पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश डाॅ.पंकज उप्रेती किसी भी समाज की जो लोक मान्यता और बोली भाषा होती है, वह उसके पूरे बात-व्यवहार को बताती है। उस समाज की विशिष्ट शब्दावली उसके इतिहास, भूगोल और व्यवहार को बहुत सटीक बताती है जबकि उसका अनुवाद या दूसरी बोली भाषा में वही शब्द उसके पूरे अर्थ को व्यक्त करने में अधूरापन ही लगता है। ऐसा ही अधूरापन हमारी हिमालयी सीमा की बोली-भाषाओं को लेकर समाज मेें रहा है। जबकि हमारे सीमान्त क्षेत्र की विशिष्ट बोली-भाषा अपनी चाल के साथ अपने सटीक शब्दों के लिये बहुत समृद्ध है। भारत सरकार के शब्दावली आयोग ने भी देश की विभिन्न बोली भाषाओं का अध्ययन करते हुए बहुत कार्य किया है परन्तु आज भी लगता है कि हमारी लोकभाषा का बहुत बड़ा हिस्सा उसमें नहीं है। बोली-भाषा उसके व्यवहार के साथ पनपनी है वरना दुनिया की सैकड़ों भाषाएं समय के साथ बुझ चुकी हैं। बोली भाषा के इस सच को जानते हुए शौका समाज के विद्वान गजेन्द्र सिंह पांगती ने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। श्री पांगती ने अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश के रूप में समाज को सजग किया है। दो खण्डों के इस शब्दकोष के पीछे उनकी सीधी सी मंशा है कि शौका बोली भाषा को पुनर्जीवित किया जाए, इसके लिये यह योजनाबद्ध प्रयास है। भाषा में जबर्दस्त पकड़ रखने वाले और अनुशासन प्रिय पांगती जी ग्रन्थ की भूमिका में शब्दकोष के बारे में बताने के साथ-साथ जितना भी उल्लेख करते हैं वह जानना शौका ही नहीं हर समाज के लिये जरूरी है। बहुत ही श्रम के साथ उन्होंने इस कार्य को किया है। शब्दकोष की भूमिका में उन्होंने इतिहास-भूगोल सहित जो जानकारी दी है वह इस प्रकार है- भारत तिब्बत सीमा में स्थित गोरीगंगा की घाटी जोहार के मूल निवासी शौका नाम से जाने जाते हैं। यहाँ की अपनी विशिष्ट संस्कृति और भाषा रही है। प्राचीन काल में यहाँ की आबादी बहुत कम थी क्योंकि विकट होने के कारण यहाँ से तिब्बत जाने वाला दर्रा, उंटाधूरा से व्यापारिक आवागमन सबसे बाद में खुला। यहाँ के तत्कालीन लोग जो भाषा बोलते थे वह रंकस कहा जाता था। पूर्व मध्यकाल में तिब्बत व्यापार के लाभ से आकर्षित होकर जब कुमाउँ व पश्चिम नेपाल के राजदूत व खस लोग जोहार आये तो वे अपने साथ हिन्दू वैदिक धर्म व कुमाउंनी-हिन्दी भाषा ले आये। परिणामतः इस समुदाय ने न केवल वैदिक धर्म अपनाया बल्कि कुमाउंनी और रंकस के सम्मिश्रण से निर्मित एक विशिष्ट भाषा को भी अपनाया जिसे सूकिखून कहा जाता था। मध्यकाल में गढ़वाल और तिब्बत होते हुए मूल रूप से राजस्थान के राजपूत धाम सिंह जोहार मिलम में, काशी के पण्डित भट्ट मर्तोली में, गढ़वाल के शौका और कुमाउँ के व नेपाल के राजपूत बड़ी संख्या में आकर विभिन्न गाँवों में बसे तो जोहार में वैदिक धर्म के और सुदृढ़ होने के साथ ही कुमाउंनी की सहोदर एक ऐसी भाषा का जन्म हुआ जिसे सूकिबोलि/शौकी बोली कहा जाने लगा। इस विशिष्ट भाषा ने सूकिखून को चलन से बाहर कर दिया। शौका बोली में कुछ ऐसे शब्द है। जो न तो कुमाउंनी में पाए जाते हैं और न ही हिन्दी में। वे शब्द सूकिखून से आये हैं। उनमें से कुछ दारमा के रंगलू में पाए जाते हैं। और कुछ का मूल भाषा विज्ञानी ही बता सकते हैं। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने के कारण जब शौका लोग जोहार घाटी से पलायन करके देश के विभिन्न स्थानों में बस गए और उनके आर्थिक क्रियाकलापों में अमूलचूल परिवर्तन हो गया तो उनकी संस्कृति और भाषा मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी। परिवर्तन की यह दिशा व गति ऐसे ही जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब शौका संस्कृति और भाषा दोनों विलुप्त हो जायेंगे। इसलिए इस समाज के प्रबुद्ध लोग इनके संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। उनके प्रयास को सफल बनाने के लिये आवश्यक है कि, मेरी आयु वर्ग के लोग जिन्होंने बचपन में शौका जीवन जिया है, शौका संस्कृति से सम्बन्धित शोधग्रन्थ और रचना साहित्य लिखें। ऐसा किया भी जा रहा है। मै। खुद ऐसी कई रचनाएं कर चुका हूं लेकिन यह सब कुछ हिन्दी में किया गया है शौका भाषा में नहीं। शौका बोली को पुनर्जीवित करने के लिए अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है। वर्ष में तीन-तीन गाँवों में उत्क्रमण तथा व्यापार हेतु लम्बी अवधि के लिए तिब्बत और भारत के विभिन्न भागों में भ्रमणशील रहने के कारण शौकाओं को रचना साहित्य लेखन और भाषा को व्यापकरण की परिधि में लाने का कोई अवसर नहीं मिला। आधुनिक काल में भी इस भाषा का रचना साहित्य कुछ कविताओं के लेखन तक ही सीमित है। यदि यह कहा जाये कि शौका बोली कभी भी भाषा नहीं बन पायी तो गलत नहीं होगा। बोली वह होती है जो बोली जाती है। जब उस बोली में लेखन कार्य किया जाता है तो वह भाषा बन जाती है। शौका बोली के इतनी जल्दी चलन से बाहर होने का एक कारण यह भी है कि इसका लिखित साहित्य नहीं है जो इसे स्थायित्व दिला सकता था। भाषा और संस्कृति का चोली-दामन का सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व बना नहीं रह सकता है। शौका भाषा को पुनर्जीवित किये बिना शौका संस्कृति को संरक्षित और सम्बर्धित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह भाषा अब मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी है जिसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके संरक्षित करने के लिये कोई आधर भी उपलब्ध् नहीं है। हमारी आयु-वर्ग के लोग इस भाषा को जानते और कुछ हद तक बोल भी सकते हैं। उनके बाद यदि यह भाषा भी सूकिखून की तरह विलुप्त हो जाये तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, ऐसा न हो इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास को सपफल बनाने के लिये आवश्यक है कि शौका भाषा का व्याकरण तैयार किया जाये। इसके मुहावरों और लोकोक्तियों को लिपिबद्ध किया जाये और एक बृहद शब्दकोष बनाया जाये, इसी कड़ी में शब्दकोष बनाने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है। शब्दकोष में सामान्यतः मूल शब्द दिया जाता है। उसके साथ उसका अर्थ, वाक्य प्रयोग, समानार्थक व विलोम शब्द, उससे बने शब्द आदि दिए जाते हैं। और ऐस बने शब्द यथा संज्ञा, भाववाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण आदि में से क्या है यह संकेतकों के द्वारा दर्शाया जाता है। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि हर शब्द को अलग लिखने से शब्दकोष बहुत बड़ा हो जाता है। लेकिन अब सन्दर्भ बदल गया है। इन्टरनेट के कारण न तो शब्दकोष बड़ा होने की समस्या रह गयी है और न ही इसके छापने की आवश्यकता रह गयी है। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारा लक्षित वर्ग इस भाषा को जानता ही नहीं है। उसे किसी अंग्रेजी या हिन्दी शब्दकोष का समानार्थक शौका भाषा का शब्द ढूंढने के लिए उसके मूल शब्द जानने में भी कठिनाई होगी। इसलिए इस शब्दकोष में हर शब्द को अलग लिखा गया है। प्रोग्रामिंग के माध्यम से वे अपनी उंगुली से अंग्रेजी, हिन्दी और शौका भाषा के किसी भी शब्द को क्लिक करके अन्य दो भाषाओं में उनका समानार्थक शब्द ढूंढ सकते हैं। या यूं कहें कि जिस तरह आधुनिक टैक्नोलाॅजी के माध्यम से दुनिया उनकी मुट्ठी में है उसी तरह इन तीन भाषाओं के शब्द उनके फिंगरटिप में होंगे। शब्दकोष उपयोगी होने के साथ बहुत बड़ा भी न हो इसके लिए संज्ञा और क्रिया दोनों बनाने वाले शब्दों में उनमें से केवल उस एक को लिया गया है जो ज्यादा चलन में है। यह इस आशा में किया गया है कि दूसरी शब्द रचना पाठक स्वयं आसानी से कर सकता है। जैसे लेख से लिखना आदि। फिर भी जहाँ भी कुछ भिन्न अर्थ का शब्द बनता हो उसे दिया गया है। इसी प्रकार हिन्दी और अंग्रेजी के समानार्थक शब्दों के साथ शौका बोली के केवल शब्द दिए गए हैं और उनका अर्थ इस विश्वास से छोड़ दिया गया है कि पाठक हिन्दी या अंग्रेजी के शब्दों से उसका अर्थ बखूबी समझ जाएंगे। आवश्क समझे जाने पर कुछ खास शब्दों का वाक्य प्रयोग बाद में दिया जा सकता है। जो शब्द इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं उनका अन्य भाषा का समानार्थक शब्द दिया गया है। उसके लिए (न) संकेतक दिया गया है। कोई भी भाषा पूर्ण रूप से न तो स्वतंत्रा है और न ही रह सकती है। भाषा की समृद्धि के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को हर भाषा में अपनाया जाता रहा है और यही हमें भी करना होगा। इसलिए हिन्दी, फारसी, उर्दू और अग्रेजी के प्रचलित तथा प्रचलित की जाने लायक शब्दों को बिना संकोच के शब्दकोष में स्थान दिया गया है। शौका बोली का मूल स्वरूप जीवित रहे इसके लिए आवश्यक है कि इसका मूल उच्चारण कायम रहे। इसमें श तथा ष के लिए बहुधा स का प्रयाग किया जाता है। इसी तरह इ की जगह र का प्रयोग किया जाता है। ण के स्थान पर भी न का प्रयोग किया जाता है। मात्राओं में भी अन्तर है। जैसे अ की आ और आ की जगह आ। इसी तरह शब्दों में भी अन्तर है। जैसे ध् की जगह द आदि। मूल उच्चारण की इन विशेषताओं को मानये रखने का प्रयास किया गया है। इस भाषा की एक बहुत बड़ी खामी है इसमें संयुक्ताक्षर का अत्यधिक प्रयोग। इससे भाषा न केवल कर्ण कटु हो जाती है बल्कि इसके लेखन में भी कठिनाई आती है। भाषा के आम प्रचलन और सहज लेखन के लिए इसमें सरलता लाना आवश्कय है। इस हेतु जहाँ भी सम्भव है वहाँ संयुक्ताक्षर के स्थान पर सरल शब्दों का उपयोग किया गया है जो सम्भव है कुछ शुद्धता के पोषक लोगों को पसन्द न आये। उन विद्वानों से से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि भाषा के संरक्षण के लिए यह किया जाना आवश्यक है। फिर भी जो संयुक्ताक्षर न केवल बहुत आम है बल्कि शौका बोली की विशिष्टता है उनका स्वरूप यथावत रखा गया है। इसमें कुछ शब्द छूटे हो सकते हैं और कुछ अन्य भाषाओं के शब्द शौका बोली में लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। शब्दकोष को छोटा और उपयोगी बनाने के लिये अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द छोड़ दिए गए हैं जो उपयोग में नहीं हैं। इसी प्रकार मूल शब्द से बने अन्य शब्दों में से उनको छोड़ दिया गया है जिनका प्रयोग आमतौर पर नहीं होता है। उपयोगी पाए जाने या हो जाने पर भविष्य में छोड़ गए कुछ शब्दों को शब्दकोष में लेने की आवश्कता पड़ सकती है। इसके लिये अपने वाले सुझावों के आधर पर एडमिन व सम्पादक द्वारा इसे अद्यतन व परिष्कृत कराते रहना होगा। इसके लिए मेरी पूर्व स्वीकृति है। वैसे भी अब हार्ड काॅपी का जमाना चला गया है। मैं आशा करता हूं कि नई पीढ़ी आन लाइन शब्दकोष को अधिक सहजता से स्वीकारेगी। शौका बोली में दो ऐसे विशिष्ट शब्द हैं जिनको उच्चारण के अनुरूप देवनागरी में लिखना सम्भव नहीं है। इस पर अभी विचार विमर्श चल रहा है। क्योंकि हम देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं और करते रहेंगे इसलिए इसके अनुशासन के अन्तर्गत इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके तो अच्छा होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो हमें इसको भविष्य के लिए छोड़ना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारी बोली कुमाउनी के सबसे नजदीक है। फिर भी वह उससे बहुत भिन्न है। कुमाउनी में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दशाने के लिए उच्चारण भिन्नता को अपनाया गया है लेकिन हमारी बोली में इस भिन्नता को दर्शाने के लिए कुमाउनी के अ और आ का स्थान परिवर्तन कर दिया गया है या फिर व, य, ह जैसे अक्षर में ए आदि के ध्वनि के साथ नए शब्द का निर्माण कर दिया गया है। इस अर्थ में हमारी बोली कुमाउनी से अधिक समृद्ध है। लेकिन इसके कारण हमारी बोली कुछ कर्ण कटु हो गयी है। पिफर भी इसकी विशिष्टता को बनाए रखने के लिए हमें न केवल इस अन्तर को बनाए रखना होगा बल्कि इसे और भी सुदृढ़ करना होगा। इस विशिष्टता को बचाए रखने के लिए लघु ह्रस्व के लिए हलन्त और अति दीर्घ के लिए विसर्ग (:) का प्रयाग बहुत आवश्यक होने पर ही करना होगा अन्यथा हमारी भाषा कुमाउनी या हिन्दी में समाहित हो जायेगी। शौका बोली के जिन शब्दों का समानार्थक शब्द किसी अन्य भाषा में नहीं है उनको तथा उनके प्रयोग को संलग्नक में देने का प्रयास किया जाएगा। शब्दकोष को साॅफ्रटवेयर में डाने वाले युवा यह निर्णय लेंगे कि इसे शब्दकोष में कहाँ और किस रूप में स्थान दिया जाये। शब्द और भाषा का समाज और उसकी संस्कृति से चोली दामन का साथ होता है। इसलिये कई शब्दों का समानार्थक शब्द कुछ अन्य भाषाओं में नहीं मिलता है। ऐसे ही अंग्रेजी के कुछ शब्दों का हिन्दी समानार्थक शब्द की तुलना में शौका शब्द अध्कि सटीक होने पर उसे अपनाया गया है। ऐसे में हिन्दी और शौका शब्द एक-दूसरे के समरूप नहीं मिलेंगे। पाठकों से अनुरोध् है कि ऐसे में अंग्रेजी शब्द देखें क्योंकि इस शब्दकोश की मूल भाषा अंग्रेजी और लक्षित भाषा शौका है। एक ही वस्तु, भाव व प्रकटीकरण के लिये शौका भाषा में कई शब्द हैं और समानार्थक शब्द अंग्रेजी व हिन्दी में नहीं हैं। ऐसे शब्दों को और विशिष्ट कार्य व्यवहार से सम्बन्धित शब्दों को एक ही जगह दिया गया है ताकि यह शब्दकोष एक सन्दर्भ पुस्तक के रूप में काम आ सके और भावी पीढ़ी को भाषा का उपयोगी ज्ञान हो सके। सन्दर्भ में आसानी के लिये सम्बन्धित अंग्रेजी शब्द को s Capital Ietter में दिया गया है। शब्द चयन का आधर पफादर बुल्के का ‘अंग्रेजी हिन्दी कोश’ रहा है। जिसके लिये मै। उस महान आत्मा का रिणी हूं। उनके शब्दकोष के उन शब्दों को छोड़ दिया गया है जो न तो प्रयोग में हैं और न ही उनके प्रयोग में आने की सम्भावना है। उसमें जो कुछ शब्द छूट गये हैं उनको सम्मिलित कर लिया गया है। कुछ मित्रों ने शौका बोली के शब्द चयन में जो सहयोग दिया उनके लिये मैं उनका आभारी हूं। इसमें संशोधन करने और कुछ शब्दों को इससे हटाने तथा कुछ और शब्दों को इसमें जोड़ने की प्रक्रिया दसकों तक जारी रखनी होगी। इसके लिए, इसके प्रकाशित कराने और इसके उ(रण की अनुमति देने के लिए मैं जोहार पुस्तकालय और मेरे पुत्रा नवीन को सम्मिलित रूप से अधिकृत करता हूं।
तिब्बत तथा भारत के बीच सीमान्त क्षेत्र में रहने वाले मानव समूहों के लिये ‘भोटिया’ शब्द प्रयुक्त किया गया है परन्तु वास्तव में इससे भ्रम होने लगता है। कई संस्कृतियों के इस हिमालय में निरन्तर शोध् होते रहे हैं। इसी विषय पर पी.एन.जी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर के एसो.प्रोफेसर डाॅ.गिरीश पन्त का एक शोधपत्र प्रस्तुत है। -सम्पादक ———————————————————————————- भोटिया वास्तव में कोई जाति नहीं है। ये इस जातीय सम्बोधन को पसन्द भी नहीं करते हैं। अंग्रेज प्रशासकों ने इनकी बसासत और तिब्बत से सम्बन्धों के चलते इन्हें गलती से भोटिया पुकारना शुरु कर दिया जबकि इन्हें मारछा, ताल्छा, जोहारी, शौक, दारमी, चैंदासी और व्याॅसी के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिये था। -डाॅ.आर.एस.टोलिया ———————————————————————————— डाॅ.गिरीश चन्द्र पन्त भारत और तिब्बत के बीच का सीमान्त क्षेत्रा अत्यन्त दुर्गम और हिमाच्छादित पहाड़ी क्षेत्रा होने के कारण ही भारत ने सामरिक कारणों से भोटियों को जनजाति का दर्जा दिया था। इस तथ्य के पीछे धारणा थी कि ये लोग अपने स्थानों पर बने रह कर, अपना विकास कर सकें और सामरिक दृष्टि से अति सम्वेदनशील इस इलाके को निर्जन न होने दें। ये लोग प्राचीन काल से भारतवर्ष की उत्तरी सीमा की प्रहरी जाति रही हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत के लिए व्यापार बन्द हो जाने के कारण इन लोगों का इन दुर्गम एवं जीवन के लिए अति कठिन क्षेत्र में निवास करना निरर्थक हो गया है, ऐसी स्थिति में भारत सरकार ने भी नहीं सोचा कि बिना आजीविका के कोई भी आबादी ऐसे विकट भौगोलिक परिस्थिति वाले और शेष दुनिया से कटे दुर्गम क्षेत्र में कैसे टिक सकेगी। हालांकि इन जीवट कर्मवीरों ने उस हालात में भी जीने का काफी कुछ साजो सामान जुटा ही लिया, दूसरी ओर सम्पन्न होते जाते इन लोगों के लिए शीत मरुस्थलीय गाँवों में टिके रहने की मजबूरी भी जाती रही। इस सीमान्त क्षेत्र से बहुत तेजी से जनसंख्या का पलायन होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पुनः खतरा उत्पन्न हो गया है। पड़ोसी देश चीन द्वारा इस सामरिक क्षेत्रा में सीमा का उल्लंघन करना आम बात हो गयी है। यह विचारणीय प्रश्न आज भारत राष्ट्र के सम्मुख है कि इन पर्वत पुत्रों का अपनी थाती-माटी से पलायन कैसे रोका जाए। चीनी आक्रमण के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द होने से यहाँ के निवासियों के पुश्तैनी व्यापार पर तो असर पड़ा ही है, साथ ही उत्तराखण्ड के लोगों को सस्ते एवं सुलभ उनी वस्त्रों से भी वंचित होना पड़ा है। पर्वतीय समाज के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला चट्टानी नमक की आपूर्ति भी बन्द हो गयी है। तिब्बत से व्यापार बन्द होने के कारण भोटियों की लाखों बकरियाँ उन पर बोझ बन गयी हैं। इसलिए अब उनकी बकरियों की संख्या लाखों की जगह मात्रा हजारों में रह गयी है। इसका सीधा असर उत्तराखण्ड के उनी उत्पादन पर भी पड़ा है। मांग और पूर्ति में भारी अन्तर होने के कारण ठण्डे पहाड़ों के लिये अति आवश्यक उनी कपड़े आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गये हैं, उनकी जगह सिन्थैटिक धागों के वस्त्रों ने ले ली है जो कि पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक होने के साथ ही स्वास्थ्य के लिए भी अनुपयुक्त माने गये हैं। तिब्बत से व्यापार बन्द होने तथा बकरियों की संख्या में कमी के चलते यहाँ के निवासियों ने आजीविका के लिए नये विकल्प ढूँढ लिये। दूसरी ओर इनके द्वारा हस्तशिल्प के रूप में बनाए जाने वाले गलीचे, दन, थुल्मे, कम्बल, उनी वस्त्र आदि की परम्परागत कला के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा। वन एवं वन्य जीव संरक्षण के नाम पर सरकार ने फूलों की घाटी और नन्दादेवी बायोस्पफीयर जैसे कई बुग्याली क्षेत्र आरक्षित कर दिए, अतः चारागाहों से वंचित इन पशुपालकों का बकरी पालन भी अत्यन्त प्रभावित हो गया। जिसका सीधा असर हस्तशिल्प एवं प्राचीनतम कुटीर उद्योग पर पड़ा, जबकि इनका कुटीर उद्योग सम्पूर्ण पर्वतीयों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय था। यहाँ के लोग स्थानीय उत्पादों से शराब बनाने में माहिर माने जाते हैं शराब इनके जीवन से जुड़ी हुई है। ठण्ड से बचने के साथ यह इनके देवी-देवताओं से जुड़ी हुई वस्तु भी है। देश की आन्तरिक सुरक्षा पर 17 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री जी अध्यक्षता में दिल्ली मेें आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बताया कि पिछले 5 साल (सन् 2007 से 2012 तक) चीन के गश्ती दलों की ओर से भारतीय सीमा में 37 बार घुसपैठ हुई है। उन्होंने इसके साथ ही नेपाली सीमा पर वामपंथी उग्रवाद पनपने की आशंकाओं का हवाला देते हुए उत्तराखण्ड के 5 सीमावर्ती जिलों के सभी 34 विकासखण्डों को सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) में शामिल करने और पुलिस बल के आधुनिकीकरण के लिये पूरा धन केन्द्र की तरफ से उपलब्ध् कराये जाने की भी मांग की। उन्होंने उत्तराखण्ड में चीन से सटी 350 किमी लम्बी सीमा में चीन की तरफ से चमोली जिले के बाड़ाहोती इलाके में भारतीय दावे को विवादित करने की चीन की कोशिशों का प्रमुखता से उल्लेख किया। मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड ने इस बैठक में कहा कि चीन के गश्ती दलों ने 2006 में 6 बार, 2007 में दो बाद, 2008 में दस बार, 2009 में 11 बार, 2011 में 5 बार और 2012 में तीन बार सीमा सीमा उल्लंघन किया है। सीमावर्ती इलाकों में मजबूत सड़क सम्पर्क की जरूरतों पर जोर देते हुए उन्होंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से ज्यादे रोड़े न अटकाए जाने की भी अपील की। उन्हेांने भारत से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर चीन की तरफ से सड़क राजमार्ग बनाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें भी सीमावर्ती सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया तेज करनी पड़ेगी। इसी तरह नेपाल से सटी 275 किमी लम्बी सीमा पर भी सुरक्षा की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश की अहम सामरिक स्थिति एवं सम्वेदनशीलता के मद्देनजर सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा और संचार तन्त्र स्थापित करना जरूरी है। नेपाली प्रान्त महाकाली अँचल में नेपाली माओवादी एवं यंग कम्युनिस्ट लीग सक्रिय है। महाकाली इलाके से लगे उत्तराखण्ड क्षेत्र में भाकपा (माओवादी) पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी तैनात करना चाहती है। खुफिया सूत्रों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि माओवादी इस इलाके में अपने आन्दोलन का विस्तार करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री का सुझाव था कि सीमा पार से इस खतरों को ध्यान में रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर खुफिया नेटवर्क सुधाराजाए। साथ ही केन्द्रीय बल सतर्कता एवं निरीक्षण भी तेज किया जाए। चीन द्वारा 2020 में लद्दाख एवं गलवान में दिखाया गया कपटपूर्ण व्यवहार एवं पड़ोसी देश नेपाल द्वारा चीन के साथ सुर से सुर मिलाना, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी की उपरोक्त शंकाओं को सौ प्रतिशत सिद्ध करता है। पड़ोसी देशों की सेनाओं द्वारा की जा रही घुसपैठों को सदा सीमान्त के निवासियों ने पहले पकड़ा है चाहे वह घुसपैठ पाकिस्तान द्वारा की गयी हो, चीन, नेपाल अथवा बांगलादेशियों द्वारा। चिन्ता का विषय है कि आज उत्तराखण्ड का सीमान्त क्षेत्र दिन पर दिन जनविहीन होता जा रहा हे। यहाँ के मूल निवासी पर्वत पुत्र सुख सुविधाओं के आभाव में अन्यत्र जाकर बसने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं ऐसी परिस्थिति में यक्ष प्रश्न उठता है कि कौन करेगा? इस सीमान्त क्षेत्र की रक्षा। उत्तराखण्ड राज्य के सीमान्त निवासियों को भोटिया नाम से जाना जाता है। डाॅ. आर.एस.टोलिया ने अपनी पुस्तक (गे्रेट ट्राइवल डाइवर्सिटी आॅफ उत्तराखण्ड) में उल्लेख किया है कि भोटिया वास्तव में कोई जाति नहीं है ये इस जातीय सम्बोधन को पसन्द भी नहीं करते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेज प्रशासकों ने इनकी बसासत और तिब्बत से सम्बन्धों के चलते इन्हें गलती से भोटिया पुकारना शुरु कर दिया जबकि इन्हें मारछा, ताल्छा, जोहारी, शौक, दारमी, चैंदासी और व्याॅसी के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिये था। हिमालय गजेटियर में एटकिंसन ने कहा है कि भोटिया शब्द की उत्पत्ति भोट शब्द से हुई है जो कि ‘बोड’ शब्द का अपभ्रन्श है। इसका अर्थ तिब्बत से लगाया जाता है और इसी भोट शब्द ने भोटिया नाम को जन्म दिया है, जिसे कालान्तर में तिब्बत तथा भारत के बीच सीमान्त क्षेत्र में रहने वाले मानव समूहों के लिये प्रयुक्त किया गया। एटकिंसन ने इन्हें खस मानने से इन्कार करने के साथ ही इनकी भाषा के आधार पर इन्हें तिब्बत मूल का माना है। लेकिन इस समूह के विद्वानों का कहना है कि एटकिंसन एक प्रशासक था वह भाषा विज्ञानी नहीं था। बी.एस.चटर्जी ने लिखा है कि भोटिया शब्द का प्रयोग भारत-तिब्बत सीमा में निवास करने वाले अनेक नृःजातीय समूहों के लिए किया जाता है, जिनकी आदतें कुछ समान होते हुए भी अन्य मानव जातियों से भिन्न शारीरिक विशेषताएँ होती हैं। देखा जाय तो भोटिया भारत-तिब्बत सीमा पर सीमान्त प्रहरी की तरह बसे हुए हैं और अगर भारतीय के बजाय उन्हें तिब्बती कहा जाय तो उनकी भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक ही हे। सम्भवतः तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्ध् होने तथा वहाँ के निवासियों के साथ ‘ज्ञानकोषी’ और ‘पानकोषी’ (खानपान के रिश्ते) सम्मिलित होना सुदृढ़ मैत्री का यथार्थ प्रमाण माना जाता था। शिवराज सिंह रावत निःसंग का मानना है कि व्यापारिक समुदाय के सम्बन्ध् अतीत में वैदिक परम्पराओं से जुड़े थे। कालान्तर में इस जाति ने विष्णुगंगा क्षेत्र माणा, धवल गंगा क्षेत्र में नीती-गमसाली, जान्हवी क्षेत्र में डुण्डा, हरसिल नेलंग, धारचूला और व्यास- चाौंदास जैसे उपयोगी मार्गों के सिरोभाग में अपना निवास स्थान चुना। उत्तराखण्ड की विभिन्न घाटियों में सदियों से निवास कर रही भोटिया जनजाति को विभिन्न नामों से जाना जाता है। धारचूला के रं, मुन्स्यारी के शौका, माणा के मारछा, नीती घाटी के तोल्छा तथा उत्तरकाशी के जाड़ भोटियों का रहन-सहन, बोली भाषा तथा वेशभूषा भिन्न है। पूर्व में इनमें से एक समूह दूसरे से वैवाहिक सम्बन्ध् नहीं रखते थे। गढ़वाल में मारछा जनजाति के मूल गाँव माणा, गमसाली, नीति और बम्पा हैं, जबकि तोल्छा लोगों के मूल गाँव कोसा, कैलाशपुर, फकरिया, मलारी, जेलम, फाक्ती, द्रोणागिरी, लाता, रेणी, सुराईकोठा और सुबाई आदि हैं। सुबाई, मल्लागाँव और सुक्की जैसे कुछ गाँवों में दोनों जातियों की मिश्रित आबादी निवास करती है। तोल्छा स्वयं को उची जाति मानते हैं। उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी तहसील के भोटिया जाड़, निलंग तथा जाडुंग घाटियों के मूल निवासी हैं। इन सभी जातियों में अत्यधिक सांस्कृतिक भिन्नताएं हैं जैसे मारछा, तोल्छा स्वयं को क्षत्रियों के करीब मानते हैं तो जाड़ तिब्बतियों की तरह बौद्ध हैं। परन्तु दोनों का मूल एक ही माना जाता है। गढ़वाल के भोटिया स्वयं को राम का वंशज मानते हैं ये केवल क्षत्रियों से अपना सम्बन्ध् कायम रखते हैं। ‘वाल्टन’ ने भी माना है कि भोटिया किसी भी तरह से तिब्बतियों से समरूप नहीं हैं। हालांकि इनके गुण शक तातार जाति से मिलते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन ने भी लिखा है कि भाषा, पहनावे तथा शारीरिक बनावट के साथ कतिपय अन्य समानताओं के चलते भोटियों को तिब्बती कहना उचित नहीं है। भोटिया वास्तव में जाजीविका के लिए एक घुमन्तू और व्यापारिक मानव समूह रहा है। भारत तथा तिब्बत के बीच में रहनेे तथा दोनों भू-भागों में व्यापार करने के लिए उन्हें एक ऐसी विलक्षण भाषा की जरूरत पड़ी जो कि न दुनिया के अन्य क्षेत्रों में बोली जाती हो और ना ही दूसरा व्यापारिक वर्ग उसे समझता हों। इसीलिए इनकी बोली को सांकेतिक भाषा भी कहा जाता हे। भोटिया अन्य हिमालयी जनजातियों की तरह खेती या वनों पर आधारित कभी भी नहीं रहे। उनकी आजीविका का मुख्य साध्न व्यापार रहा हे। सन् 1962 से पहले व्यास घाटी के व्यापारी लिपुलेख दर्रे से तकलाकोट, दारमा घाटी के व्यापारी न्यू धूरासे छाकरा, जोहार के उटाधूरा होते हुए ज्ञानिमा, नीति वाले बाड़ाहोती से दाबा, माणा के व्यापारी थोलिंग और निलंग के व्यापारी चपराॅग आदि तिब्बती मण्डयों में जाकर व्यापार करते थे। उस समय नमक एवं सुहागा तिब्बत का मुख्य उत्पाद था। इनका तिब्बत से कई बहुमूल्यवस्तुओं का व्यापार होता था इनमें भेड़-बकरी, भोटिया घोड़े, भारद्वाज घोड़े, हुण्डेर, च्यालपू, चॅवर पूंछ, तिब्बती उन (पश्मीना) तिब्बती कालीन, चमड़ा, सुहागा, राॅगा, तिब्बती नमक, मूंगा, हींग, लालजड़ी, जहरमोहरा और वन ककड़ी आदि जड़ी-बूटियाँ शामिल थीं। इनके सीमावर्ती गाँव हर तरह से व्यापार के डिपो थे। भोटिया व्यापारियों ने तिब्बत से ही उनी कारोबार करना सीखा था। उनी वस्त्रों में थुलमा, गुदमा, दन्न, चैपट्टा पट्टू, लावा,ख् आॅगड़ा, कालीन, पंखी एवं शटन आदि तथा चाॅद या राँछ पर उनी वस्त्र बुनना भी भोटियों ने तिब्बत से ही सीखा था। कुछ अन्य जातियों की तरह भोटिया जनजाति एक जगह पर स्थिर नहीं रही फिर भी इन्हें खानाबदोश नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि इनकी बसासत साल में कुछ निश्चत स्थानों में ही होती थी। तिब्बत नजदीक होने के कारण नीती, माणा, चैदास और जोहार जैसी उफँचाई वाली घाटियों में भीषण भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भोटिया वहाँ रहते थे। वे क्षेत्रा गर्मियों के लिए भोटियों की बकरियों के हिसाब से अनुकूल थे और वहाँ व्यापारिक वस्तुओं का संग्रह भी कर लेते थे। सीमान्त की विकट जलवायु का भोटिया जनजाति के खानपान, रहन-सहन पहनावा, जीवन शैली एवं व्यवहार पर गहरा प्रभाव रहा है। प्राकृतिक पर्यावरण का उनकी शारीरिक बनावट पर भी असर पड़ा है। उत्तराखण्ड राज्य के जिस क्षेत्र में ये भोटिया रहते हैं उस भू-भाग का एक चैथाई भाग 6 माह बर्फ से ढका रहता है। हवा अधिक चलने के कारण यहाँ गर्मियों में भी तापमान अत्यधिक घट जाता है इसीलिए इनकी बस्तियाँ प्रायः ऐसी धूप वाली ढलानों पर होती हैं, जिन पर सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं। भारी हिमपात को ध्यान में रखते हुए घरों की छतें तिरछी या शंक्वाकार होती हैं ताकि बर्फ फिसल कर नीचे आ जाए। इनके परम्परागत मकान मिट्टी, पत्थर से बने होते थे। पश्चिम में मारछा, तोलछा और जाड़ भोटियों की बसासतों में पत्थर के स्लेटों की कमी के कारण मकान की छातें भोजपत्र वृक्ष की मोटी छालों से या देवदार के तख्तों से ढकी जाती थी। भोटिया समूह विवाहोत्सव को बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं। विवाहोत्सव का जश्न शराब के बिना अध्ूरा माना जाता है। चमोली के भोटिया जनजाति पौणा नृत्य (बारात का नृत्य) इतना लोकप्रिय होता जा रहा है कि इसका आयोजन गैर भोटिया कार्यक्रमों में होने लगा है। शोध् कर्ताओं ने पाया कि जाड़, दारमी, व्यासी और चैदासी भोटियों में ममेरे, फुफेरों में वैवाहिक सम्बन्ध् हो सकते हैं जबकि अन्य में देवर और साली के साथ विवाह की अनुमति है। लेकिन जब से भोटिया लोगों ने गंगाड़ी ठाकुरों से रिश्ते कायम करने शुरू किये तब से वे अपने को राजपूत मानने लगे हैं, इनके कुछ उप समूहों में कन्या शुल्क लेने की प्रथा रही है जबकि मारछा, तोल्छा तथा जोहारियों में यह परम्परा कभी नहीं रही है। डाॅ. आर.एस.टोलिया का कहना है कि अब भोटिया समाज में भी दहेज की बीमारी फैल रही है। भोटिया महिलाओं में माँग में सिन्दूर, गले में हार तथा नाक में नथ विवाहित महिला की पहचान होती है। अपनी पुस्तक ‘द शेड्यूल्ड ट्राइब्स’ में के.एस. सिंह ने लिखा है कि सिक्किम के उत्तरी जिलों में 1981 तक बहुपति प्रथा के मामले दर्ज हुए थे। सिक्किम के भोटिया अपने मुर्दे को उसे लेकर 49 दिन तक घर के अन्दर ही रखकर शोक मनाते हैं और इसके बाद मुर्दे का अन्तिम संस्कार किया जाता है। बरसी के अवसर पर लामचे संस्कार होता है। जाड़ भोटिया समुदाय ने हिन्दू और तिब्बत की बौद्ध संस्कृति का एक अनूठा समन्वय स्थापित किया है। वे एक तरह से तिब्बती त्यौहार को हिन्दू तरीके से मनाते हैं। तिब्बत की सीमा से लगे हुए जाढुंग, नेलाॅग से विस्थापित कर डूंडा में बसाए गए और पहले से ही बगोरी में रह रहे जनजाति समुदाय के लोग डुंडा के वीरपुर में स्थायी रूप से बस गये हैं। कण्डाली त्यौहार रं भोटिया समुदाय के लिए महाकुम्भ जैसा है, जो कि पूरे 12 वर्ष बाद मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-विदेश में फैले इस समुदाय के लोग अपने गाँवों में लौट आते हैं। सीमान्त की चाौंदास घाटी में हर बारह वर्षों बाद बुराई का प्रतीक मानी जाने वाली (कंडाली) पौधे को रं समुदाय द्वारा नष्ट किया जाता है। कहा जाता है कि इस पौधे में बारह वर्ष में एक बार फूल खिलते हैं। जोहारियों के अलावा शेष भोटिया समुदाय का साल में दो बार निवास परिवर्तन होता है। जबकि जोहारी भोटिया साल में तीन बार निवास बदलते हैं। उनका पहला निवास तिब्बत सीमा के एकदम निकट दस हजार से 19 हजार पिफट की उफँचाई पर होता है। मिलम, मर्तोली, बुपर्फू, माणा, लवन आदि बुग्याल हैं। जोहारियों के स्थाई घर 7000 से 7500 फिट की उचाई पर होते हैं। जहाँ अपेक्षाकृत कम ठण्ड पड़ती है। इनका तीसरा ठिकाना भाबर के निकट होता था जो कि समुद्र तल से 2500 से लेकर 3500 फिट की उचाई तक स्थित है। शेष दो बार जलवायु या मौसम के हिसाब से निवास बदलते हैं। 2011 की जनगणना से पहले अगर 12001 की जनगणना के आॅकड़ों पर ध्यान दें तो हमें उत्तराखण्ड में निवास करने वाली अन्य चार जनजातियों में से भोटिया जनजाति प्रत्येक क्षेत्र में सबसे आगे नजर आती है। वे उत्तराखण्ड की अन्य सामान्य जातियों की तुलना में भी तरक्की के मामले में सबसे आगे दिखाई देते हैं। 2001 की जनगणना के आॅकड़ों के अनुसार यद्यपि उत्तराखण्ड में जन जातियों की 93.8 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लेकिन इनमें से सर्वाधिक 25.8 प्रतिशत आबादी नगरीय क्षेत्रों में रहती है। सन् 2001 में प्रदेश की जनजातियों का लिंगानुपात 950 स्त्री प्रति हजार था लेकिन भोटिया जनजाति में सर्वाधिक 1049 लिंगानुपात दर्ज किया गया है। उस दौरान सभी जन जातियों का साक्षरता प्रतिशत 63.2 था जबकि अकेली भोटिया जनजाति का प्रतिशत 79.9 था। उस दौरान जब राज्य की जनजातियों के 5 से लेकर 14 साल के 76.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे जबकि भोटिया जनजाति के 86.4 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे। जनगणना में प्रदेश की जनजातियों के 4.3 प्रतिशत लोग ही स्नातक और परास्नातक स्तर तक शिक्षित पाये गये। इनमें भी सर्वाध्कि 11.6 प्रतिशत स्नातक और उससे उपर की कक्षाओं के छात्र भोटिया (सीमान्त) जनजाति के थे। सन् 2001 की जनगणना मेें जन जातियों की 41.1 प्रतिशत आबादी कर्मकार में दर्ज की गयी। कुल कर्मकारों या कर्मियों में सर्वाधिक 41.1 प्रतिशत भोटिया और सबसे कम 34.9 प्रतिशत बुक्सा जनजाति के लोग थे। प्रख्यात इतिहासकार पद्मश्री प्रो.शेखर पाठक का मानना है कि सन् 1967 में आरक्षण मिलने के बाद भोटान्तिक क्षेत्रा की आबादी का बड़ा हिस्सा आरक्षण मिलने के बाद राजकीय नौकरियों में आना शुरु हुआ है जिससे भोटान्तिक में सदियों से विकसित विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक आर्थिक परिदृश्य एकदम बदल गया, बल्कि ध्वस्त हो गया है। उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक लगभग 300 किमी लम्बी भारत तिब्बत सीमा के निकट नीति-माणा और व्यास-दारमा घाटियों में बसे भेटिया समुदाय के लोगों द्वारा बड़े पैमाने पलायन किये जाने से ये सीमान्त क्षेत्रा तेजी से निर्जन होते जा रहे हैं। यह पलायन नहीं रोका गया तो देश की सुरक्षा के सामने एक गम्भीर चुनौती खड़ी हो जायेगी। पिथौरागढ़ जिले में तिब्बत से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़ी व्यास, चैदास घाटियाँ खाली हो गयी है। इन घाटियों के नाबी, रौंगकौंग, गुंजी, गब्र्यांग, बूँदी, सीपू, मार्छा, तिदाँग, गो में, दातू में, दुग्तू, बाने में, बालिंग, चल में, नाग्लिंग में और सेला जैसे सीमान्त गाँव लगभग खाली हो गए हैं। महिलाओं का उल्लेख किये बिना इस समाज का मूल्यांकन अध्ूरा रह जाएगा। यहाँ की महिलाएं गर्म कपड़ों की बुनाई में सि(हस्त होती हैं। उनमें प्रोसेसिंग, डाइंग और उन बुनने की परम्परागत कला संस्कार के तौर पर माँ से बेटी के पास जाती है। अन्य पर्वतीय महिलाओं की तरह उन पर खेती की जिम्मेदारी नहीं होती है। उनमें पुरुषों के साथ काम का बंटवारा भी समान नहीं होता है, वे अन्य पहाड़ी महिलाओं की तरह पुरुषों के बाद भोजन करने की प्रथा को भी नहीं मानती क्योंकि उन्हें भोजन आदि कार्यों को निपटा कर बुनाई जैसे कार्यों में जुटना होता है। ये व्यापार के साथ घरेलू कच्ची शराब बनाने में भी माहिर होती हैं। समाज में शराब केवल जीवन एवं संस्कृति का अंग ही नहीं बल्कि आर्थिकी का भी अभिन्न अंग होती है। कठिन जलवायु के कारण ये शारीरिक रूप से अत्यन्त मजबूत, ताकतवर एवं जीवट होती हैं। ये अन्य पहाड़ी महिलाओं की तरह संकोची नहीं होती हैं। चिपको आन्दोलन के बगैर जिस प्रकार दुनिया भर में पर्यावरण की चर्चा अध्ूरी है, उसी प्रकार बिना गौरा देवी की चर्चा किए भोटिया महिलाओं की जीवटता, शौर्य और अदम्य साहस के साथ पर्यावरण चेतना की बातें भी अध्ूरी हैं। बेजुबान वृक्षों की रक्षक इन वीरांगनाओं ने हिमालय की उपत्यकाओं से वृक्षखोरों के खिलापफ जो गर्जना की वह दुनिया के कोने-कोने तक प्रतिध्वनित हुई, वह गौरा देवी भी कोई और नहीं बल्कि एक भोटिया महिला थी। जिसने सीमान्त नीति घाटी में स्थित रैणी गाँव की जनजाति महिलाओं के सहयोग से 26 मार्च 1974 को कुल्हाड़ियों तथा बन्दूकों से लैस वन ठेकेदार के मजदूरों, वन कर्मियों के साथ ठेकेदार के दबंगों को जंगल से इस तरह भगाया कि वे दुबारा पीछे मुड़कर न देख सके। गौरा देवी के साथ रैणी गाँव की उमा देवी, गुमती देवी, गोमा देवी, परसा देवी, मूसी देवी, हरकी देवी, तिलाड़ी देवी, संग्रामी देवी एवं बाली देवी जैसी वीरांगनाओं की टोली आजीवन बनी रही। हाथ में तकली, पीठ पर कपड़े से बंध बच्च और सामने एक डगर पहाड़ी पगडण्डी, लकड़ी के राॅच पर रंग-बिरंगे धगों के ताने-बानों में उलझी सीमान्त की ये नारियाँ सचमुच जिन्दगी के रंग-बिरंगे सपनों की प्रेरणा देती हैं, वे खाली कभी भी नहीं बैठती हैं। इन महिलाओं में वो अदम्य साहस होता है कि इतिहास उनके पीछे चलता है। गगनचुम्बी हिम शिखरों का गर्वमर्दन करने वाली बछेन्द्रीपाल और चन्द्रप्रभा ऐतवाल ये वो नारियाँ हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत और हौंसले का डंका सारी दुनिया में बजाया है। पूर्व में जसुली देवी ने अपनी पूरी सम्पत्ति अंग्रेज कमिश्नर सर हेनरी रैमजे को पैदल यात्रियोें की सुविध हेतु धर्मशालाओं के निर्माणार्थ सौंप दी थी। उन्होंने लगभग तीन सौ धर्मशालाएं बनवाई जिनके अवशेष आज भी यत्र-तत्र पाये जाते हैं। इसी तरह गंगोत्री गरब्याल को शिक्षा के क्षेत्र में सन् 1964 मेें राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया था। आज सीमान्त के गाँव वीरान होते जा रहे हैं जो सामरिक दृष्टि से अत्यन्त चिन्ता का विषय है। इस सीमान्त गाँवों में बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल तक न होने के कारण ये सीमान्तक लोग बच्चों की पढ़ाई की खातिर अब मूल गाँवों में लौटने के बजाय नीचे की घाटियों में ही स्थायी रूप से रहने लगे हैं। अपने विराट स्वरूप और सर्वाधिक उचाई जैसी विशेषताओं के कारण अगर हिमालय भारत वर्ष का ताज कहा जाता है तो इनके मूल निवासी उसकी जीवटता, उद्यमशीलता, प्रगतिशीलता तथा विशिष्ट संस्कृति को देखते हुए भारत वर्ष के आदिम जाति समूह का सरताज अवश्य ही कहे जा सकते हैं। मध्य हिमालय की भोटिया जनजाति इसी क्षेत्र की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत वर्ष की जनजातियों में सर्वाधिक विकसित तो है ही, इनकी खुशहाली एवं समृद्धि गैर जनजातीय लोगोें के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण है। इस जनजाति का ऐसा विकास किसी दैवीय चमत्कार या खास प्राकृतिक सम्पदा के कारण नहीं हुआ है वरन इनकी हिम्मत, कठिन परिश्रम और लगन का परिणाम है। इन्होंने भीषणतम भौगोलिक परिस्थितियों एवं प्रतिकूल जलवायु में खुशी से जीने की कला भी सीखी औरर इन कठिनतम परिस्थितियों ने उनके अन्दर के पौरुष को ललकार कर उन्हें व्यापार के जरिये अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिये प्रेरित भी किया। ये जनजाति के लोग कुशाग्र बुद्धि, कड़ी मेहनत और जन्मजात विनम्रता का ही परिणाम है कि वे आज प्रत्येक क्षेत्र में अपना विशेष स्थान रखते हैं। ये उत्तराखण्ड राज्य ही नहीं भारत राष्ट्र की सेवा में अपना अतुलनीय योगदान प्रदान कर रहे हैं। उत्तराखण्ड राज्य गठन के मात्रा 20 वर्षों के अन्तराल में ही इस मानव समूह ने प्रदेश के मुख्य सचिव, सूचना आयुक्त देने के साथ दर्जनों आइएएस आईपीएस, आईएपफएस, पीसीएस, पीपीएस सैकड़ों डाक्टर, इंजीनियर तथा सहस्त्रों की संख्या में अन्य नौकरशाह देने के साथ ही प्रदेश के उद्योग और व्यापार में भी अहम भूमिकाा अदा करते हुए दूसरे समुदायों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण इस मानव समूह में किसी प्राचीन या अर्वाचीन श्रेष्ठ मानव नस्ल का अंश होने का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। पड़ोसी देश चीन एवं नेपाल की सीमा से लगे हुए सीमान्त गाँवों का निर्जन हो जाना भारत राष्ट्र की सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त चिन्ता का विषय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही पड़ोसी देश चीन के साथ चल रहा सीमा विवाद, चीन द्वारा पड़ोसी देश तिब्बत को हड़प लेना, नेपाल जैसे शान्त देश को भारत के खिलाफ उकसाये रखना, उत्तराखण्ड की सीमाओं में घुसपैठ करना, सन् 2020 से चीन द्वारा सम्पूर्ण सीमा में विवाद खड़ा किए रखना। दूसरी ओर सीमान्त के गाँवों का उजड़ना एवं जन विहीन होना बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। उत्तराखण्ड सरकार एवं भारत रकार को समय रहते जागना होगा सीमान्त के जनविहीन गाँवों में पर्यटन हब विकसित करना होगा। अन्यथा की स्थिति में भारत राष्ट्र को सीमाओं की सुरक्षा एवं सामरिक महत्व के दृष्टिगत सीमान्त के इन निर्जन गाँवों को भारत तिब्बत सीमा पुलिस अथवा सेना को सौंपना होगा। सन्दर्भ ग्रन्थ सूची- यात्राएं जीवन यात्राएं: लेखकर डाॅ. प्रयाग जोशी। हिमलायन गजेटियर ग्रन्थ-2, भाग2, एटकिंसन। अनुवाद प्रकाश थपलियाल हिमालय दर्शन: लेखक दिगम्बर दत्त थपलियाल उत्तराखण्ड का सामाजिक एवं साम्प्रदायिक इतिहास: लेखक प्रो. डी.डी.शर्मा उत्तराखण्ड जनजातियों का इतिहास लेखक जयसिंह रावत हिमालयन गजेटियर ग्रन्थ-2, भाग-1, एटकिंसन, अनुवाद- प्रकाश थपलियाल उत्तराखण्ड इयर बुक: सम्पादक लोकेश नवानी। कुमाउ का इतिहास: लेखक बद्रीदत्त पाण्डेय उत्तराखण्ड ज्ञानाकोष: लेखक प्रो. डी.डी.शर्मा पहाड़ 14-15 अस्कोट-आरोकोट अभियान अंक। सम्पा.शेखर पाठक पहाड़ 14-15 पिथौरागढ़-चम्पावत अंक, सम्पादक शेखर पाठक पहाड़ स्मृति अंक: एक 20-21- 2019, सम्पादक शेखर पाठक पहाड़ 18 हिमालयी समाज, संस्कृति, इतिहास 2012-13। सम्पा. शेखर पाठक पहाड़ चम्पावत अंक-2 पहाड़ 19 गिर्दा के आयाम 2015