नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं

एन.सी.तिवारी से बातचीज
डॉ.पंकज उप्रेती
यह सच्चाई है कि सुख-दुःख के साथी और समय हर हमेशा मस्तिष्क में छाए रहते हैं। वर्तमान की दिखलावटी दुनिया में भले ही बहुत रंगीन नजारे खुशनुमा दिखते होंगे लेकिन इनकी रंगीनियत वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। जीवन के गहरे अनुभव और समाज में हमेशा सक्रियता निभाने वाले श्रीमान नवीन चन्द्र तिवारी (एन.सी.तिवारी) जीवन के उत्तरार्द्ध में भी समाज के लिये जीवट बने रहने का जोश अपने साथियों और युवाओं को दिलाते हैं। हल्द्वानी के जगदम्बानगर निवासी तिवारी जी की यादों में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी तक लम्बा सपफर है जिसमें नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं। बातचीज में वह कहते हैं- ‘दुर्गा-आनन्द स्मृतियों में हर वक्त हैं।’ ‘पिघलता हिमालय’ की स्थापना के समय और उससे पहले से ही इसके संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ जिस प्रकार की प्रगाढ़ता इनकी रही है वह परिवार के सयाने की ही हो सकती है।
अल्मोड़ा के शैल ग्राम निवासी श्रीबल्लभ तिवारी के सुपुत्र थे- कृष्णानन्द तिवारी। ये परिवार मूल रूप से सोमेश्वर के बेगनिया ग्राम का हुआ। माता दुर्गा देवी और पिता कृष्णानन्द जी के परिवार में 8 सन्तानें हुईं, जिनमें सबसे छोटे थे- नवीन तिवारी। 5 भाई 3 बहिनों में एन.सी.तिवारी बेशक छोटे रहे हों लेकिन अवसरों पर आगे बढ़ते हुए इन्होंने अपने रास्ते तय किये और सन् 1971 मंे इनका विवाह निर्मल जी के साथ हुआ। इनके परिवार में दो बेटियां प्रीति, संगीता (गुड़िया) और पुत्र विजय हुए। सभी गृहस्थ आश्रम के साथ अपनी परम्पराआंे से जुड़े हैं, जो उन्होंने श्रीमती निर्मल-श्री एन.सी.तिवारी से पाया।
अल्मोड़ा से बीएससी करने के बाद तिवारी जी इलाहाबाद पढ़ने गये लेकिन स्कूल-कालेज की शिक्षा से ज्यादा व्यवहारिक शिक्षा में रमने वाले एन. सी.तिवारी के भाग्य में कुछ और ही था। अल्मोड़ा में पढ़ाई के दौरान उनके साथियों में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी थे। यह विज्ञान वर्ग में थे जबकि मर्तोलिया कला वर्ग में। वह बताते हैं- ‘हमारे ग्राम शैल के प्रतिष्ठि व्यापारी नारायण तिवारी जी ने अल्मोड़ा के जिस जगह पर देवालय बनाया, उस स्थान को नारायण तिवारी देवाल बाजार कहने लगे और धीरे-धीरे एनटीडी नाम प्रचलित हो गया। इसी क्षेत्र में सीमान्त क्षेत्रा के व्यापारी आते थे और यही जोहारी भाईयों का मुख्य केन्द्र था। ज्यादातर डॉ.दरवान सिंह के आवास पर भी रहते थे। बाद में और ज्यादा विस्तार हुआ। सन् 1947 में रिफ्रयूजी भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे थे। इनके स्कूल के साथी गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, बीरशिवा स्कूल के संस्थापक एन.एन.डी.भट्ट, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, दरवान सिंह, उत्तम सिंह वहीं मिले थे। उस दौर में पढ़ाई के बाद ज्यादातर शिक्षक बने और फिर उच्चपदों पर आसीन रहे। हल्द्वानी दोनहरिया निवासी लक्ष्मण निवास का नाम हमेशा से अग्रणीय रहा है इस परिवार के बाला सिंह, सत्यवान सिंह जंगपांगी, सेल्सटैक्स कमिश्नर पुष्कर सिंह, जज उत्तम सिंह पांगती, दुर्गा सिंह अच्छे साथी रहे हैं।’
इण्टर के बाद इलाहाबाद पढ़ाई गये तिवारी जी अधूरी पढ़ाई से जब लौटे तो कुछ महीने कौसानी में अध्यापकी करने लगे। इसके बाद बिड़ला मिल सिरपुर कागजनगर, आन्ध्रप्रदेश मेें अपने बड़े भाई के पास चले गये जो बिरला कागज फैक्ट्री में थे। 1938 में स्थापित भारत की सबसे पुरानी यह पेपर मिल्स को हैदराबाद मिर उस्मान अली खान द्वारा स्थापित किया गया था। 1950 में बिरला परिवार ने इसका अधिग्रहण किया और 2018 में जे.के. पेपर लि. ने इस मिल का अधिग्रहण कर लिया। बिरला की इस फैक्ट्री में एन.सी.तिवारी क्वालिटी कन्ट्रोल का काम देखने लगे, कुछ समय बाद पेपर मैकर बन गये। सन् 1968 में मशीन में दुर्घटना होने के बाद इन्होंने विचार बदला और अपने गाँव से इतनी दूर आ चुका हँू, भाई भी यहीं है, क्यों न घर चल जाउँ। फिर से शैल ग्राम अल्मोड़ा आ गये। कुछ दिन रुकने के बाद हल्द्वानी का रुख किया। अल्मोड़ा में जहाँ इनकी मुलाकात दुर्गा सिंह मर्तोलिया से हुई थीं वहीं हल्द्वानी में आनन्द बल्लभ उप्रेती से हुई। तब तक ‘पिघलता हिमालय’ अखबार के बारे में चिन्तन नहीं हुआ था। हल्द्वानी में स्वरोजगार के क्रम में यह अपने को आजमाते रहे और सफल नहीं हो रहे थे। खुली चाय का कार्य भी किया लेकिन इसका प्रचलन न होने से उसे छोड़ पेपर एजेंसी ले ली। अनुभव तो था लेकिन दूर-दूर तक उधरबाजी से इस काम को भी बन्द कर दिया। उन दिनों में आनन्द बल्लभ उप्रेती का छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ खुला और वह पत्रकारिता में पहले से सक्रिय थे ही। तिवारी जी बताते हैं कि युवाओं और गपोड़ियों के बैठने का अड्डा कालाढूंगी रोड स्थित ‘शक्ति प्रेस’ हुआ करता था। दाँतों के डाक्टर बी.सी.पन्त, वकील जीवन जोशी, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह डसीला तमाम लोगों का मिलना जुलना बराबर था। कुछ अन्तराल में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी ‘शक्ति प्रेस’ में आए और उप्रेती जी के साथ एक प्रण सा हो गया कि अपना अखबार निकालना है। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ की शुरुआत हो गई। जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव सभी साथियों ने देखे और एक-दूसरे की परेशानियों को समझा-महसूस किया।
तिवारी जी बताते हैं कि स्वरोजगार के क्रम में उन्होंने पहली बार सोपस्टोन इन्डस्ट्रीज की स्थापना कर डाली। छोटी मुखानी हल्द्वानी में 1973 में इसे स्थापित किया गया। बागेश्वर में खड़िया कार्य के शुरुआती दिन थे। बहुत मुश्किलों से तब खड़िया कारोबार का बाजार बना था, एक प्रकार से इसका परिचय ही हुआ। कुछ सालों तक सपफल कार्य करने के बाद तिवारी ने इस कारोबार को समेट दिया। आज भी छोटी मुखानी का वह क्षेत्र खड़िया फैक्ट्री नाम से ही जाना जाता है। अपने कारोबार और घर-परिवार के साथ कदम से कदम आगे बढ़ रहे तिवारी जी ने अपने साथियों और समाज की भलाई के लिये भी कदमताल कम नहीं की। होली हो या दीपावली उसकी रंगत बनी रहे इसके लिये इनका ध्यान पूरा था। वह बताते हैं कि हल्द्वानी में छोटा सा बाजार और दूर-दूर तक छिटके आवास थे। साइकिल से आना-जाना होता था और होली मिलने के लिये एक दूसरे के वहाँ अनिवार्य रूप से जाते थे, एक बार जेलरोड में पत्थरबाजी की घटना ने माहौल खराब किया था। पहाड़ की होली के लिये हीराबल्लभ पन्त जी के वहाँ सभी जुटते थे। रामपुर रोड में बालमुकुन्द तिवारी के घर में बैठकी होली के अलावा जगदम्बा नगर में इनके अपने आवास पर होली की बैठक जमती थी। रेंजर हीरा बल्लभ जी, रमेश चन्द्र, अल्मोड़ा से तारा प्रसाद ‘तारी मास्साब’, जगदीश उप्रेती ‘जग्गन’ से रातभर रागों में भरी होलियों सुनने को मिलती थीं।
सामाजिक सरोकारों से जुड़े एन.सी. तिवारी जी जनमुद्दों को लेकर हमेशा अगुवाई करते रहे हैं। जमरानी बांध बनाने के आन्दोलन के क्रम में श्री नवीन चन्द्र वर्मा के साथ मिलकर इन्होंने पीआईएल तक डाली जिसमें विभाग को जुर्माना पड़ा था। व्यापारी हितों के लिये भी इनकी भागीदारी कम नहीं रही। वह बताते हैं कि सन् 1992 में अलीगढ़ में व्यापार मण्डल का सम्मेलन हुआ, तब बाबूलाल जी को कुमाउँ का प्रभारी बनाया गया और उन्हें कोषाध्यक्ष। पृथक पर्वतीय राज्य के बाद सन् 2001 में उ.प्र. से अलग होकर उत्तराखण्ड का व्यापार मण्डल बना। इसके लिये गाजियाबाद में यूपी के अध्यक्ष श्याम विहारी एमपी सहित तमाम साथी थे। उत्तराखण्ड व्यापार मण्डल के लिये रीषिकेश के यशपाल अग्रवाल अध्यक्ष, हल्द्वानी से बाबूलाल गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष, देहरादून से अनिल गोयल महामंत्री, नवीन वर्मा उप महामंत्राी, एनसी तिवारी कोषाध्यक्ष बने। राज्य आन्दोलन के दौरान अगुवाई करने वाले एन.सी.तिवारी कहते हैं- मुलायम सिंह का जमाना था और पुलिस का सख्त पहरा। आरक्षण विरोधी आन्दोलन में सुलग रहे युवाओं को जेल भेजा जा रहा था तब हल्द्वानी में छात्र अभिभावक संघर्ष समिति का गठन हुआ जिसमें वह सह संयोजक बने। इस बीच अज्ञात उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा द्वारा इन्हें जान से मारने की ध्मकी तक दे दी गई। मानसिक तनाव व अन्य प्रकार से दबाव देने वाले तिवारी जी के पीछे लगे रहे लेकिन ये विचलित नहीं हुए बल्कि और सूझबूझ से कमान संभाली। राज्य आन्दोलन का स्वरूप बढ़ता गया और सारे सरकारी संगठन इस समिति से जुड़ गये। जब दिल्ली में प्रदर्शन की बात हुई तो शासन-प्रशासन का पहरा था। जाने की अनुमति नहीं थी, ऐसे में कोर्ट से चालीस बसों को ले जाने की अनुमति ले ली गई। वह कहते हैं कि पुलिस का इरादा था आन्दोलनकारियों को हल्द्वानी से आगे ही न बढ़ने दिया जाए। गढ़वाल में भी ऐसा ही हुआ और दिल्ली जा रहे आन्दोलनकारियों के साथ रामपुर तिराहा काण्ड हुआ था। हल्द्वानी मे भी रामपुर तिराहा काण्ड कराने की पूरी साजिश थी लेकिन किसी प्रकार पूरे आन्दोलन को सही दिशा दी गई और आन्दोनकारी युवाओं को बचाया गया।
बातचीज में तिवारी जी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं- जितना किया बहुत था, अब नई पीढ़ी ने इस शहर और प्रदेश को संवारने में जुटना चाहिए। पिघलता हिमालय परिवार में संरक्षक की भूमिका रखने वाले श्री तिवारी के सुपुत्र विजय तिवारी भी सुलझे हुए युवा उद्यमी हैं और उन पुरानी परम्पराओं को अपने बचपन से समझते हुए आगे बढ़ रहे हैं। कामना है उनकी चाह सफल रहे।

पिघलता हिमालय से मेरी पहली मुलाकात….

चिट्ठी
चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है….। चार-छः जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल के बच्चे समवेत स्वरों में गाकर सरकार द्वारा आवंटित क्वाटर से बाहर मुझे समाचार पत्रा पिघलता हिमालय देने के लिए खड़े थे। मैंने पूछा कि तुम आज पंकज उदास की गज़ल क्यों गा रहे हो? बच्चों ने कहा कि सर आपको आपकी वतन की चिट्ठी आई है। मैं आश्चर्यचकित था मेरी चिट्ठी!! तब बच्चों ने पिघलता हिमालय दिखाते हुए कि सर आप इसे चिट्ठी ही तो कहते हैं। ये चिट्ठी ही हमें गाँव गोठार, मेले ठेले, बांज बुरांश, सुख-दुःख, तीज त्यौहारों की खबरें/निमंत्राण लेकर आती हैं।
तब मुझे याद आया कि एक दिन मैं अपने वार्डन रूम के बाहर पिघलता हिमालय पढ़ रहा था कि बच्चों ने पूछा कि सर आप कौन सासमाचार-पत्र पढ़ रहे हो तो प्रत्युत्तर मैने चिट्ठी- पाती कहा।और बताया कि यह हिमालय की आवाज है, यह सीमांत लोगों की सांसें है। तब से मेरे स्कूल के बच्चे भी कहने लगे कि सर हम भी चिट्ठी – पाती पढ़ेंगे। मैने बताया यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र है जो सप्ताह में नियमित रूप से पोस्टऑफिस से आता है पहले आप लोग पढ़ लेना फिर मेरे पास भिजवा देना। मुझे भी तो पढ़ना है! तब से बच्चे हर सप्ताह चिट्ठी के इंतजार में रहते हैं। जैसे ही पोस्टमैन विद्यालय में डाक देने पहुंचता है तब विद्यालय के छात्र पिघलता हिमालय के लिए दौड़ लगाते है वैसे भी छात्र जो घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं वे सब अपने आसपास गांव घरकी आदिल कुशल जानने के लिए बेताब होते हैं।आज के सोशल मीडिया के दौर में भी पिघलता हिमालय अपनी पाती द्वारा लोगों को अपनेपन की भावों से जोड़े रखने के प्रयासों की बच्चे खूब सराहना करते हैं।
वेदांग ढौंढियाल जो कक्षा 11वीं का छात्र है पिघलता हिमालय के बारे में विचार देते हुए बताता कि यह
समाचार पत्र नहीं हमारे संस्कृति की संवाहिका है।
प्रणव कुमार कक्षा 11वीं छात्र को झकरुवा भूली के फ़सक बहुत पसंद है।
कक्षा 9 वीं के छात्र श्रेष्ठ सिंह को हमारे संरक्षक/ बुजुर्ग पर आलेख बहुत पसंद है।
तन्मय ध्यानी कक्षा 10 वीं के छात्र को हमारी संस्कृति विरासत फीचर/प्रसंग बहुत भाता है।
कक्षा 9 वीं के छात्र यशपाल पर्यटन स्थलों की जानकारी से संबंधित लेख पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है।
विनय कुमार को हमारे प्राकृतिक संसाधनों की उपेक्षा पर प्रसंग रुचिकर व ज्ञानवर्धक लगता है।
कक्षा 12 के छात्र मोहित सती पिघलता हिमालय की मुहिम हमारी संस्कृति हमारी विरासत संरक्षण के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है।
विद्यालय के छात्र गौरव को ज्वलंत विषयों पर दाज्यु की लेखनी बहुत पसंद है।
इन बच्चों के बाइट्स सुनकर/जानकार मैं सहसा अपने अतीत में खो गया। मैं भी सन् 1987/88 में इन्हीं बच्चों की तरह राजकीय इंटर कॉलेज मुनस्यारी काछात्र था मैं गांव से दूर मुनस्यारी के एक धुएंवाली एक छोटी सी कोठरी किराए पर रहकर पढ़ाई करता था। जिसका मासिक किराया 10 रुपए था । मुनस्यारी बाजार में सबसे कम किराए का यही कमरा था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।मुनस्यारी बाजार मेरे लिए कनॉटप्लेस से कम नहीं था। जिस कमरे में रहता था उसके नीचे होटल था।जिसमें जलेबी, बालूशाही, समोसे अरजी व भुटुवा बनता था।सुबह बांज बुरांश की गीली लकड़ी से चीची आवाज व धुएं से कमरा रहने योग्य नहीं रहता था।पर क्या किया जाए इससे अधिक सुविधा वाले कमरे का किराया देना सामर्थ्य में नहीं था।सोमवार से शनिवार तक स्कूल ,दोस्तों के डेरे में समय व्यतीत होता पर रविवार को अपने कमरे के आसपास बैठा करता। मेरे डेरे के पास देव सिंह पाना जी की चाय की टपरी थीं।दुकानदार रविवार को सुबह की धूप के साथ आनंद लेते थे। मैं भी उन्हीं के आसपास बैठा रहता था एक दिन कुछ दुकानदार पिघलता हिमालय पर छपी खबरों के बारे में चर्चा कर रहे थे।कह रहे थे कि उप्रेती जी ने क्या बढ़िया लिखा है। वे सब पिघलता हिमालय पर छपी वर्ष वा साप्ताहिक खबरों पर विमर्श कर रहे थे।मैं भी पढ़ने के लिए उत्सुक था। पर मैं शर्मीले स्वभाव कारण उनसे जानकारी प्राप्त नहीं कर सका।सभी दुकानदार अपनी अपनी दुकानों में चले जाने के बाद बिंद्रा (शु-मेकर) और मैं हम दोनों बैठे धूप सेक रहे थे। बिंद्रा (शु-मेकर) पढ़ा लिखा था, दुनियादारी देखी थी। मैने पूछा यह पिघलता हिमालय पढ़ने को कहां मिलेगा? तो उसने बताया कि श्री आनंद वल्लभ उप्रेती जी हल्द्वानी वाले और श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया आपस में मिलजुलकर अखबार छपवाते हैं। और कहा यदि तुम श्री दुर्गासिंह जी से बात करो तो वे तुम्हें पढ़ने के लिए दे देंगे ।वे भले और नेक इंसान हैं। उस दौर में अमर-उजाला तीसरेचौथे दिनमुनस्यारी पहुंचता था।उस पर भी कुछ संभ्रांत लोग ही पढ़ पाते थे। साथ ही सोरघाटी प्रिंटिंग प्रेस से छपने वाली पर्वत- पीयूष साप्ताहिक समाचार – पत्र आता था। जिसमें कुछ अभिजात्य वर्ग का ही कब्जा था। जो मुझे बात मेंप ताचला।श्री दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी बहुत सहृदय, विनोदप्रिय, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। सबसे मिलजुल कर रहते थे। जनप्रिय थे इसलिए लोग उन्हें नेता जी कहते थे। शायद शनिवार का दिन था। कोई सार्वजनिक अवकाश के कारण आज बाजार मेंखास चहल-पहल नहीं थीं। मैने देखा एक सामान्य कद-काठी, पर हिमालय जैसे धीर गंभीर ,घनी मूंछें , गोल चेहर , हरे रंग की पारका जैकेट पहने श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया जी अपनी दुकान के आगे लोहे की एक फोल्डिंग कुर्सी में बैठकर पिघलता हिमालय पढ़ रहे थे। मुझे प्रथम बार दूर से पिघलता हिमालय समाचार पत्र और संस्थापक संपादक के दर्शन हुए। मैने इससे पहले कोई क्षेत्रीय ,सांस्कृतिक मुद्दों पर छपने वाली समाचार पत्र नहीं पढ़ा था। मैने हिम्मत जुटाई और मर्तोलिया जी के पास उनके दुकान में पहुंचा। उन्होंने एक ग्राहक समझकर पूछा क्या चाहिए। मैने कहा समान तो कुछ नहीं चाहिए, पर मैं पिघलता हिमालय पढ़ना चाहता हूं। तो वे मुस्कुराते हुए बोले यह कल ही डाक से मिली है। आज मैं पढ़ लेता हूं कल सुबह दुकान खुलने पर आना। तब लेकर पढ़ लेना। जी कहकर मैं वापस लौट आया। दिन किसी तरह बीत गया, रातभर उत्सुकता में नीद नहीं आई। आज रविवार था, मैं सुबह से ही दुकान खुलने का इंतजार में था। आज कमरे में धुआं अत्यधिक था। इस लिए बाहर एक लकड़ी के बैंच में बैठा उनकी राह देख रहा था। सुबह दोनों भाई दुकान में पहुंच गए थे। तब उनकी दो दुकानें थी। एक किराना दूसरा रेडिमेड जनरल स्टोर था। छोटे भाई मंगल सिंह मर्तोलिया जी ज्यादातर किराना संभालते थे श्री दुर्गासिंह जी दोनों में बैठते थे। दूसरे दिन मैं हिम्मत करके अखबार मांगने गया। अरे! हां……कहते हुए मुस्कुराए, पहले मेरे बारे में जानकारी ली, कौन सी कक्षा मे पढ़ते हो तुम्हारा ना क्या है? कहां के रहने वाले हो? मैने सबकुछ बताया बहुत खुश हुए। और कहने लगे कि एक गांव का लड़का इतना पढ़ने के लिए लालायित है। मैं अखबार लेकर अपने कमरें में चला गया। होटल से धुआं कम हो गया था। मैने अच्छी तरह देखा पलटाया और एक एक खबर को पढ़ने लगा। उस दिन आकाश साफ था पंचाचुली की धवल श्वेत शिखरों से सूर्य की स्वर्णिम किरणें चमक रही थी। उस साप्ताहिक में भिटोली पर कहानी छपी हुई थी किस तरह एक भाई भिटौली के पर्व पर अपनी बहिन गौरीधाना मिलने जाता है। ननद और सास द्वारा कुचक्र रचना, एक अंतहीन कहानी पढ़कर मेरे आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। उस दिन मैं खूब रोया। यह थी मेरे पिघलता हिमालय से प्रथम साक्षात्कार। मैने पढ़ने के बाद सही सलामत अखबार वापस कर दिया। मर्तोलिया जी बोले जब भी पढ़ने का मन हो मुझसे मांग लेना और पढ़ते रहना। फिर दो चार बार ही लिया होगा। वे अपने कार्यों में ही व्यस्त रहते थे। यदि वे आज होते और मैं ये प्रसंग सुनता तो उन्हें अच्छा लगता। पर वह विराट हिमालय समय से पूर्व पिघल गया उनसे पिघली अमृतधारा आज भी पिघलता हिमालय रूप में निरन्त प्रवाहित है।
नारायण सिंह धर्मशक्तू
जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल।