जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं ‘ईष्ट देव’ ग्राम- सेला

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी के ग्राम सेला, जन प्राचीन काल से ही जैं ‘श्री ह्या पुक्टांग’ सैं को अपना ईष्ट देव/स्यंग सैं मानते हैं। सेलाल जनों का /सेलालों का मानना है कि जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं सृष्टि की रचना के समय से ही धरती पर अवतरित हुए और वे आदि देव महादेव का ही अवतारक शिव अंश है।
ग्राम सेला की उत्तरी दिशा में विशाल ‘पांगर’ के वृक्षों के मध्य ‘श्री ह्या पुक्टांग सैं’ का मूल मन्दिर स्थित है। श्रद्धालु श्रद्धासुमन भाव से ह्या पुक्टांग सैं के मूल मन्दिर में नतमस्तक होकर सुख- शान्ति, समृद्धि , सौभाग्य प्राप्त होने का वरदान मांगते हैं। सच्चे मन से मांगे गये वरदान जरूर पूर्ण होते हैं। ग्राम सेला वासियों का मानना है कि ह्या पुक्टांग सैं सृष्टि के पालनहार है और वे दिव्य शक्तियों से परिपूर्ण ‘शिव अंश’ है।
जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं की महिमा- जैं ह्या पुक्टांग सैं की महिमा का साक्षात दर्शन ग्राम डंगरिया /धामी के द्वारा ग्राम जनों को होता है। सभी ग्रामवासी मिलकर जब सैंथान /भगवान का स्थल में ‘नौर्ता’ /जागर का आयोजन करते हैं, ढोल, दमै-छिलांग की आवाज पर डंगरिया /धामी के शरीर में ईष्ट देव अवतरित होते हैं। डंगरिया /धामी जी के ज्येष्ठ पुत्र ही धामी होते हैं, उन्हें ईष्ट देव के दिशा-निर्देशानुसार नियम का पालन करना पड़ता है। डंगरिया जी के दिशा निर्देशानुसार में ग्राम के सभी प्रकार के संस्कार सम्पन्न होते हैं। आदि काल से ही ‘ह्या पुक्टांग सैं’ ने गाँव की रक्षा हेतु एक ऐसी व्यवस्था बनाई है कि जब ईष्ट देव ‘जैं ह्या पुक्टांग सैं’ जप-तप और साधना में लीन होते हैं, तब ग्राम को अयाल-बयाल, रोग-ब्याग, प्राकृतिक विपत्ति और अन्य बाहरी समस्याओं से बचाने के लिए ईष्ट देव भैरव के रूप में ‘श्री हुल्ला सैं’ को ग्राम रक्षक के रूप में नियुक्त करते हैं। यूं तो समय-सम पर भक्तजनों को ह्या पुक्टांग सैं की अपार दिव्य शक्तियों की कृपा से हम सब रं जन परिचित हैं परन्तु कुछ साक्षात घटनाएं इस प्रकार हैं-

घटना 1- आज से लगभग चार दशक पूर्व की बात है, जब ‘जैं ह्या पुक्टांग सैं’ के देवालय स्थल पर ग्रामजनों ने नौर्ता /जागर लगा रखा था, उस दिन सुबह से ही गर्जना भरी घनघोर मूसलाधार बारिश हो रही थी। नौर्ता /जागर में आग की धूनी जल रही थी। फिर भी इस धूनी के चारों ओर लोग पेड़-पत्थरों की आड़ में दुबक कर बैठे थे, तभी ग्रामजनों की इस भक्ति से प्रसन्न होकर धामी श्री दरपान सिंह जी के शरीर में साक्षात ह्या पुक्टांग सैं अवतरित हुए और उन्होंने अपने हाथों में अक्षत /ठुमू पछम लेकर मसलते हुए आसमान की ओर उछाल कर बारिश को रुकने का दशारा किया, देखते ही देखते एकाएक बारिश रुक गयी। घनघोर मौसम पूरी तरह साफ हो गया और जागर का कार्यक्रम सुचारु ढंग से चलता रहा।

घटना 2- ‘जैं ह्या पुक्टांग सैं/स्यांग सैं’ के मूल स्थल पर एक दिन पूजा-पाठ नौर्ता /जागर के दौरान कुछ महिलाओं के शरीर पर देवी अवतरित होने लगी, इस साक्षात दैवीय घटनाचक्र को शान्त करने के लिए ईष्ट देव/ स्यांग सैं ने डंगरिया /धामी ‘मुख्य पंडित’ के शरीर में अवतरित होकर अक्षत /ठुमू पछम के कुछ दाने साक्षात देवी घटनाचक्र /कांपती हुई, महिलाओं की ओर उछाल दिये, देखते ही देखते अवतरित देवी ‘कांपने वाली सभी महिलाएं’ शान्त होकर अपने-अपने स्थान पर जागर बैठ गई। इससे स्पष्ट हो जाता है कि र्दष्ट देवता ‘ह्या पुक्टांग सैं’ की अनुमति के बिना उनके जागर में अन्य कोई देवी-देवता किसी भी भी रूप में अवतरित नहीं हो सकते हैं।

घटना 3- एक और नौर्ता /जागर के दौरान की बात है। ‘ह्या पुक्टांग सैं’ /जैं इष्ट देव की जैं जागर स्थल में गाँव और रिश्तेदारों के विशाल जन समूह एकत्र थे। रात्रि के लगभग 8.30 बजे का समय था, जब डंगरिया /धामी जी के शरीर में ईष्ट देव अवतरित हुए। वहाँ उपस्थित लोगों ने देवता से विनती की कि- हे ईष्ट देव! बाघ ने हमारे जानवरों को विचलित कर रखा है और लगातार जानवरों की हत्या कर रहा है। हमारे उपर इसके समाधान हेतु कृपा करें। तभी तुरन्त धामी जी ने तीन बार सीटी बजायी। देखते ही देखते बाघ उछलते हुए, हवा की गति सी तेज रफ्रतार से मन्दिर परिसर के उपर आकर बैठ गया। जीभ बाहर निकाल लपलपाने लगा। सभी ग्रामजन यह देख भयभीत हो गये, सभी ने ईष्ट देव-हे ईष्ट देव रक्षा करें का उच्चारण किया। धामी जी ने एक लाल कपड़े की ध्वजा /दाजा से अक्षत /ठुमु पछुम बांधकर जलती धूनी के अंगारों के बीच से राख उठाकर, मंत्र फंूककर एक गाँठ बनाई और बाघ के गले में बाँध् दिया। साथ ही उसके कानों में मंत्र सिद्ध कर धूनी के चारों ओर परिक्रमा करवा कर, दूर जंगल की ओर जाने का इशारा किया। और वह बाघ जंगल की ओर चला गया। डंगरिया ने कहा कि अब यह बाघ हमारे गाँव में नहीं दिखाई देगा। इस घटनाक्रम को देखकर लोग अचम्भित रह गये। उन्हेें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो घटनाक्रम घटा वह सच्चाई है या स्वप्न था। जैं ईष्ट देव की इस माया को देख लोग प्रसन्न, भाव-विभोर हो गये और स्वयं को सेला-ग्रामजन समझकर बहुत धन्य समझने लगे।

ये तीन-चार साक्षात घटनाक्रम के साथ ‘जैं श्री ह्या पुक्टांग सैं’ की अन्य माया-कृपा ग्राम डंगरिया जी /धामी के माध्यम से ग्रामजनों को सन्तान प्राप्त करना हो या किसी जंगली जानवरों के आतंक-भय से ग्राम के जानवरों को बचाना हो, फसली मौसम पर कृपा करवानी हो, या किसी भी प्रकार की परेशानियों को ईष्ट देव/स्यांग सैं ;जैं ह्या पुक्टांग सैं जागर /नौर्ता के उन फलों में साक्षात धामी जी के शरीर में अवतरित होकर हमें आशीर्वाद देता है और समस्याओं का समाधान कर हमारे उपर कृपा करते हैं। हम ‘सैं समा’ के हमेशा रिणी रहेंगे.

महादेव अवतार ‘जैं श्री गबला देव’

दारमा घाटी’
नरेन्द्र सिंह दताल
उत्तराखण्ड हिमालयी भू-भाग हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं का निवास स्थान है। इस कारण उत्तराखण्ड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। इसका प्रमाण आदिकाल से ही मिलता है।
उत्तराखण्ड के अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त क्षेत्र लुग्बा रं क्षेत्र में पौराणिक कैलास पति महादेव जी का अवतार माने जाने वाले वरदानी देव/न्यायप्रिय, न्याय का देवता ग्राम दांतू में प्रतिष्ठित हैं, जिसे हम रं जन ‘जय श्री ह्या गबला देव’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। इसे दांतू/दंग्तों जय श्री ह्या गबला देव भी कहते हैं। यह ग्राम दांतू, तहसील धारचूला, जिला पिथौरागढ़ के ‘दारमा घाटी’ में स्थित है। जैं श्री ह्या गबा देव जी की वेषभूषा ‘रंगा-सिले’ सफेद रंग का धरण कर ढाल-तलवार शस्त्र लेकर सफेद घोड़े की सवारी करते हैं। वर्तमान समय तक में जय श्री ह्या गबला देव रं लुंग्बा के लगभग अधिकृत ग्राम में विराजमान है। यह श्री ह्या गबला देव को लोग ‘जन देवता’ भी कहते हैं।
जै श्री ह्या गबला देव को अधिकतर रं ग्रामजन परमपिता ईष्टदेव मानते हैं। कष्ट, दुःख, विवादित न्यायिक समस्याओं से पीड़ित लोग अपने कष्ट, दुःखों का निवारण हेतु श्री ह्या गबला देव ईष्ट देव की शरण में आते हैं।
ऐसी मान्यता है कि प्राचीन समय में श्री ह्या गबला देव जन न्याय करवाने के लिये ग्राम दांतू के ‘हैली/सैली पंग् दंग् थंग् मैदान’ में सभी पक्ष-विपक्ष व ग्राम प्रमुखों की उपस्थिति में सभी समस्याओं का निवारण करते थे। ग्राम दांतू/दंग्तों को प्रागैतिहासिक काल से ही ऐतिहासिक ‘ग्राम’ माना जाता है क्योंकि यह भूमि सर्वप्रथम ह्या गबला देव की जन्मभूमि, कर्मभूमि, न्यायभूमि रही है। ग्राम दांतू वह भूमि है, जहां रं लुंग्बा के 36 कोटि देवी-देवताओं का पौराणिक काल से ही जय श्री ह्या गबला देव के प्रांगण में एकत्रित होकर सभी बिन्दुओं से सम्बन्धित विषय पर मंत्रणा व विचार गोष्ठी का आयोजन किया जाता था/है। इसी कारण ग्राम दांतू को श्री ह्या गबला देव का उच्च न्यायालय माना जाता है। जय श्री ह्या गबला देव के प्रांगण में देवी देवताएं अन्त में उत्सव मनाते हुए अपने अपने कर्मस्थली की ओर चले जाते थे।
ग्राम दांतू दारमा में हर वर्ष जय श्री ह्या गबला देव ‘दारमा महोत्सव’ के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। यह ‘गबला दारमा महोत्सव’ दारमा घाटी के सभी ग्रामों के गणमान्य बुद्धिजीवियों के विचार-विमर्श के द्वारा, सर्वप्रथम 1977 से हर साल अगस्त माह में मनाते आ रहे हैं। ग्राम दांतूम में आयोजित ‘प्रथम दारमा गबला महोत्सव मेला’ का मुख्य नेतृत्वकर्ता स्व. डूंगर सिंह ढकरियाल, स्व. नैन सिंह बोनाल, स्व. शेर सिंह दुग्ताल, स्व. ददिमल सिंह दताल, स्व. लक्ष्मण सिंह दताल, स्व. रूप सिंह दताल, ‘छैवा राठ’, सुन्दर सिंह बोनाल, देव सिंह दुग्ताल, धर्म सिंह बनग्याल, धर्मसिंह बोनाल और रूप सिंह दताल ;नेता जी थे और सभी दारमा रं ग्राम वासियों ने संयुक्त रूप से नेतृत्व व हर प्रकार से सहयोग कर बहुत सुन्दर मेला का आयोजन कराया गया था, जो आज भी हम सब रं वासी याद करते हैं। यह ‘गबला महोत्सव’ दामरा मेला 15 अगस्त से 30 अगस्त के मध्य शुभ दिन प्राकृतिक पुष्पीय व फसलीय पुष्पीय प्रकृति के बीच मनाया जाता है। अगस्त माह में प्राकृतिक व फसलीय सुन्दर पुष्पीय सुन्दरता देखने को मिलती है। इस गबला महोत्सव में तल्ला-मध्य-मल्ला दारमा ग्रामों के ग्रामवासियों के अतिरिक्त व्यांस, चैंदास घाटी के लोग और तहसील धारचूला के अन्य लोग शामिल होते हैं।
जय श्री ह्या गबला महोत्सव ;दारमा गबला महोत्सवद्ध में सर्वप्रथम सभी रं ग्राम प्रतिनिधि और रं मं जन सामूहिक गबला पूजन कर महोत्सव का शुभारम्भ करते हैं। यह ‘दारमा महोत्सव’ का कार्यक्रम तीन दिनों तक चलता है। इस मेले में सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेलकूद क्रियाकलाप और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन को संचालित करवाने में हिमवीर आईटीबीपी ढाकर-दारमा घाटी बटालियन भी सहयोग कर श्री ह्या गबला देव का पूजन कर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
ह्या सम्बोधन-
जैं/जय श्री ह्या गबला देव न्याप्रिय उदार, न्यायवादी, परोपकारी, प्रजा सेवक के रूप में कार्य करने की मानवीय प्रवृत्ति के कारण हम सभी रं जन उनके नाम के आगे ह्या ;बड़े भाई शब्द को जोड़कर जय श्री ह्या गबला देव के नाम से सम्बोधित करते हैं।
‘‘जै श्री ह्या गबला देव हम सब पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखना’’ दारमा घाटी’ नरेन्द्र सिंह दताल
उत्तराखण्ड हिमालयी भू-भाग हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं का निवास स्थान है। इस कारण उत्तराखण्ड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। इसका प्रमाण आदिकाल से ही मिलता है।
उत्तराखण्ड के अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त क्षेत्रा लुग्बा रं क्षेत्र में पौराणिक कैलास पति महादेव जी का अवतार माने जाने वाले वरदानी देव/न्यायप्रिय, न्याय का देवता ग्राम दांतू में प्रतिष्ठित हैं, जिसे हम रं जन ‘जय श्री ह्या गबला देव’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। इसे दांतू/दंग्तों जय श्री ह्या गबला देव भी कहते हैं। यह ग्राम दांतू, तहसील धारचूला, जिला पिथौरागढ़ के ‘दारमा घाटी’ में स्थित है। जैं श्री ह्या गबा देव जी की वेषभूषा ‘रंगा-सिले’ सफेद रंग का धरण कर ढाल-तलवार शस्त्रा लेकर सफेद घोड़े की सवारी करते हैं। वर्तमान समय तक में जय श्री ह्या गबला देव रं लुंग्बा के लगभग अधिकृत ग्राम में विराजमान है। यह श्री ह्या गबला देव को लोग ‘जन देवता’ भी कहते हैं।
जै श्री ह्या गबला देव को अधिकतर रं ग्रामजन परमपिता ईष्टदेव मानते हैं। कष्ट, दुःख, विवादित न्यायिक समस्याओं से पीड़ित लोग अपने कष्ट, दुःखों का निवारण हेतु श्री ह्या गबला देव ईष्ट देव की शरण में आते हैं।
ऐसी मान्यता है कि प्राचीन समय में श्री ह्या गबला देव जन न्याय करवाने के लिये ग्राम दांतू के ‘हैली/सैली पंग् दंग् थंग् मैदान’ में सभी पक्ष-विपक्ष व ग्राम प्रमुखों की उपस्थिति में सभी समस्याओं का निवारण करते थे। ग्राम दांतू/दंग्तों को प्रागैतिहासिक काल से ही ऐतिहासिक ‘ग्राम’ माना जाता है क्योंकि यह भूमि सर्वप्रथम ह्या गबला देव की जन्मभूमि, कर्मभूमि, न्यायभूमि रही है। ग्राम दांतू वह भूमि है, जहां रं लुंग्बा के 36 कोटि देवी-देवताओं का पौराणिक काल से ही जय श्री ह्या गबला देव के प्रांगण में एकत्रित होकर सभी बिन्दुओं से सम्बन्धित विषय पर मंत्रणा व विचार गोष्ठी का आयोजन किया जाता था/है। इसी कारण ग्राम दांतू को श्री ह्या गबला देव का उच्च न्यायालय माना जाता है। जय श्री ह्या गबला देव के प्रांगण में देवी देवताएं अन्त में उत्सव मनाते हुए अपने अपने कर्मस्थली की ओर चले जाते थे।
ग्राम दांतू दारमा में हर वर्ष जय श्री ह्या गबला देव ‘दारमा महोत्सव’ के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। यह ‘गबला दारमा महोत्सव’ दारमा घाटी के सभी ग्रामों के गणमान्य बुद्धिजीवियों के विचार-विमर्श के द्वारा, सर्वप्रथम 1977 से हर साल अगस्त माह में मनाते आ रहे हैं। ग्राम दांतूम में आयोजित ‘प्रथम दारमा गबला महोत्सव मेला’ का मुख्य नेतृत्वकर्ता स्व. डूंगर सिंह ढकरियाल, स्व. नैन सिंह बोनाल, स्व. शेर सिंह दुग्ताल, स्व. ददिमल सिंह दताल, स्व. लक्ष्मण सिंह दताल, स्व. रूप सिंह दताल, ‘छैवा राठ’, सुन्दर सिंह बोनाल, देव सिंह दुग्ताल, धर्म सिंह बनग्याल, धर्मसिंह बोनाल और रूप सिंह दताल ;नेता जी थे और सभी दारमा रं ग्राम वासियों ने संयुक्त रूप से नेतृत्व व हर प्रकार से सहयोग कर बहुत सुन्दर मेला का आयोजन कराया गया था, जो आज भी हम सब रं वासी याद करते हैं। यह ‘गबला महोत्सव’ दामरा मेला 15 अगस्त से 30 अगस्त के मध्य शुभ दिन प्राकृतिक पुष्पीय व फसलीय पुष्पीय प्रकृति के बीच मनाया जाता है। अगस्त माह में प्राकृतिक व फसलीय सुन्दर पुष्पीय सुन्दरता देखने को मिलती है। इस गबला महोत्सव में तल्ला-मध्य-मल्ला दारमा ग्रामों के ग्रामवासियों के अतिरिक्त व्यांस, चैंदास घाटी के लोग और तहसील धारचूला के अन्य लोग शामिल होते हैं।
जय श्री ह्या गबला महोत्सव ;दारमा गबला महोत्सवद्ध में सर्वप्रथम सभी रं ग्राम प्रतिनिधि और रं मं जन सामूहिक गबला पूजन कर महोत्सव का शुभारम्भ करते हैं। यह ‘दारमा महोत्सव’ का कार्यक्रम तीन दिनों तक चलता है। इस मेले में सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेलकूद क्रियाकलाप और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन को संचालित करवाने में हिमवीर आईटीबीपी ढाकर-दारमा घाटी बटालियन भी सहयोग कर श्री ह्या गबला देव का पूजन कर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
ह्या सम्बोधन-
जैं/जय श्री ह्या गबला देव न्याप्रिय उदार, न्यायवादी, परोपकारी, प्रजा सेवक के रूप में कार्य करने की मानवीय प्रवृत्ति के कारण हम सभी रं जन उनके नाम के आगे ह्या ;बड़े भाई शब्द को जोड़कर जय श्री ह्या गबला देव के नाम से सम्बोधित करते हैं।
‘‘जै श्री ह्या गबला देव हम सब पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखना’’