शौका बोली-भाषा को पुनर्जीवित करने का योजनाबद्ध प्रयास है यह

अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश
डाॅ.पंकज उप्रेती
किसी भी समाज की जो लोक मान्यता और बोली भाषा होती है, वह उसके पूरे बात-व्यवहार को बताती है। उस समाज की विशिष्ट शब्दावली उसके इतिहास, भूगोल और व्यवहार को बहुत सटीक बताती है जबकि उसका अनुवाद या दूसरी बोली भाषा में वही शब्द उसके पूरे अर्थ को व्यक्त करने में अधूरापन ही लगता है। ऐसा ही अधूरापन हमारी हिमालयी सीमा की बोली-भाषाओं को लेकर समाज मेें रहा है। जबकि हमारे सीमान्त क्षेत्र की विशिष्ट बोली-भाषा अपनी चाल के साथ अपने सटीक शब्दों के लिये बहुत समृद्ध है।
भारत सरकार के शब्दावली आयोग ने भी देश की विभिन्न बोली भाषाओं का अध्ययन करते हुए बहुत कार्य किया है परन्तु आज भी लगता है कि हमारी लोकभाषा का बहुत बड़ा हिस्सा उसमें नहीं है। बोली-भाषा उसके व्यवहार के साथ पनपनी है वरना दुनिया की सैकड़ों भाषाएं समय के साथ बुझ चुकी हैं। बोली भाषा के इस सच को जानते हुए शौका समाज के विद्वान गजेन्द्र सिंह पांगती ने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। श्री पांगती ने अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश के रूप में समाज को सजग किया है। दो खण्डों के इस शब्दकोष के पीछे उनकी सीधी सी मंशा है कि शौका बोली भाषा को पुनर्जीवित किया जाए, इसके लिये यह योजनाबद्ध प्रयास है। भाषा में जबर्दस्त पकड़ रखने वाले और अनुशासन प्रिय पांगती जी ग्रन्थ की भूमिका में शब्दकोष के बारे में बताने के साथ-साथ जितना भी उल्लेख करते हैं वह जानना शौका ही नहीं हर समाज के लिये जरूरी है। बहुत ही श्रम के साथ उन्होंने इस कार्य को किया है। शब्दकोष की भूमिका में उन्होंने इतिहास-भूगोल सहित जो जानकारी दी है वह इस प्रकार है-
भारत तिब्बत सीमा में स्थित गोरीगंगा की घाटी जोहार के मूल निवासी शौका नाम से जाने जाते हैं। यहाँ की अपनी विशिष्ट संस्कृति और भाषा रही है। प्राचीन काल में यहाँ की आबादी बहुत कम थी क्योंकि विकट होने के कारण यहाँ से तिब्बत जाने वाला दर्रा, उंटाधूरा से व्यापारिक आवागमन सबसे बाद में खुला। यहाँ के तत्कालीन लोग जो भाषा बोलते थे वह रंकस कहा जाता था। पूर्व मध्यकाल में तिब्बत व्यापार के लाभ से आकर्षित होकर जब कुमाउँ व पश्चिम नेपाल के राजदूत व खस लोग जोहार आये तो वे अपने साथ हिन्दू वैदिक धर्म व कुमाउंनी-हिन्दी भाषा ले आये। परिणामतः इस समुदाय ने न केवल वैदिक धर्म अपनाया बल्कि कुमाउंनी और रंकस के सम्मिश्रण से निर्मित एक विशिष्ट भाषा को भी अपनाया जिसे सूकिखून कहा जाता था। मध्यकाल में गढ़वाल और तिब्बत होते हुए मूल रूप से राजस्थान के राजपूत धाम सिंह जोहार मिलम में, काशी के पण्डित भट्ट मर्तोली में, गढ़वाल के शौका और कुमाउँ के व नेपाल के राजपूत बड़ी संख्या में आकर विभिन्न गाँवों में बसे तो जोहार में वैदिक धर्म के और सुदृढ़ होने के साथ ही कुमाउंनी की सहोदर एक ऐसी भाषा का जन्म हुआ जिसे सूकिबोलि/शौकी बोली कहा जाने लगा। इस विशिष्ट भाषा ने सूकिखून को चलन से बाहर कर दिया। शौका बोली में कुछ ऐसे शब्द है। जो न तो कुमाउंनी में पाए जाते हैं और न ही हिन्दी में। वे शब्द सूकिखून से आये हैं। उनमें से कुछ दारमा के रंगलू में पाए जाते हैं। और कुछ का मूल भाषा विज्ञानी ही बता सकते हैं।
तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने के कारण जब शौका लोग जोहार घाटी से पलायन करके देश के विभिन्न स्थानों में बस गए और उनके आर्थिक क्रियाकलापों में अमूलचूल परिवर्तन हो गया तो उनकी संस्कृति और भाषा मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी। परिवर्तन की यह दिशा व गति ऐसे ही जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब शौका संस्कृति और भाषा दोनों विलुप्त हो जायेंगे। इसलिए इस समाज के प्रबुद्ध लोग इनके संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। उनके प्रयास को सफल बनाने के लिये आवश्यक है कि, मेरी आयु वर्ग के लोग जिन्होंने बचपन में शौका जीवन जिया है, शौका संस्कृति से सम्बन्धित शोधग्रन्थ और रचना साहित्य लिखें। ऐसा किया भी जा रहा है। मै। खुद ऐसी कई रचनाएं कर चुका हूं लेकिन यह सब कुछ हिन्दी में किया गया है शौका भाषा में नहीं। शौका बोली को पुनर्जीवित करने के लिए अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है। वर्ष में तीन-तीन गाँवों में उत्क्रमण तथा व्यापार हेतु लम्बी अवधि के लिए तिब्बत और भारत के विभिन्न भागों में भ्रमणशील रहने के कारण शौकाओं को रचना साहित्य लेखन और भाषा को व्यापकरण की परिधि में लाने का कोई अवसर नहीं मिला। आधुनिक काल में भी इस भाषा का रचना साहित्य कुछ कविताओं के लेखन तक ही सीमित है। यदि यह कहा जाये कि शौका बोली कभी भी भाषा नहीं बन पायी तो गलत नहीं होगा। बोली वह होती है जो बोली जाती है। जब उस बोली में लेखन कार्य किया जाता है तो वह भाषा बन जाती है। शौका बोली के इतनी जल्दी चलन से बाहर होने का एक कारण यह भी है कि इसका लिखित साहित्य नहीं है जो इसे स्थायित्व दिला सकता था।
भाषा और संस्कृति का चोली-दामन का सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व बना नहीं रह सकता है। शौका भाषा को पुनर्जीवित किये बिना शौका संस्कृति को संरक्षित और सम्बर्धित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह भाषा अब मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी है जिसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके संरक्षित करने के लिये कोई आधर भी उपलब्ध् नहीं है। हमारी आयु-वर्ग के लोग इस भाषा को जानते और कुछ हद तक बोल भी सकते हैं। उनके बाद यदि यह भाषा भी सूकिखून की तरह विलुप्त हो जाये तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, ऐसा न हो इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास को सपफल बनाने के लिये आवश्यक है कि शौका भाषा का व्याकरण तैयार किया जाये। इसके मुहावरों और लोकोक्तियों को लिपिबद्ध किया जाये और एक बृहद शब्दकोष बनाया जाये, इसी कड़ी में शब्दकोष बनाने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है।
शब्दकोष में सामान्यतः मूल शब्द दिया जाता है। उसके साथ उसका अर्थ, वाक्य प्रयोग, समानार्थक व विलोम शब्द, उससे बने शब्द आदि दिए जाते हैं। और ऐस बने शब्द यथा संज्ञा, भाववाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण आदि में से क्या है यह संकेतकों के द्वारा दर्शाया जाता है। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि हर शब्द को अलग लिखने से शब्दकोष बहुत बड़ा हो जाता है। लेकिन अब सन्दर्भ बदल गया है। इन्टरनेट के कारण न तो शब्दकोष बड़ा होने की समस्या रह गयी है और न ही इसके छापने की आवश्यकता रह गयी है। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारा लक्षित वर्ग इस भाषा को जानता ही नहीं है। उसे किसी अंग्रेजी या हिन्दी शब्दकोष का समानार्थक शौका भाषा का शब्द ढूंढने के लिए उसके मूल शब्द जानने में भी कठिनाई होगी। इसलिए इस शब्दकोष में हर शब्द को अलग लिखा गया है। प्रोग्रामिंग के माध्यम से वे अपनी उंगुली से अंग्रेजी, हिन्दी और शौका भाषा के किसी भी शब्द को क्लिक करके अन्य दो भाषाओं में उनका समानार्थक शब्द ढूंढ सकते हैं। या यूं कहें कि जिस तरह आधुनिक टैक्नोलाॅजी के माध्यम से दुनिया उनकी मुट्ठी में है उसी तरह इन तीन भाषाओं के शब्द उनके फिंगरटिप में होंगे।
शब्दकोष उपयोगी होने के साथ बहुत बड़ा भी न हो इसके लिए संज्ञा और क्रिया दोनों बनाने वाले शब्दों में उनमें से केवल उस एक को लिया गया है जो ज्यादा चलन में है। यह इस आशा में किया गया है कि दूसरी शब्द रचना पाठक स्वयं आसानी से कर सकता है। जैसे लेख से लिखना आदि। फिर भी जहाँ भी कुछ भिन्न अर्थ का शब्द बनता हो उसे दिया गया है। इसी प्रकार हिन्दी और अंग्रेजी के समानार्थक शब्दों के साथ शौका बोली के केवल शब्द दिए गए हैं और उनका अर्थ इस विश्वास से छोड़ दिया गया है कि पाठक हिन्दी या अंग्रेजी के शब्दों से उसका अर्थ बखूबी समझ जाएंगे। आवश्क समझे जाने पर कुछ खास शब्दों का वाक्य प्रयोग बाद में दिया जा सकता है। जो शब्द इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं उनका अन्य भाषा का समानार्थक शब्द दिया गया है। उसके लिए (न) संकेतक दिया गया है। कोई भी भाषा पूर्ण रूप से न तो स्वतंत्रा है और न ही रह सकती है। भाषा की समृद्धि के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को हर भाषा में अपनाया जाता रहा है और यही हमें भी करना होगा। इसलिए हिन्दी, फारसी, उर्दू और अग्रेजी के प्रचलित तथा प्रचलित की जाने लायक शब्दों को बिना संकोच के शब्दकोष में स्थान दिया गया है।
शौका बोली का मूल स्वरूप जीवित रहे इसके लिए आवश्यक है कि इसका मूल उच्चारण कायम रहे। इसमें श तथा ष के लिए बहुधा स का प्रयाग किया जाता है। इसी तरह इ की जगह र का प्रयोग किया जाता है। ण के स्थान पर भी न का प्रयोग किया जाता है। मात्राओं में भी अन्तर है। जैसे अ की आ और आ की जगह आ। इसी तरह शब्दों में भी अन्तर है। जैसे ध् की जगह द आदि। मूल उच्चारण की इन विशेषताओं को मानये रखने का प्रयास किया गया है। इस भाषा की एक बहुत बड़ी खामी है इसमें संयुक्ताक्षर का अत्यधिक प्रयोग। इससे भाषा न केवल कर्ण कटु हो जाती है बल्कि इसके लेखन में भी कठिनाई आती है। भाषा के आम प्रचलन और सहज लेखन के लिए इसमें सरलता लाना आवश्कय है। इस हेतु जहाँ भी सम्भव है वहाँ संयुक्ताक्षर के स्थान पर सरल शब्दों का उपयोग किया गया है जो सम्भव है कुछ शुद्धता के पोषक लोगों को पसन्द न आये। उन विद्वानों से से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि भाषा के संरक्षण के लिए यह किया जाना आवश्यक है। फिर भी जो संयुक्ताक्षर न केवल बहुत आम है बल्कि शौका बोली की विशिष्टता है उनका स्वरूप यथावत रखा गया है।
इसमें कुछ शब्द छूटे हो सकते हैं और कुछ अन्य भाषाओं के शब्द शौका बोली में लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। शब्दकोष को छोटा और उपयोगी बनाने के लिये अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द छोड़ दिए गए हैं जो उपयोग में नहीं हैं। इसी प्रकार मूल शब्द से बने अन्य शब्दों में से उनको छोड़ दिया गया है जिनका प्रयोग आमतौर पर नहीं होता है। उपयोगी पाए जाने या हो जाने पर भविष्य में छोड़ गए कुछ शब्दों को शब्दकोष में लेने की आवश्कता पड़ सकती है। इसके लिये अपने वाले सुझावों के आधर पर एडमिन व सम्पादक द्वारा इसे अद्यतन व परिष्कृत कराते रहना होगा। इसके लिए मेरी पूर्व स्वीकृति है। वैसे भी अब हार्ड काॅपी का जमाना चला गया है। मैं आशा करता हूं कि नई पीढ़ी आन लाइन शब्दकोष को अधिक सहजता से स्वीकारेगी।
शौका बोली में दो ऐसे विशिष्ट शब्द हैं जिनको उच्चारण के अनुरूप देवनागरी में लिखना सम्भव नहीं है। इस पर अभी विचार विमर्श चल रहा है। क्योंकि हम देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं और करते रहेंगे इसलिए इसके अनुशासन के अन्तर्गत इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके तो अच्छा होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो हमें इसको भविष्य के लिए छोड़ना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारी बोली कुमाउनी के सबसे नजदीक है। फिर भी वह उससे बहुत भिन्न है। कुमाउनी में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दशाने के लिए उच्चारण भिन्नता को अपनाया गया है लेकिन हमारी बोली में इस भिन्नता को दर्शाने के लिए कुमाउनी के अ और आ का स्थान परिवर्तन कर दिया गया है या फिर व, य, ह जैसे अक्षर में ए आदि के ध्वनि के साथ नए शब्द का निर्माण कर दिया गया है। इस अर्थ में हमारी बोली कुमाउनी से अधिक समृद्ध है। लेकिन इसके कारण हमारी बोली कुछ कर्ण कटु हो गयी है। पिफर भी इसकी विशिष्टता को बनाए रखने के लिए हमें न केवल इस अन्तर को बनाए रखना होगा बल्कि इसे और भी सुदृढ़ करना होगा। इस विशिष्टता को बचाए रखने के लिए लघु ह्रस्व के लिए हलन्त और अति दीर्घ के लिए विसर्ग (:) का प्रयाग बहुत आवश्यक होने पर ही करना होगा अन्यथा हमारी भाषा कुमाउनी या हिन्दी में समाहित हो जायेगी। शौका बोली के जिन शब्दों का समानार्थक शब्द किसी अन्य भाषा में नहीं है उनको तथा उनके प्रयोग को संलग्नक में देने का प्रयास किया जाएगा। शब्दकोष को साॅफ्रटवेयर में डाने वाले युवा यह निर्णय लेंगे कि इसे शब्दकोष में कहाँ और किस रूप में स्थान दिया जाये।
शब्द और भाषा का समाज और उसकी संस्कृति से चोली दामन का साथ होता है। इसलिये कई शब्दों का समानार्थक शब्द कुछ अन्य भाषाओं में नहीं मिलता है। ऐसे ही अंग्रेजी के कुछ शब्दों का हिन्दी समानार्थक शब्द की तुलना में शौका शब्द अध्कि सटीक होने पर उसे अपनाया गया है। ऐसे में हिन्दी और शौका शब्द एक-दूसरे के समरूप नहीं मिलेंगे। पाठकों से अनुरोध् है कि ऐसे में अंग्रेजी शब्द देखें क्योंकि इस शब्दकोश की मूल भाषा अंग्रेजी और लक्षित भाषा शौका है। एक ही वस्तु, भाव व प्रकटीकरण के लिये शौका भाषा में कई शब्द हैं और समानार्थक शब्द अंग्रेजी व हिन्दी में नहीं हैं। ऐसे शब्दों को और विशिष्ट कार्य व्यवहार से सम्बन्धित शब्दों को एक ही जगह दिया गया है ताकि यह शब्दकोष एक सन्दर्भ पुस्तक के रूप में काम आ सके और भावी पीढ़ी को भाषा का उपयोगी ज्ञान हो सके। सन्दर्भ में आसानी के लिये सम्बन्धित अंग्रेजी शब्द को s Capital Ietter में दिया गया है।
शब्द चयन का आधर पफादर बुल्के का ‘अंग्रेजी हिन्दी कोश’ रहा है। जिसके लिये मै। उस महान आत्मा का रिणी हूं। उनके शब्दकोष के उन शब्दों को छोड़ दिया गया है जो न तो प्रयोग में हैं और न ही उनके प्रयोग में आने की सम्भावना है। उसमें जो कुछ शब्द छूट गये हैं उनको सम्मिलित कर लिया गया है। कुछ मित्रों ने शौका बोली के शब्द चयन में जो सहयोग दिया उनके लिये मैं उनका आभारी हूं।
इसमें संशोधन करने और कुछ शब्दों को इससे हटाने तथा कुछ और शब्दों को इसमें जोड़ने की प्रक्रिया दसकों तक जारी रखनी होगी। इसके लिए, इसके प्रकाशित कराने और इसके उ(रण की अनुमति देने के लिए मैं जोहार पुस्तकालय और मेरे पुत्रा नवीन को सम्मिलित रूप से अधिकृत करता हूं।

शौका बोली व भाषा

गजेन्द्र सिंह पांगती
जोहार से विस्थापन के बाद शौका संस्कृति जिस तरह विलुप्ति के कगार पर पहुँच गयी है उससे युवा व वृद्ध सभी शौका चिन्तित है। अन्य लोगों की तरह मैं भी मौका मिलते ही शौका संस्कृति के संरक्षण और समवर्धन की आवश्यकता पर अपने विचार प्रकट करता रहता हूँ। लेकिन अभी तक इस विषय में कुछ जागरूकता पैदा होने के अतिरिक्त कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पायी है। इसका बहुत बड़ा कारण भी है। यह कार्य उतना ही दुरूह है जितना सूखे जड़ वाले पेड़ को पुनर्जीवित करना लेकिन यह असम्भव भी नहीं है। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि प्रयाश सुनियोजित हो और उसमें निरन्तरता हो, प्रयास सार्थक हो इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि संस्कृति के वे मूल तत्व और कारक कौन है जिनके छूटने से संस्कृति बिलुप्त हो गयी/हो जाती है।
संस्कृति के मूल तत्व है भाषा, धर्म, परम्पराएं, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास, अंधविश्वास, आर्थिक क्रिया कलाप, पहनावा, खानपान आदि आदि। ऐतिहासिक कारणों से शौका भाषा जहाँ कुमाउंनी की सहोदर रही है वहीं शौकाओं का धर्म वैदिक धर्म का सरलीकृत रूप रहा है। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने से शौकाओं का परम्परागत आर्थिक क्रियाकलाप पुनर्जीवित करना असम्भव है। जोहार की ठण्डी आबोहवा में उपयोगी पहनावे का अनुपयोगी हो जाना भी स्वाभाविक है. परम्पराए, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास व अंधविश्वास, खान-पान आदि समय के साथ बदलती रहती हैं। संस्कृति के समवर्धन के किये इसके मूल तत्वों को संरक्षित करने के साथ ही कुरीतियों व अन्ध् विश्वासों को दूर करते रहना आवश्यक है। संस्कृति में भाषा व ध्र्म सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इन दोनों में भाषा का स्थान गुरुतर है। ध्र्म बदलने के बाद भी संस्कृति के संरक्षित रहने के कई उदाहरण मिल जायेंगे लेकिन भाषा छूटने के बाद संस्कृति के बचे रहने का शायद ही कोई उदाहरण मिल पाए। बंगाली मुसलमानों ने धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी भाषा नहीं बदली। यही कारण है कि उनमें बंगाली संस्कृति अब भी जीवित है। यही बात कुछ हद तक पंजाबी मुसल्वानों के लिए भी कहा जा सकता है। इसीलिए कहा जाता है, ‘भाषा छूटी तो संस्कृति छूटी।’ पलायन के साथ ही शौका अपनी भाषा पीछे छोड़ आये है। अब उनकी संस्कृति भी भूतकाल की बात होने के कगार पर है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है।
इसलिए यदि शौका संस्कृति को संरक्षित करना हो तो हमें सबसे पहले उनकी भाषा व बोली को पुनर्जीवित व प्रचलित करना होगा। हमें उन कारकों का विश्लेषण करना होगा जिनकी वजह से शौका भाषा में लिखित साहित्य की रचना नहीं की जा सकी और उनकी बोली प्रचालन से बाहर हो गयी। कुमाउनी का सहोदर होने के कारण शौका भाषा को हिन्दी की उपभाषा कहा जा सकता है। मैं अपनी रचनाओं में इसका कई बार उल्लेख कर चुका हूँ कि यह कैसे बंगाली और नेपाली से मिलती है। कुमाउनी से इसमें जो भिन्नता है उसके मूल में उक्त दोनों भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। मैं तो यहाँ तक कहता रहा हूँ कि यदि बंगाली शब्दों में ओ की जगह अ का उच्चारण किया जाय या शौका बोली में अ की जगह ओ का उच्चारण किया जाय तो इन दो भाषी लोगों को एक दूसरे की भाषा समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यह मैं अपने कलकत्ता प्रवास के अनुभव के आधार पर दावे के साथ कह सकता हूँ। दुर्भाग्य से अबसे पूर्व राजस्थानी की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। दुर्भाग्य इसलिए कि जोहार के मूल पुरुष धम सिंह रावत के राजस्थान से होने पर भी मैं इस पर गौर नहीं कर सका। इसका एक कारण सम्भवतय यह भी रहा है कि जब मैं 2 वर्ष के लिए जयपुर में था तो मेरा कार्य क्षेत्र मध्य और पूर्व राजस्थान था जहाँ हिन्दी खड़ीबोली का अधिक प्रभाव है जबकि पश्चिम व दक्षिण राजस्थान में शुद्ध राजस्थानी बोली व भाषा का प्रभाव है। यही कारण है कि महान लेखक व साहित्यकार बिजयदान देथा ने जब अपना रचना साहित्य राजस्थानी में लिखने का निर्णय लिया तो उन्होंने जो पहला कार्य किया वह था जयपुर से जोध्पुर जाना और अपने मूल गाँव में रहना ताकि वे मूल राजस्थानी भाषा की आत्मा में रच-बस सकें। उन्होंने राजस्थानी में अनेकानेक उपन्यास, लेख, समालोचनाएँ, संस्मरण आदि और हजारों कहानियां लिखीं है. मुझे पूर्व में उनकी एक-दो रचनाएं पढने का सौभाग्य मिला था. उनके कथानकों की रोचकता और रचना की सरलता व सुन्दरता से मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाया। इसलिए उनकी और रचनाएं पढ़ने की तमन्ना मेरे दिल में थी। कोरोना ने मेरी यह तमन्ना पूरी कर दी। इस महामारी से बचने के लिए मैं अपने पुत्र नवीन के आवास ‘मनाकार’, सल्ला, कसारदेवी, अल्मोड़ा आ गया। नवीन के भी बिजयदान देथा का प्रशंसक होने के कारण उसके पुस्तकालय में उनकी कई रचनाएँ उपलब्ध् थीं। उनमें से तीन-चार रचनाएं पढ़ने पर मुझे इस बात का आभास हुआ कि शौका भाषा व बोली राजस्थानी से अत्यधिक प्रभावित है। कई राजस्थानी शब्द, शब्दों का स्पेलिंग व उच्चारण, वाक्यों की संरचना आदि हिन्दी से भिन्न लेकिन हूबहू शौका बोली जैसी है। मुझे पक्का विश्वास है कि जब भी हम शौका बोली को संरक्षित करने का सुनियोजित प्रयाश करेंगे और शौका भाषा में लेखन के लिए उसके ब्याकरण, उच्चारण, स्पेलिंग आदि का मानकीकरण करेंगे तब मूल राजस्थानी भाषा से हमें बहुत मदद मिलेगी।
किसी भी भाषा व संस्कृति को जीवन्त रखने के लिए उसके मुहावरों व लोकोक्तियों का प्रचलन में रहना अति आवश्यक है क्योंकि इनमें उस संस्कृति की आत्मा बसती है। इनमें सम्बन्धित समाज का इतिहास, उसका अनुभव, उसका विस्वास, मान्यताएं, वर्जनाएं आदि का संकलन होता है। इसी प्रकार भाषा के जीवन्त रहने के लिए आवश्यक है उसका सरल व मध्ुर ;कर्णप्रियद्ध होना और उसका व्याकरण की शु(ता की परिध् िमें बोला और लिखा जाना। इसी अभीष्ट के लिए शौका लोग जब अपनी बोली में लिखते थे तो कुमाउनी शब्द और वाक्य रचना का सहारा लेते थे। इसके लिए बाबू राम सिंह के लेखों को पढ़ा जा सकता है। मेरे पिता जी भी मुझे हमेशा इसी तरह की शौका भाषा में पत्रा लिखा करते थे। अपनी बोली के प्रचलन और अपनी भाषा में स्वतंत्रा व उच्च कोटि के लेखन के लिए मूल भाषा का विश्लेषण, ब्याकरण का मानकीकरण, मुहावरों व लोकोक्तियों का संकलन, शब्दों का सरलीकरण आदि के लिए परिचर्चाओं, गोष्ठियों, शोधें आदि को आगे के लिए छोड़ते हुए मैं अभी केवल इस पर चर्चा करना चाहूँगा कि राजस्थानी भाषा में किस तरह हमारी भाषा से साम्यता है और राजस्थानी भाषा कैसे हमारे अभीष्ट में सहायक हो सकती है। जिन साम्यताओं का मैं उल्लेख करूंगा उनको पढ़ने और उन पर मनन करने के लिए यह बात हमेशा याद रखना होगा कि भाषा के सरल और मधुर (;कर्णप्रिय) होने के लिए संयुक्ताक्षरों के प्रयोग में नियंत्रण के साथ-साथ शब्दों के छोटे स्वरूपों का प्रयोग करना वांछनीय है। जैसे सुरेन्द्र दाज्यू और लक्ष्मण बूबू के स्थान पर सुरिदा व लछ्बू लिखना जितना सरल है उतनी ही मिठास है उसको बोलने और सुनने में। इस भूमिका के बाद अब बढ़ते हैं राजस्थानी और शौका संस्कृति और उनकी भाषा के अनेकानेक शब्दों में समानता ओर, साथ ही विचार करते हैं शौका बोली व भाषा को सरल तथा मध्ुुर बनाने के लिए राजस्थानी भाषा की कुछ विशेषताओं को अपनाने की आवश्यकता पर।
दोनों समाजों में समानताएं-
1-परदा प्रथा
2-महिलाओं द्वारा बिनाई वादन
3-हुक्के का प्रचलन
4-सत्तू का सेवन आदि आदि
दोनों भाषाओं में समान रूप से बोले व लिखे जाने वाले शब्द-
राजस्थानी शौका राजस्थानी शौका टिपण्णी
दीठ दीठ अदीठ —– अपनाए जाने योग्य
अदेर अबेर —– —– विपरीत अर्थ
मनचीती मनचितै,मनचैन अचीता —– अपनाने योग्य
कुछ वैसे ही शब्द-
अचैन, अच्यौत
बखत बखत, बखद ठौर ठोर जगह के अर्थ में
लच्छन लच्छन दरसन दरसन
भरम भरम दरद दरद
धरमी धरमी कौर कौर कौरगास के अर्थ में
बरस बरस जतन जतन
जत्ती जदी उनमान उनिजस उनमान अपनाने योग्य
जस तस जसे तसे किचकिच किचकिच
गार गारा, गौरो. लीपना लीपना
लोग बाग लोग बाग मुरकि मुरकि झुमका
चैमास चैमास ढील ढील देरी के अर्थ में
नौकर-चाकर नौकर-चाकर
राजस्थानी भाषा की शौका बोली-भाषा में अपनाए जाने योग्य विशेषताएं व शब्द-
राजस्थानी भाषा में संयुक्ताक्षरों का प्रयोग बहुत कम है। इस के कारण इसमें मिठास व सरलता है। शौका बोली में संयुक्ताक्षरों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इससे यह लिखने में कठिन तथा बोलने में कर्णकटु लगता है। राजस्थानी भाषा की मिठास का एक और कारण है उसे उसी रूप में लिखना जिस रूप में उसे बोला जाता है। जैसे श और ष का कम से कम प्रयोग और उसके स्थान पर स का प्रयोग। हमें भी यही करना होगा क्योंकि हमारी बोली में भी स का ही अधिक प्रयोग होता है। यही नहीं ड़ के स्थान पर जिस तरह हम र बोलते हैं उसी तरह उसे लिखना भी होगा। ऐसा न किया जाना भी शौका बोली-भाषा के चलन से बाहर होने का एक प्रमुख कारण है। यही वह कारण है जिसकी वजह से हमारे पूर्वज अपनी भाषा में लिखने के लिए अल्मोड़े की कुमाउनी जैसी शैली का प्रयोग करते थे।
राजस्थानी से अपनाए जाने योग्य कुछ शब्द-
ऐसे अनेकानेक शब्द है। उनमें से कुछ शब्द शौका बोली में प्रयुक्त होते रहे हैं। आवश्यकता है तो केवल उनको चलन में रक्खे रहना। नीचे कुछ उदाहरण मात्र दिए गये हैं-
राजस्थानी शौका हिंदी
दरसन दरसन दर्शन
बरस बरस वर्ष
भरम भरम भ्रम
परियाप्त कापफी पर्याप्त
नितनेम रोजक नियम नित्य का नियम
दीठ दीठ दृष्टि
उछाह उछाल उत्साह
बरसा बारिस वर्षा
दरसाना देखौन दर्शाना
दिसावर दिसावर देश
चंदरमा जोन चन्द्रमा
बिणज ब्योपार वाणिज्य
सरूप समान स्वरूप
पिरास्चित परास्चित प्राश्चित
मानुस मनख मनुष्य
बिरमांड बरमांड ब्रह्माण्ड
बिरछ रूख वृक्ष
आदि आदि
पुनश्चः- हामर बोलि पेंल औले या हामर संस्कृति पेंल बचुल? मुर्गी पेंल औले या आन। ते बतौ ते बतौ हनेरे भे। ‘‘ते ठग में ठग द्वार कु ढग’’ क्वेले त बौटो लैने भे। सुरिदा, लछ्बु और डाक्टर हरू आछ्याल ‘‘किछ ला’’ (Whats App) मा आबन बोलि में लेखी बेर बौट लैन में लैगि रन। आमा, बाबा, दादा, भूली सबे औस्या। ऊनि दाकारै हिटा। लेकिन मलि में मेंल जू लेखी रछुं वीक खयाल कया। यदि यस कलात तमर लेख व बोलि मो धे मिठु हे जौल। फिर चाया हामर बोलि कस के सबनक मूख व कलम में औंछ. आब ढील क्याक छ ला? -गजे पांगती