कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने और जनमानस को झकझोरने वाला आयोजन

पि.हि. कला-संगीत समीक्षक
हल्द्वानी शहर में ‘आवाहन’ नाम से लोक उत्सव का वृहद आयोजन कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने वाला और जनमानस को झकझोरने वाला था। व्यापारिक मण्डी के अलावा तमाम तरह के अड्डों में बदलते जा रहे हल्द्वानी भाबर में इस प्रकार के आयोजन के सूत्रधार मनोज चन्दोला की जितनी प्रसंशा की जाए कम है। क्योंकि महोत्सव की बाढ़ में फंसे उत्तराखण्ड में इस प्रकार के आयोजन मुश्किल से हो हो पा रहे हैं। आयोजन को लेकर चिन्तन करने वालों में चारु तिवारी का योगदान सबसे आगे है। चन्दोला जी और तिवारी जी की जुगलबन्दी ने इस आयोजन को मूर्त रूप दिया और कई विचारधाराओं के लोगों को एकसाथ करने का काम किया। गीत-संगीत के अलावा संगीत-साहित्य के मर्मज्ञों को मंच देकर प्रोत्साहित किया।
अभिव्यक्ति कार्यशाला की ओर से देवभूमि उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत एवं लोक विधओं को सहेजने के लिये तीन दिवसीय आयोजन में दिन में सेमिनार और रात्रि में कार्यक्रम का हिस्सा था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सांसद अजय भट्ट ने रैली को हरी झण्डी दिखाकर किया। शहर के तमाम विद्यालयों के बच्चों ने सुन्दर प्रस्तुतियों के साथ इसमें भाग लिया। मय झांकी के बच्चों ने रंग बिरंगे परिधनों में अपनी अभिव्यक्ति की। शेष तो वही होना था जो उन्हें उनके विद्यालय में तैयार करवाया गया था। सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय, सिंथिया स्कूल, ललित आर्य महिला इण्टर कालेज, बीयरशिवा, रा.मा.विद्यालय नया गांव लछमपुर, द्रोण पब्लिक स्कूल, गांध्ीनगर राजकीय मा.विद्यालय, एमबी इण्टर कालेज, लक्ष्मी शिशु मन्दिर, खालसा इण्टर कालेज, रा.पूर्व.मा.विद्यालय कालाढूंगी रोड, टिक्कू माडर्न, रा.इण्टर कालेज बनभूलपुरा, महात्मा गांध्ी इण्टर कालेज के विद्यार्थी रैली में शामिल थे। आयोजन स्थल पर स्वयं सहायता समूहों की ओर से स्टाल भी लगाए गये थे। कार्यक्रम में रेशमा शाह ने जौनसारी, प्रहलाद मेहरा ने कुमाउनी गीत प्रस्तुत किये।
सेमिनार में उत्तराखण्ड की वर्तमान सांस्कृतिक परिस्थितियों पर बोलते हुए अनिल कार्की ने कहा कि इसे अपने से शुरु करना होगा, तब दूसरों से कहने के हकदार हैं। प्राध्यापक डाॅ.प्रभा पन्त ने कहा कि संस्कृति और पलायन बाधा नहीं है। जितना पलायन होगा उतना विस्तार होगा। कवि और साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कहा कि भगनौल, बैर गीत हमसे दूर होते जा रहे हैं, जो चिन्ता की बात है। पत्रकार और चिन्तक ओ.पी.पाण्डे ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन संस्कृति के आधर पर हुआ था लेकिन सरकार ने आज तक संस्कृति को बचाने का रोड मैप तक तैयार नहीं किया है। लोेक गायक हीरा सिंह राणा ने ‘मुख में लागी ताई’ व्यंग गीत से कालाकारों की पीड़ा को व्यक्त किया।
दूसरे दिन के आयोजन में दिल्ली के भगवत मनराल ग्रुप का कार्यक्रम था। युगमंच की ओर से गोपुली बुब का एकाकी मंचन हुआ। नन्दलाल भारती टीम ने जौनसारी संस्कृति प्रदर्शित की। इसके अलावा फृयूजन के नाम पर शहर में हो रहे कनफ्रयूज करने वाले कार्यक्रम हुए। कार्यक्रम के अतिथि मेयर डाॅ.जोगेन्द्र रौतेला थे। इस दिन के सेमिनार में सिने कर्मी हेमन्त पाण्डे ने कहा कि लोक संस्कृति सरकार नहीं, संस्कार से बचेगी। संगीतज्ञ डाॅ.पंकज उप्रेती ने महोत्सवों के नाम पर हो रहे छलावे पर चिन्ता व्यक्त की। नन्दलाल भारती ने कहा कि आर्थिक उदारीकरण होने के बाद अपसंस्कृति का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। डाॅ.माध्ुरी बड़थ्वाल ने कई शानदार उदाहरण देकर अपने लोग गीतों को बचाने का आहवान किया।
समारोह के तीसरे यानी अन्तिम दिन भगवत मनराल व साथियों के अलावा अमित गोस्वामी, दीपा नगरकोटी, मनोज चड्ढा, रोहन भारद्वाज, करिश्मा, खुशी जोशी ने प्रस्तुति दी। आयोजन के तीनों दिनों में शहर की स्थानीय संस्थाओं ने प्रस्तुतियां दीं। जिसमें शास्त्राीय संगीत को लेकर फृयूजन कहा गया लेकिन संगीत की दृष्टि से वह खरा नहीं कहा जा सकता है। दरअसल अपने प्रचार के लिये व बहलावे के लिये इस प्रकार के प्रयोग किये जाने लगे हैं जिसमें गायन, वादन, नृत्य के धमाल को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। चूंकि सीखने वाले बच्चे वही करने लगते हैं जो उन्हें बताया गया है सो वह एक शो के रूप में भीड़ के आगे परोस दिया जाता है। ऐसे में न शास्त्रीयता होती है और न लोक का नृत्यगीत। तीसरे दिन के सेमिनार में उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना और यथार्थ विषय पर वक्ताओं ने विचार रखते हुए संघर्षश्ीाल ताकतों को आगे आने को ललकारा। कवि बल्लीसिंह चीमा ने कविता के माध्यम से अपना दर्द कहा- ‘मैं किसान हँू, मेरा हाल क्या, मैं तो आसमां की दया से हँू।’’ उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी.सी. तिवारी कहा कि राज्य गठन के बाद कांग्रेस और भाजपा के हाथ में प्रदेश की सत्ता आने से राज्य गठन की परिकल्पना ध्वस्त हो गई। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रूप से राज्य पिछड़ गया। उत्तराखण्ड पत्रकारिता विभाग के प्रो.भूपेन सिंह ने कहा कि सरकारों ने पर्वतीय राज्य की अवधरणा को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है। नया भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग उभर रहा है। सत्ता में बदल-बदल कर आ रहे इन चेहरों ने समाज को भी भ्रष्ट बना दिया है। एंकर आरजे काव्या ने कहा कि हमारी संस्कृति के संरक्षण के लिये हमें स्वयं ही पहल करनी होगी। पत्रकार रूपेश ने कहा कि 10 साल के राज्य में मूल्यांकन का समय है। आयोजन के दौरान डाॅ.प्रयाग जोशी, नवीन वर्मा, मोहन बोरा, हेमन्त बोरा, अमिशा पाण्डे, नवीन पाण्डे, योगेश पन्त, विजय बिष्ट, टीसी उप्रेती, दीपक बल्यूटिया, प्रवीन रौतेला, भावना पन्त, प्रकाश भट्ट, लता कुंजवाल, कमल मठपाल, जीत राम, ललित पन्त, बबीता उप्रेती उपस्थित थे।