पुंगराउ घाटी में जब मन्दिर स्थापना हुई तभी से कार्की, पाठक, वृजवालों को इसका आंगन मिला है

भीमसिंह वृजवाल-श्रीमती तुलसी देवी से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
पुंगराउ घाटी ‘पांखू’ में न्याय की देवी कोटगाड़ी की मान्यता विश्वभर में है। कोकिला माता के नाम से भी इनके दरबार को जाना जाता है। कोटगाड़ी के इसी आंगन में कार्की, पाठक, वृजवालों का खाल (आंगन )है। आज के अंक में इस घाटी के वयोवृद्ध दम्पत्ति से विशेष भेंटवार्ता प्रस्तुत है। 92 वर्षीय भीम सिंह वृजवाल और 88 वर्षीय तुलसी देवी के साथ नई-पुरानी अनगिनत यादें जुड़ी हैं। और जिस प्रकार का जीवन इन्होंने देखा है वह पहाड़ की कठिन कही जाने वाली दिनचर्या के साथ अपनी संस्कृति की पूरी लहर सी है।
वृजवालों के परिवार अपने यात्रा प्रसंग में माइग्रेशन के दौरान पुंगपाउ घाटी में आए और यहीं के होकर रह गये। इस घाटी के नौ गांवों में यह इसलिये फैले क्योंकि इनके साथ भेड़ बकरियां जानवरों के लिये काफी खुला स्थान चाहिए था।
अब तो कोटगाड़ी मन्दिर तक शानदार मोटर रोड है और ग्रामों में भी सम्पर्क मार्ग हो चुके हैं, उस दौर को याद कर सोच पड़ जाते हैं जब एकदम बीहड़ दुर्गम जगह रही होगी। भीमसिंह जी कहते हैं- कोटगाड़ी मन्दिर की स्थापना हुई होगी, हमारे बुजुर्ग उसी दौर से से यहाँ आते रहे हैं और यहीं हमारा आंगन है। तभी से एक मवासा कोटगाड़ी, एक सनेती, एक चनोती, फल्याटी, तोराथल इन ग्रामों में रहे हैं। चूंकि जानवरों के लिये चारागाह की आवश्यकता होती है, तब वृजवाल भाई अलग-अलग जगहों पर रहने गये थे। मौसम चक्र अनुसार माइग्रेशन में बिल्जू से आने वाले परिवार मुनस्यारी, दुम्मर के बाद पुंगराउ घाटी आया करते थे। तिब्बत व्यापार तो बुजुर्गों का नियत था ही। फिर यहाँ से व्यापार के लिये हल्द्वानी, काशीपुर, रामनगर भी जाना होता था।
जीवन के उत्तरार्द्ध में वृजवाल दम्पत्ति अपने ग्राम फल्याटी के उन दिनों की याद बताते हैं जब घरेलू सामान लेने पैदल चौकोड़ी जाना होता था। हस्तशिल्प की माहिर श्रीमती तुलसी देवी दन-कालीन व पंखी बनाने जिस प्रकार की उस्ताद रही हैं, महिलाओं का हुजूम इन्हें देखने उमड़ता था। श्री वृजवाल बताते हैं कि उन्होंने पहली बार सन् 1955 में घोड़ों के साथ गरुड़ जाकर गाड़ी देखी थी और उनके बड़े बालक गिरीश ने जब चौकोड़ी में पहली बार गाड़ी देखी वह डरकर भागने लगा। श्री गिरीश वृजवाल भी अपने बचपन की इस घटना को हमेशा याद करते हुए उन दिनों का स्मरण करते हैं।
भीमसिंह जी अपने बड़े भाई प्रेम सिंह जी के साथ एक बार तिब्बत व्यापार के लिये भी गये। रोमांचक और कठिनाई भरी उस यात्रा में तीन धूरा चोटी जहाँ जान गंवाने में भी देर नहीं लगती थी। उंटाधूरा, जयन्ती, किंगरी-बिंगरी जिसे किसी भी रूप में एक दिन में पार करना अनिवार्य था। जिसे हम डेथ पांइट भी कह सकते हैं। एक ही दिन में पार कर लिया गया। उसी बीच गंगपानी से किंगरी बिंगरी, दुंग, छिरतिंग, चिलमता, मानीथंगा, खिमलिंग, गुरगम, मिसर, बम्म्बाडोल ज्ञानिमा तक रास्ते पड़ाव दुर्गम बर्फीले रास्तों का सामना करना पड़ा। किंगरी बिंगरी पहुंचकर कैलास पर्वत दर्शन का मनोरम दृष्य दिखाई दिया। सभी गर्खाओं के मित्र की तरह बृजवालों के मित्र खिमलिंग नामक स्थान पर डेरा डाले थे। चंवर गाय के बालों के बनाया तम्बू जिसमें अत्यध्कि गरम रहता था।
अब थोड़ा सा इस परिवार के बारे में जान लेते हैं- एक थे लालसिंह बृजवाल। इनके सुपुत्र हुए जसौद सिंह फिर इनकी अगली पीढ़ी के हुए- हीरा सिंह, गोवर्द्धन सिंह, प्रेम सिंह और भीमसिंह। जसौद सिंह की बाद की पीढ़ी का डेरा पुंगराउ घाटी पर पूरी तरह हो गया। हालांकि उससे पहले भी व्यापार के सिलसिले में इनका आना-जाना बराबर था। जसौद सिंह जी की थराली, नारायणबड़ग में दुकान भी थी। सेठ जी के इस फैले हुए कारोबार में हाथ बंटाने परिवार सहित अन्य भी जुटते थे।
श्री भीमसिंह जी बताते हैं उनी कारोबार में भेड़ का काला उन गढ़वाल जाता था क्योंकि वहाँ महिलाओं के बनने वाले वस्त्रों में इसकी मांग थी और सफेद उन बागेश्वर मेले में जाता था। बागेश्वर गांधी आश्रम के प्रबन्धक शान्ति लाल थे। जिस प्रकार जोहार मुनस्यार में उनी कुटीर उद्योग धन्धे थे उनका सामान दन, कम्बल, कालीन, पंखी जौलजीवी मेले में जाता था, उसी प्रकार पांखू से के घरेलू कुटीर उद्योग से सामान बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में जाता था।
अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को जीवनभर जीने वाले वृजवाल दम्पत्ति के पास अनगिनत यादें हैं। इनके सुपुत्र श्री गिरीश बृजवाल श्रीमती भवानी बृजवाल और श्री प्रकाश बृजवाल श्रीमती सरस्वती बृजवाल अपने गाँव-घर की उन पुरानी यादों को समृतियों में सहेजे हुए हैं। तभी उनका मन पुंगराउ घाटी की उन वादियों में घुमड़ता है और कोटगाड़ी दरबार के दर्शन के अलावा अपने उस स्थान को संवारने में दृढ़ हैं।

यादों के अलावा समर्पण जरूरी है

गोविन्द सिंह जंगपांगी से बातचीज
डॉ.पंकज उप्रेती
किसी भी समाज को बनाने के लिये यादों के अलावा समर्पण जरूरी है। अपने समाज के लिये ऐसे ही समर्पित हैं श्रीमान गोविन्द सिंह जंगपांगी। वरिष्ठ नागरिक के अलावा ‘बूबू’ के रूप में प्रतिष्ठि जंगपांगी जी की बात करें तो जोहार के पदम सिंह जंगपंागी के पुत्र हुए मान सिंह जंगपांगी। पिता मानसिंह और माता श्रीमती चन्द्रा देवी के घर गोविन्द सिंह व मंगल सिंह ने जन्म लिया। 3 मार्च 1949 को बुर्फू में जन्मे गोविन्द सिंह सीमान्त के जिस दुरुह क्षेत्र से आते हैं उतनी ही गहराई उनके व्यवहार में है।
बचपन की पढ़ाई दरांती ग्राम में हुई। माइग्रेश के रूप में जब-जब परिवारों की यात्रा होती इनका परिवार भी बुर्फू से दुम्मर आता। बुपर्फू, दरांती के अलावा अपने मामकोट छिनका, गढ़वाल में शिक्षा दीक्षा के बाद अल्मोड़ा कालेज से पढ़ने वाले गोविन्द सिंह जी सन् 1071 में आर्मी में भर्ती हो गए। 6 साल तक सेना की सेवा के बाद ओरिएंटल इंश्योरेंश कम्पनी लि. में इनका प्रतिभा का लाभ मिला। मार्च 2009 में डिविजन मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त होने वाले ‘बूबू’ जी ने समाज में अपनी सक्रियता को बरकरार रखा है।
बुर्फू से जंगपांगी परिवार मल्ला दुम्मर, भकुण्डा, इमला में रहने लगे थे। अपने बचपन की यादों में डूबते हुए गोविन्द सिंह बताते हैं- बचपन का एक खेल था केले/कदली के पेड़ की डंठ्ल में द्यार डालकर उसे जलाते हुए लालटेंन जलाते थे। परिवार ह्यून/जाड़ों में भकुण्डा आ जाता और गर्मी में बुर्फू जाता था। तिब्बत व्यापार की अवसर इन्हें नहीं मिला लेकिन वह यादें इनके साथ जुड़ी हैं जब व्यापारी तिब्बत जाते थे और वहाँ से भी आने वाले जोहार आते थे। वह बताते हैं जिस प्रकार ब्राह्मणों के जजमान
होते हैं उसी तरह तिब्बती मित्रों यहाँ के लोगों से सम्पर्क था यानी अपने-अपने घनिष्ट परिवार मित्रों के पास उनका आना-जाना था और तिब्बत लौटते समय वह उपहार स्वरूप हुनकारा तिब्बती बकरी परिवार को देकर जाते थे। हुनकारा की यादें भुलाए नहीं भूलती जब लोगों में परस्पर मेल होता था।
वास्तव में श्री जंगपांगी जी की बातों का मर्म यह बताता है कि दुर्गमता के रास्तों में राहें तब भावना हो और समाज के लिये कुछ करने की ललक। अपनी सेवाओं के दौरान समाज और मित्रों के लिये समर्पित रहे गोविन्द सिंह जी सेवानिवृत्त के बाद भी बेहद सक्रिय हैं और उनकी कोशिश हमेशा जोड़ने की रही है। मल्ला जोहार में होने वाली हरि प्रदर्शनी से लेकर अन्य तमाम आयोजनों पर ठोस कार्य के पक्षध्र श्री जंगपांगी जी पिघलता हिमालय परिवार के भी भी संरक्षक रूप में रहे हैं।
उनसे हुई भंेटवार्ता केवल समाचार विचार तक सीमित नहीं बल्कि उन पुरानी यादों को ताजा करना भी है जिससे नई पीढ़ी को उन पुराने दिनों की याद आ सके जब गर्मी-जाड़ा-बरसात में यात्राओं के बीच निकलने वालों ने अपने रास्ते हमेशा सच के साथ बनाए और बहुत ही ईमानदारी से रिश्तों को निभाया। श्री जंगपांगी प्रतिवर्ष मल्ला जोहार हरि प्रदर्शनी के लिये भी तत्परता से जुटते हैं और यत्र-तत्र निवास करने वाले प्रवासियों की टोह भी लेते हैं ताकि वह समाज के प्रति जुड़ाव बनाए रखें। इनकी सहजता-सरलता समाज के प्रति समर्पण को बताता है। वाकेई समाज में इस प्रकार के सयानों का होना सुखदाई है जो स्थितियों को सम्भालते और रास्ते दिखाने का काम करें। इनके अनुभवों का लाभ नई पीढ़ी ने लेना चाहिये।

ऐसे थे हमारे दीवान दा ‘दीवान सेठ जी’

एम.एस.सयाना
दीवान सेठ जी मूलतः चिलकिया, पिथौरागढ़ के रहने वाले थे। उनके पिता स्व. चन्द्र सिंह पांगती समाजसेवी थे। उन्होंने अपने समय में गाँव में स्कूल खुलवाए, घराट बनवाए तथा रास्ते का निर्माण किया।
दीवान सेठ जी अपने समय के जोहार समाज के जानेमाने सेठ थे, तिब्बत व्यापार के समय बागेश्वर उत्तरायणी मेले में तिब्बती भेड़ का उन गांधी आश्रम वालों को बेचा करते थे। एक बार उन का दाम इतना बढ़ गया कि सूठ जी दो बक्सा नोट अपने खच्चरों में लाद कर चिलकिया गये, व्यापार घटने के बाद उन्होंने भैंसखाल में आरामशीन लगवाई परन्तु लकड़ी के अभाव से मशीन बन्द करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने जंगलात का कार्य किया, उसमें भी अपेक्षाकृत लाभ नहीं हुआ। इस कार्य को छोड़कर उन्होंने ‘दीवान ट्रान्सपोर्ट’ की स्थापना की। अपने समय में सेठ जी ने सभी गरीब तबके लोगों की खूब मदद की। किसी की बेटी की शादी हो या कोई दुःख बीमार हो, सेठ जी सभी को उधर दिया और कभी किसी से भी पैसे लौटाने के लिये तकाजा नहीं नहीं करते थे। जिसने लौटाया तो ठीक नहीं लौटाया तो उनको कहना तौहीन समझते थे। सेठ जी को अनेकों लोगों ने पैसे नहीं लौटाये। वे सही मायने में गरीबों के मसीहा थे। जब वे हल्द्वानी में आकर बसे तो भोटिया पड़ाव में 52 बीघा जमीन जोहार संघ के नाम से लीज पर थी, यदि वे चाहते तो कई बीघा अपने नाम कर सकते थे परन्तु उनकी इतनी महानता कि उन्होंने एक इंच जमीन अपने नाम नहीं की तथा औरों को जमीन दिलाई। जमीन के सम्बन्ध् में अनेक विवाद भी होते रहते, लोग अपनी समस्याएं लेकर सेठ जी के घर जाते थे, वे आसानी से उनका समाधान कर देते थे। उनका निर्णय सर्वमान्य हुआ करता था। सभी पड़ाववासी उनका आदर करते थे क्योंकि उनका कहीं पर भी किसी प्रकार लोभ लालच नहीं था। ऐसे निस्वार्थ व्यक्तित्व को जोहार रत्न से नवाजा जाना चाहिये।
————————————————————————
स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे’ में भी स्व.दीवान सिंह जी के सीमान्त ट्रान्सपोर्ट सहित तमाम रोचक जानकारियों का उल्लेख है।

घोरपट्टा में आये थे तिब्बती तब हुई हचल-पहल

मोहनी टोलिया से बातचीज
पि.हि. प्रतिनिधि
अपनी आँखों के सामने परिवार व मित्रों को तिब्बत व्यापार को जाते देखना, माइग्रेशन में इधर से उधर घुमन्तू जीवन बिताना, जोहार के अन्तिम गाँव मिलम से टोला फिर तमाम पड़ाव होते हुए दिगतड़ ;डीडीहाट और अब अपने पुत्रों के साथ हल्द्वानी और दिल्ली तक की लम्बी यात्रा के अनुभवों से भरी 85 वर्षीय मोहनी टोलिया पिघलता हिमालय से खास बातचीज में बताती है कि जब दलाईलामा तिब्बत छोड़ भारत आये तो उनके साथ कई तिब्बती दिगतड़ भी आये जो घोरपट्टा नामक स्थान पर रहे। उन दिनों दिगतड़ में काफी चहल-पहल रही। सरकार ने तिब्बत से आये लोगों के लिये घोरपट्टा में व्यवस्था की। यहां पर इन लोगों ने सड़क का कार्य भी किया। बाद में यह लोग देहरादून, हिमांचल चले गये।
मोहनी देवी मिलम के अमर सिंह सयाना की पुत्री हैं, जिनका विवाह टोला के खुशाल सिंह जी से हुआ। सीमान्त के प्राकृतिक जीवन में रमी श्रीमती मोहनी जी अपने अतीत का स्मरण करते हुए बताती हैं कि अन्तिम गांव मिलम में होने के कारण तिब्बत व्यापार का हाल देखने का सौभाग्य हुआ। तब पुरुष व्यापार के लिये तिब्बत जाते थे और महिलाएं घर में उनी कारोबार और खेती का छुटपुट कार्य करती थीं। खेतों में फांफर, आलू खूब होता था। विवाह के बाद वह अपने ससुराल टोला में थीं लेकिन व्यापार और व्यवहार की दिनचर्या वैसी ही थी। जोहार, टोला, साईपोलू, भैंसकोट बारी-बारी से वह लोग आते-जाते रहते थे। मौसम के अनुसार जोहार से लेकर मुनस्यारी तक वह लोग आते थे। तब गर्मी होते ही जोहार भागने की तैयारी करते थे। लोगों को मुनस्यारी तक की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती थी, अब महानगरों में गर्मी सह रहे हैं। बचपन से लेकर कई सालों तक की जीवन यात्रा का सिलसिलेबार वृत्तांत सुनाती हैं। इनके पुत्र-पुत्रियों में वीरेन्द्र, नवीन, लीला हुए। टोला में बालक वीरेन्द्र की बाल लीलाओं को याद करने के साथ ही वह बताती हैं कि नवीन बचपन से ही गीत-संगीत का शौकीन था। बच्चों का स्कूल दूर होने के कारण वह उनका परिवार दिगतड़ आ गया। तब लोग अपने जानवरों को लेकर दूर-दूर तक यात्राएं करते थे। दिगड़त में बड़ा सा मैदान था, जोहार से तीन परिवार शुरुआत में बसने के लिहाज से आये। हाट लगने के कारण दिगतड़ का नाम ही डीडीहाट हो गया। यहां बच्चों की पढ़ाई की सुविधा थी। पुराने परिवार में धनसिंह पांगती, कृष्ण सिंह टोलिया हुए। तब नन्दा मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर भी बनाया ताकि अपने ईष्ट को याद करने का स्थल नियत हो जाए।
आज के डीडीहाट पर चर्चा करते हुए वह कहती हैं कि बहुत बदल गया है। जिस जगह एक मैदान मात्र था, आज बाजार हो गया है और गांव से बड़ी संख्या में लोग बस चुके हैं। जब तिब्बती दिगतड़ आये थे वह मैदान में होने वाले कार्यक्रमों में अपने सांस्कृतिक प्रोग्राम दिखाने आया करते थे। स्कूल में विद्वान गुरुजन बुलाए जाते थे। शौका मास्टर भी थे जिनमें बहादुर सिंह लस्पाल भी हुए। इसके अलावा तिब्बती मास्टर भी रखे गये जो अपनी भाषा में सिखाते थे।
श्रीमती मोहनी टोलिया पि0हि0 के वरिष्ठ सदस्य रहे स्व.उमेदसिंह मर्तोलिया का स्मरण करते हुए बताती हैं कि जिस समय दलाईलामा के साथ तिब्बती दिगतड़ आये थे दरोगा साहब मर्तोलिया जी की तैनाती भी यहीं थी। उनके साथ पुत्र सुरेन्द्र भी था। वह लोग यहां रहे। समय की सीमा में बहुत कुछ बदल जाता है। आज श्रीमती टोलिया जीवन का उत्तरार्द अपने योग्य पुत्रों के साथ बिता रही हैं। वह जोहार मौसम से लेकर दिल्ली के मौसम और रहन-सहन पर खुलकर बोलती हैं। उनके मन में हमेशा जोहार बसता है और वह युवा पीढ़ी से चाहती हैं कि वह अपने संस्कृति से जुड़े रहें।