यादों के अलावा समर्पण जरूरी है

गोविन्द सिंह जंगपांगी से बातचीज
डॉ.पंकज उप्रेती
किसी भी समाज को बनाने के लिये यादों के अलावा समर्पण जरूरी है। अपने समाज के लिये ऐसे ही समर्पित हैं श्रीमान गोविन्द सिंह जंगपांगी। वरिष्ठ नागरिक के अलावा ‘बूबू’ के रूप में प्रतिष्ठि जंगपांगी जी की बात करें तो जोहार के पदम सिंह जंगपंागी के पुत्र हुए मान सिंह जंगपांगी। पिता मानसिंह और माता श्रीमती चन्द्रा देवी के घर गोविन्द सिंह व मंगल सिंह ने जन्म लिया। 3 मार्च 1949 को बुर्फू में जन्मे गोविन्द सिंह सीमान्त के जिस दुरुह क्षेत्र से आते हैं उतनी ही गहराई उनके व्यवहार में है।
बचपन की पढ़ाई दरांती ग्राम में हुई। माइग्रेश के रूप में जब-जब परिवारों की यात्रा होती इनका परिवार भी बुर्फू से दुम्मर आता। बुपर्फू, दरांती के अलावा अपने मामकोट छिनका, गढ़वाल में शिक्षा दीक्षा के बाद अल्मोड़ा कालेज से पढ़ने वाले गोविन्द सिंह जी सन् 1071 में आर्मी में भर्ती हो गए। 6 साल तक सेना की सेवा के बाद ओरिएंटल इंश्योरेंश कम्पनी लि. में इनका प्रतिभा का लाभ मिला। मार्च 2009 में डिविजन मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त होने वाले ‘बूबू’ जी ने समाज में अपनी सक्रियता को बरकरार रखा है।
बुर्फू से जंगपांगी परिवार मल्ला दुम्मर, भकुण्डा, इमला में रहने लगे थे। अपने बचपन की यादों में डूबते हुए गोविन्द सिंह बताते हैं- बचपन का एक खेल था केले/कदली के पेड़ की डंठ्ल में द्यार डालकर उसे जलाते हुए लालटेंन जलाते थे। परिवार ह्यून/जाड़ों में भकुण्डा आ जाता और गर्मी में बुर्फू जाता था। तिब्बत व्यापार की अवसर इन्हें नहीं मिला लेकिन वह यादें इनके साथ जुड़ी हैं जब व्यापारी तिब्बत जाते थे और वहाँ से भी आने वाले जोहार आते थे। वह बताते हैं जिस प्रकार ब्राह्मणों के जजमान
होते हैं उसी तरह तिब्बती मित्रों यहाँ के लोगों से सम्पर्क था यानी अपने-अपने घनिष्ट परिवार मित्रों के पास उनका आना-जाना था और तिब्बत लौटते समय वह उपहार स्वरूप हुनकारा तिब्बती बकरी परिवार को देकर जाते थे। हुनकारा की यादें भुलाए नहीं भूलती जब लोगों में परस्पर मेल होता था।
वास्तव में श्री जंगपांगी जी की बातों का मर्म यह बताता है कि दुर्गमता के रास्तों में राहें तब भावना हो और समाज के लिये कुछ करने की ललक। अपनी सेवाओं के दौरान समाज और मित्रों के लिये समर्पित रहे गोविन्द सिंह जी सेवानिवृत्त के बाद भी बेहद सक्रिय हैं और उनकी कोशिश हमेशा जोड़ने की रही है। मल्ला जोहार में होने वाली हरि प्रदर्शनी से लेकर अन्य तमाम आयोजनों पर ठोस कार्य के पक्षध्र श्री जंगपांगी जी पिघलता हिमालय परिवार के भी भी संरक्षक रूप में रहे हैं।
उनसे हुई भंेटवार्ता केवल समाचार विचार तक सीमित नहीं बल्कि उन पुरानी यादों को ताजा करना भी है जिससे नई पीढ़ी को उन पुराने दिनों की याद आ सके जब गर्मी-जाड़ा-बरसात में यात्राओं के बीच निकलने वालों ने अपने रास्ते हमेशा सच के साथ बनाए और बहुत ही ईमानदारी से रिश्तों को निभाया। श्री जंगपांगी प्रतिवर्ष मल्ला जोहार हरि प्रदर्शनी के लिये भी तत्परता से जुटते हैं और यत्र-तत्र निवास करने वाले प्रवासियों की टोह भी लेते हैं ताकि वह समाज के प्रति जुड़ाव बनाए रखें। इनकी सहजता-सरलता समाज के प्रति समर्पण को बताता है। वाकेई समाज में इस प्रकार के सयानों का होना सुखदाई है जो स्थितियों को सम्भालते और रास्ते दिखाने का काम करें। इनके अनुभवों का लाभ नई पीढ़ी ने लेना चाहिये।

प्राचीन व्यापारिक सम्बन्ध

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
प्राचीन समय की बात जब रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) के दारमा घाटी में धनधान्य से परिपूर्ण मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहा करते थे। तब लगभग 75 प्रतिशत वर्तमान कुमाउँ में कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन था। पर रं लुंग्बा (दारमा, व्याँस और चैदाँस घाटी) स्वतन्त्र भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था।
उस समय भोट देश का अलग राजा शासन करता था। तब परगना दारमा के वासी भांट देश का भोट प्रान्त होने के बाद भी वे अपने-अपने ग्रामों के स्वतन्त्र स्वामी थे। उस समय दारमानी, दारमा, रंगपा और जोहारी लोग दारमा और जोहार घाटी आने जाने व पश्चिम तिब्बत प्रान्त ;मल्ला जोहार व्यापार मार्ग से पहलेद्ध। ये हिम दर्रा मार्ग निम्न थे-
1 पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग, 2. सीपू- बलाती हिम दर्रा मार्ग।
पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग- दारमा-जोहार घाटी के व्यापारी और अन्य लोग पंचाचूली हिमगिरी शिखर के पंचा हिम दर्रा को पार कर दारमा जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह हिम दर्रा तहसील धरचूला, दारमा घाटी में है।
यह दर्रा मार्ग छोटा और खतरनाक था। इस मार्ग का प्रयोग तल्ला और मध्य दारमा के 10-15 ग्राम वाले करते थे। यह पंचा-दाँतू हिम दर्रा साफ मौसम में ही पार किया जा सकता था, जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम दाँतू में प्रवेश किया करते थे, साथ ही दारमा घाटी के वासी रालम-पातों ग्राम क्षेत्रा में पहुंचते थे।
कहावत- इस पंचा-दाँतू दर्रा मार्ग को तय करने में इतना कम समय लगता था कि मूल दाँतू ग्राम से जड़ी-बूटी, नमक और घीट से से तैयार मरच्या (नमकीन चाय जड़ी बूटी गरम चाय) पीते हुए, जोहार घाटी के रालम-पातौं क्षेत्र में पहुँचा जा सकता था।
सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग- तहसील मुनस्यारी और धारचूला, ग्राम सीपू, अटासी और ग्राम सीपू बलाती के क्षेत्र में पड़ने वाला इस हिमदर्रा को पार करते हुए दारमा-जोहार घाटी आया-जाया करते थे।
यह दर्रा मार्ग पंचा दर्रा की अपेक्षा लम्बा और सुरक्षित था। इस मार्ग का प्रयोग मल्ला दारमा के 9-10 ग्राम वाले किया करते थे, यह सीपू-बलाती हिम दर्रा जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम बलाती, अटासी ‘जोहार घाटी’ में पहुंचते थे।
कहावत- ऐसी मान्यता है कि इस हिम दर्रा की दारमा-जोहार नजदीक ग्रामों की दूरी तय करने में इतना समय लगता था कि सीपू गाँव में बनी रोटी कपड़े में तय की गयी, गरम रोटी जोहार घाटी के बलाती ग्राम क्षेत्रा तक गरम ही पहँुचती थी।
;जोहार-रालम घाटी और दारमा घाटी के व्यापारी इन दोनों ही पंचा-दाँतू और सीपू-बलाती दर्रा मार्ग का प्रयोग करके दारमा घाटी होते हुए, सीमान्त पश्चिम तिब्बत प्रान्त के निम्नलिखित क्षेत्र- मंगोल, शिल्दी थं, मिसल, चिन, ज्ञानिमा, दरचन, दयाकार, शिनचिलम और ठूकर मण्डियों में सामाग्रियों का व्यापारी विनियम करते थे। पुरंग, पाला किरमेक, डोंग दर्चिन, जोमजिंन, बिल्थी थं तकलाकोट ठुकर (मानसरोवर) गढ़तोक में अधिकतर व्याँसी लोग व्यापारी विनिमय कर व्यापार करते थे और नीति-माना घाटी वासी शिवचिलम, चपराउफ मण्डियों में व्यापारिक विनिमय के लिए जाते थे। इन्हीं मण्डियों के आसपास लला लसुली देवी के धर्म शालाएं विद्यमान हैं। उन धर्मशालाओं के अवशेष/ साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। दारमा घाटी के तरह ही जोहार घार्टी के व्यापारी भी इन्हीं तिब्बती मण्डियों का प्रयोग व्यापारिक विनिमय के लिये करते थे। इन मण्डियों तक पहँुचने के लिए उटाधूरा, जयन्तीधूरा, कुंगरी-बिंगरी धूरा तीनों गिरी द्वारों को पार करना पड़ता था।
अंग्रेज समय काल से भारत-तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त व्यापारियों का विनिमय व्यापार केन्द्र दारमा रं लुंग्बा (दारमा प्राचीन भोट प्रान्त क्षेत्र) मंगोल शिल्दी थं, विदांग नामक ग्राम ;वर्तमान ग्राम खिमलिंगद्ध हो गया, और यह विनिमय व्यापार लगभग 1962 तक चलता रहा। वर्तमान समय इस दारमा भारत-पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रा से कोई व्यापार नहीं होता है।
विनिमय (आदान-प्रदान) पश्चिम तिब्बत सामग्री- निम्न सामाग्री जैसे स्वर्ण चुरे, सुहागा, तिब्बती बकरियों का उन (पसमीन उन), नमक, बहुमूल्य रत्न, लाचा (लाख), जंगली पशुओं का चोखाल (समूर), पत्थर रत्न और अन्य सामग्री होते थे। साथ ही बकरियों, घोड़े, झुप्पू, याक का भी खरीददारी भोट (रं) जन करते थे। यह व्यापार 16500 से 18500 पिफट उफँचाई पर प्रवास के समय होता था। इन सीमान्त वासियों का मुख्य पेशा तिब्बती व्यापार तथा उफनी शिल्प उद्योग में एक दूसरे के पूरक थे।
विनिमय भारतीय (भोट/रं) सामग्री- निम्न सामग्री जैसे- गुड़, मिश्री, चीनी, चाय कपड़ा, तम्बाकू सूती वस्त्रा, सामान्य दवाईयां, ड्राई फूड, लपफो और दैनिक प्रयोग की अन्य सामग्रियों की खरीददारी पश्चिम तिब्बत व्यापारीजन करते थे।
सुनपति रं भोट समयकाल से ही जोहार-दारमा घाटी आना-जाना, व्यापार करना व अच्छे व्यवहारिक सामाजिक सम्बन्ध् के कारण शादी-विवाह का भी चलन था।
पौराणिक किवदंतियाँ (जनश्रुतियाँ)- दारमा-जोहार-रालम घाटी का पारिवारिक सम्बन्ध्- एक समय की बात है, दारमा घाटी के बेटे का ब्याह जोहार रं, रंगपा लड़की के साथ हुआ, ब्याह के बाद कुछ दिन के लिये अपने मायके जोहार-रालम घाटी रहने जा थी। मायका जोहार घाटी जाते समय वे न्यौला पंचाचूली हिमगिरी पंचा-दाँतू दर्रा को पार करने वाली थी, तब वे उच्च हिम मार्ग पार करने से कुछ पहले कुछ देर आराम करते हुए अपने दोनों तरफ ससुराल व मायका को निहार रही थी, और ससुराल से साथ लायी खाद्य सामग्री (स्यली/फाफर के आटे से तैयार गोलनुमा खाद्य) गंदु, चरपा और पतली/कट्टू आटा से तैयार गुठे, श्यली/ फापफर के आटे से तैयार गंदु (गोलनुमा), चरपा खाद्य पदार्थ पैक वाला निंगाल का टिफिन बाॅक्स ढलान की ओर गिरता ही चला गया। उस महिला ने तुरन्त उस जगह को दोष देते हुए, कोई न खा पाएँ, खा यानु बं (कितनी गन्दी जगह) अपशब्द निकल आया, जिसके कारण उसी वक्त मौसम खराब होते हुए हिमस्खलन व भूस्खलन होने लगा, वह महिला जोड़ी इस हिमस्खलन की चपेट में आकर वहीं मर गयी, साथ ही न्यौला पंचाचूली के निचला भूभाग ‘न्योल्पा बुग्याल थं’ के आसपास रहने वाले मूल दाँतू ग्राम के अधिकतर ग्रामवासी उस हिमस्खलन मं दबकर मर गए, कुछ बचे हुए ग्रामवासी वर्तमान स्थित ग्राम दाँतू में आकर बस गए।
ये ग्रामवासी ही यह ग्राम दाँतू के मूल दताल निवासी माने जाते हैं। उसी समय इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग पूर्ण रूप से खण्डित हो गया। जिस कारण इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग से दोनों ‘दारमा-जोहार-रालम घाटी’ का सम्पर्क पूर्ण रूप से टूट गया, तब से आज तक इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग का पता नहीं चल सका। इसी समय में जोहार- दारमा घाटी को मिलाने वाली दूसरी अटासी, बलाती, सीपू हिम दर्रा (बलाती-सीपू हिम दर्रा) के टूटने से यह मार्ग भी बन्द हो गया था। इसके पश्चात जोहार घाटी का व्यापार मल्ला जोहार के रास्ते पश्चिम तिब्बत प्रान्त से होने लगा। पर वर्तमान समय में इस मार्ग का प्रयोग ट्रेकर्स जोहार से दारमा, दारमा से जोहार घाटी ट्रेकिंग किया करते हैं।
यह समय काल मीठे, मृदुभाषी, ईमानदार और कर्मठ लोगों का सत्यवादी युक्त समय था।