कुमाउँ विश्वविद्यालय को याद नहीं आ रहे हैं संस्थापक कुलपति

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
कुमाउँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति, भौतिक विज्ञानी प्रो.डी.डी.पन्त का जन्म शताब्दी समारोह उनके चाहने वाले, उनके साथी, उनके शिष्य ध्ूमधम से मना रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय पन्त जी को भूल ही गया। इसके अलावा किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह पहाड़ के इस विवि प्रशासन से कह सके कि आयोजन के लिये आगे आओ। महान भौतिक विज्ञानी, कुविवि के कुलपति, उक्रांद के संस्थापक, समाज विज्ञानी प्रो. पन्त की याद में विवि में कुछ होना ही चाहिये, ऐसी मंशा सभी की है परन्तु अपनी कारगुजारी के लिये बेहद चर्चा में बने हुए इस विवि इस बारे में कुछ सोच भी सकता है ऐसा अभी नहीं लगता। कारण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.एस.राणा को विश्वविद्यालय से ज्यादा उत्तराखण्ड की चिन्ता हो रही है। उनके कई चर्चित बयान सबकी जुंवा पर हैं। साथ ही विवेकानन्द, रविन्द्रनाथ टौगोर को लेकर वह कुछ नया करने की बात कर रहे हैं। पूर्व प्रधानीमंत्री अटल जी के नाम पर भी एक विभाग का नाम रख दिया गया है। लगता है राणा जी बहुत दूर की सोच कर चल रहे हैं शायद तभी उनके बयान भी आते-आते जारी हो गये थे। स्व.डी.डी.पन्त जो पहाड़ के बारे में सोचते थे, विज्ञान के बारे में सोचते थे, समाज के बारे में सोचते थे, उनपर सोचने के लिये अब विवि के पास अवसर ही नहीं है। ऐसे समय में जबकि प्रो.पन्त की जन्म शताब्दी समारोह पर दांये बांये कई गतिविधियां हुई, विवि मौन रहा।
उल्लेखनीय है कि प्रो.पन्त के शताब्दी समारोह को भव्य बनाने को लेकर नैनीताल में बैठक हुई थी और पिछले कुलपित प्रो. डी.के. नोडियाल ने विवि की ओर से इस बारे में सकारात्मक बात दोहराई थी। हालांकि बैठक करवाने वाले नैनीताल के लोग, पन्त जी से जुड़े लोग, उनके शिष्य, उनके चाहने वाले, समाजसेवी थे। समय गतिमान है। प्रो.नोडियाल को कुविवि की लीला जितनी समझ आती उससे पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल कुलपति अकादमिक कार्य करने वाले थे और वह प्रशासनिक कार्यों में राजनीति का घोल नहीं बना पा रहे थे। इसके बाद प्रो.राणा को कुलपति बनाकर भेजा गया। आगरा निवासी राणा के आने से पहले ही चर्चा फैल गई कि बहुत पकड़ वाले हैं। अब स्थायी कुलपति के लिये चल कार्यवाही में भी इनकी बात सबसे आगे है। उत्तराखण्ड राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिये यूपी के तीन मैदानी जिलों को इसमें मिलाने का बयान देने वाले प्रो. राणा शायद पता न हो कि प्रो.डी.डी.पन्त वैज्ञानिक होने के साथ ही समाजविज्ञानी थे। समाज की व्यवहारिकता को जानते थे और इसी लिये उन्होंने उत्तराखण्ड क्रान्तिदल में रहना पसन्द किया। राजनीति से दूर पन्त जी पहाड़ के दर्द को जानते थे। इसीलिये तमाम अवसरों के बावजूद वह नैनीताल में ही रहे और अन्त में हल्द्वानी में रहने लगे थे।
कुलपति डाॅ. डी.डी.पन्त के जन्म शताब्दी समारोह को लेकर पहाड़ सहित अन्य संस्थाओं ने शुरुआत की। यहाँ पर सबसे पहले आशुतोष उपाध्याय का उल्लेख करना जरूरी है क्योंकि डी.डी. पन्त को लेकर वह शुरु से ही कुछ करते रहे हैं। उनके सद्प्रयास से डी.डी.पन्त खोजशाला के रूप में गतिविधियां होती रहती हैं। बेरीनाग में इस प्रकार के आयोजन वह करवाते रहे हैं। अन्य स्थानों में भी वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिये वह संस्था के रूप में संलग्न हैं। आशुतोश उपाध्याय की सोच पहले से इस ओर थी कि प्रो.पन्त जैसे महान व्यक्ति को भुलाया जाना गलत होगा, कुछ होना चाहिये। इस बीच शताब्दी समारोह आयोजन को लेकर जो श्रृंखला शुरु हुई उसमें बेरीनाग, काण्डा, हल्द्वानी, पिथौरागढ़ में लोग जुटे। संस्था चाहे कोई हो, पन्त को समझने वाले लोगों का जुटना बड़ी उपलब्धि कहा जायेगा। इसी क्रम में हल्द्वानी में हुए आयोजन में वक्ताओं ने कहा कि डाॅ. पन्त जैसे व्यक्तित्व कभी कभार ही पैदा होते हैं। उन्होंने कुमाउँ विश्वविद्यालय को जिस तरह से अकादमिक उँचाईयों पर पहँुचाया, वह आज भी एक उपलब्धिहै। डाॅ.पन्त को अपने देश व समाज से बहुत ही प्यार था, इसी कारण से उन्होंने अमेरिका में अपना भविष्य तलाशने की बजाय भारत में ही रहना पसन्द किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महापौर डाॅ. जोगेन्द्र पाल सिंह रौतेला ने कहा कि डाॅ. पन्त हमारी विशिष्ट पहचान थे। उनका कुमाउँ विश्वविद्यालय से जुड़ा रहना हमारे लिए गौरव की बात रही है। उन्होंने अपने निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों को उच्चकोटि के शोध् कार्य करवाए। वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास को लेकर उनकी अपनी अलग सोच थी, इसी छटपटाहट में वह यूकेडी से भी जुड़े जबकि वह राजनीति से वास्ता नहीं रखते थे। पन्त के मायने आज भी समझने की जरूरत है। प्रो. शेखर पाठक ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डाॅ.पन्त नैनीताल के डीएसबी कालेज में भौतिक विषय के संस्थापक रहे। उन्होंने प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो.सी.वी.रमन के निर्देशन में भौतिकी में अपना शोध् पूरा किया। प्रो.रमन ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भविष्य का वैज्ञानिक घोषित किया था। बाद में अपनी प्रतिभा के कारण ही उन्हें एक फेलोशिप के लिये अमेरिका जाने का अवसर मिला। वहाँ शोध् करने के दौरान उन्हें अमेरिका के अनेक उच्च कोटि के संस्थानों ने अपने यहाँ नौकरी करने का अनुरोध् किया। पर डाॅ.पन्त ने अमेरिका में अच्छी सुविधओं वाली नौकरी करने के बजाय अपने देश और अपनी मातृभूमि उत्तराखण्ड लौटना स्वीकार किया। अपने इसी प्रण के कारण उन्होंने कुमाउँफ विवि के सहारे यहाँ की उच्चशिक्षा को एक नया आयाम दिया।
प्रो.गिरिजा पाण्डे ने कहा कि डाॅ.पन्त को समझना और जानना अपने पूरे समाज को समझने और जानने की तरह है। उनके शताब्दी समारोह के बहाने हम पूरे पहाड़ को भी पूरी समग्रता के साथ समझ सकते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो.कविता पाण्डे ने कहा कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्रा में उनके द्वारा किये गये शोध् कार्यों को हमेशा याद रखा जायेगा। प्रो. बीएस बिष्ट पूर्व कुलपति, प्रो. केसी जोशी पूर्व कुलपति, प्रो. एचबी त्रिपाठी, प्रो.प्रीति गंगोला जोशी, डाॅ.आई.डी. पाण्डे, ध्नेश पाण्डे, हृदयेश मिश्रा, प्रो.प्रभात उप्रेती, उमेश तिवारी विश्वास, ओपी पाण्डे ने डाॅ.पन्त की स्मृतियों को श्रोताओं के सम्मुख रखा। जन्म शताब्दी समारोह में हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, ओ.पी.पाण्डे, दिवाकर भट्ट, बबीता उप्रेती, प्रदीप लोहनी, मयंक जोशी, सहर्ष पाण्डे, अनिल कार्की, पंकज उप्रेती, विनोद जीना, रेखा जोशी, सतीश जोशी, पंकज पाण्डे, सुनील पन्त, कर्नल आलोक पाण्डे, पूरन बिष्ट सहित तमाम लोग थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *