदेय पिता स्व. ऊपर सिंह दुग्ताल (मूल-ती राठ)

जीवन सिंह दुग्ताल
श्रदेय पिता श्री पर यह कहावत सही बैठता है :-“कभी हार न मानने की आदत ही, आप एक दिन जीत के कारण बनते है”
पिता स्व. ऊपर सिंह दुग्ताल पुत्र स्व. तिका सिंह एक नेक इन्सान, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, अपने काम के प्रति बहुत कठिन मेहनत, निडर छवि के व्यक्तित्व रहे है I यद्यपि बचपन बहुत गरीबी से गुजरा था क्युकि दादा जी स्व. तिंका सिंह का महामारी के दोरान अल्पायु में स्वर्गवास होने के कारण बेसहारा का कारण बना I माता जी का भी देहान्त होश संभालने से पूर्व हो चुका था I जिस वजह से पढाई के प्रति गहन लगाव रखने के बाबजूद घर की गरीबी के कारण स्कूल जाने में असमर्थ रहे I उनके सहपाठी गाव के रहे थे श्री शेर सिंह दुग्ताल, श्री दोलत सिंह दुग्ताल, श्री जगत सिंह दुग्ताल इत्यादि I
पिता जी बताते थे- परिवार को इस स्थर में पहुचाने में काफी समय लग गया था I बहुत ही अल्प आयु से ही रोजी रोटी के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा था I बाल्यावस्था में भेड़ बकरी चुकाने का काम किया करता था थोडा जब बड़ा हुआ और होश सभाला फिर अपने कुछ बकरियों से काम काज किया लेकिन उसमे भी कोई खास लाभ नहीं हुआ था विवाह के बाद चाय के अपने दुकान से रोजी रोटी खुशहाल बनाने का भरसक प्रयास लेकिन यह कार्य भी विफल ही रहे I पिता जी आगे बताते है कि हमारे घर के पास पड़ोस में ही एक पटवारी जी रहते थे नाम याद नहीं आ रहा है जो कि हमेशा दुकान में आया जाया करते थे I उन्होंने पिता जी के मेहनतऔर कार्य के प्रति लगन को लम्बे समय से देखा था एक दिन अपने कमरे में बुलाया और कुछ अहम् बात बताया कि भारत सरकार ने भेड़ पालकों को एक बिशेष योजना प्रदान की है जो इस कार्य में कठिन परिश्रम और मेहनत करेगा उसे बहुत फायदा हो सकता है यह कार्य आप सकते है मैंने आपके मेहनत और कठिन परिश्रम को साक्षात् देखा है इसी कारण आपके अपने भविष्य को देखते हए भेड़ पालन के लिए सरकारी योजना के लिए आपका फार्म मैंने भर दिया है अब इसमें केवल हस्ताक्षर ही करने बाकी है I सोचकर बता देना फार्म को आगे भेजना है I यह सुनकर पिता जी को फिर से भेड़ पालन के दल दल में जाने का विचार से मना करने का विचार आया था फिर सोचा कि एक बार घर परिवार से भी विचार बिमर्श किया जाये I घर में इस विषय में काफी विचार किया गया लेकिन अंतिम फेसला करना काफी कठिन था I फिर भी इस कठिन फैसले को स्वय की जिम्मेदारी लेते हुये फार्म को भरवा दिया I यही फ़ेसला पिताजी का टर्निंग पॉइंट रहा I उसके बाद सरकारी भेड पालन का कार्य दो साल से अधिक समय तक अपने जिंदगी के सारे मेहनत, कठिन परिश्रम इसी कार्य में लगा दिये I दारमा से गाव निगाल्पनी और उसके बाद टनकपुर भेड पालन के लिए लगातार आना पड़ा तब में शायद दो ढाई साल का रहा होगा, मुझे धुधली यादे है अभी भी है लेकिन दो साल में अपने तथा परिवार के द्वारा कड़ी मेहनत ने अपना फल देना शुरु कर दिया था 45 भेड़ से 120 तक पंहुचा दिया था I सरकारी नियम से अनुसार 50 भेड़ वापस लिया गया फिर भी काफी भेड़ अपने पास बच गये थे यही पूंजी पिता जी की भविष्य सवर गयी I इसी भेड़ से बाद में पिता जी ने नेपाल में भी व्यापार कर अपने सम्पति में इजाफा किया और मुझे पढाई में कोई कमी नहीं की I जिसकी वजह से आज इस मुकाम तक पहुच पाया हु I भेड़ पालन के दोरान काफी कुछ पिता जी ने सीखा और अपने लगन के कारण ही बाद में व्यापार हिसाब किताब में भी पारंगत हुए थे I
अपने दुग्तू गाव का सबसे बड़े बुजुर्ग पिता जी को 95 साल से ऊपर होने का गर्व हासिल कर चुके है अंतिम समय तक अपने पुराने यादो को हमेशा ताजा करने का भरसक प्रयास किया करते थे और हर कथा को नये सिरे से शुरू कर अंतिम छोर तक ज्यों का त्यों सुनाया करते थे हमेशा की तरह बहुत संतोष नजर आते थे I पिता जी ने कभी भी हार नहीं मानी थी कठिन से कठिन स्थिति पर भी डटकर सामना किया था I मेहनत, कठिन परिश्रम ईमानदारी का ही उनका मूल मन्त्र था हमे उन्ही से सीख मिली है I
पिता जी के अपने जीवन काल में अपने पारिवारिक कार्य के अलावा समाज को बहुत भी बहुत योगदान दिये है I कतिपय घटनाओ को कर्मानुसार करने एक प्रयास मात्र है; .
• वनों से विशेष लगाव:- पिता जी ग्राम सभा दुग्तू के लगभग 20 साल लगभग बन पंचायत की देखरेख की जिम्मेदारी उनके कड़क स्वाभाव् व् ईमानदारी के कारण दिया गया था I जिसे उन्होंने बड़े जिम्मेदारी से निभाया था I गाव की सुन्दरता एवं बुनियाद को मजबुत करने के लिए पेड़ को बचाना बहुत जरुरी था उन्होंने भरसक प्रयास किया और सफल भी हुआ I यह काम उतना आसान भी नहीं था जैसा कहने और सुनने में लगता है I रोज सुबह 4 बजे निस्वार्थ भाव से जंगल का भ्रमण कर अनावश्यक पेड़ जो कटे है चेक करना और कटे हुए पेड़ को गिनना और पता लगाना एक महत्वपूर्ण कार्य था I गाव पंचायत में दण्ड में वसुल किये गये धनराशी को जमा करना हर एक रोज का काम था I इसमें गाववासियो का भी सहयोग सराहनीय होता था I गाव के ठीक पीछे जंगल जो आज काफी बड़े रूप में देखते है I उस पर भी काफी पाबंधी कर रखी थी जिससे यह सभी पेड़ो को पनपने का मोका मिला था I आज इसी पेड़ के कारण गाव काफी सुरक्षित लगता है I आज जो छवि गाव दुग्तू सोन गाव जंगलो का जो सोंदर्य हम देखते है उसके पीछे पिता जी ने वन पंचायत पद में रहते हुए काफी मेहनत किया गया था I मुझे याद है यह बन पचायत का काम पिता जी ने 2014 को इस पद से त्याग पत्र देकर गांव के अन्य लोगो को यह सोप दिया था I तत्पश्चात गाव वासियों ने बिना पाबन्दी के देवदार के लगभग सारे बड़े पेड़ काटकर आज पूरा जंगल खाली कर दिया है l अब मात्र भोज पत्र के पेड़ ही दिखते है I मैंने भी इस बात को रखने का प्रयास किया कि पेड़ के बदले नये पेड़ भी तो बोया या लगया जा सकता है इस पर अभी किसी का ध्यान नहीं है बाद में गाव वासियों को चिंतन मनन करना ही होगा I
• कृषि एवं भेड़ पालन पर विशेष लगाव :- गाव दुग्तू काफी उपजाऊ भूमि पहले से ही रहा है I पिता जी को कृषि कार्य व् भेड़ पालन में हमेशा से ही विशेष लगाव रहा है I अपने समय में अपने खेतो में बहुत परिश्रम किया करते थे जिसे देख देखी में हम लोग भी बचपन में कोशिश करते थे I
गाव दुग्तू में बर्फ काफी देर तक टिकने के कारण मिटटी में नमी काफी रहती है तथा पूर्व में भेड़ बकरिया, गाय, बेल, झुपू, घरेलु जानवर काफी मात्र में होने के कारण खेतो में पर्याप्त मात्र में खेत खलिहान में खाद भी पहुच जाता था I जिसके कारण पुरे दारमा घाटी में कुट्टू के खेती सबसे बढ़िया पैदावार अपने गाव दुग्तू- सोन में होती थी I मेरे विचार में पिता जी के समय 70-80 का दशक कृषि के लिए स्वर्ण युग कहना उचित होगा I क्युकि सभी परिवारों का खेती के प्रति विशेष लगाव मेहनत, पशुपालन पर विशेष रूचि ने गाव के कृषि को नई उच्चाई मिली I जिसे मैंने भी साक्षात् रूप में देखा था तब में गाव के जूनियर हाई स्कूल दुग्तू- गोठी में कक्षा 6 से 8 तक पढ़ा करता था I उस समय गाव में काफी परिवार थे गाव के चारो तरफ कट्टु के पोधे व् फाफ़र के पोधे गुलाबी तथा पीले रंगों से खेत दंग्तो गबला मेला अगस्त के महीने के दोरान रंगीन दिखाई देता था इसके अतिरिक्त आलू, मूली का पैदावार भी काफी मात्र में होता था I पैदावार इतना कि जमीन के अंदर विशेष रूप से बनाये गये कोल्ड स्टोरेज में कुट्टू के अनाज रखे जाते थे और घर में लकड़ी के तख्तो से बनाये गये अलमारी जिसे र भाषा में बजम कहा जाता था रखने का व्यवस्था किया गया था I बकरी का बोझ कुन्चा आने से पूर्व कुट्टू का अनाज व् आलू धारचूला पहुंचाया जाता था I
• गाव के आय बढ़ाने के साधन:- गाव के हितार्थ आय के साधन के लिए पिता जी के समय गाव में विचार विमर्श कर तिब्बत से याक का ले आना जिससे यहाँ घर -2 में याक के बच्चे जुप्पू जुमो, तलभो का बहुत अधिक मात्र में कई सालो तक प्रचार प्रसार हुआ I जिस कारण प्रत्येक परिवार से कुछ शुल्क लिया जाता था जिससे गाव के आय में इजाफा होता था I खेतो को घरेलु जानवरों से देखभाल के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त किया गया था जिसका काम रोज खेतो में जाकर घरलु जानवरों को देखना था जिससे खेती को कोई नुकसान न हो यदि कोई जानवर खेत में मिलता तो लाकर बंद में किया जाता था दंड के रूप में रूपये देने के बाद ही छोड़ा जाता था I इसके अलावा गाव की सुरक्षा के लिए कुन्चा जाने के दोरान एक परिवार को गार्ड या चोकीदार के तोर पर रखा जाता था जिसे गाववासी राशन कुछ धनराशि दिया जाता था जिससे गाव में सभी के सम्पति सुरक्षित रहे I
• खनन पर रोक:- गाव निगाल्पनी जो कि काली नदी के एकदम किनारे टापू पर स्थित है गोठी गाव कि तरह हमेशा काली नदी के तेज वेग से गाव हमेशा खतरे में दिखता है अतः जब भी पिता जी गाव में रहे थे गाव के निचले भाग में रेता, बजरी खनन रोकने का लगातार भरसक प्रयास किया गया था यदि समय पर खनन नहीं रोका जाता, तो आज यह गाव गोठी कि तरह आधा गाव का बाढ़ में बह जाता I गाव के किनारे पेड़ बोने का आइडिया भी उन्ही का था जो कि आज जगल के रूप में पेड़ विकसित हो रहे है I भविष्य में भी गाववासियो से भी इस तरह के नेक कार्य निस्वार्थ भाव से करने की ढेर सारे उम्मीदे है I गाव में पीपल का पेड़ भी 1972-1973 में लगाया था I जो आज विशाल वृक्ष्य का रूप घारण कर चुका है I उन्ही के प्रयास से पीपल के पेड़ के नीचे बैठने का चबूतरा बनाया गया है जो कि कोई भी पथिक छाये का आनन्द ले सके I सन 1970 के आसपास निगाल्पनी में खोला के पानी में बादल फटने के कारण बाढ़ ने विशाल रूप लेकर आधे गाव को बहा ले गया जिसमे हमारा घर भी था I
• उपरोक्त के अलावा गाव पंचायत में भी पिता जी का बहुत नाम था स्पष्टवादी, सत्यवादी महापुरुष के कारण ही गाव के न्याय पंचायत में पिता जी का उपस्थित होना तत्कालीन समय में आवश्यक होता था I पिता जी के सदगुण आज भी गाव वासी याद कर भावुक हो जाते है I
पिघलता हिमालय पत्र में दो शब्द लिखकर श्रदेय स्वर्ग्रीय पिता श्री को सादर विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहता हूं।

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