समाज के लिये निरन्तरता जरूरी है

त्रिलोक सिंह वृजवाल से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
समाज को आगे ले जाने के लिये निरन्तरता जरूरी है। नियमित ठहराव के साथ जुटने वाले विशिष्ट लोगों में से श्रीमान त्रिलोक सिंह वृजवाल का नाम उल्लेखनीय है। अपने लक्ष्य को और बढ़ा करते हुए इन्होंने जिस प्रकार की संरचना अपने समाज के लिये की उसके पीछे आर्थिक सुदृढ़ता और जरूरतमंदों को सहयोग का भाव रहा है।
पिघलता हिमालय परिवार के संरक्षक सदस्यों में शामिल श्री टी.एस.वृजवाल के दादा पान सिंह वृजवाल हुए। इनकी अगली पीढ़ी में राजेन्द्र सिंह, राम सिंह, रक्षपाल सिंह, तेज सिंह, विजय सिंह, केशर सिंह भाई हुए। भाईयों में सबसे छोटे विजय सिंह की अगली पीढ़ी के हैं- त्रिलोक सिंह। माता श्रीमती गंगोत्री देवी और पिता विजय सिंह के घर जन्म लिया- त्रिलोक सिंह और धीरेन्द्र सिंह ने। पिघलता हिमालय परिवार के संरक्षक रहे स्व.उमेद सिंह मर्तोलिया की बहन हुईं इनकी माता श्रीमती गंगोत्री देवी।
रिश्तों के इन ताने-बाने के बीच मुनस्यारी के ग्राम राछूसैन, मल्लाघोरपट्ा में 6 अपै्रल 1952 को जन्मे त्रिलोक सिंह जी की इण्टर तक की शिक्षा मुनस्यारी में ही हुई। वह बताते हैं कि गाँव का बचपन और सयानों का संरक्षण सबके लिये कारगर हुआ। इण्टर के बाद अल्मोड़ा से उच्चशिक्षा के साथ बीएड करने वाले श्री वृजवाल जी एलटी शिक्षक हो गये। नाचनी और डोर में अध्यापक के रूप में रहते हुए इनकी तैयारी जारी थी। 1978 में कपकोट में बीडीओ के रूप में तैनात हुए। समय के साथ प्रोजेक्ट डाररेक्टर के रूप में इन्हें चमोली जाना हुआ। फिर अल्मोड़ा में इसी पद पर रहे। इसके बाद डीडीओ
नैनीताल का पदभार इनके पास रहा और फिर ढाई साल तक चम्पावत में मुख्य विकास अधिकारी के रूप में रहते हुए अप्रैल 2012 में सेवानिवृत्त हुए। अपनी राजकीय सेवाओं के दौरान समाज में सजग वृजवाल जी अपने समय में बेहतरीन खिलाड़ी भी रहे हैं। बताते हैं- मुनस्यारी में खेल को उत्सव की तरह मनाने की परम्परा रही है और वह अपनी टीम के गोलकीपर बनते थे। ह्यून बर्फबारी के दिनों में भी खेल का जुनून सभी खिलाड़ियों में था। बचपन की झुंझली यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि व्यापार और खेतीबाड़ी ही लोगों का जरिया था। चीन के साथ 1962 के युद्ध में जब तिब्बत व्यापार टूटा तब जोहार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। क्योंकि धारचूला के करीब नेपाल होने से और गढ़वाल में चारधम यात्रा से व्यापार की गति प्रभावित होते हुए भी रुकी नहीं जबकि जोहार एकदम अलग-थलग हो गया था। सन् 1970 से 90 तक कापफी लोग सेवाओं के लिये इधर-उधर गए। आरक्षण का यूपी में दो प्रतिशत लाभ था। पहाड़ की आर्थिक व्यवस्था तब भी मनीऑर्डर पर टिकी थी। जिन घरों में नौकरी-पेशा वाले थे, मनीऑर्डर भेजते थे।
समाज के उतार-चढ़ाव को जीने और महसूस करने वाले वृजवाल जी ने अपने साथियों के साथ ‘जोहार सहयोग निधि’ की कल्पना की और अल्मोड़ा में सौ-सौ रुपये प्रतिमाह जमा करते हुए एक निधि बनाई। 2004 में जोहार सहयोग निधि अल्मोड़ा नाम से संस्था का सहकारिता एक्ट में रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया गया। यह संस्था आज कीर्तिमान के रूप में खड़ी है जिसमें दो करोड़ से अधिक की राशि होगी। इसके द्वारा मेधावी विद्याथर््िायों को सहयोग के अलावा जरूरतमंदों को अवसर के अनुरूप हाथ बंटाया जाता रहा है। अल्मोड़ा में संस्था का अपना भवन होना भी सुखद है। शुरुआत में जोहार सहयोग निधि कार्यालय के लिये किराए पर कमरा लिया गया था जिसका किराया भी इसके संचालक स्वयं ही अपनी-अपनी ओर से देते थे। आज इस निधि का एक बड़ा आकार होना बताता है कि कितनी दौड़भाग इसके लिये हुई थी, जो आज भी है।
श्री वृजवाल के सामाजिक कार्यों में इनके परिवार का हरदम सहयोग रहा है। इनका विवाह गीता देवी से हुआ। हिमनगरी मुन्स्यार के दुकानदार गोविन्द सिंह पांगती व श्रीमती इन्द्रा देवी घर जन्मी श्रीमती गीता 6 बहनें व 2 भाई हैं। इस परिवार के अरविन्द पांगती संयुक्त सचिव, हरीश पांगती मर्चेन्ट नेवी में हैं। त्रिलोक सिंह जी की अगली पीढ़ी को देखें तो इनकी सुपुत्री प्रीति रावत नोएडा में हैं, जमाई श्री नवीन सिंह रावत कस्टम में हैं। वृजवाल जी के सुपुत्र राजेश सिंह और मनीष सिंह वृजवाल हैं। अपने घर और समाज में सयाने की भूमिका श्री टीएस वृजवाल में हमेशा से सुमार होना बताती है कि वह कितनी कर्मठता से तत्लीन रहते हैं। उनकी यही निरन्तरता उन्हें भीड़ से अलग करती है और दूसरों को भी प्रेरणा देती है कि किसी भी स्थिति में कर्मशील रहना है।