
तब मुझे याद आया कि एक दिन मैं अपने वार्डन रूम के बाहर पिघलता हिमालय पढ़ रहा था कि बच्चों ने पूछा कि सर आप कौन सासमाचार-पत्र पढ़ रहे हो तो प्रत्युत्तर मैने चिट्ठी- पाती कहा।और बताया कि यह हिमालय की आवाज है, यह सीमांत लोगों की सांसें है। तब से मेरे स्कूल के बच्चे भी कहने लगे कि सर हम भी चिट्ठी – पाती पढ़ेंगे। मैने बताया यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र है जो सप्ताह में नियमित रूप से पोस्टऑफिस से आता है पहले आप लोग पढ़ लेना फिर मेरे पास भिजवा देना। मुझे भी तो पढ़ना है! तब से बच्चे हर सप्ताह चिट्ठी के इंतजार में रहते हैं। जैसे ही पोस्टमैन विद्यालय में डाक देने पहुंचता है तब विद्यालय के छात्र पिघलता हिमालय के लिए दौड़ लगाते है वैसे भी छात्र जो घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं वे सब अपने आसपास गांव घरकी आदिल कुशल जानने के लिए बेताब होते हैं।आज के सोशल मीडिया के दौर में भी पिघलता हिमालय अपनी पाती द्वारा लोगों को अपनेपन की भावों से जोड़े रखने के प्रयासों की बच्चे खूब सराहना करते हैं।
वेदांग ढौंढियाल जो कक्षा 11वीं का छात्र है पिघलता हिमालय के बारे में विचार देते हुए बताता कि यह
समाचार पत्र नहीं हमारे संस्कृति की संवाहिका है।
प्रणव कुमार कक्षा 11वीं छात्र को झकरुवा भूली के फ़सक बहुत पसंद है।
कक्षा 9 वीं के छात्र श्रेष्ठ सिंह को हमारे संरक्षक/ बुजुर्ग पर आलेख बहुत पसंद है।
तन्मय ध्यानी कक्षा 10 वीं के छात्र को हमारी संस्कृति विरासत फीचर/प्रसंग बहुत भाता है।
कक्षा 9 वीं के छात्र यशपाल पर्यटन स्थलों की जानकारी से संबंधित लेख पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है।
विनय कुमार को हमारे प्राकृतिक संसाधनों की उपेक्षा पर प्रसंग रुचिकर व ज्ञानवर्धक लगता है।
कक्षा 12 के छात्र मोहित सती पिघलता हिमालय की मुहिम हमारी संस्कृति हमारी विरासत संरक्षण के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है।
विद्यालय के छात्र गौरव को ज्वलंत विषयों पर दाज्यु की लेखनी बहुत पसंद है।
इन बच्चों के बाइट्स सुनकर/जानकार मैं सहसा अपने अतीत में खो गया। मैं भी सन् 1987/88 में इन्हीं बच्चों की तरह राजकीय इंटर कॉलेज मुनस्यारी काछात्र था मैं गांव से दूर मुनस्यारी के एक धुएंवाली एक छोटी सी कोठरी किराए पर रहकर पढ़ाई करता था। जिसका मासिक किराया 10 रुपए था । मुनस्यारी बाजार में सबसे कम किराए का यही कमरा था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।मुनस्यारी बाजार मेरे लिए कनॉटप्लेस से कम नहीं था। जिस कमरे में रहता था उसके नीचे होटल था।जिसमें जलेबी, बालूशाही, समोसे अरजी व भुटुवा बनता था।सुबह बांज बुरांश की गीली लकड़ी से चीची आवाज व धुएं से कमरा रहने योग्य नहीं रहता था।पर क्या किया जाए इससे अधिक सुविधा वाले कमरे का किराया देना सामर्थ्य में नहीं था।सोमवार से शनिवार तक स्कूल ,दोस्तों के डेरे में समय व्यतीत होता पर रविवार को अपने कमरे के आसपास बैठा करता। मेरे डेरे के पास देव सिंह पाना जी की चाय की टपरी थीं।दुकानदार रविवार को सुबह की धूप के साथ आनंद लेते थे। मैं भी उन्हीं के आसपास बैठा रहता था एक दिन कुछ दुकानदार पिघलता हिमालय पर छपी खबरों के बारे में चर्चा कर रहे थे।कह रहे थे कि उप्रेती जी ने क्या बढ़िया लिखा है। वे सब पिघलता हिमालय पर छपी वर्ष वा साप्ताहिक खबरों पर विमर्श कर रहे थे।मैं भी पढ़ने के लिए उत्सुक था। पर मैं शर्मीले स्वभाव कारण उनसे जानकारी प्राप्त नहीं कर सका।सभी दुकानदार अपनी अपनी दुकानों में चले जाने के बाद बिंद्रा (शु-मेकर) और मैं हम दोनों बैठे धूप सेक रहे थे। बिंद्रा (शु-मेकर) पढ़ा लिखा था, दुनियादारी देखी थी। मैने पूछा यह पिघलता हिमालय पढ़ने को कहां मिलेगा? तो उसने बताया कि श्री आनंद वल्लभ उप्रेती जी हल्द्वानी वाले और श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया आपस में मिलजुलकर अखबार छपवाते हैं। और कहा यदि तुम श्री दुर्गासिंह जी से बात करो तो वे तुम्हें पढ़ने के लिए दे देंगे ।वे भले और नेक इंसान हैं। उस दौर में अमर-उजाला तीसरेचौथे दिनमुनस्यारी पहुंचता था।उस पर भी कुछ संभ्रांत लोग ही पढ़ पाते थे। साथ ही सोरघाटी प्रिंटिंग प्रेस से छपने वाली पर्वत- पीयूष साप्ताहिक समाचार – पत्र आता था। जिसमें कुछ अभिजात्य वर्ग का ही कब्जा था। जो मुझे बात मेंप ताचला।श्री दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी बहुत सहृदय, विनोदप्रिय, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। सबसे मिलजुल कर रहते थे। जनप्रिय थे इसलिए लोग उन्हें नेता जी कहते थे। शायद शनिवार का दिन था। कोई सार्वजनिक अवकाश के कारण आज बाजार मेंखास चहल-पहल नहीं थीं। मैने देखा एक सामान्य कद-काठी, पर हिमालय जैसे धीर गंभीर ,घनी मूंछें , गोल चेहर , हरे रंग की पारका जैकेट पहने श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया जी अपनी दुकान के आगे लोहे की एक फोल्डिंग कुर्सी में बैठकर पिघलता हिमालय पढ़ रहे थे। मुझे प्रथम बार दूर से पिघलता हिमालय समाचार पत्र और संस्थापक संपादक के दर्शन हुए। मैने इससे पहले कोई क्षेत्रीय ,सांस्कृतिक मुद्दों पर छपने वाली समाचार पत्र नहीं पढ़ा था। मैने हिम्मत जुटाई और मर्तोलिया जी के पास उनके दुकान में पहुंचा। उन्होंने एक ग्राहक समझकर पूछा क्या चाहिए। मैने कहा समान तो कुछ नहीं चाहिए, पर मैं पिघलता हिमालय पढ़ना चाहता हूं। तो वे मुस्कुराते हुए बोले यह कल ही डाक से मिली है। आज मैं पढ़ लेता हूं कल सुबह दुकान खुलने पर आना। तब लेकर पढ़ लेना। जी कहकर मैं वापस लौट आया। दिन किसी तरह बीत गया, रातभर उत्सुकता में नीद नहीं आई। आज रविवार था, मैं सुबह से ही दुकान खुलने का इंतजार में था। आज कमरे में धुआं अत्यधिक था। इस लिए बाहर एक लकड़ी के बैंच में बैठा उनकी राह देख रहा था। सुबह दोनों भाई दुकान में पहुंच गए थे। तब उनकी दो दुकानें थी। एक किराना दूसरा रेडिमेड जनरल स्टोर था। छोटे भाई मंगल सिंह मर्तोलिया जी ज्यादातर किराना संभालते थे श्री दुर्गासिंह जी दोनों में बैठते थे। दूसरे दिन मैं हिम्मत करके अखबार मांगने गया। अरे! हां……कहते हुए मुस्कुराए, पहले मेरे बारे में जानकारी ली, कौन सी कक्षा मे पढ़ते हो तुम्हारा ना क्या है? कहां के रहने वाले हो? मैने सबकुछ बताया बहुत खुश हुए। और कहने लगे कि एक गांव का लड़का इतना पढ़ने के लिए लालायित है। मैं अखबार लेकर अपने कमरें में चला गया। होटल से धुआं कम हो गया था। मैने अच्छी तरह देखा पलटाया और एक एक खबर को पढ़ने लगा। उस दिन आकाश साफ था पंचाचुली की धवल श्वेत शिखरों से सूर्य की स्वर्णिम किरणें चमक रही थी। उस साप्ताहिक में भिटोली पर कहानी छपी हुई थी किस तरह एक भाई भिटौली के पर्व पर अपनी बहिन गौरीधाना मिलने जाता है। ननद और सास द्वारा कुचक्र रचना, एक अंतहीन कहानी पढ़कर मेरे आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। उस दिन मैं खूब रोया। यह थी मेरे पिघलता हिमालय से प्रथम साक्षात्कार। मैने पढ़ने के बाद सही सलामत अखबार वापस कर दिया। मर्तोलिया जी बोले जब भी पढ़ने का मन हो मुझसे मांग लेना और पढ़ते रहना। फिर दो चार बार ही लिया होगा। वे अपने कार्यों में ही व्यस्त रहते थे। यदि वे आज होते और मैं ये प्रसंग सुनता तो उन्हें अच्छा लगता। पर वह विराट हिमालय समय से पूर्व पिघल गया उनसे पिघली अमृतधारा आज भी पिघलता हिमालय रूप में निरन्त प्रवाहित है।
नारायण सिंह धर्मशक्तू
जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल।

