पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
चन्दन सिंह रावत से बातचीज डॉ. पंकज उप्रेती बात और चीजों को समझना भी कुशलता है। समझने का फेर तकलीफ देता है। कई बार अवरोध् दिखने वाली बातें हमारे विकास में सहायक होती हैं। विकास और विनास का यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार के तर्कों से जूझते हुए अपना रास्ता बनाने वाले तेजम के चन्दन सिंह रावत से आज की खास बातचीज है। जिसमें वह थल-मुनस्यारी मुख्य मार्ग पर स्थित ‘तेजम’ सहित रोचक जानकारियों से अवगत करा रहे हैं। इससे पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम में एक हुए खड़क सिंह रावत। अपने जमाने के इण्डो-तिब्बत व्यापार के प्रमुख व्यक्तियों में थे। गीता, रामायण का ज्ञान और उसका वाचन करने वाले खड़क सिंह जी वैद्यगिरी भी कर लेते थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापार का जमाना था और बताते हैं तब दिल्ली में कहीं इनका सम्पर्क था जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। स्थानीय स्तर पर भी जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। र्ध्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में देवराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- प्रहलाद सिंह और चन्द्रमोहन सिंह। प्रहलाद सिंह के सुपुत्र हुए- चन्दन सिंह, डॉ. प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह और ईश्वर सिंह। इसी प्रकार चन्द्रमोहन रावत जी के हुए गजेन्द्र सिंह और गम्भीर सिंह रावत। श्री चन्दन सिंह रावत का जन्म 1952 में मिलम में हुआ। साकेत कालोनी हल्द्वानी में निवासरत श्री रावत और श्रीमती जमुना रावत की विवाहित सुपुत्री दीपिका और नीलिमा के अलावा सुपुत्र- नगेन्द्र रावत हैं। मिलम में जन्मे श्री चन्दन सिंह बताते हैं सन् 1961 तक तो माइग्रेशन स्कूल व्यवस्था में पढ़ाई की व्यवस्था थी। जोहार घाटी में कक्षा 5 तक ही माइग्रेशन वाले स्कूल सीमित थे। घरों की तरह ही स्कूल भवन भी पक्के पत्थरों के बने थे, जोहार घाटी की कई विभूतियां इन्हीं स्कूलों की देन हैं। बाद में तेजम में सरकारी प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल खुले उसमें लम्बे समय तक घास के छप्पर वाली छत थी, जिसमें कक्षाओं का संचालन होता था। उन झोपड़ियों में ही कुर्सी-मेज सब होता। बकायदा टीचर्स क्वार्टर भी बने थे। समर्पित गुरुजनों की देखरेख में सबको अवसर मिले। स्कूल बहुत कम थे और प्राइमरी परीक्षा का सेन्टर भैंसकोट था जबकि कक्षा आठ बोर्ड का सेन्टर बेरीनाग में हुआ करता था। हम साथी लोग मिलकर मनकोट में कमरा लेकर रहते और अपने गांव से ही खाना बनाने वाले साथी भी साथ ही ले जाते थे। चन्दन सिंह जी के पढ़ाई का सिलसिला तेजम, मुनस्यारी और पिफर अल्मोड़ा डिग्री कालेज रहा। इनके माइग्रेशन के गाँव का विवरण इस प्रकार है- मल्ला जोहार क्षेत्रा में मिलम, बार्डर पास, फिर मुनस्यारी क्षेत्र में जलथ, उसके बाद तल्ला जोहार की घाटियां। तेजम जहाँ 1962 के बाद स्थाई तौर पर रहना पड़ा। स्थाई तौर पर तेजम आने वाले परिवार जो प्रकृति से जुड़े थे, अतीत की कई चीजें खोई तो कई चीजें प्राप्त कीं। आज भी इनके जेहन में अपनी संस्कृति के वह दिन बसे हैं। वह बताते हैं भारत-चीन युद्ध के बाद हालात बदलने लगे। तब तक तेजम तक ही गाड़ी आती थी। चायना वार के बाद 1964 के आसपास तेजम प्रमुख केन्द्र था। उस समय के हिसाब से इसका बाजार भी था और मुनस्यारी व दूरस्थ क्षेत्र से जिसने भी मोटरवाहन से यात्रा करनी होती वह तेजम आकर रुकता। इससे पहले गाड़ी रुकने का स्टेशन थल और शामा में रहा। चायना हमले के बाद रास्ते बनने लगे, रोड कटिंग में समय लगा। रावत जी बताते हैं- पहले जमीदारी प्रथा में हमारी काफी भूमि थी और भूमि जोतने वाले ‘अधेली’ यानी फसल का हिस्सा उनके पास पहुंचा जाते थे। बचपन में देखा है- पीठ में लादकर या घोड़े के द्वारा अनाज घर तक पहुंचता था। जमीदारी उन्मूलन में भूमि चली गई। एक ओर युद्ध में व्यापार थम गया और जमीदारी उन्मूलन में भूमि छिन गई तो स्थिति डामाडोल हो गई। तब तक पढ़ाई करने वाले भी व्यापार में ही अपना समय लगाते थे। सन् 1967 में जब क्षेत्र के लोगों को भोटिया जनजाति घोषित किया गया तो परिस्थिति देखते हुए नौकरी के हिसाब से पढ़ने लगे। उन दिनों में तो किसी प्रकार की जानकारी भी नहीं मिल पाती थी। कोई साथी बाहर जाकर सुनता कि अमुक जगह भर्ती है या पद रिक्त है तो एक-दूसरे को बताते थे। अल्मोड़ा से बीएससी, एम.ए.अर्थशास्त्र के अलावा बीएड करने वाले चन्दन सिंह जी ने 1975 में बैंकिंग सेवा शुरु की। स्टेट बैंक बागेश्वर में प्रथम नियुक्ति के बाद जुलाई 2012 में मैनेजर के रूप में हल्द्वानी से सेवानिवृत्त होकर अपने परिवार के साथ समय व्यतीत कर रहे हैं। श्री रावत सेवानिवृत्त होने के बाद उत्तराखण्ड ग्रामीण बैंक हल्द्वानी में 5 साल वित्तीय जागरूकता केन्द्र भी अपनी सेवाएं देते रहे। इससे सम्बन्ध्ति जानकरी व जागरुकता के लेख पिघलता हिमालय में उनके द्वारा प्रकाशित करवाए जाते थे। समाज में चल रही उथल-पुथल को बारीकी से जानने वाले रावत जी अपने बचपन के दिनों से तुलना करते हैं- तेजम में बचपन के खेल कंचे, कबड्डी, गिल्लीडंडा था। गर्मियों में साथियों संग जाबुका नदी में जी भर तैरना फिर कुछ देर के लिये किनारे पत्थर, रेते पर बैठ कर ध्ूप का आनन्द लेने की प्रक्रिया ये आज भी हम सभी पुराने साथियों को रोमांचित कर जाता है। प्रकृति के साथ रमने वाले कई अच्छे तैराक भी बने। वह कहते हैं- जिन बातों को आज परेशानी के रूप में देखा व समझा जा रहा है वह तो आदत में सुमार था। परिस्थितियों के अनुसार बच्चे-बूढ़े अपने समय को जी रहे थे। ये हमारे समझने का पफेर है। क्योंकि जिन्होंने परेशानी नहीं देखी होती है वह कठिन समय में घबरा जाते हैं। समय के साथ बदलाव होता चला जाएगा लेकिन असली धर उसी में होगी जो ईमानदार होगा। सचमुच प्रकृति के संघर्षों को उत्सव रूप में देख चुके रावत जी और इनके जैसे और भी सज्जन हैं, इनकी क्षमता और देशभक्ति की भावना का सकारात्मक प्रभाव समाज में हमेशा रहता है।
नेत्र सिंह गनघरिया से बातचीज डॉ. पंकज उप्रेती अपनी संस्कृति को बचाने के लिये केवल जमावड़ा करना पर्याप्त नहीं है, इसके लिए जागरूकता ही उपाय है। जागरूकता से ही संस्कृति बचती है। इसी धारणा के साथ चिन्तन-मनन और व्यवहार में लाने वाले डॉ.नेत्र सिंह गनघरिया के साथ बातचीत पर आधारित है पिघलता हिमालय का यह अंक। बातचीत में रोचक जानकारियों से पहले श्रीमान गनघरिया के बारे में जान लेते हैं- इतिहास बताता है कि गढ़वाल से इनकी आवत हुई। इनके पूर्वज कुंवर राजपूत थे। परगना सगरी ग्राम बधान में रहने वाले वाले धनु के दो लड़के माछू और धौलिया जो नन्दादेवी के उपासक थे। दोनों रहते हुए पूजा-पाठ में रत रहते थे लेकिन एक व्यक्ति उन्हें बराबर व्यवधान करता था, उनकी पूजा में बिघ्न करता। ऐसे में उन कुंवर भाईयों ने धनुष उठाया और उसे मार डाला। पकड़े जाने भय से राजा बाजबहादुर के समय यह भाई जोहार घाटी के मिलम में आ गए। मिलम में रहते हुए कुछ समय ही इन्हें हुआ था, मिलम वासियों ने कहा- आप पांछू जाकर रहो। इसके बाद एक भाई धौलिया बिल्जू गया जिन्हें ‘दास्पा’ और एक भाई गनघर गया जिन्हें ‘गनघरिया’ कहा गया। स्थान के अनुसार कुल नाम हुआ करता था। ब्रिटिश काल में कुमाउं के द्वितीय कमिश्नर विलयम ट्रेल जब अपने दौरे में इस सीमान्त क्षेत्र में आए तो उन्होंने गनघर को आबाद करने के लिये प्रोत्साहित किया। मौसम के हिसाब से माइग्रेसन करने वाले परिवार ने गनघर, घोरपट्टा और थाला में अपने रहने की व्यवस्था की। चौकोड़ी से काण्डा-बागेश्वर जाते समय हुदुमधार के पास है- थाला। पहाड़ के पीछे ढलान पर यह ग्राम गनघरिया परिवारों ने अपने लिये उपयुक्त माना और यात्रा पर निकलते समय अपने जानवरों के साथ यहीं डेरा डालने लगे। और अक्टूबर माह से मार्च तक थाला में रहने लगे। थाला में अभी हाल भी कुछ परिवार रहते हैं। गनघरियाओं के इसी कुनबे में एक हुए- हरमल सिंह। इनके पुत्र हुए- बाला सिंह, कुन्दन सिंह, विशन सिंह, महिमन सिंह और गोकर्ण सिंह। परिवार की शाखाएं काफी फैली हैं। फिर बाला सिंह के सुपुत्र हुए- नेत्र सिंह और राजेन्द्र सिंह। इनकी अगली पीढ़ी की बात करें तो डॉ.नेत्रसिंह के पुत्र- सुजीत और पुत्री नीता हैं जबकि श्रीमान राजेन्द्र सिंह की पुत्रियां किरन, पूजा और पुत्र पंकज सिंह हैं। पारिवारिक तानेबाने के बाद डाक्टर गनघरिया साहब के बचपन की ओर झांके तो पता चलता है 22 दिसम्बर 1950 को थाला में इनका जन्म हुआ। पधानचारी के परिवार में जन्म लेने वाले नेत्र सिंह, राजेन्द्र सिंह का लालन-पालन साधारण पृष्ठभूमि में हुआ। बचपन की पढ़ाई कमेड़ीदेवी से करने के बाद यह मुनस्यारी चले गये। बचपन के दिनों को याद करते हुए नेत्र सिंह जी बताते हैं- पढ़ने के साथ पाटी लेकर जाते और पाटी में घोटा लगाते हुए उसे दूसरे साथियों की पाटी से ज्यादा चमकदार बनाने का सब साथियों के लिये अनमोल क्षण होता। विद्यालय में छुट्टी से पहले गिनती, पहाड़े जोर-जोर से समूह में पढ़ते, जो सबको याद हो जाता। मुनस्यारी इण्टर कालेज के बाद अल्मोड़ा से बीएससी इन्होंने की और एमएससी करने नैनीताल चले गये। इस बीच कानपुर में एमबीबीएस करने के बाद पैरामिलीट्री फोर्स, बीएसएपफ में चिकित्साधिकारी, सहायक कमाण्डेंट के पद पर इनका चयन हुआ लेकिन अपनी उन मीठी यादों के साथ हमेशा अपने संस्कारों में बंध्े रहे। इन्होंने 31 साल तक फौजी परिवेश में विभिन्न जगहों, पदों पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा एवं सफलता पूर्वक निर्वहन किया। इसके लिये इन्हें 26 जनवरी 2003 में राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। झेमू हरपाल राठ में गोविन्द सिंह पांगती की सुपुत्री तारा देवी से इनका विवाह हुआ। श्रीमती तारा भी सांगीतिक और साहित्यक अभिरुचि रखती हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डॉ. एन.एस.गनघरिया को बीएसएफ ग्वालियर की अकादमी में कम्पोजित अस्पताल में सेवा का अवसर मिला। पूर्वात्तर में अरुणाचल, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम सहित तमाम जगह इन्हें सेवा के दौरान जाने का अवसर मिला। बांग्लादेश सीमापर पर सिलचर में इनकी पहली पोस्टिंग रही। अपनी पूरी सेवा में उत्कृष्ट कार्यों के बाद जनवरी 2011 में सी.आई.एस.एफ. के निदेशक मेडिकल के पद से सेवानिवृत्त होकर इन्होंने हल्द्वानी में अपने परिवार के साथ रहना तय किया और जिस स्थान पर यह रहते हैं उसे हिमालय कालौनी के नाम से जाना जाता है। अपनी कालौनी को व्यवस्थित रूप देने से लेकर अपने मूल ग्राम तक की स्थितियों पर चिन्तनशील रहने वाले एन.एस.गनघरिया कहते हैं- ‘हमारा ग्राम गनघर नैसर्गिक सुन्दरता से परिपूर्ण है। इसके उत्तर पश्चिम में नन्दादेवी है। वहीं पास पांछू गाढ़ का मनोरम दृश्य दिखता है। दक्षिण में मापा और पूर्व में बिल्जू ग्राम है। प्राकृतिक रूप से इसकी सीमाएं निर्धारित हैं। अब बुर्फू से गनघर ग्राम तक प्रधानमंत्रा ग्रामीण सड़क योजना के अन्तर्गत सड़क बन रही है। अब मुनस्यारी से गनघर जाना आसान हो जाएगा। अपनी पुरानी यादों का जोरदार किस्सा वह बताते हैं- ‘‘तिब्बत से आने वाले हुणिया मित्रों का दल आ रहा था और हम लोग गनघर से देख रहे थे, पाछू गाड़ पर अस्थायी पुल से हुनिया लोग अपने हुनकारा के साथ आ रहे थे अचानक एक भेड़ ने पाछू गाड़ छलांग लगा दी, उसके बाद एक के बाद एक भेड़ छलांग लगाने लगे। गनघर से गये युवकों ने नदी में डूब चुकी भेड़ों को निकाला।’ गनघर और अपने बुजुर्गों से जुड़ी यादों को चिरस्थाई रखने के लिये इन्होंने हाल ही में माँ नन्दादेवी गनघर धार्मिक ट्रस्ट को बनाया है। इसका उद्देश्य अपनों को जोड़ने की पहल सहित पर्यावरण संरक्षण है। गनघर में नाग मन्दिर भी है जहाँ नाग देवता को पूजा जाता है। गोरखनाथ मन्दिर सहित स्थानीय शक्तियों के मन्दिर हैं। समय के साथ बदलाव होता रहता है लेकिन समय के साथ अपनी धरोहरों को बचाए रखने की शानदार पहल करने वाले डॉ.गनघरिया अपने काज में सपफल हों यही कामना है।
वर्तमान समय में जोहार घाटी के तिब्बत व्यापार तक जाने वाले लोगों की गिनती अंगुली में की जा सकती हैं. घाटी की चहल-पहल, प्रत्येक गाँव से तिब्बत जाने वाले छोटे- बड़े व्यापारीयों को लोग गाँव से वलकिया (गाजे-बाजे के साथ स्वागत ) कुछ दूर तक जाकर विदा करते थे. यहाँ के व्यापारी भी अन्य घाटी यों की व्यापारीयों की तरह हिमालय के वार-पार क्षेत्रों मे दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की आपूर्ति करते थे. तिब्बत व्यापार के लिए माल वाहक के कार्य भेड़-बकरी,घोड़े-खच्चर, जूबू,, चौंर (याक) ही प्रमुखतया थे.निर्यात- कपड़ा, अनाज, किराना सामान, भेली (गुड़) वस्तु विनमय के अतिरिक्त नगद धनराशि देकर भी किया जाता था. मंडी तथा मित्र तक पहुचाकर वस्तु विनमय का व्यापार प्रमुखतया था. आयात- नमक, ऊन, सोना- सूहागा, चंवर पूंछ आदि किया जाता था.व्यापार का इतिहास पुराणों में भी तंगण-पतंगण के उल्लेख के रूप में देखी जा सकती हैं. चीन द्वारा तिब्बत राज्य पर अपना अधिपत्य के चलते सन् 1962 में शौकाओ के सदीयों से चलती आ रही व्यापार पर विराम लग चुका था तभी से जोहार के समृद्धशाली इतिहास तथा जोहार के बर्बादी की कहानी लिखना प्रारंभ हो गया था. जोहार के शौकाओं को भारत तिब्बत एजेंट गरतोक द्वारा 1955 में व्यापार करने की अनुमति मिलने के पश्चात अपने युवा काल 19 वर्ष के उम्र में श्री भीम सिंह बृजवाल जी तिब्बत व्यापार जाने हेतु उत्सुक, अपने हम उम्र साथी लछम सिंह बृजवाल, रतन सिंह बृजवाल,बड़े भाई प्रेम सिंह बृजवाल के साथ अपने पिता जसौद सिंह बृजवाल के आज्ञा से तिब्बत जाने के लिए तैयार हो गये. जो आज नब्बे बंसत पार कर चुके अपनी मुह जबानी बताते हैं. बिल्जू ग्राम से व्यापारी दल को गाँव के लोग वलकिया (गाजे-बाजे से स्वागत) कर गाँव से कुछ दूर तक विदा करते थे. हम भी उसी तरह विदा हुए, हम केवल घोड़ा-खच्चर में जौं, उवा लेकर एक याक (चंवर) याक के साथ तिब्बत यात पर थे. सबसे आगे याक तथा उसकी विशिष्ट विशेषता, कुदरत की देन यह जानवर चलते समय रूकने का नाम नहीं लेता है्.आगे- आगे मार्ग दर्शक का काम कर रही थी.पहला पडाव दुंग नामक स्थान पर रहा.कठिन कंकड़-पत्धर, पथरिली, बर्फ के रास्ते भी अति कठिनाइयों भरा राह भी सुखद अनुभूति ही करा रही थी. जो उनका प्रथम व अंतिम यात्रा थी. तीन धूरा (चोटी) जहाँ जान गंवाने में भी देर नही लगती थी. ऊंटाधूरा, जयंती, किंगरी-बिगंरी जिसे किसी भी रूप में एक दिन में पार करना अनिवार्य था. जिसे हम डेथ पांइट भी कह सकते है. एक ही दिन में पार कर लिया गया, उसी बीच गंग पानी से किंगरी-बिगंरी , दुंग, छिरतिंग, चिलमता, मानीथंगा, खिमलिंग, गुरगम, मिसर, बम्बाडोल ज्ञानिमा तक रास्ते, पडाव दुर्गम,बफीले रास्ते जहाँ चलते काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. जहाँ भेड- बकरियाँ का बर्फ में डुबने तक की स्थिति आ सकती थी. किंतु हमारे पास सिर्फ घोड़े,खच्चर ही थे.बस अंतिम चोटी किंगरी-बिगंरी पहुचकर कैलाश पर्वत दर्शन का मनोरम दृश्य दृष्टिगत नज़र आने लगी. सभी गर्खाओं के मित्र की तरह बृजवालों के मित्र खिमलिंग स्थान पर डेरा डाले थे.चंवर गाय के बालों से बनाया तम्बू जिसमें अत्यधिक गरम रहता था. वहाँ बौद्ध मठ (गुम्फा) का दर्शन व पूजा- पाठ करके आगे का रास्ता भी तय किया गया. रास्ते में हमें अन्य गर्खा(जाति) के लोग जोहार के समाजसेवी व्यक्ति धरम राय के बड़े सुपुत्र बाला सिंह पांगती, हयात सिंह पांगती, उन्हीं के साथ साथ उमेद सिंह निखुर्पा भी मिल गये थे. तिरछापुरी,सिसर से दायीं तरफ की ओर बगल में हमें अपने मित्र मिल गये थे. जिन्होने चंवर गायों के बालों से बने मोटे तम्बू बनाकर डेरा डाला था. जो हमारा ही इंतजार कर रहे थे.ज्ञानिमा मंडी में पहले से पिताजी जसौद सिह, दीवान, सिंह तथा गोबर्धन सिंह,(बड़ा व्यापारी)जसवंत सिंह, जगत सिंह,(सेठ) मोहन सिंह धूरा वाले अपनी दुकान सजाऐ बैठे थे. दोनों ओर से मित्रजनों का मिलन स्यो-ढोक (प्रणाम) का आदान-प्रदान के बाद थोड़ी देर आराम करने के पश्चात हुनिया मित्र द्वारा आवाभगत में समक्ष सभी के लिए थाली में पकाया हुनकारा भेड़ का गोस्त व सत्तू परोसा था, हम सभी ने सहर्ष स्वीकार कर ग्रहण किया. अपने मित्र साथियों से मिलकर हम सभी ने तिब्बती बकरी हुनकारा,से बाल उतारने में सहयोग भी किया, 120 बिल्ची तैयार कर रूपये ढ़ाई (2=5०) की दर से नगद खरीदा था. दो- तीन दिन ठहरने के पश्चात जब घर वापसी की सोच रहे थे तभी तीन दिन भारी बर्फबारी के कारण यही रूकना पड़ा. ज्ञानिमा व्यापारी मंडी में याक का आराम दायक आंनदित सवारी, घुमते- फिरते रहना जिसकी यादें भुले नहीं भुलाया जा सकता है,कुछ दिन रूकने के पश्चात अपने गाँव बिल्जू वापसी हुई.जोहार से तिब्बत आने -जाने में लगभग आठ-दस दिन का समय अवश्य लगता है. श्री भीम सिंह बृजवाल जी से उनके तिब्बत यात्रा के विषय में बातचीत, जिक्र करने पर भावुक हो जाते है, वे तिब्बत यात्रा की सुखद अनुभूति को संजोये रखना, कभी भूलना नही चाहते हैं.आज वे स्वयं सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त है तथा दोनों सुपुत्र श्री गिरीश सिंह व श्री प्रकाश सिंह बृजवाल जी अच्छे सरकारी नौकरी पेशा उच्च ओहदे पद पर आसीन है.शहरों में निवास करते है.किंतु भीम सिंह बृजवाल जी का पैतृक भूमि प्रेम, पुरखों के विरासत को खोना किसी प्रकार से नागवार है.शहर का जीवन उन्हें रास नहीं आता है वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी देबी बृजवाल संग पुंगराव घाटी के फ्लांटी गाँव में रहते है इसी घाटी में एक और बुजुर्ग व्यक्ति श्री नारायण सिंह बृजवाल जी भी ग्राम मुसरिया में भी रहकर अपनी थाती प्रेम का मिसाल दे रहे हैं. और तिब्बत जोहार घाटी के विषम में अच्छी जानकारी रखते हैं.आज हमारे जीते- जागते धरोहरों, बुजुर्गों को सदैव नमन करता हूँ. जगदीश सिंह बृजवाल
जगदीश बृजवाल हिमालय की गोद में बसा हिमनगरी, जिसे ‘सारा संसार एक मुनस्यार’ भी कहते है। उत्तर में हिमालय के तलहटी के मिलम ग्लेश्यिर से उदगम गोरी नदी निचले घाटी के में उतरकर वार-पार के बीचों बीच बहते मवानी-दबानी तक तथा पश्चिम में हीरामणि ग्लेशियर निकलने वाली नदी रामगंगा सीमा रेखा बनाते नाचनी, नौलड़ा तक मुनस्यारी तहसील का सीमांकन क्षेत्र है। मुनस्यारी तहसील क्षेत्रफल की दृष्टि से कई जिलों से भी बड़ा है। जैसे जिला हरिद्वार। क्योंकि इस तहसील क्षेत्र की सीमा तिब्बत (चीन) तक जा लगती है। प्राचीन समय जोहार के शौका जनजाति तथा मुनस्यारी के मूल बरपटिया जनजाति के लोग जो यक्ष, किन्नर, किरात, नागवंशी तथा मंगोलियाड, मुख मुद्रा व तिब्बती बर्मी भाषा के समावेश से कुछ-न-कुछ सम्बन्ध अवश्य उनसे भी रहा है। जोहार के इतिहास में तीनों कालखण्डों का अनुशासित वर्णन दिखने को नहीं मिलता, ऐसे में पाठकों को कुछ भ्रम की आशंका बनी रहती है। जबकि जोहार का इतिहास तीन कालखण्ड में वर्गीकृत दिखाई स्पष्ट है- प्राचीन काल- हल्दु्वा-पिङंगलवा युग, मध्य काल पनज्वारी युग, आधुनिक युग धामू रावत का जोहार घाटी में प्रवेश व पंनज्वारियों का अवसान। तीन काल खण्ड जोहार के समग्र इतिहास की जानकारी देते हैं। इनमें आपस में रक्त सम्बन्ध भी स्थापित र्है अर्द यायावरी जनजाति मौसम के अनुसार अपने प्रवास बदलते रहते थे किन्तु सन 1962 में तिब्बत पर चीन का अधिपत्य हो जाने के कारण शौकाओं का व्यापार बन्द हो गया था, सभी लोग बेरोजगार हो गये। नए रोजगार की तलाश में अब एक स्थान पर स्थायी भी रहने लगे थे। शिक्षा, नौकरी, पद प्राप्त कर आज पुनः अच्छी स्थिति में देश के कौने कौने में बस गये हैं। यहाँ के लोगों का व्यापार समाप्ति के वाद धीरे-धीरे लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था। वर्तमान में अब शौकाओं की जनसंख्या क्षेत्र में न्यून है, कुछ ही गाँव तक सीमित परिवार निवास करते हैं। व्यापारी जो सदैव अपनी व्यापार को उन्नत बनाने के लिए मृदु भाषा, व्यवहार कुशल, मिलनसार बनने का प्रयत्न करता है सुबह से शाम तक अपनी वाणी में संयम, भाषा की सौहार्दता का विशेष ध्यान रखते है जो बाद में उसकी आदत व्यवहार में अवश्य शुमार हो गया होगा। किसी भी घर, परिवार में कोई भी व्यक्ति जो घर के लिए आर्थिक योगदान देता है वह घर का मुख्य व्यक्ति हो सकता है इस कारण घर परिवार में उनकी बातों को हमेशा परिवार तबज्जू देता है, उनकी बातों को लोग अमल में भी लाते हैं। व्यक्ति की वाणी की सौम्यता, व्यवहार में मधुरता परिवार के लिए भी तथा व्यवसाय के लिए भी संजीवनी का काम करता है। शायद कोई अनुमान न लगा पाये, पर उनकी तहजीब सबके लिए जीवनोपयोगी सिद्ध हो चुका था। तहजीब, जिसे हम कहते हैं किसी भी संस्कृति, सभ्यता के अवयव आचरण, आचार-व्यवहार, सदभाव, प्रेम गुण-धर्म की सीख व्यक्ति को घर या समाज से ही मिलता है। परिवार बालक की सर्व प्रथम पाठशाला होता है जहाँ से बच्चा संस्कारवान बनकर बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है। आपकी सहिष्णुताता आपके कई कामों को आसान बना देती है। शौकाओं का अपना व्यापार करने के एवज में उसे कई लोगों के साथ अपनी अच्छे सम्बन्धों को बढ़ावा देना पड़ता होगा, जिस कारण घर के सदस्य के साथ हो या बाहर के, वाणी में मधुरता यथावत रखनी पड़ती होगी, व्यापारी की मजबूरी सदैव तहजीब को बनाये रखना ही है। अन्यथा व्यापार में अवरोध आने की आशंका बनी रहती थी जिस कारण शौका व्यापारी को दैनिक जीवन में भी अपने पशुओं से लेकर परिवार व बाहर के लोगों से भी अच्छे व्यवहार सम्बन्धों को बनाये रखना आवश्यक था। इस कारण उसने अपने पास-पड़ोस, अपने बन्धु-बान्धवो के साथ मैत्राीपूर्ण व्यवहार बनाकर अच्छे वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान अवश्य किया होगा। जोहार घाटी में अतीत में निवास करने वाले लोग सभी जोहारी कहलाये जाते थे। किसी भी जाति धर्म का क्यों न हो, जोहार में निवास करने के बाद जोहारी ही कहलाए, अपनी बुद्धि, क्षमता अनुसार कार्य कर आपसी सामंजस्यता प्रेम सदभाव से अपने कार्यों में मशगूल रहे, अनुमान/कल्पना तो आज के लोगों का कथन और सोचना है, उसी प्रकार तहजीब, संस्कार अग्रिम पीढ़ी को तथा पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार समाज को हस्तांतरण करते रहे हैं। मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों की ईमानदारी, विश्वास, स्वाभिमानी होने का प्रमाण तो सिद्ध है, यहाँ के लोग जुवान व उसूल के पक्के होते थे। सच्चाई, ईमानदारी, विश्वास के लिए कभी समझौता नहीं करते थे। तिब्बत व्यापार हेतु जाने वाले मार्ग में एक स्थान बोगडियार पड़ाव है, उससे कुछ नीचे दक्षिण दिशा की तरपफ रारगारी नामक अति दुर्गम स्थल माना जाता है, सत्यता यह भी है कि शौका लोग व्यापार के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री जो अपने पशुओं के पीठ पर लादकर तिब्बत तक पहुँचाते थे यदा-कदा उन्हें इन स्थानों में कहीं सड़क किनारे, गुफा आदि स्थान पर सुरक्षित मोटे कपड़े से (तिरपाल) ढक कर रख देना पड़ता था। अगले वर्ष उसे सुरक्षित सामान मिल जाता था, जो उस समय के समाज की अच्छी स्थिति की जानकारी देता है कि झूठ, चोरी-चकारी, बईमानी, अविाश्वास को समाज में कोई भी स्थान नहीं दिया गया था। मुनस्यारी क्षेत्रा में रहने वाले सभी जाति विरादरी के बीच जो प्रेम, मित्राभाव अतीत में दिखाई देती देती है वो अब कहाँ! हमेशा आपस में एक दूसरे की प्रति अटूट विश्वास व सम्बन्ध बनाए रखना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा सम्बन्धों की प्रागढ़ता पीढ़ी दर पीढ़ी भी निरन्तर चलती रही। अतिथि सत्कार करना इस क्षेत्र के लोगों को कहीं से सीखने की आवश्यकता न थी। अपने गुण की पहिचान वह बखान अपने मुँह से कभी नहीं किया। आपसी सामंजस्यता, खाना-पीना, उठना-बैठना, बोलचाल जिसने आपसी समानता को बनाये रक्खा, क्षेत्रा में सभी जाति धर्म के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य तहजीब-ए-मुनस्यार ने किया था तथा आपस में सदैव एक दूसरे का सहयोग कर काम आते रहे हैं, इस कारण मुनस्यारी क्षेत्रा की लोगों की वाणी ने लोगों को ध्यान आकर्षित कर अच्छी परम्परा की नींव रख दी। इस बात की समझ अनुमान/कल्पना आज करते हैं तो क्षेत्र में आने वाली बाहरी लोग जो सरकारी कार्मिक, अध्यापक गण नियुक्ति, पदोन्नति में आकर दूर दराज गाँव में लम्बे समय तक ठहराव करते हैं तो उन्हें यहाँ के लोगों का आचार-व्यवहार में अपनत्वता झलकता है तभी यहाँ से अन्यत्रा जाने के पर यदा-कदा जब उनके सन्देश मिलते तथा कभी मिलन हो जाने पर क्षेत्रा तथा वहाँ रहने वाले लोगों की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं। तहजीब की आवश्यकता तथा बनाये रखना जो शौका समाज के अच्छे संस्कारों के गुण धर्म को विकसित करना था। विरासत में मिला तहजीब व प्रकृति का अमूल्य उपहार प्राप्त कर सदैव यहाँ के वाशिन्दे अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं।
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन समय की बात जब रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) के दारमा घाटी में धनधान्य से परिपूर्ण मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहा करते थे। तब लगभग 75 प्रतिशत वर्तमान कुमाउँ में कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन था। पर रं लुंग्बा (दारमा, व्याँस और चैदाँस घाटी) स्वतन्त्र भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। उस समय भोट देश का अलग राजा शासन करता था। तब परगना दारमा के वासी भांट देश का भोट प्रान्त होने के बाद भी वे अपने-अपने ग्रामों के स्वतन्त्र स्वामी थे। उस समय दारमानी, दारमा, रंगपा और जोहारी लोग दारमा और जोहार घाटी आने जाने व पश्चिम तिब्बत प्रान्त ;मल्ला जोहार व्यापार मार्ग से पहलेद्ध। ये हिम दर्रा मार्ग निम्न थे- 1 पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग, 2. सीपू- बलाती हिम दर्रा मार्ग। पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग- दारमा-जोहार घाटी के व्यापारी और अन्य लोग पंचाचूली हिमगिरी शिखर के पंचा हिम दर्रा को पार कर दारमा जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह हिम दर्रा तहसील धरचूला, दारमा घाटी में है। यह दर्रा मार्ग छोटा और खतरनाक था। इस मार्ग का प्रयोग तल्ला और मध्य दारमा के 10-15 ग्राम वाले करते थे। यह पंचा-दाँतू हिम दर्रा साफ मौसम में ही पार किया जा सकता था, जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम दाँतू में प्रवेश किया करते थे, साथ ही दारमा घाटी के वासी रालम-पातों ग्राम क्षेत्रा में पहुंचते थे। कहावत- इस पंचा-दाँतू दर्रा मार्ग को तय करने में इतना कम समय लगता था कि मूल दाँतू ग्राम से जड़ी-बूटी, नमक और घीट से से तैयार मरच्या (नमकीन चाय जड़ी बूटी गरम चाय) पीते हुए, जोहार घाटी के रालम-पातौं क्षेत्र में पहुँचा जा सकता था। सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग- तहसील मुनस्यारी और धारचूला, ग्राम सीपू, अटासी और ग्राम सीपू बलाती के क्षेत्र में पड़ने वाला इस हिमदर्रा को पार करते हुए दारमा-जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह दर्रा मार्ग पंचा दर्रा की अपेक्षा लम्बा और सुरक्षित था। इस मार्ग का प्रयोग मल्ला दारमा के 9-10 ग्राम वाले किया करते थे, यह सीपू-बलाती हिम दर्रा जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम बलाती, अटासी ‘जोहार घाटी’ में पहुंचते थे। कहावत- ऐसी मान्यता है कि इस हिम दर्रा की दारमा-जोहार नजदीक ग्रामों की दूरी तय करने में इतना समय लगता था कि सीपू गाँव में बनी रोटी कपड़े में तय की गयी, गरम रोटी जोहार घाटी के बलाती ग्राम क्षेत्रा तक गरम ही पहँुचती थी। ;जोहार-रालम घाटी और दारमा घाटी के व्यापारी इन दोनों ही पंचा-दाँतू और सीपू-बलाती दर्रा मार्ग का प्रयोग करके दारमा घाटी होते हुए, सीमान्त पश्चिम तिब्बत प्रान्त के निम्नलिखित क्षेत्र- मंगोल, शिल्दी थं, मिसल, चिन, ज्ञानिमा, दरचन, दयाकार, शिनचिलम और ठूकर मण्डियों में सामाग्रियों का व्यापारी विनियम करते थे। पुरंग, पाला किरमेक, डोंग दर्चिन, जोमजिंन, बिल्थी थं तकलाकोट ठुकर (मानसरोवर) गढ़तोक में अधिकतर व्याँसी लोग व्यापारी विनिमय कर व्यापार करते थे और नीति-माना घाटी वासी शिवचिलम, चपराउफ मण्डियों में व्यापारिक विनिमय के लिए जाते थे। इन्हीं मण्डियों के आसपास लला लसुली देवी के धर्म शालाएं विद्यमान हैं। उन धर्मशालाओं के अवशेष/ साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। दारमा घाटी के तरह ही जोहार घार्टी के व्यापारी भी इन्हीं तिब्बती मण्डियों का प्रयोग व्यापारिक विनिमय के लिये करते थे। इन मण्डियों तक पहँुचने के लिए उटाधूरा, जयन्तीधूरा, कुंगरी-बिंगरी धूरा तीनों गिरी द्वारों को पार करना पड़ता था। अंग्रेज समय काल से भारत-तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त व्यापारियों का विनिमय व्यापार केन्द्र दारमा रं लुंग्बा (दारमा प्राचीन भोट प्रान्त क्षेत्र) मंगोल शिल्दी थं, विदांग नामक ग्राम ;वर्तमान ग्राम खिमलिंगद्ध हो गया, और यह विनिमय व्यापार लगभग 1962 तक चलता रहा। वर्तमान समय इस दारमा भारत-पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रा से कोई व्यापार नहीं होता है। विनिमय (आदान-प्रदान) पश्चिम तिब्बत सामग्री- निम्न सामाग्री जैसे स्वर्ण चुरे, सुहागा, तिब्बती बकरियों का उन (पसमीन उन), नमक, बहुमूल्य रत्न, लाचा (लाख), जंगली पशुओं का चोखाल (समूर), पत्थर रत्न और अन्य सामग्री होते थे। साथ ही बकरियों, घोड़े, झुप्पू, याक का भी खरीददारी भोट (रं) जन करते थे। यह व्यापार 16500 से 18500 पिफट उफँचाई पर प्रवास के समय होता था। इन सीमान्त वासियों का मुख्य पेशा तिब्बती व्यापार तथा उफनी शिल्प उद्योग में एक दूसरे के पूरक थे। विनिमय भारतीय (भोट/रं) सामग्री- निम्न सामग्री जैसे- गुड़, मिश्री, चीनी, चाय कपड़ा, तम्बाकू सूती वस्त्रा, सामान्य दवाईयां, ड्राई फूड, लपफो और दैनिक प्रयोग की अन्य सामग्रियों की खरीददारी पश्चिम तिब्बत व्यापारीजन करते थे। सुनपति रं भोट समयकाल से ही जोहार-दारमा घाटी आना-जाना, व्यापार करना व अच्छे व्यवहारिक सामाजिक सम्बन्ध् के कारण शादी-विवाह का भी चलन था। पौराणिक किवदंतियाँ (जनश्रुतियाँ)- दारमा-जोहार-रालम घाटी का पारिवारिक सम्बन्ध्- एक समय की बात है, दारमा घाटी के बेटे का ब्याह जोहार रं, रंगपा लड़की के साथ हुआ, ब्याह के बाद कुछ दिन के लिये अपने मायके जोहार-रालम घाटी रहने जा थी। मायका जोहार घाटी जाते समय वे न्यौला पंचाचूली हिमगिरी पंचा-दाँतू दर्रा को पार करने वाली थी, तब वे उच्च हिम मार्ग पार करने से कुछ पहले कुछ देर आराम करते हुए अपने दोनों तरफ ससुराल व मायका को निहार रही थी, और ससुराल से साथ लायी खाद्य सामग्री (स्यली/फाफर के आटे से तैयार गोलनुमा खाद्य) गंदु, चरपा और पतली/कट्टू आटा से तैयार गुठे, श्यली/ फापफर के आटे से तैयार गंदु (गोलनुमा), चरपा खाद्य पदार्थ पैक वाला निंगाल का टिफिन बाॅक्स ढलान की ओर गिरता ही चला गया। उस महिला ने तुरन्त उस जगह को दोष देते हुए, कोई न खा पाएँ, खा यानु बं (कितनी गन्दी जगह) अपशब्द निकल आया, जिसके कारण उसी वक्त मौसम खराब होते हुए हिमस्खलन व भूस्खलन होने लगा, वह महिला जोड़ी इस हिमस्खलन की चपेट में आकर वहीं मर गयी, साथ ही न्यौला पंचाचूली के निचला भूभाग ‘न्योल्पा बुग्याल थं’ के आसपास रहने वाले मूल दाँतू ग्राम के अधिकतर ग्रामवासी उस हिमस्खलन मं दबकर मर गए, कुछ बचे हुए ग्रामवासी वर्तमान स्थित ग्राम दाँतू में आकर बस गए। ये ग्रामवासी ही यह ग्राम दाँतू के मूल दताल निवासी माने जाते हैं। उसी समय इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग पूर्ण रूप से खण्डित हो गया। जिस कारण इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग से दोनों ‘दारमा-जोहार-रालम घाटी’ का सम्पर्क पूर्ण रूप से टूट गया, तब से आज तक इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग का पता नहीं चल सका। इसी समय में जोहार- दारमा घाटी को मिलाने वाली दूसरी अटासी, बलाती, सीपू हिम दर्रा (बलाती-सीपू हिम दर्रा) के टूटने से यह मार्ग भी बन्द हो गया था। इसके पश्चात जोहार घाटी का व्यापार मल्ला जोहार के रास्ते पश्चिम तिब्बत प्रान्त से होने लगा। पर वर्तमान समय में इस मार्ग का प्रयोग ट्रेकर्स जोहार से दारमा, दारमा से जोहार घाटी ट्रेकिंग किया करते हैं। यह समय काल मीठे, मृदुभाषी, ईमानदार और कर्मठ लोगों का सत्यवादी युक्त समय था।