
हिमालय क्षेत्र के प्राचीन आदम जाति किरात, पुलिंद, तंगण तथा विष्णु पुराण, महाभारत के वनपर्व, वाराहसंहिता में भी भारतवर्ष के किनारे-किनारे हिमवंत क्षेत्र में सकास,नाग, गंधर्व, यक्ष भिल्ल, आदि आदम जाति रहते आ रहे हैं.आज भी निवास करने वाले उन प्राचीन जातियों से जो संबंध रखते हों, किंतु कयी अन्य बाहरी जातियों का यहाँ आकर इन जाति के साथ घुल-मिल जाने से पहचान की भ्रामकता दिखती है.
बरपटिया जनजाति के विषय में सही -सही बता पाना कठिन है.क्या ये खस, शक, या पौराणिक जाति किरात पुलिन्द, तंगण संबंध रखते होगें ? इनसे जानकारी प्राप्त करने पर वे अपने को बाहरी क्षेत्र नेपाल, पाली पछांऊ, दानपुर आदि क्षेत्रों से आने की बात बताते है.पर यह सिद्ध है कि कुछ बाहरी जातियाँ, आदम प्राचीन जातियों के साथ यहाँ आकर घुल-मिल गये हैं. जिसमें संदेह नहीं.
हिमालय क्षेत्र के ही जनजाति जोहार के शौका घुमंतू, पशुचारक, अर्द्धयायावरी जीवन व्यतीत करते थे, इनके विषय में इतिहासकारों की खोज, किवदंती, जनश्रुति, मत-मतांतर देखने को मिलते हैं.जोहार घाटी में भी समय-समय पर बाहरी जातियों का प्रवेश तथा रक्त संबंध स्थापित के चलते जोहार के समाज में पूरातन समय से अर्वाचीन तक सामाजिक उथल-पुथल चलता ही रहा है.
शौका जनजाति मौसम के अनुसार जोहार परगना, गौरीफाट, तल्लादेश में प्रवास करते रहे थे. इन्ही के आस-पास, बीच एक और छोटा – सा जनजाति समुदाय बरपटिया बारह पट्टी (बारह गाँव) में रहने वाले, जिनका अपनी संस्कृति, सांस्कृतिक पहिचान भी थी.जोहारियो के प्रभाव से इनके अस्तिव पर विराम लगता रहा है.
गोरीफाट (मुनस्यारी) तथा बरपटिया जनजाति समुदाय जो मुख्य रूप से कृषक तथा पशुपालक थे.जो स्थाई निवास कर माल क्षेत्र में शौका व्यापारीयो के लिए अनाज, आदि सामाग्री की आपूर्ति करके मैत्री भाव का संबंध शौकाओ के साथ बनाये रखते थे. जोहार के मध्यकाल के पंज्वारीयों का माल अनाज भंडारण क्षेत्र बरपटिया क्षेत्र ही था; प्रसिद्ध पूरूष, धनाढ्य व्यक्ति सुनपति शौका का सौकाट क्षेत्र बरपटिया क्षेत्र में ही है.
बारह पट्टी- जैंती गाँव ( बरनियागांव) पापड़ी, चौन-हरकोट, इमला, गोल्फा, सुरिंग, जीमीया, रिंगू-चूलकोट, गोल्फा, तोमिक, नामिक आदि क्षेत्र में निवास करते थे.इनकी उपजाति अधिकांशतः गाँव के नामों से आते हैं: बनिगों के , बर्निया, पापड़ी के पापड़ा, हरकोट के हरकोटिया,कोटाल गाँव के कोटाल, इमला के इमलाल, बोथी के बोथयाल, चूलकोट के चूलकोटिया, गोल्फा के गोलफियाल, तोमिक के तोमकियाल, जीमी के जीमीयाल, रिंगू के रिगंवाल, पछाई, सेमीया, कलझुनिया भी बरपटिया जनजाति ही है.सदियों से यहाँ निवास करते हैं.
बरपटिया जनजाति में पूर्व में बर्निया , पापडा , चूलकोटिया जाति का प्रभुत्व रहा है बाद में अपने -अपने क्षेत्र में शासक के रूप में भी देखा जा सकता हैं.
“बनिया माने” स्थान आज भी बेटूली धार के पास पत्थर स्तम्भ सीमा का प्रतीक चिह्न मौजूद हैं जिनका अधिपत्य गोरीनदी के किनारे किरकुटियागार, बछेपूर तक बताया जाता है उसी प्रकार पापडा, चूलकोटिया जाति भी अपने क्षेत्र सीमा तक के स्वामी थे.
बर्नियो का अतीत का इतिहास जो दोधर (दो भाग) में बटे कौम एक अपने को तातर देश (हुणदेश) के निवासियो से संबंध होना बताते हैं, दूसरा धर अन्य जाति का बर्नियो के साथ घुल- मिल जाना है. मेसर देव पूजन में हुमला-जुमला पलायन कर चुके बर्निया आज भी अपने मूल गाँव जैंती (बर्निया गाँव) पहुचते हैं.जो जोहारियो के प्रभाव चलते अपने मुल्क जैंती गाँव छोड़कर नेपाल में जा बस गये थे.
बर्निया जाति से जुड़ी प्रसिद्ध कथा-कहानी रूपवती कन्या का हरण जो मेसर व रूपवती कन्या के सामाजिक असमनता का कारण, दोनों के स्वाभाविक मानव स्वभाव मिलन में अवरोध की कहानी दिखती है.मेसर देव जो नागवंशी व बर्निया कन्या तातर देश के हुण जातिसे संबंध रखते थे. हिमालयी दर्रे से टिड्डी के दल की तरह भारत पर हुण आक्रमण मैदानों तक भी होते रहे है.रूपवती कन्या को सामाजिक विरोध के कारण अपना प्राण गंवानी पड़ी थी.
बर्निया गाँव का उत्तर दिशा की ओर स्थित मेसर देव का जिसमें शिवशक्ति प्रतिष्ठापित मंदिर है,जिसमें नौर्त (जागरण) देवतरण के कार्यक्रम चलता है तत्पश्चात् गाँव से पश्चिम दिशा की और घने जंगलों के बीच नागपंचमी के दिन मेसर कुण्ड में मेसर देव की पूजा-अराधना की जाती है, जिसमें महिषि बलि प्रथा बौन, बौद्ध पूजा विधि विधान का स्पष्ट संकेत भी देती है.
बरपटिया जनजाति में पूर्व में प्रभुत्व बर्नियाओ का रहा था, धीरे-धीरे पापडा, चूलकोटिया, गोल्फियाल जाति भी प्रभाव में दिखाई देते है यदपि यह प्रभाव अपने क्षेत्र तक सीमित हो.
पापडा तथा बर्नियों में सदैव प्रतिद्वंद्विता बनी रही. आज भी वह मल्लयुद्ध स्थान, रास्ता झुगरू गौ्र,( लड़ने-झगडने हेतु खेत की उपलब्धता )झुगरू बौ्ट( झगडे वाले रास्ते में मिलना )उन्ही बातों की याद दिलाती है. आज से कुछ वर्षों पूर्व डांडाधार, जैती गाँव के मेलों में जब गाजे-बाजे के साथ दोनो गांवों से लोग मंदिर में प्रवेश करते थे तब भी तना-तनी का माहोल अतीत का स्मरण कराती थीं.
बर्निया गाँव से प्राप्ति जानकारी से मालूम पड़ता है कि आज भी 10,15 बर्निया जनजाति परिवार तथा 20,25 परिवार अनुसूचित जाति के लोग भी गाँव में रहते हैं,जिनका पारस्परिक संबंध सदियों से बना है.धार्मिक,सामाजिक मान्यताए जनजातीय के अतिरिक्त हिंदू संस्कृतिकरण की तरह है. गाँव के लोग सरकारी नौकरी पैशा तथा कुछ अच्छे पदों में भी आसीन है.गाँव में रहन वाले लोग कृषि,पशुपालन, मजदूरी कर अपने आजिविका चलाते हैं.पूर्व के पधानचारी प्राप्त पद पधान राठ श्री किसन सिंह बर्निया का परिवार भी गाँव में रहता है, गाँव के लोग पढ़े लिखे सौहार्दता से मिल-जुल कर रहते हैं मोटर मार्ग ही निर्मित मेसर देवता पूजा-पाठ सामाग्री, बर्तन रखने का मंदिरनुमा छोटा सा कमरा बना है.बरपटिया जनजाति के संस्कृति, सांसकृतिक इतिहास को जानने की जिज्ञासा स्वयं बरपटिया समाज के लोगों को भी है.
