उत्तराखण्ड के परिदृश्य में खत्तों की खेती

हिमाँशु कफल्टिया
खत्ते, गोठ अथवा झाले उत्तराखण्ड के परिदृश्य में समय-समय पर चर्चाओं में आते रहते हैं। कभी वन भूमि पर अवैध् कब्जे के तौर पर तो कभी वन उपज की तस्करी या फिर खुद को राजस्व ग्राम घोषित करने हेतु आन्दोलन। ये खत्ते समाचार पत्रों का हिस्सा बने ही रहते हैं। खत्ते जिन्हें गोठ अथवा झाले के नाम से भी जाना जाता है वह वन ग्राम हैं जो वन भूमि पर बसे हैं एवं सरकार की नजरों में अवैध् कब्जे हैं। बिन्दुखत्ता, गैण्डीखत्ता, छीनीगोठ गढ़ीगोठ, भैंसाझाला कुछ उदारहण हैं। इन गाँवों में वन गुज्जरों के अलावा कई अन्य लोग जो मुख्यतः पहाड़ के लोग हैं निवास करते हैं।
खत्तों का अपना एक इतिहास रहा है। राज्य की तराई-भाबर काफी उपजाउ भूमि है परन्तु यहाँ गर्मी और उमस भरा मौसम, खतरनाक जंगली जानवर, मच्छर जनित मलेरिया एवं अन्य बीमारियों के कारण यह क्षेत्रा कभी भी पहाड़ी लोगोें द्वारा रहने योग्य नहीं माना गया। कत्यूरों, चन्दों व गढ़वाल के पवारों के शासन काल में भी यहाँ बसावटें म ही थी। थारू एवं बुक्सा जनजाति ही यहाँ के स्थाई निवासी थे तथा पहाड़ से लोग केवल शीत ट्टतु में ही कड़ाके की ठण्ड से बचने एवं जानवरों के लिए चारागाह ढूंढने आते थे।
जिन स्थानों पर पहाड़ के लोग शीत ट्टतु में अपने जानवरों समेत डेरा डालते थे उसे खत्ता/गोठ अथवा झाला के नाम से जाना गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने तराई-भाबर की उपजाउ जमीन के महत्व को समझा व यह माना कि यह क्षेत्रा राजस्व वृद्धि जो कि उनका एकमात्र ध्येय था, हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर अंग्रेजी शासन द्वारा इस क्षेत्रा में कृषि विकास हेतु नहरों, मार्गों एवं बांधें का निर्माण किया वहीं उनके द्वारा पहाड़ के लोगों को इन क्षेत्रा में स्थाई तौर पर बसाने के लिए भी प्रोत्साहित किया लेकिन उनकी ये कोशिशें कम ही रंग लाई तथा पहाड़ के लोगों का अस्थाई तौर पर आना-जाना बना रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में एक बार फिर पहाड़ के लोगों को यहाँ स्थाई तौर पर बसाने हेतु आमंत्रित किया गया। अब परिस्थितियाँ भी बदलने लगी, जहाँ एक ओर क्षेत्रा का तेजी से विकास हो रहा था वहीं भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा विपरीत परिस्थितियांे के मध्य मेहनत कर इस उपजाउफ जमीन को तरासा। पन्तनगर में कृषि विश्वविद्यालय, तराई बीज कार्पोरेशन की स्थापना और अवस्थापना जैसे विकास के लिये उठाये गये कदमों ने इस क्षेत्रा को भारत की हरित क्रान्ति का जनक बना दिया।
बदली हुई परिस्थितियों में धीरे-धीरे पहाड़ के लोगों ने खत्तोे में स्थाई तौर पर निवास करना शुरु किया। पहले कुछ परिवार बसे और शनैः-शनै- खत्तों की बसावटें बढ़ती चली गई। जहाँ पहले पहाड़ एक आकर्षण था वहीं अब विकास की बदली हवा ने मैदान को आकर्षण बना दिया। खत्ते सस्ती जमीन और अपने लोगोें की जगह माने गये और अधिक से अधिक लोग यहाँ बसते चले गये।
खत्ते सरकारों/राज्यों के लिए राजस्व का स्रोत भी बने रहे। चन्द शसकों के समय चरवाहों से राजस्व लिया जाता था। रुहेलों व अंग्रेजों द्वारा भी लगान लिया गया। आजादी के पश्चात भी राजस्व जिसे चराई कहा जाता था, की वसूली जारी रही।
इस बीच परिदृश्य फिर र बदलने लगा। 1970 के दशक और उसके पश्चात वन एवं पर्यावरण कानूनों में बड़ा परिवर्तन आया। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कड़े वन एवं पर्यावरण संध्यिों व कानून बनाये गये। इस बीच संरक्षित वनों व आरक्षित वनों में भी वृद्धि हुई। तराई-भाबर में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क, कार्बेट बाघ रिजर्व, राजाजी, नन्धैर अभ्यारण इत्यादि बनाये गये और अधिकतर खत्ते/गोठ/झाले इनकी सीमाओं में आ गये। आज भी खत्ते/गोठों में रहने वाले परिवारों के पास उस समय की चराई;लगान की रसीदें व खसरे मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि दशकों तक राजस्व दिये जाने के बाद इन खत्तों को संरक्षित वन अथवा आरक्षित क्षेत्रा घोषित किया गया। जिन लोगोें ने सदियों से बड़ी मशक्कत के पश्चात इन क्षेत्रों को बसाया था, अचानक से उनके निवास स्थान अवैध् कब्जे की श्रेणी में आ गये और यहीं से शुरु हुआ खत्ते में रहने वालों का संघर्ष।
आज इन खत्तांे/गोठों में कई परिवार निवास करते हैं। उन्होंने दशकों की मेहनत से पक्के मकान बना लिये हैं तथा कई पीढ़ियों से यहाँ खेती करते आ रहे हैं। सरकार द्वारा भी कुछ सुविधयें जैसे बिजली, स्वास्थ्य मुहैया कराई गई हैं। कुछ खत्ते जैसे बिन्दुखत्ता तो शहर का रूप ले चुके हैं और यहाँ के लोग खुद को राजस्व ग्राम अथवा नगरीय क्षेत्रा घोषित करने के लिए आन्दोलनरत हैं।
खत्ते सरकारों के लिए एक चुनौती भी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर ये वन भूमि पर अवैध् कब्जे हैं वहीं यहाँ वन उपज की अवैध् तस्करी, वन्यजीव अपराध्, अवैध् लकड़ी कटान जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। पिछले दशकों में तो कुछ खत्ते नक्सली गतिविधियों के लिए भी समाचारों में रहे।
खत्तों का एक मानवीय पहलू भी है। यहाँ के निवासी आज स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। दशकों तक सरकार द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के पश्चात इनके पूर्वज यहाँ बसे थे। दशकों तक इनके द्वारा चराई;राजस्व भी दिया गया। पीढ़ियों की मेहनत लग गई घर बनाने व खेती योग्य जमीन तैयार करने में, परन्तु इनकी पहचान आज भी अवैध् है। अवैध् कब्जों में आने के कारण इन क्षेत्रों में न तो अवस्थापना विकास हो पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन। फलस्वरूप मनरेगा, विधायक या सांसद निधि का व्यय इन क्षेत्रों में नहीं हो पाता और यह क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। गरीबी व पिछड़ेपन ने भी इन खत्तों को अपनी जकड़ में बनाये रखा है तथा यहाँ के निवासी अपना घरबार व आजीविका खोने के डर से भयभीत रहते हैं। अवैध् कब्जों की श्रेणी में आने वाले ये निवास स्थान अपने भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए चिन्तारत हैं।
हमें खत्तों के मानवीय पहलुओं को समझना होगा। यहाँ के मुद्दे अलग हैं। पर्यावरण एवं वनों के स्तर पर एक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सोच आवश्यक है परन्तु खत्तों/गोठों/झालों को स्थानीय नजरिये से देखना होगा। इनके निवासी हमारे अपने लोग हैं। पिछड़े व गरीब इन गाँवों के बारे में बुद्धिजीवी वर्ग, प्रशासन को गहन चिन्तन की आवश्यकता है ताकि इस विषय को समय रहते सुुलझा लिया जाये।
लेखक- उपजिलाधिकारी पूर्णागिरी, टनकपुर जनपद चम्पावत। टनकपुर भाबर भी खत्तों से घिरा क्षेत्र है। हिमाँशु कफल्टिया हिमाँशु कफल्टिया
खत्ते, गोठ अथवा झाले उत्तराखण्ड के परिदृश्य में समय-समय पर चर्चाओं में आते रहते हैं। कभी वन भूमि पर अवैध् कब्जे के तौर पर तो कभी वन उपज की तस्करी या फिर खुद को राजस्व ग्राम घोषित करने हेतु आन्दोलन। ये खत्ते समाचार पत्रों का हिस्सा बने ही रहते हैं। खत्ते जिन्हें गोठ अथवा झाले के नाम से भी जाना जाता है वह वन ग्राम हैं जो वन भूमि पर बसे हैं एवं सरकार की नजरों में अवैध् कब्जे हैं। बिन्दुखत्ता, गैण्डीखत्ता, छीनीगोठ गढ़ीगोठ, भैंसाझाला कुछ उदारहण हैं। इन गाँवों में वन गुज्जरों के अलावा कई अन्य लोग जो मुख्यतः पहाड़ के लोग हैं निवास करते हैं।
खत्तों का अपना एक इतिहास रहा है। राज्य की तराई-भाबर कापफी उपजाउ भूमि है परन्तु यहाँ गर्मी और उमस भरा मौसम, खतरनाक जंगली जानवर, मच्छर जनित मलेरिया एवं अन्य बीमारियों के कारण यह क्षेत्रा कभी भी पहाड़ी लोगोें द्वारा रहने योग्य नहीं माना गया। कत्यूरों, चन्दों व गढ़वाल के पवारों के शासन काल में भी यहाँ बसावटें म ही थी। थारू एवं बुक्सा जनजाति ही यहाँ के स्थाई निवासी थे तथा पहाड़ से लोग केवल शीत ट्टतु में ही कड़ाके की ठण्ड से बचने एवं जानवरों के लिए चारागाह ढूंढने आते थे।
जिन स्थानों पर पहाड़ के लोग शीत ट्टतु में अपने जानवरों समेत डेरा डालते थे उसे खत्ता/गोठ अथवा झाला के नाम से जाना गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने तराई-भाबर की उपजाउ जमीन के महत्व को समझा व यह माना कि यह क्षेत्रा राजस्व वृद्धि जो कि उनका एकमात्र ध्येय था, हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर अंग्रेजी शासन द्वारा इस क्षेत्रा में कृषि विकास हेतु नहरों, मार्गों एवं बांधें का निर्माण किया वहीं उनके द्वारा पहाड़ के लोगों को इन क्षेत्रा में स्थाई तौर पर बसाने के लिए भी प्रोत्साहित किया लेकिन उनकी ये कोशिशें कम ही रंग लाई तथा पहाड़ के लोगों का अस्थाई तौर पर आना-जाना बना रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में एक बार फिर पहाड़ के लोगों को यहाँ स्थाई तौर पर बसाने हेतु आमंत्रित किया गया। अब परिस्थितियाँ भी बदलने लगी, जहाँ एक ओर क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा था वहीं भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा विपरीत परिस्थितियांे के मध्य मेहनत कर इस उपजाउफ जमीन को तरासा। पन्तनगर में कृषि विश्वविद्यालय, तराई बीज कार्पोरेशन की स्थापना और अवस्थापना जैसे विकास के लिये उठाये गये कदमों ने इस क्षेत्रा को भारत की हरित क्रान्ति का जनक बना दिया।
बदली हुई परिस्थितियों में धीरे-धीरे पहाड़ के लोगों ने खत्तोे में स्थाई तौर पर निवास करना शुरु किया। पहले कुछ परिवार बसे और शनैः-शनै- खत्तों की बसावटें बढ़ती चली गई। जहाँ पहले पहाड़ एक आकर्षण था वहीं अब विकास की बदली हवा ने मैदान को आकर्षण बना दिया। खत्ते सस्ती जमीन और अपने लोगोें की जगह माने गये और अधिक से अधिक लोग यहाँ बसते चले गये।
खत्ते सरकारों/राज्यों के लिए राजस्व का स्रोत भी बने रहे। चन्द शसकों के समय चरवाहों से राजस्व लिया जाता था। रुहेलों व अंग्रेजों द्वारा भी लगान लिया गया। आजादी के पश्चात भी राजस्व जिसे चराई कहा जाता था, की वसूली जारी रही।
इस बीच परिदृश्य फिर र बदलने लगा। 1970 के दशक और उसके पश्चात वन एवं पर्यावरण कानूनों में बड़ा परिवर्तन आया। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कड़े वन एवं पर्यावरण संधियों व कानून बनाये गये। इस बीच संरक्षित वनों व आरक्षित वनों में भी वृद्धि हुई। तराई-भाबर में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क, कार्बेट बाघ रिजर्व, राजाजी, नन्धैर अभ्यारण इत्यादि बनाये गये और अधिकतर खत्ते/गोठ/झाले इनकी सीमाओं में आ गये। आज भी खत्ते/गोठों में रहने वाले परिवारों के पास उस समय की चराई;लगान की रसीदें व खसरे मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि दशकों तक राजस्व दिये जाने के बाद इन खत्तों को संरक्षित वन अथवा आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। जिन लोगोें ने सदियों से बड़ी मशक्कत के पश्चात इन क्षेत्रों को बसाया था, अचानक से उनके निवास स्थान अवैध् कब्जे की श्रेणी में आ गये और यहीं से शुरु हुआ खत्ते में रहने वालों का संघर्ष।
आज इन खत्तांे/गोठों में कई परिवार निवास करते हैं। उन्होंने दशकों की मेहनत से पक्के मकान बना लिये हैं तथा कई पीढ़ियों से यहाँ खेती करते आ रहे हैं। सरकार द्वारा भी कुछ सुविधयें जैसे बिजली, स्वास्थ्य मुहैया कराई गई हैं। कुछ खत्ते जैसे बिन्दुखत्ता तो शहर का रूप ले चुके हैं और यहाँ के लोग खुद को राजस्व ग्राम अथवा नगरीय क्षेत्रा घोषित करने के लिए आन्दोलनरत हैं।
खत्ते सरकारों के लिए एक चुनौती भी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर ये वन भूमि पर अवैध् कब्जे हैं वहीं यहाँ वन उपज की अवैध् तस्करी, वन्यजीव अपराध्, अवैध् लकड़ी कटान जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। पिछले दशकों में तो कुछ खत्ते नक्सली गतिविधियों के लिए भी समाचारों में रहे।
खत्तों का एक मानवीय पहलू भी है। यहाँ के निवासी आज स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। दशकों तक सरकार द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के पश्चात इनके पूर्वज यहाँ बसे थे। दशकों तक इनके द्वारा चराई;राजस्व भी दिया गया। पीढ़ियों की मेहनत लग गई घर बनाने व खेती योग्य जमीन तैयार करने में, परन्तु इनकी पहचान आज भी अवैध् है। अवैध् कब्जों में आने के कारण इन क्षेत्रों में न तो अवस्थापना विकास हो पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन। फलस्वरूप मनरेगा, विधायक या सांसद निधि का व्यय इन क्षेत्रों में नहीं हो पाता और यह क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। गरीबी व पिछड़ेपन ने भी इन खत्तों को अपनी जकड़ में बनाये रखा है तथा यहाँ के निवासी अपना घरबार व आजीविका खोने के डर से भयभीत रहते हैं। अवैध् कब्जों की श्रेणी में आने वाले ये निवास स्थान अपने भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए चिन्तारत हैं।
हमें खत्तों के मानवीय पहलुओं को समझना होगा। यहाँ के मुद्दे अलग हैं। पर्यावरण एवं वनों के स्तर पर एक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सोच आवश्यक है परन्तु खत्तों/गोठों/झालों को स्थानीय नजरिये से देखना होगा। इनके निवासी हमारे अपने लोग हैं। पिछड़े व गरीब इन गाँवों के बारे में बुद्धिजीवी वर्ग, प्रशासन को गहन चिन्तन की आवश्यकता है ताकि इस विषय को समय रहते सुुलझा लिया जाये।
लेखक- उपजिलाधिकारी पूर्णागिरी, टनकपुर जनपद चम्पावत।
टनकपुर भाबर भी खत्तों से घिरा क्षेत्र है।

पाटी विकासखण्ड में पर्यटन की अपार संभावनाएं

सूरज लडवाल
चम्पावत – जिला अंतर्गत पाटी विकासखण्ड में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं । लेकिन सरकार द्वारा अब तक विकासखण्ड के कई पर्यटन संभावित क्षेत्रों में कोई भी सकारात्मक पहल नहीं की गई है । जिससे खुद की अलग पहचान बनाने की संभावनाओं वाला ये क्षेत्र लगातार पिछड़ता जा रहा है । गातव्य हो कि ब्लॉक मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूरी पर कूँण गाँव में बाँज के जंगलों से घिरी पहाड़ी में स्थित जैचम निर्मांसी का मन्दिर स्वयं में एक पर्यटक स्थल है । जिसे मन्दिर में बीते दशकों से रह रहे महात्मा ने एक रमणीक स्थल बनाने में मुख्य व अहम योगदान दिया है । बताते चलें कि चोटी पर स्थित इस मन्दिर से आस – पास का समूचा क्षेत्र दिखाई देता है । शाम के वक्त मन्दिर से आसपास की पहाड़ियों का दिखाई देने वाला अनूठा नजारा मन को शान्ति प्रदान करने वाला तो होता ही है इसके अलावा मंद हवाओं के बीच प्रकृति की गोद में बैठकर इन नजारों को देखना सांसारिक थकान को भी दूर करता है । और आसपास के इलाके से इस पहाड़ी का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है । यह क्षेत्र सुबह हल्के कोहरे से ढका रहता है , तो दोपहर में साफ मौसम के साथ पहाड़ी के ऊपर बादल मंडराते नजर आते हैं । और सूर्य ढलने के बाद शाम के वक्त अगर कोई इस दृश्य को देखता है तो फोटोग्राफी करने से खुद को नहीं रोक पाता है । शाम के वक्त आसमान में हल्की लालिमा लिए बादलों का जमावड़ा पहाड़ी को और भी खूबसूरत बना देता है । और ये लालिमा सूर्य ढलने के काफी देर रात होने तक दिखाई देती है । इसके साथ – साथ पास में ही कणकश्वेर त्रिवेणी के समीप रौलमेल में देवदार वनी के बीच स्थित शिव मन्दिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है । लेकिन सरकार की उदासीनता के चलते इन ऐतिहासिक , पौराणिक व सुरम्य स्थानों पर विकासकार्य ठप नजर आ रहे हैं । इन पर्यटन संभावित स्थानों में विकास के नाम पर जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनावों में नजर आते हैं । जानकारों के मुताबिक अगर सरकार इन स्थानों पर पर्यटन को विकसित करने के लिए कदम उठाती है तो ये स्थान बहुत जल्दी बेहतरीन पर्यटन स्थलों की सूची में शुमार हो जायेंगे ।
( सूर्य ढलने के बाद दिखाई देने वाला जैचम पहाड़ी का मनोरम दृश्य – छाया व विवरण सूरज लडवाल )

युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं उद्द्यान अधिकारी

युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं उद्द्यान अधिकारी

सूरज लडवाल
चम्पावत – जिला अन्तर्गत पाटी ब्लॉक के देवीधुरा उद्द्यान विभाग में कार्यरत उद्द्यान अधिकारी प्रदीप पचौली क्षेत्र के युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं । जहाँ एक ओर क्षेत्रीय लोग जंगली जानवरों से परेशान होकर कृषि से मुँह मोड़ते नजर आ रहे हैं तो दूसरी ओर प्रदीप पचौली आलू , अरबी , पिनालू , बैंगन , शिमला , टमाटर , फूलों की खेती व बागवानी कर रहे हैं । और सोसल मीडिया के माध्यम से जानकारी व फ़ोटो शेयर कर लोगों को खेती और बागवानी करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं । तमाम लोग पचौली की खेती के प्रति लगन की सराहना कर रहे हैं । औऱ क्षेत्र के तमाम लोग उनके मार्गदर्शन में खेती औऱ बागवानी भी करने लगे हैं । उद्द्यान अधिकारी से जानकारियां और मार्गदर्शन लेते हुए अनेक क्षेत्रीय लोगों ने कृषि औऱ बागवानी को अपनी आमदनी का जरिया बना लिया है । बताते चलें कि प्रदीप पचौली की जानकारियां साझा करने की इस आदत के चलते क्षेत्रीय लोग उनके ऑफिस जाकर उनसे जानकारी प्राप्त करने लगे हैं । कई बार तो उन्हें ऑफिस जाते समय किसानों को जानकारी देते हुए भी देखा गया है । बीच रास्ते में गाड़ी से उतरकर किसानों को जानकारी देने की यह आदत उनकी कार्यप्रणाली में चार चाँद लगाती है । बातचीत के दौरान प्रदीप पचौली ने कहा अगर हम खेती करेंगे तो खेती को जंगली जानवर खाएँगे ही । इसका मतलब ये नहीं कि गिरने के डर से चलना ही छोड़ दिया जाय । हाँ बस हमें अगली बार थोड़ा संभलकर चलने की आदत डालनी होगी । हाल ही में उनके द्वारा सोसल मीडिया में अरबी की खेती की फ़ोटो के साथ शेयर की गई पंक्तियाँ खूब सराही जा रही हैं । जिसमें उन्होंने खेती करने के साथ – साथ उसकी रखवाली पर भी जोर दिया गया है ।

घरै की लौकी घरै क आलू
घरै क आद ( अदरक ) और घर क पिनालू
के बानर खाल , के सुगर पचाल,
जी बचलो उ हमार काम आलो l
क़े न हुन क़े न हुन कै बैर
इन गड़ (खेत ) भीड़ि बठे ,
तरीके ले करला त बहुत कुछ है जालो
थोड़ तुम पौर (रखवाली ) करा
थोड़ भगवान सहयोग कराल l

इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने खेती की रखवाली और खेती से जुड़े रहने की बात कही है । जो आधुनिक पीढ़ी के लिए काफी प्रेरणादायी है । प्रवासी लोगों को उनने खेती और बागवानी के प्रति जागरूक करते हुए लाभप्रद योजनाओं व जानकारियों के लिए संपर्क करने की बात भी कही ।