
टी.सी.पपनै
कमला बहिन जी से मेरा सम्पर्क सन् 1990 से था जब मैं लोक चेतना मंच से जुड़ा। बहिन जी एक प्रखर समाज सेविका के साथ महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रबल कार्यकर्ता भी थी। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से तो मेरा सम्पर्क वर्ष 1980 से था ही जब हम लोग साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मिला करते थे। उप्रेती परिवार से मेरा पारिवारिक सम्बन्ध् रहा है। एक दुर्घटना में जब मेरा हाथ फैक्चर हुआ था और मैं अस्पताल में भर्ती था तो बहिन जी ने जिस आत्मभाव से साथ दिया मैं कभी नहीं भूल सकता।
श्रीमती कमला उप्रेती आन्दोलनों की अगुवाई में कभी अग्रिम पंक्ति में रहती थीं तो कभी सबको धकेलने के लिये पीछे अपने साथियों के साथ। आन्दोलनों में उनका यह स्वभाव ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन’ में खूब दिखाई दिया। पृथक राज्य के लिये लड़ी गई लड़ाई में उन्हें भी आम आन्दोलनकारियों की तरह कोई गुमान नहीं था। बस, आन्दोलनकारी होने की खुशी थी। राज्य के लिये छिड़े ऐतिहासिक आन्दोलन में वह हल्द्वानी की सड़कों पर महिला शक्ति के साथ निरन्तर रहीं। होने वाली सभाओं की अध्यक्षता करते हुए वह युवा आन्दोलनकारियों को ललकाती थीं- ‘यह लड़ाई बच्चों के भविष्य की लड़ाई थी। इसका नेतृत्व स्वयं करना होगा।’
राज्य आन्दोलन के दौरान हल्द्वानी में हुए पुलिस लाठीचार्ज में घायलों में वह भी थीं। लेकिन उन्होंने प्रतिदिन होने वाले प्रदर्शन में जाना नहीं छोड़ा। राज्य बनने और उसके नाम पर सुविधा लेने वालों की होड़ कमला जी को बेचैन करती थी। वह कहतीं- ‘राज्य की लड़ाई नेता बनने के लिये थोड़ा ही लड़ी है।’ बाद को जब राज्य आन्दोलनकारियों को सरकार की ओर से प्रमाण पत्र दिये गये तो उन्हें भी इसके लिये बुलवाया गया। जब सरकार द्वारा राज्य आन्दोलनकारियों के लिये पेंशन प्रावधन किया गया, वह हँसती और कहती- ‘‘अब मैं पेंशन वाली हो गई हँू।’ क्योंकि जरूरत के समय भी उन्होंने सरकार से ऐसी याचना नहीं की थी। न ही उनके मन में कभी ऐसा विचार आया।
नेतृत्व का गुण उन्हें नेता बनाये हुआ था लेकिन अपने संस्कार और गृहस्थी के साथ सामंजस्य रखते हुए वह केवल सामाजिक आन्दोलनों का हिस्सा बनी। भ्रष्टाचार के खिलापफ वह एकदम गरज पड़ती थी। उनकी सभी महिला साथी आज उन्हें याद करती हैं, जो जानती हैं कि सामाजिक आन्दोलनों के आगे पहली जिम्मेदारी घर-गृहस्थी है। घर को संवार देना किसी भी महिला का सबसे बड़ा आन्दोलन है। वह धर्मपरायण थी लेकिन मंच सजाकर ढोंग का प्रवचन करने वालों के खिलाफ मुखर थीं। श्रीमती उप्रेती के सामने राजनीति के कई मौके आये लेकिन वह टाल गईं। वह जानती थी कि एक-एक, दो-दो व्यक्तियों की पार्टी भी उत्तराखण्ड में बनी हुई है। उत्तराखण्ड क्रान्तिदल को क्षेत्रीय पार्टी के रूप में वह पसन्द करती थीं। इसके अलावा बड़ी पार्टियों की नीतियाँ उन्हें रास नहीं आई। भीड़ एकत्रित करने के लिये वह मनोनीत होने से भी मना कर देती। हाँ, किसी भी पार्टी की जो बात उन्हें भा जाती उसमें वह समर्थन करती। इसके लिये वह भाकपा माले के प्रदर्शन में भी शामिल हुई थी। कांग्रेस के समर्थन में जुटी थीं। कांग्रेस की अकड़ पर भाजपा के नेता का समर्थन किया था। स्पष्ट निर्णय लेने वाली समाजवादी पार्टी के लिये भी वह बोली और जनता पार्टी के समय उसकी नीतियों पर भी उसके साथ थी। राष्ट्रीय दलों से कई बार उनके मनोनयन के लिये पत्रा आए लेकिन वह टाल गईं और न ही उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता ली। नेतृत्व के गुण होने के कारण ही वह पालिका चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक बूथ में गड़बड़ करने वाले किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को झिड़क देती थीं।
राजनीति की हलचल को परखने और जानने के बाद वह अपने मिशन पर अडिग थीं। महिला संगठनोें के साथ जुड़कर वह शिक्षा व सामाजिक कार्यों में रुचि लेती। इसके लिये कई बार उन्हें सम्मानित किया गया था। बेवाक बोलने वाली कमला जी पत्रकारिता के घराने से थीं तो उन्हें किसी भी अधिकारी या नेता से सम्वाद करने में झिझक नहीं थी लेकिन वह अपने दायरे में रहकर ही सम्वाद करतीं। सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर वह कार्यों में जुड़ी रहीं। लोक चेतना मंच की सक्रिय महिला सदस्य के रूप में उनकी भूमिका थी। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में उन्होेंने जनपक्षीय मुद्दों को उठाया और हिमालय संगीत शोध् समिति की अध्यक्ष के रूप में बच्चों और बड़ों का मार्गदर्शन किया।
सेनि. तहसीलदार, समाजसेवी

