टलकपुर से टनकपुर का सफर

कभी तो लहर आयेगी इस माल-भाबर में

चन्द्र सिंह वृजवाल
चम्पावत/टनकपुर। टनकपुर का ‘मिशन हाउस’ 19वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में निर्मित, यह शहर के उत्तर पूर्व में शारदा नदी के तट पर स्थित है जो आज इस जर्जर हालत में भी अपने शहर के समृद्ध इतिहास और नैसर्गिक सुन्दरता का गवाह है।

उत्तराखण्ड राज्य बने वर्षों बीत चुके हैं लेकिन पुरानी मण्डी और पहाड़ के प्रवेश द्वार के रूप में विख्यात टनकपुर विकास की रफ्रतार नहीं पकड़ सका। माँ पूर्णागिरी का प्रवेश द्वार भी टनकपुर है। फिर भी उम्मीद है कि कभी तो लहर आयेगी इस माल-भाबर क्षेत्र में।

यह नेपाल की सीमा से लगा एक छोटा सा गाँव था। यहाँ से तीन मील की दूरी पर ब्रह्मदेव मण्डी थी, जिसे कत्यूरी राजाओं ने बसाया, कालान्तर में भूस्खलन होने के कारण ब्रह्मदेव मण्डी समाप्त हो गई। और इस नगर का निर्माण 1898 में नेपाल की ब्रह्मदेव मण्डी के विकल्प के रूप में किया गया था। आंकड़ों की बात करें तो सन् 1901 में इसकी कुल जनसंख्या मात्र 692 थी।
सर्वप्रथम सन् 1890 में एक अंग्रेज सैलानी मि. टलक यहाँ आया और उन्हें इस स्थल की प्राकृतिक सुन्दरता ने बेहद प्रभावित किया और उन्होंने सबसे पहले बगडोरा ;सैलानी गोठद्ध में आवास के लिये एक बंगला बनवाया और ध्ीरे-ध्ीरे सुनियोजित ढंग से कस्बे को स्थापित किया। आगे चलकर इस कस्बे को टलक के नाम से ‘टलकपुर’ कहा जाने लगा। कालान्तर में शहर के तस्वीर के साथ नाम के उच्चारण में भी बदलाव आया और इतिहास को नजरअंदाज करते हुए स्थानीय लोगों ने टलकपुर को टनकपुर कहना प्रारम्भ कर दिया। मुड़ कर देखें तो देश की आजादी के साथ शहर के नाम का विवाद भी दफन हो गया।
यहाँ की सुनियोजित ढंग से निर्मित बाजार, चैड़ी खुली हुई सड़कें, फैले हुए फुटपाथ, खुली हवादार कालोनियां इसकी विशिष्टता वयां करता है। पूर्णागिरी मन्दिर के मुख्य द्वार के रूप में शारदा नदी के तट पर बसा यह कुमाउँ की प्रमुख मण्डी ;व्यापारिक केन्द्र था, जहाँ कत्यूरी शासन से लेकर देश की आजादी के कई वर्षों बाद तक जोहार, दारमा और व्यास घाटियों के भोटिया ;शौका, नेपाल से नेपाली, देश के मैदानी क्षेत्र से व विदेशी व्यापारी यहाँ आकर व्यापार करते थे। टनकपुर ब्रिटिश शासन भारत में कुमाउँ का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों में इमारती लकड़ी, कत्था, पेड़ों की छाल, शहद और अन्य छोटे जंगली उत्पाद आदि शामिल थे, जिनका व्यापार नवम्बर और मई के बीच होता था। यहाँ भोटिया ;शौका व्यापारी तिब्बत से उन और सुहागा नीचे लाया करते थे, और बदले में शक्कर व कपड़े वापस ले जाते थे। दूसरी ओर चीनी, नमक, हल्दी, मिर्च और घी अल्मोड़ा और नेपाल के पहाड़ी बाजारों से आयात किया जाता था। 19वीं शताब्दी के  उत्तराद्ध में यहाँ अवध्-तिरहुत रेल कम्पनी द्वारा पीलीभीत टनकपुर रेल लाइन निर्माण किया गया जो चम्पावत तथा पिथौरागढ़ के लिये अन्तिम रेलवे स्टेशन है।

यद्यपि इस शहर ने अनेक मुश्किलों के दौर देखे हैं किन्तु अब यह शहर रेलवे बड़ी लाइन व राष्ट्रीय राजमार्ग से देश के प्रमुख शहरों से जुड़ने के बाद बहुत उम्मीदों के साथ आगे बढ़ रहा है। यहाँ पर्यटन, व्यापार व परिवहन क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की पूरी सम्भावना है। टनकपुर अब ध्ीरे-ध्ीरे शिक्षा-चिकित्सा व यातायात के कारण विशेष आकर्षण केन्द्र बन गया है।

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