
डाॅ.पंकज उप्रेती
10 अक्टूबर 2020 को सायं 3 बजे श्रीमती देविन्द्रा (देवेन्द्रा) रावत का निधन हो गया। उनके साथ ही श्री एवं श्रीमती रावत की भरपूर सहयोग की कहानी यादें छोड़ गई है। 91 वर्षीय सबकी आंटी के रूप में पहचान रखने वाली श्रीमती देवेन्द्रा बलवन्त कालोनी, दोनहरिया, हल्द्वानी में निवास करती थीं। जीवन के उत्तराद्र्ध में भी वही बचपन सी उमंग और बहिनों का आपसी लाड़-प्यार सबकी जुवां पर था। इनकी कोशिश रहती है कि हर गतिविधियों में भागीदारी करूँ। उम्र के इस पड़ाव में भी, वह सभी आयोजनों में खुशी से सम्मिलित होती ताकि सबसे भेंटघाट हो सके। इधर-उधर सबकी कुशल पूछती थीं।
उनके निधन के समय ईष्ट-मित्रों का तांता लगा और चित्राशिला घाट, रानीबाग में उन्हें अन्तिम विदाई दी गई। अल्मोड़ा से आकर भतीजे दिग्विजय सिंह रावत ने अन्तिम संस्कार की क्रियाएं कीं। दिग्विजय ‘दीपू’ सामाजिक सरोकारों से जुड़े और रावत परिवार के समझदार व सहनशील युवाओं में से हैं।
बात करते हैं ‘ज्योति-देवेन्द्रा’ की। इस दम्पत्ति का अपने समाज के प्रति अटूट विश्वास था और सहयोग की भावना इनमें थी। कमाण्डर ज्योति सिंह रावत उच्च पदों पर रहते हुए भी सहज-सरल व्यक्ति थे। पारिवारिक विरासत का जो संस्कार उनमें था, वह तो था ही लेकिन स्वयं के बूते भी उन्होंने बहुत कुछ जोड़ा। उनके असमय निधन से श्रीमती देवेन्द्रा जी अकेले रह गईं और अपने इष्ट-मित्रों के साथ हल्द्वानी में रहने लगीं। बलवन्त कालोनी में श्री दुर्गा सिंह रावत और उनके परिवार के साथ देवेन्द्रा जी का समय व्यतीत हो रहा था। डाॅ.एन.एस.पांगती सहित उनके सभी पारिवारिक जन सुधबुध लेते रहते थे। और उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।
अपनों के बीच देविन्द्रा (देवेन्द्रा) सुख थीं। माघ की खिचड़ी, होली मिलन से लेकर जोहार महोत्सव तक के हर कार्यक्रम की दर्शकदीर्घा में उनकी उपस्थिति होती। ध्नबल जैसा कोई अहंकार उनमें कभी नहीं रहा। उनके संस्कार उन्हें रौबदार बनाए रहे। तभी वह कहीं भी अपने सहयोग में पीछे नहीं हटती। पिघलता हिमालय की आजीवन सदस्य होने के बावजूद वह हमेशा इसकी चिन्ता करती थी कि किन स्थितियों में यह प्रकाशित होता है और सभी को इससे जोड़ती। ज्योति-देवेन्द्रा दम्पत्ति ने महरौली दिल्ली में भी कापफी सम्पत्ति जोड़ी थी लेकिन सबकुछ सौदा कर समय के साथ इन्हें सिमटना पड़ा। ‘देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट’ के रूप में गठित समिति द्वारा नेक कार्यों के लिये निर्णय लिये जाने लगे। मुनस्यारी, अल्मोड़ा, हल्द्वानी सहित तमाम संस्थाओं में इनका योगदान याद रहेगा।
अब जबकि कमाण्डर ज्योतिसिंह व श्रीमती देवेन्द्रा हमारे बीच नहीं हैं, उनकी यादों को सजोने के लिये शुभचिन्तकों को बेहतर करना होगा। इनकी जीवनी हमें त्याग करना सिखाती है। स्व. देवेन्द्रा रावत को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजजि।
