पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
न्यौला पंचाचूली दार्शनिक विद्वानों का मानना है कि तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार भारत से लगभग 7-8वीं शताब्दी में से हुआ। उससे पहले पश्चिम तिब्बत में स्थानीय धर्म बौंन धर्म ही था, पर 8-9 सदी के मध्य में अधिकांश राजकीय समर्थक बौद्ध धर्म लामाओं की ओर मुड़ गये और बौंन धर्मालम्बियों के साथ भेदभाव बरता जाने लगा। धीरे-धीरे वहाँ के जन मानस बौद्ध धर्म को ही अधिकतम मान्यताएं और धर्म काण्ड अपनाने लगे, जिससे यह मूल बौंन धर्म समूह जन बुद्धिजम का ही एक सम्प्रदाय लगने लगा। जिस प्रकार कालान्तर में तिब्बती बौद्ध परम्परा कई धाराओं में कट गयी, जैसे- निम्न द्येलुक, न्यिंगमा, कान्ग्यु, शाक्य, बौद्ध सम्प्रदाय हैं। तिब्बत में बौंन धर्म के ऐतिहासिक लिखित प्रमाण 11 वीं सदी से मिलते हैं और 14 वीं शताब्दी में बौंन धर्म का धर्मिक पुनर्गठन हुआ। यह बौंन धर्म ‘तोनपा-शेन-रब’ के द्वारा स्थापित किया गया था, जो शाक्य मुनि गौतम से भी पहले के युग से बौद्ध थे। बौन धर्म का मूल विहार मेनरी मोनेस्ट्री है। जो दुनिया भर के बौंन धर्म अनुयायियों का सबसे बड़ा केन्द्र है। मेनरी का अर्थ- औषधियों का पर्वत होता है। इस मोनेस्ट्री की स्थापना सदियों पहले पश्चिम तब्बत में हुई थी। चीनी कब्जे के बाद कई बचे बौंन धर्मावलम्बी भारत और सीमान्त देशों में भाग आए। दोलाजी का मौजूदा विहार, मूल मेनरी विहार के नाम से फिस नामक स्थान में बनाया गया। सन् 1969 में यहाँ मौजूद ‘पुंगडुंग बौंन पुस्तकालय’ बनाया गया, जहाँ दुनिया भर के बौंन साहित्य का सबसे बड़ा संग्रह है। बौंन धर्म का अनुयायी प्रमुख देवाल्या ‘मिवो-शेन-रब’ ‘शेन-रब-मिवोचे’ को मानते हैं। अनुयायी इन्हीं की पूजा अर्चना करते हैं। जी-टुची के अध्ययन वर्णन में ‘मिये-शेन-रब’ का स्वरूप बुद्ध की तरह ही एक पाषाण कमल पर आसीन चित्रण किया गया है। स्नेल ग्रोव ने मूल बौंन देवाल्या ‘कुन्तु-जाग्पो’ तो ‘म्वै-शेन-रब गुरु शेन-रब’ को बताया। बौंन धर्म का गढ़ (केन्द्र) ‘ख्युग-लुग व छपराड़’ दोनों प्रान्त के मध्य स्थित ‘शाग-शगु’ प्रान्त माना, जहाँ कैलास मानसरोवर स्थित है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग का उल्लेख हिन्दू साहित्य ‘स्कन्द पुराण’ के मानस खण्ड के अध्याय 1 में भी वर्णन किया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार कैलास पर्वत पर तपस्थल ब्रह्मा, वशिष्ट तथा दधिची के पुत्रों ने प्रतिदिन मन्दाकिनी नदी की स्नान यात्रा से मुक्ति पाने के लिये ब्रह्मा से कैलास पर्वत पर स्थान की व्यवस्था करने की मांग की तब देव ब्रह्म ने अपनी मानसिक-शक्ति के मानसर (मानसरोवर ताल )का सृजन किया। उस आदि काल से ही प्रतिवर्ष उत्तराखण्ड हिमालय पर्वतों को पार कर बड़ी संख्या में हिन्दू तीर्थयात्री भोले कैलाशपति के दर्शन के लिये कैलास मानसरोवर तीर्थ की यात्रा में जाते हैं। दार्शनिक जी-टुजी ने अपने पुस्तक Tibet land of Snow में ब्रह्मा का उल्लेख करते हुए कहा, कैलास मानसरोवर हिन्दुओं, बौद्धों और बौंन तीन धर्म , धर्मावलम्बियों का मुख्य तीर्थ स्थल है। 18वीं शताब्दी में तिब्बत के बौंन अनुयायी क्षेत्रों पर दजुन्गर कबीलों का कब्जा हो गया। लामाओं और बौंन धर्मावलम्बियों को पकड़ कर जेल में ठूंस दिया गया। उस समय बौंन धर्मावलम्बियों अनुयायियों का लगातार मन्त्र पढ़ने से जीभ का रंग काला पड़ जाता था। इस लिये दजुन्गर अधिकारी इन बौंन अनुयायियों से मिलने आये। हर व्यक्ति को अपनी जीभ दिखानी पड़ती थी ताकि दोनों व्यक्तियों का परस्पर पहचान कर सकें कि वहाँ लाया है या नहीं। कालान्तर में लोगों के बीच यही अभिवादन का तरीका बन गया था। आज भी तिब्बत में लोग एक दूसरे का अभिवादन जीभ दिखाकर ही करते हैं।
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली तिदांग में सर्वप्रथम ‘जैं रंचिम सैं’ का युग था। फिर सुम कच्यरों पैं (तीन कच्यरों भाई) का युग आया। उसके बाद तिदांग में ‘ह्या छूड.ग सैं’ का युग आया। ह्या छूड.ग से जब अपने मूल निवास स्थान- किदांग, तिब्बत से पश्चिम-दक्षिण हिमालयी क्षेत्र में भ्रमण करने निकले, तिदांग की अलौकिक सुन्दरता यहाँ से चारों ओर दिखाई देने वाला प्राकृतिक नैसर्गिकता और ग्राम जनों का परस्पर स्नेह को देखकर तिदांग को ही अपना निवास स्थान बनाने का निश्चय किया। तब ग्राम- तिदांग, नदी के पास का उच्च मैदानी भू-भाग ‘आधा नमीयुक्त हरियाली और आधा बंजरनुमा भूभाग’ हुआ करता था। समय बीतने के साथ-साथ हरियाली नुमा बंजर (सूखते जा रहे) होते जा रहे खेतीनुमा भू-भाग के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने जाना कि इस भू-भाग के नीचे बड़ा सा पत्थर है। इस पत्थर के नीचे एक साँप (खोबू) रहता है, जिसके तासीर (ताप) से तिदांग गाँव का मैदानी खेती युक्त भू-भाग बंजर होते जा रहा था, इस साँप को मारने के लिये ह्या छूड.ग सैं ने ‘चूहा और गरुड़ पक्षी’ का रूप धारण कर साँप को बाहर निकालकर उसे मार डाला और मरे हुए साँप को अपनी चोंच में पकड़कर आस-पास के ग्रामों में घुमा-घुमाकर हवाई रास्ते से किदांग (तकलाकोट )क्षेत्र ले जाकर दफना दिया। इस दौरान जब ह्या छूड.ग सैं वापस दितांग गाँव में पहुंचते हैं तो तिदांग की 30 प्रतिशत बजंर (सूखते) मैदानी भू-भाग, हरा-भरा खेतीनुमा मैदानी भू-भाग में बदल गया। जिस हरा-भरा खेती नुमा मैदानी भू-भाग में साँप की तासीर का प्रभाव अत्यधिक पड़ा उस भू-भाग में आज से 300-400 साल पहले तक उसका प्रभाव साफ दिखाई देता था। ऐसा बड़े-बुजुर्ग जनों का कहना है। इस भौगोलिक परिवर्तन को देखकर सभी ग्रामजन खुश हुए और ह्या छूघग सैं की दिव्य शक्ति को देखकर ग्रामजनों ने उनका धन्यवाद किया। और उन्हें यहीं रहने का आग्रह करते हुए उनको प्रतिष्ठित कर पूजा-अर्चना का विशेष आयोजन किया। ग्रामजनों की श्रद्धापूर्वक भक्ति को देखकर ह्या छूड.ग सैं ने ग्राम तिदांग को ही अपना स्थाई निवास बनाने का निर्णय किया। तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ के युग के दौरान बौन-ग्राम में एक शक्तिशाली तंत्र-मंत्र ज्ञाता (विद्वान) ‘हबा लाटौ’ रहता था। दारमा के ग्राम्य जनों के द्वारा देवी-देवताओं को पूजा-पाठ के माध्यम से चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा, बौन के तंत्र-मंत्र ज्ञाता हबा लाटौ इस चढ़ावा को देवी-देवताओं से पहले स्वतः ग्रहण कर लेते थे, जिससे देवी-देवताओं को यह चढ़ावा उन तक नहीं पहुंच पाता था। इस समस्या को हल करने के लिए भोले शिव के अवतारक दाँतू (दंग्तो) ‘‘ह्या गबला देव’’ ने अपने तपोस्थली ग्राम दाँतू के दं थं प्रांगण में दारमा के सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया। सभी देवी-देवतागण निमंत्रण मिलते ही सोंग (ग्राम) दं थं प्रांगण में उपस्थित हो गए। तिदांग ह्या छूड.ग सैं भी साधारण व्यक्ति के समान तिब्बती पहनावा व टेढ़ी टोपी पहनकर टट्टू (गधा) में सवार होकर सभा प्रांगण में पहुंचे। किसी देवी-देवताओं ने भी ह्या छूड.ग सैं की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया। ह्या छूड.ग सैं सभा प्रांगण से कुछ दूरी पर बैठकर सुस्ताने लगे। अपने टोपू (हुक्का) में तम्बाकू भरकर गधा (बाँगजु) के त्यागा (काठी) से च्यामा (आग प्रज्जवलित करने का पदार्थ) रगड़ कर आग पैदा की और तम्बाकू सुलगा कर हुक्का पीने लगे, तत्काल अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी मुट्ठी तेजी से जमीन की ओर फैंका, उस स्थान से फव्वारे की तरह पानी निकल आया। जिससे ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने वह पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। सभा में उपस्थित सभी देवी-देवतागण इस अद्भुत दिव्य-शक्ति को देखकर अचम्भित हो गए। सभी देवी-देवता ह्या छूड.ग सैं की असाधारण दिव्य-शक्ति देकर सभा में स्थान ग्रहण करने को कहा, लेकिन ह्या छूड.ग सैं ने कहा- ‘मैं अपनी जगह पर ही ठीक हूं। आप अपनी सभा प्रारम्भ कीजिए।’ सभा में ‘हबा लाटो’ के विषय पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, इस समस्या का निवारण करने के लिए जैं श्री ह्या गबला देव ने सभा में उपस्थित प्रत्येक देवी-देवता गणों से पूछा/प्रश्न किया। ह्या छूड.ग सैं के अलावा सभी देवी-देवताओं ने इस विषय में असमर्थता व्यक्त की। आंखिर में ह्या छूड.ग सैं से प्रश्न किया। उन्होंने सिर हिलाते हुए हामी भर दी। साथ ही ‘होला दम्फू सैं’ ने भी हाथ खड़ा कर हामी भरा। तब ह्या गबला देव, होला दम्फू सैं से पूछता है कि तुमने हाँ किस लिये किया। तब दम्फू सैं ने उत्तर दिया कि ‘ह्या छूड.ग सैं मेरे मामा हैं। इस समस्या को हल करने में जो कार्य वे मुझे सौंपेंगे, मैं वह कार्य करूंगा।’ इस प्रकार सभा पूर्ण हुई। सभी देवी-देवता गण अपने-अपने निवास स्थान को चले गए। ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू में सवार होकर तिदांग के लिए रवाना हो गए। ह्या छूड.ग सैं की अद्भुत दिव्य शक्ति और हबा लाटौ विषय पर कार्य सपफलता की परीक्षा लेने के लिए ह्या गबला देव ने उनके पीछे से तीव्र आंधी-तूफान प्रहार किया। जैं श्री ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू को तेजी से दौड़ाते हुए इतनी तेजी से ढाकर ‘गिलीघ’ नामक मैदान मेें पहुंचे , कि आंधी-तूफान भी उन्हें छू नहीं सके और वह तूफान उनकी टेड़ी टोपी को भी हिला न सका। तभी इस घटनाक्रम से ह्या गबला देव को पूर्ण विश्वास हो गया कि ह्या छूड.ग सैं के पास ही ऐसी शक्ति है जो हबा लाटौ जी के द्वारा देवी-देवताओं का प्रसाद जबरदस्ती ग्रहण करने की समस्या से निजात दिलाएगा। उस जमाने में तिब्बती लोग अपने भेड़-बकरियों, याक में नमक, सुहागा, छयूरा और अन्य सामग्री लादकर दारमा-पश्चिम तिब्बत सीमान्त परिक्षेत्र में व्यापार के लिए आया-जाया करते थे और दोनों क्षेत्र के व्यापारी परस्पर मित्रता रखा करते थे, ग्राम-बौन के हबा लाटौ का भी तिब्बती व्यापारियों से घनिष्ट मित्रता थी। तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने अपने अपनी दिव्य मंत्र-शक्ति का प्रयाग कर तिब्बती चन (भूत) का आह्वान किया और उसे हिदायत देते हुए कहा कि तुम अपने कुछ साथियों को लेकर सैकड़ों भेड़-बकरियों के साथ गो से आगे गोतो-रामा के मैदान में सही समय और मौसम को देखकर प्रकट हो जाना। एक दिन ह्या छूड.ग सैं को तिब्बती चन (भूत) ने रामा गोतो दं (उंचा स्थान) के मैदान में प्रकट होने का सन्देश भिजवाया और तभी ह्या छूड.ग सैं ने ‘लिंकम दं थं’ व ‘गोतो दं’ के बीच का चट्टानी रास्ता पूर्णतया बर्फ से ढकवा दिया और अपने भान्जे ‘होला दंफू सैं’ को ‘बौर बा लाटौ’ के पास व्यापारिक सूचना सूचित करने के लिए भेजा और हबा लाटौ जी से कहना तुम्हारे तिब्बती व्यापारिक मित्रगण अपने सैकड़ों भेड़-बकरियों और विनिमय सामान के साथ ‘रामा-गोतो दं’ (उंचा स्थान) के थं(मैदान) में डेरा लगाकर बैठे हैं, और तुम्हें जल्दी से जल्दी मिलने के लिए कहा है। इस पर हबा लाटौ जल्दी-जल्दी अपने मित्रों से मिलने के लिए अपने निवास स्थान से व्यापारिक परिक्षेत्र की ओर रवाना हो गया और जब ‘गोतो-लिंकम दं’ (उंचा स्थल) का पहाड़ी रास्ता बर्फ से ढका हुआ दिखाई दिया, तब ‘बौन हबा लाटौ’ बर्फ में डूबने व फिसलने से बचने के लिए तन्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए, अपने जेब से ‘सरसों का दाना’ निकालकर अपने से आगे फैंकते गया, सरसों का दाना फेंकते ही सरसों के दाने का पत्थर बन गया। उन्हीं पत्थरों में छलांग लगाते हुए, आगे बढ़ते गए। जैसे ही बर्फीला आधा रास्ता तय कर लिया, तब उनका सरसों का दाना खत्म हो गया, अब ‘हबा लाटौ’ का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। साथ ही पीठ पीछे के सरसों से बना पत्थर भी अदृश्य हो गया, उसी समय तिदांग ह्या छूड.ग सैं ने उपर पहाड़ से बर्फ का बर्फीला तूफान करवाया और हबा लाटौ का अन्त हो गया। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर हबा लाटौ दब गया था, वहाँ पर बहुत बड़ा टीला बन गया, जो अभी भी मौजूद है। तंत्र-मंत्र ज्ञाता ‘हबा लाटौ’ को मारने के बाद इलाके के सभी देवी-देवतागणों को मनुष्यों के द्वारा चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा पूजा-पाठ खाद्य सामग्री सर्वप्रथम मिलना शुरु हो गया। ‘जैं हो किदांग जु (के)- तदांग ह्या छूड.ग सैं’
इतिहास डाॅ. मदन चन्द्र भट्ट तिब्बत के लिए पुराणों में त्रिविष्टप, उत्तर कुरू, हूण देश और भोट नामों प्रयोग होता रहा है। मध्य प्रदेश में खजुराहो के चन्देल राजा यशोवर्मा ;925-950 ई. की प्रशस्ति मिली है। उसमें कहा गया है कि बैकुण्ड ;शेषशायी नारायण की एक मूर्ति भोट के राजा ने अपने मित्र कीर ;कांगडा के राजा को भेंट की ‘कैलासाद् भोटनाथः सुहृद इति कीरराजः प्रपेदे’ इसका अर्थ है दसवीं सदी में तिब्बत को ‘भोट’ कहते थे और भोटिया वहाँ के राजा थे। कश्मीर से प्राप्त कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी में भोट के निवासियों को ‘भौट्ट’ कहा गया है। इसी भौट्ट शब्द से भोटिया शब्द बाल्हीक प्राकृत में बना जिसका अर्थ है- भोट का रहने वाला। इसी तरह का शब्द ‘खषिया’ भी है जिसका अर्थ है- खष देश का रहने वाला। अलमोड़िया, कुम्मैयाॅ, गढ़वाली, शोर्याल आदि भी इसी तरह के नाम हैं। कई जातियों के नाम भी स्थान बोधक हैं जैसे नौटी का रहने वाला नौटियाल, पोखरी का रहने वाला पोखरियाल आदि। स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में जहाँ कुमाउ के पर्वत, नदी, मन्दिर और जातियों का विस्तार से वर्णन है, वहीं शौक, भोटिया और रं जातियों का कोई उल्लेख नहीं है। इसमें काली नदी को ‘श्यामा’ कहा गया है और उसके उद्गम स्थल पर महाभारत के लेखक व्यास रिषि का चर्चित आश्रम बताया गया है। दारमा के ‘दर’ स्थान पर धर्माश्रम, मुनस्यारी में परशुराम आश्रम और छिपुलाकोट में कश्यप रिषि का आश्रम था। भोटिया आक्रमण में ये सब नष्ट हो गये। आज मुन्स्यारी में कोई भी नहीं जानता कि वहाँ पर रामायण में चर्चित परशुराम मुनि का आश्रम था। ‘स्यारी’ शब्द संस्कृत भाषा में उर्वर खेत के लिए प्रयुक्त है। मुन्स्यारी का अर्थ मुनि का खेत। ये मुनि परशुराम थे। मानसखण्ड के रामेश्वर महात्म्य के अनुसार परशुराम ने रामेश्वर से कैलास तक पैदल मार्ग बनवाया था। इसी कारण पूर्वी रामगंगा का असली नाम ‘परशुराम गंगा’ पड़ा जो बाद में रामगगा हो गया। उस समय आधुनिक नन्दादेवी पर्वत को ‘मेरू’ पर्वत और शिवालिक को ‘मन्दर’ पर्वत कहते थे। तिब्बत में पूर्व की ओर यक्ष और पश्चिम की ओर गन्धर्व रहते थे जो सार्थवाह परम्परा के व्यापारी थे। जहाँ दसवीं सदी में खजुराहों लेख कैलास में भोटिया राजा का अधिकार बताता है, वहीं मानसखण्ड कैलास में ‘विद्याधर’ जाति का अधिकार बताता है। मानसखण्ड का प्रारम्भ ही निम्न पद से हुआ है- ये देवा सन्ति मरौ वरकनकमये मन्दरे ये च यक्षाः पाताले ये भुजंगाः फणिमणिकिरणाध्वस्त सर्पान्धिकाराः। कैलासे स्त्रीविलासः प्रमुदितहृदयाः ये च विद्याधराद्यास्ते मोक्षद्वारभूतं मुनिश्वरवचनं श्रोतुमायान्तु सर्वे।। अर्थ- जो देवता श्रेष्ठ एवं स्वर्णिम मेरू में रहते हैं, जो यक्ष मन्दर पर्वत में रहते हैं, अपने फण की मणियों से जो अन्धकार का नाश करने वाले पाताल निवासी नाग हैं तथा कैलास में आनी स्त्रियों के साथ विलास करने वाले विद्याधर रहते हैं, वे सब मोक्ष प्राप्ति के साधन इस मानसखण्ड की कथा को सुनने के लिए आमंत्रित हैं। मानसखण्ड द्वितीय शदी ई.पू. में शुुंग राजाओं के शासनकाल में लिखा गया। उस समय तिब्बत को भोट नहीं कहते थे। राजतरंगिणी के अनुसार हूण राजा मिहिस्कुल की सेना में भौट्ट सैनिक थे। इसका अर्थ है 165 ई.पू. की मध्य एशिया की भगदड़ से पहले भौट्ट शक और हूणों के साथ चीन की सीमा पर रहते थे। सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने अपनी पुस्तक ‘सी-यू-की’ में ब्रह्मपुर राज्य के उत्तर में स्त्रीराज्य का उल्लेख किया है। अलमोड़ा संग्रहालय में सुरक्षित पर्वताकर राज्य के दो ताम्रपत्रों से पता चलता है कि सातवीं सदी में ब्रह्मपुर अलमोड़ा का नाम था। उसके उत्तर में स्थित हिमाच्छादित पर्वतों में ह्वेन्सांग सुवर्णागोत्र के स्त्रीराज्य का उल्लेख करता है। बाणभट्ट से पता चलता है कि यह स्त्रीराज्य किरातों की औरतों ने बनाया था। इसकी राजधानी सुवर्णापुर आधुनिक ‘छिपुलाकोट’ में थी। स्त्रीराज्य का उल्लेख ह्वेन्सांग के अलावा जैमिनीय आश्वमेधिक, हर्षरचित, बृहत्संहिता और पुराणों में भी पाया जाता है। इससे स्पष्ट है कि शौका और भोटिया सातवीं सदी तक तिब्बत में थे, उसी के बाद उन्होंने स्त्रीराज्य का अन्त कर दारमा और जोहार पर कब्जा किया। शुनपति शौक इस राज्य का अन्तिम राजा था जिसे कत्यूरी राजा धमदेव ;1400-1420 ई. ने परास्त कर कैलास मानसरोवर को कत्यूरी साम्राज्य में मिला दिया। शुनपति शौक की लड़की राजुला ‘कन्योपायन’ के रूप में कत्यूरियों की ग्रीष्मकालीन राजधानी बैराट आयी थी। धामदेव का बेटा मालूशाही और उसके सौन्दर्यी पर मुग्ध् हो गया और उससे विवाह की जिद करने लगा। कत्यूरी साम्राज्य एक गणराज्य था जिसमें बारह रजबार और दो आलें थीं। सबने इस विवाह का विरोध् किया। मालूशाही ने राजुला के कारण कत्यूर की गद्दी छोड़ दी और बैराट में रहने लगा। उसके बेटे मल्योहीत और पौत्र हरूहीत को भी कत्यूर की गद्दी नहीं मिली।
कार्यालय प्रतिनिधि उत्तराखण्ड से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर चाौकसी बढ़ा दी गई है। चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद भारत की ओर से सीमा पर सख्ती की गई है। चीन तो भरोसे लायक कतई नहीं है इसे पूरी दुनिया जानती है लेकिन नेपाल के साथ भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। ऐसे में सीमा पर रहने वालों को नेपाल के कदम से असहजता बनी हुई है। नेपाल की नेशनल असेम्बली ने देश के राजनीतिक एवं प्रशासनिक नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों को शामिल करने के लिये संविधन संशोध्न विधेयक को पारित किया है। लिपुलेख, कालापानी और लिपिंयाध्ुरा इलाकों पर भी वह दावा कर रह रहा है। भारत और नेपाल के बीच उस समय तनाव पैदा हो गया था जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को प्रदेश में लिपुलेख दर्रे को धरचूला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किमी लम्बी सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल इस सड़क के उद्घाटन के समय से क्षेत्रा पर अपना दावा कर रहा है जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि यह सड़क पूरी तरह उसके अपने भू-भाग पर स्थित है। चीन की हरकत के बाद सीमा पर भारतीय जवान सक्रिय हैं। वहीं नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रा को अपना बताकर नक्शा जारी करने के बाद से सीमा पर गश्त बढ़ा दी गई है। झूलाघाट, जौलजीवी, धारचूला, बनबसा सहित सारे रास्तों पर एसएसबी के जवान चप्पे-चप्पे पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय झूला पुलों की निगरानी के साथ ही महाकाली नदी के किनारे बल बढ़ाया है। नेपाल की कार्रवाई से बुद्धिजीवियों ने नाराजी जताई है। रोटी-बेटी का सम्बन्ध् होने के बावजूद इस प्रकार की फितरत नेपाल में कैसे पनपी इसके पीछे चीन की साजिश की बू को माना जा रहा है। नेपाल के फैसले से सीमा क्षेत्र के लोगों में रोष है क्योंकि नेपाल से हजारों लोगों की रोटी भारत में ही है। साथ ही आम जनता हर प्रकार के दुःख-दर्द में एक-दूसरे के साथ सहभागी हैं। शादी-विवाह, पूजा-पाठ से लेकर रश्मों को साथ-साथ निभाया जाता है। पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड एवं मुख्य केन्द्रीय संरक्षक नृपसिंह नपलच्याल ने नेपाल की एकतरफा कार्रवाई को अचरज भरा बताते हुए कहा कि दोनों राष्ट्रों को मैत्राीपूर्ण वातावरण में वार्ता से विवाद का समाधान निकालना चाहिये। श्री नपलच्याल ने सीमान्त के सभी भारतीय व नेपाली बन्ध्ुओं से अपील की कि वह भड़काउ बयाजबानी न करें। पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी पर चीन के सम्प्रभुता के दाबे को भारत ने पूरी तरह खारिज किया है और चीन की हरकतों को देखते हुए सीमाओं पर हाईअलर्ट किया है। अकड़ में रहने वाले चीन ने भारत के रुख और उसके उत्पादों के बहिष्कार की बात सुनकर बातचीत में सकारात्मकता दिखाई है। लेकिन वह धोखेबाज के रूप में है। ऐसे में उत्तराखण्ड की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर भी कड़े इन्तजाम कर दिये गये हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1962 मंे चीन द्वारा छल किया गया था। उस युद्ध में उसकी हड़प नीति सबने समझ ली थी। तिब्बत को पूरी तरह अपने कब्जे में करने वाले चीन के कारण तिब्बतियों को परेशान होना पड़ा है। उत्तराखण्ड की सीमान्त घाटियों के व्यापारियों का पूरा कारोबार तिब्बत पर केन्द्रित था और तिब्बती व्यापारियों के साथ उनकी अच्छी मित्रता रही है। चीन की हरकत के बाद तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और सीमान्तवासियों के कारोबार भी बदले, पलायन हुआ। तिब्बत से बड़ी संख्या में लोग भारत आ गये।