पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली भारत के सुन्दरतम पर्वत श्रृंखला न्यौला पंचाचूली हिम श्रृंखल’ के सामने ‘‘स्यं सैं च्यूति गबला की थाती माटी’’ पर बसा गाँव-बोन के अत्यधिक आर्थिक कमजोर परिवार में भावी सामाजिक चिन्तक-बालक का जन्म 11 जुलाई 1940 में हुआ। जिनका नाम उनके परिवारजनों ने नैन सिंह रखा। नैन सिंह जी के माता का नाम-श्रीमती सुरमा दताल बोनाल और पिता का नाम-श्री ज्ञान सिंह बोनाल ‘पूनराठ’ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे स्कूली शिक्षा में अक्षर ज्ञान की औपचारिक शिक्षा भी ठीक से प्राप्त नहीं कर पाए। इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवन में बहुआयामी रूप से बहुत तरक्की किया। उनका व्यक्तित्व-बहुमुखी (सम्वेदनशील, कर्मशील, कठोर परिश्रमी) स्नेहशील और मिलनसार था। नैन सिंह जी अपने साक्षात् जीवन में सामाजिक सुधार हेतु निरन्तर चिन्तनशील रहते थे। श्रद्धेय नैन सिंह जी की अनौपचारिक शिक्ष और आजीविका- नैन सिंह जी ने अपने साक्षात् जीवन के अन्तिम दौर तक निरन्तर बहुत संघर्षशील तप किए। नैन सिंह जी की छोटी उम्र में ही उनके पिता जी की अचानक मृत्यु हो गयी जिस कारण उनके परिवार का भरण-पोषण की अतिरिक्त बाहरी जिम्मेदारी और आर्थिक सुधार की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गयी। इन्हीं कारणों से उन्होंने होश सम्भालते ही लक्ष्य 10-11 साल की उम्र से ही परिवार की आर्थिक रूप से मदद करने हेतु गाँव में सहायक (सहयोगी) के रूप में कार्य करना शुरू किया। जैसे- दूसरों के भेड़-बकरी को चराने में मदद करना और अन्य सहायक रूप के कार्य करना। नैन सिंह जी ने जैसे ही मानसिक रूप से समझ व शारीरिक रूप से सक्षम होने पर गाँव के मददगार लोगों के साथ मिलकर अपना छोटा-सा कार्य शुरू करने लगे। जैसे- अपनी थोड़ी सी भेड़-बकरी को दूसरों के भेड़-बकरियों की टोली के साथ ले जाकर सुदूर क्षेत्रों पर सामग्री विनिमय हेतु व्यापारिक कार्य पर जाना। आगे चलकर नैन सिंह बोनाल जी ने सरकारी संस्था के पशुपालन विभाब में दैनिक वेतनभोगी के तौर पर गाँव-ग्रामीणों से दूर जीवन का प्रथम चरण शुरू किया। नैन सिंह जी ने मात्रा 19 साल की उम्र से सन् 1959 में भारत-तिब्बत सीमान्त क्षेत्र बिदंग में रक्षा सीमा प्रहरी के कार्यालय वायरलैस चैक पोस्ट पर सहायक (हैल्पर) के रूप में अस्थाई नौकरी की। यह नौकरी मात्रा छः माह मई से अक्टूबर तक के लिए ही होती थी। तब वायरलैस के माध्यम से बातचीत करते समय वायरलैस की मशीन को हाथ से घुमाना पड़ता था। वे अपने कार्य के प्रति ईमानदारी व लगन से कठिन परिश्रम करते थे। शिक्षा के प्रति निरन्तर जिज्ञासा रखने के कारण उन्होंने इसी कार्यालय के कर्मचारियों की मदद से शिक्षा का प्रथम उद्देश्य ‘अक्षर ज्ञान’ की अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त की। सन् 1962-63 में मात्रा 22 साल की उम्र पर में नैन सिंह जी ने पांगू में स्थित सरकारी भेड़ पालन केन्द्र पर भेड़ों की देखरेख करने की नौकरी की। नैन सिंह जी ने जहाँ-जहाँ नौकरी की वहीं-वहीं अपनी लिखाई-पढ़ाई में रूचि व लेखनी पर विशेष ध्यान देते रहे और शिक्षित लोगों से वे निरन्तर शिक्षा लेते रहे। नैन सिंह बोनाल जी ने औपचारिक शिक्षा को प्राथमिक स्कूल से अक्षर ज्ञान की शिक्षा ठीक से प्राप्त न करने के बाद भी उन्होने अपनी शिक्षा अभिरूचि जिज्ञासा से औपचारिक शिक्षा को अनौपचिरिक रूप से प्राप्त किया। शिक्षा सम्बन्धित ज्ञान-कर्मशील योग्यता और उनके ईमानदार व्यक्तित्व के कारण क्षेत्राय ग्रामीणों के अनुमोदन पर उन्होंन सन् 1966 से 1969 तक बौंन का ग्रामीण पोस्ट आफिस में ग्रामीण पोस्ट मास्टर के पद पर सरकारी कार्य किया। नैन सिंह जी की जिन्दगी में विशेष मोड़ तब आया जब उन्हें ‘बौंन-दुग्तु’ साधन सहकारी समिति में गणक (काउन्टेन्ट) पद पर काम करने को मिला। उन्होंने इन्हीं दिनों सहकारी समिति का कार्य भी किया। इन्हीं वजहों से सरकारी सहायता क्षेत्रा के क्रियाविधि् (कार्य प्रणालियों) के बारे में जानने-समझने का मौका मिला। सहकारी समिति के कार्यों के माध्यम से उनका दारमा के चौदह गाँवों के प्रबुद्धजनों और बुद्धजीवियों से मिलन व उनसे व्यक्तिगत व्यक्तित्व से परस्पर मैत्रिक सम्बन्ध् बने। उन्हें सहकारी कार्यों के सम्बन्ध् में समय-समय पर धारचूला ब्लॉक स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बैठकों में शामिल होकर विचार-विमर्श करने का अवसर मिला। ग्रमीण कार्यशैली से हटके बाहर शासनिक-प्रशासनिक संस्था के कार्यशैली व सरकारी तन्त्रा में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जानने-समझने के कारण वे शिक्षा को और अध्कि महत्व देने लगे। उनसे मिलने वाले प्रत्येक अशिक्षित व्यक्तियों को अनौपचारिक रूप से प्रौढ़ शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा देते थे और उनके परिवारजनों का शिक्षा के प्रति उत्साहित करते हुए औपचारिक संस्थागत शिक्षा ग्रहण करने को कहते थे। सामाजिक चिन्तक श्रद्धेय नैन सिंह के सामाजिक जन जागृति अभियान पर महत्वपूर्ण भूमिका- दारमा लुंग्बा के क्षेत्रजनों ने सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए सत्तर-अस्सी के दशक में जन जागृति अभियान चलाया। यह अभियान दारमा समाज सुधारक संस्था का गठन कर चलाया गाया। इस संस्था का सूत्रधार-नेतृत्वकर्ता नैन सिंह बोनाल थे। उन्होंने दारमा घाटी के उस समय के सक्रिय नवयुवकों नवयुवतियों और विद्यार्थियों के साथ मिलकर टोली बनाकर कई बार पारम्परिक संस्कृति और संस्थागत शिक्षण के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों को जमीनी स्तर से शुरू कर क्षेत्रजनों के मन मस्तिष्क तक इसकी महत्वता को पहुँचाया जिसका एक उदाहरण ‘चौदह गाँव-चौदह दिन’ ‘पाँच सूत्रीय जन जागृति कार्यक्रम’ भी था जो 1 बाल विवाह प्रतिबन्ध्, 2 नशाबन्दी (मद्य निषेध्) 3 द्वृक्षारोपण, 4 शिक्षा-साक्षरता, ;5 सफाई आन्दोलन ;स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छताद्ध आदि मुख्य बिन्दु थे। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने जून सन् 1974-1975 में इस पाँच सूत्रीय जन जागृति अभियान में शामिल नवयुवकों-नवयुवतियों एवं विद्यार्थियों के समूह का नेतृत्व करते हुए, दारमा का दूरस्थ गाँव-सिपू से लेकर गाँव-सेला तक के चौदह गाँवों में चौदह दिन कई घण्टे पैदल चलकर घर-घर जाकर इस अभियान को चलाया। इस अभियान के निम्नलिखित उद्देश्य ;1 नशाबन्दी, ;2 शिक्षा-साक्षरता, ;3 द्क्षारोपण, ;4 बाल विवाह प्रतिबन्ध, ;5 सफाई आन्दोलन (स्वास्थ्य के प्रति स्वच्छता) होने वाले लाभ व नुकसान पर दारमा लुंग्बा के साथ-साथ दिलंग दारमा के क्षेत्राजनों के मन-मस्तिष्क (अन्तरात्मा) जन जगृति पैदा कराया जिसका काफी लाभ रं लुंग्बा जनों को हुआ। इस सामाजिक पाँच सूत्राय जन जागृति अभियान से नशाबन्दी, शिक्षा स्वास्थ्य, बाल विवाह रोकथाम व प्राकृतिक पेड़-पौधें से होने वाले लाभ के प्रति समाज को कापफी लाभ हुआ। सामाजिक चिन्तक- श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल ने पुनः ‘दारमा यवक संघ’ का नेतृत्व कर जनवरी 1977 में जौलजीबी दाँतू खे़डा से लेकर बलुवाकोट घाटीबगड़, छारछम-नयाबस्ती, कालिका, गोठी एवं निंगालपानी-गलाती तक के ग्रामीणों का जून सन् 1975 में चौदह गाँव चौदह दिन ‘पाँच सूत्राय जन ‘जागृत अभियान’ कां याद दिलाते हुए पुनः नशाबन्दी, बाल विवाह रोकथाम, कुटिर उद्योग, शिक्षा स्वास्थ्य के प्रति जनचेतना का वृहद अभियान चलाया जिसे सफलताप पूर्वक सम्पन्न किया। उपरोक्त दोनों जन जागृति (जन जागरण) में बहुत सारे दारमा के नवयुवक-नवयुवती और छात्र-छात्रायें शामिल थे। उनमें से कुछ युवकों के नाम इस प्रकार से है। कल्याण सिंह सोनाल, राम सिंह सोनाल, चन्द सिंह ग्वाल, पुष्कर सिंह सेलाल, फली सिंह दताल, श्री लाल सिंह बोनाल और बिशन सिंह बोनाल। समय-समय पर हुए इस प्रकार से जन चेतना कार्यक्रम के फलस्वरूप ही आज दारमा रं लुंग्बा के अनेक नौजवान शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदां पर आसीन होकर दारमा का नाम रोशान कर रहे हैं। सन् 1980 जुलाई-अगस्त कोठी में जबरदस्त भूकम्प आया जिसमें स्थानीय लोगों की बहुत चल-अचल सम्पत्तियों का नुकसान हुआ। उस वक्त भी नैन सिंह बोनाल जी ने निःस्वार्थ ध्रातली सेवक के रूप मे भूकम्प पीड़ितों को राहत पहुँचाने हेतु लगातार कई महिने तक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही के तौर पर शासन-प्रशासन की सहायता कर विशेष योगदान दिया। उस समय के सरकारी अधिकारियों ने उनकी इस सेवा कार्य की खूब प्रशंसा की और इन अध्किरियों और क्षेत्राय सामाजिक संस्थाओं ने उनके द्वारा क्षेत्रा में पूर्व से 1980 अगस्त तक के समाज सेवा, सामाजिक सेवा कार्यों की गणना कर उन्होंने समाज को दिये अपन े महत्वपूर्ण समय की महत्वता को समझते हुए कार्य पफल के रूप में श्रद्धेय नैन सिंह जी का नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए नामित करने की बात की। पर दुर्भाग्यवश कुछ षड़यन्त्राकारियों के कारण उनका नाम इस पुरस्कार के लिए नामित नहीं हो पाया। समाज सेवक नैन सिंह जी ने सामाजिक क्षेत्रा से लेकर कई सरकारी संस्थानों में काम करते हुए अपनी अन्तर आत्मा के अनुसार सामाजिक दायित्वों को पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा एवं ईमानदारी से निभाया। जिस वजह से स्थानीय समाज उनके नाम को समय-समय पर जरूर स्मरण करते हैं। यही उनके लिए सर्वोपरि पुरस्कार के समान है। समाज सेवक नैन सिंह बोनाल ने सच्चे समाज सेवक के रूप में दारमा क्षेत्रा और राज्य सरकार द्वारा संचालित समाज कल्णण विभाग से जनमानस को लाभ पहुँचाने के लिए बहुत से कार्य किये। नैन सिंह बोनाल जी ने सामाजिक हित के लिए परस्पर विरोध् की राजनीति के बिना ;किसी भी पक्ष-विपक्ष के बहकावे में आए बिनाद्ध अपने विवेक से जनमानस क्षेत्राजनों के परस्पर प्रेम एकता हेतु सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में समाज सेवा का कार्य उनसे जितना हो सके वे कार्य उन्होंने पूर्ण ईमानदारी से किया। इन्हीं कारणों से उन्हें रं लुंग्बा का सामाजिक प्रेरणास्रोत माना जाता है। सामाजिक चिन्तक- नैन सिंह जी के सपफल प्रयासों से हम सब आज दंग्ते दंग में मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखला देख पा रहे हैं ;जब इस पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर मन्दिर निर्माण कार्य शुरू होने वाला था। सभी खरीदे निर्माण सामग्रियों व कार्य करने वाले लोग यहाँ पहुँच गये थे। मन्दिर निर्माण कार्य शुरू करने के लिये खुदाई शुरू करनी थी तब यहाँ सर्वप्रथम खुदाई शुरू करने के लिए कोई क्षेत्राजन व निर्माण कार्य करने वाला व्यक्ति तैयार नहीं हुआ क्योंकि कुछ रूढ़िवादी सोच वाले लोगों ने अपफवाह फैला दी थी कि इस पवित्रा दंग्तों दं बं भू-भाग में जो खुदाई करेगा उसे प्रकृति और दैवीय शक्ति का दण्ड झेलना पड़ेगा। उस समय रूढ़िवादी सोच के डर से कोई भी व्यक्ति यहाँ खुदाई शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस विकट समस्या पर रूढ़िवादी सोच से हटकर श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल ने कहा कि मैं यहाँ सर्वप्रथम खुदाई करूंगा। चाहे मुझे प्रकृति और दैविय दण्ड झेलना पड़े। मैं झेलूँगा कहते हुए खुदाई की सर्वप्रथम शुरूआत उन्होंने मन्दिर निर्माण कार्य हेतु किया तभी इस पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर मन्दिर निर्माण कार्य शुरू हो पाया। ;कथन नैन सिंह बोनाल जी की पत्नी आवती गुंज्याल बोनालद्ध समाज सेवक श्र(ेय नैन सिंह बोनाल के कार्यपफल से ही वर्तमान में पवित्रा दंग्तों देव दं बं पर इस प्रकार से मन्दिरों की सुन्दर श्रृंखला देख पा रहे हैं। सन् 1977 संगठन (समिति) स्यांग सैं ह्या गबला देव की मूर्ति लाने की जिम्मेदारी उस समय के सक्रिय कार्यकता नैन सिंह बोनाल जी और रूप सिंह दताल (नेता जी) को सौंपी। पूर्व प्रस्ताव के आधर पर नैन सिंह बोनाल अपने सहायक ;सहयोगीद्ध रूप सिंह दताल (नेता जी) के साथ दाँतू के सामूहिक ह्या गबला देव मन्दिर हेतु स्यांग सैं ह्या गबला की मूर्ति को जयपुर में बनवाने के लिए मई 1978 को गये। अगस्त 1978 को यह मूर्ति जयपुर राजस्थान से गोठी, धरचूला लाया गया। इस स्यांग सैं ह्या गबला की मूर्ति को सभी चौदह गाँवों में परिक्रमा करवाते हुए 23-08-1978 को दाँतू गाँव में मूर्ति पहुँचाई गई और 24-08-1978 को आदि देव ‘स्यांग सैं ह्या गबला देव’ गबला मन्दिर में स्थापित किया गया। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने दारमा के सामाजिक बुद्धजीवियों ने उन्हें सौंपी जिम्मेदारी को बखूबी से निभाते हुए इन सभी सामूहिक कार्यों को सन्ताशजनक ढंग से सम्पन्न करवाया। इसके साथ ही श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल और उनके अनुज भ्राता इन्जीनियर श्री फल सिंह बोनाल जी के सौजन्य से अपनी माता स्व. सुरमा देवी दताल बोनाल की दादी यानि नैन सिंह व फल सिंह जी की परनानी महान समाजसेविका जसुली देवी जी की मूर्ति को मूर्तिकार-डी.आर. सीपाल जी से बनवाकर स्थापित करवाया। यह लला जसुली जी की मूर्ति पूरे रं लुंग्बा का प्रथम रं मूर्ति (स्टेचू) था और है जो वर्तमान समय पर भी लला जसुली दं बं पर स्थित है। उपरोक्त सेवा कार्यों के बाद उनके जीवन के अगले चरण में धारचूला ब्लॉक में कनिष्ठ उप प्रमुख के पद पर कार्य किया। इसके बाद वे ग्राम बौंन में 1970-80 के दशक में दो बार ग्राम प्रधन पद पर चुने गये। समाज सेवक नैन सिंह जी धारचूला ब्लॉक के सच्चे, ईमानदार, निष्ठावान, निःस्वार्थ समाज सेवक के रूप में उभरे। राजनीति भूमिका- श्रद्धेय नैन सिंह बोनाल जी ने राजनीति की पारी सन् 1969-1970 में काँग्रेस पार्टी की सदस्यता लेकर किया। काँग्रेस पार्टी में शामिल होकर उन्होंने अपने पूरे राजनीति जीवन पदाध्किरी पद की लालसा किए बिना एक सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया। उन्होंने समय-समय पर कांग्रेस संगठन के साथ मिलकर कई बार कांग्रेस सदस्यता अभियान चलाया। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल जी ने कांग्रेस पार्टी में पद की प्राथमिकता उनके जीवन में कभी नहीं रहा। वे जमीनी सक्रिय कार्यकर्ता का काम संगठन के पदाधिकारी से अधिक महत्वपूर्ण समझते थे। वे हमेशा स्वदेशी खादी कुर्ता-पायजामा ही पहनते थे। पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता का सम्बन्ध् पार्टी सदस्यों और पदाधिकारी दोनों के साथ होता है। दोनां ही पक्ष सक्रिय कार्यकर्ता की बात सुनते व मानते हैं। इसी से आप समझ सकते हैं कि संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता की क्या भूमिका होती है। कांग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल की महत्वपूर्ण भूमिका के माध्यम से सन् 1986-1987 में प्रधन मन्त्रा राजीव गांधी जी को गेठी बुलाने में वे सपफल रहे। इसी से आप स्पष्ट समझ सकते हैं कि उनके पास कांग्रेस पार्टी का कोई पद न होने के बाद भी उनकी कांग्रेस संगठन में क्या महत्व था। उनकी ईमानदार-कर्तर्व्य निष्ठता के सिद्धान्त ही उनका मूल मन्त्र था। समाज सेवक नैन सिंह बोनाल जी ने अपने जीवन यात्रा में सम्भाले कुछ मुख्य सामाजिक पद का विवरण- 1. सहायक गणक (सुपरवाईजर)-बौंन-दुग्तू साध्न सहकारी समिति। 2. अध्यक्ष नवयुवक संघ/मंगल दल-बौंन। 3 अध्यक्ष दारमा उत्थान समिति। 4. ग्राम प्रधान -बौंन। 5. सक्रिय सदस्य-कांग्रेस ब्लॉक कमेटी धारचूला। 6. उपाध्यक्ष कल्याण संस्था शाखा धारचूला। 7. सदस्य एकीकृत जनजाति विकास समिति नाचनी मुनस्यारी। 8. सदस्य खादी कमीशन सलाहकार समिति धारचूला। 9. संचालक जिला सहकारी बैंक पिथौरागढ़। 10. ब्लॉक कनिष्ठ प्रमुख क्षेत्रा समिति धारचूला। 11. सदस्य-कैलाशाश्रम स्वराज्य संस्था धारचूला। 12. सदस्य उ.प्र. सरकार द्वारा आयोजित भारत भ्रमण प्रोग्र्राम के सदस्य में सम्मिलित हुए उन्हें कई धर्मिक स्थानों एवं प्रतिष्ठानों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ था। समाज सेवक बोनाल जी ने अपने जीवन के उनसठ बसन्त देखने के बाद अपने घर गोठी में स्वस्थ स्वास्थ्य में दिनांक 3.5.1998 की रात को लगभग आठ बजे अचानक हृदयगति रुक जाने से हम सभी को छोड़कर ईश्वर के पास चले गये। उनके द्वारा किये गये बहुत सारे सामाजिक कार्यों से हम हमेशा उन्हें याद करते हुए उनके ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ कार्य प्रणाली से प्रेरणा लेते रहेंगे। जिन्होंने अपना सारा जीवन समाज की भलाई के लिए चिन्तनशील रहते हुए समाज को समर्पित किया। इन्हीं कारणों से उन्हें रं लुंग्बा का महान सामाजिक चिन्तकों की श्रेणी में रखा जाता है। इसका मुख्य कारण उनके द्वारा किसी भी पक्ष-विपक्ष के बहकावे में आए बिना सापफ छवि ईमानदार कर्तव्य निष्ठता व्यक्तित्व से किया कार्य माना जाता है। सामाजिक चिन्तक नैन सिंह बोनाल ने समाज में किये गये सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक उत्थान के कार्य को संज्ञान में लेकर रं कल्याण संस्थान ने अपने वार्षिक आम सभा (एजीम 2011) ग्राम-दाँतू (दारमा) में उन्हें रं गौरव सम्मान से सम्मानित किया। समाज सेवक नैन सिंह बोनाल जी के परिवार का संक्षिप्त विवरण- वैसे तो निःस्वार्थ समाज सेवा के प्रति निष्ठावान समाज सेवक का परिवार पूरा समाज होता है। पफर भी ऐसे ध्नात्मक सोच वाले सामाजिक चिन्तक के निजी जीवन का थोड़ा जिक्र होना ही चाहिए। बोनाल जी ने अगस्त 1964 में गुंजी गाँव की आवती गुंज्याल जी से विवाह किया। धर्मपत्नी आवती जी से दो पुत्र (गगन सिंह, धीरेन्द्र सिंह ) और दो पुत्रियां (शकुन्तला, विशन्तला) हुई। समाज सेवक-श्र(ेय नैन सिंह बोनाल के दोनों पुत्रा भारत सरकार के अधीन सरकारी कार्यालयों में अपनी सेवा दे रहे हैं। उनके चारों बच्चे अपने-अपने दाम्पत्य जीवन के सुख भोग रहे हैं। वर्तमान समय में उनकी धर्मपत्नी आवती गुंज्याल बोनाल उम्र के अस्सीवे पड़ाव में अपनी सभी बच्चों के साथ खुशनुमा जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
इतिहास कथा नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन समय में उत्तराखण्ड का उत्तर-पूर्वी (वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय सीमान्त क्षेत्र) का हिम क्षेत्र, पश्चिम तिब्बत प्रान्त और हूण देश के सम्बन्ध इस प्रकार से थे। भोट देश- वर्तमान कुमाउँ का उत्तर पूर्व अन्तर्राष्ट्रीय हिम सीमान्त क्षेत्र और पश्चिम तिब्बत हिम सीमान्त क्षेत्र को सर्वप्रथम स्वतन्त्र भोट देश के नाम से जाना जाता था। ‘कूर्मांचल वाले’ कुमाउंनी लोग भारत तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय हिम सीमान्त क्षेत्रा को ‘भोट देश’ कहते थे। जो हिमाच्छादित प्रान्तों का नाम है। इनका माने उस देश से है, जहाँ ‘भोट-भोटिया’ रं, रौंगपा, शौका, जाड़ औन अन्य जनजातीय लोग रहते हैं। इस क्षेत्र के वासियों को कुमाउंनी लोग भोट-भोटिया और कुछ लोग शौका से भी सम्बोधित करते थे। ( कुमाउं का इतिहास, पेज नं. 523, लेखक बद्री दत्त पाण्डे) हूण देश- कूर्मांचल ( कुमाउं ) के कुर्मांचली लोग मध्य तिब्बत क्षेत्र के मूल/स्थायी तिब्बतियों के बौद्धिकबौद्ध और उनके देश को बौद्धिक देश/बौ( देश भी कहते थे। वास्तविक बौद्ध देश के जगह हूण देश का नाम बार-बार इतिहास में आने का कारण चैथी और पाँचवीं शताब्दी में हूण समुदायों के समूह का वर्चस्व पूरे बौद्ध /लामा देश के मध्य केन्द्र तक फैल गया था। ये हूणीये चीन के पश्चिम दक्षिण हिमालय क्षेत्र से, पश्चिम उत्तर बौद्ध देश की सीमान्त से होते हुए बौद्ध देश के केन्द्र तक पहुँचे। बौद्ध लामाओं का वर्चस्व कम होने के कारण बाद में यह बौद्ध /लामा देश ही हूण देश कहलाने लगा/हूण देश के नाम से जाना जाने लगा। श्री मूर प्रोफ्ट और उसके साथी श्री विल्सन 1812 में तिब्बत गए थे। उन्होंने इसे हूण देश यानि उन देश बताया, किन्तु इस समय असली नाम हूण देश था। जिसका तात्पर्य उन मानववादी, बौद्धिकता वादियों से था, जो मानवीय और बौद्धिकता पर पूर्णतयाः विश्वास करते थे। जहाँ पर मूल बौ( लामा रहते थे। पर उस समय काल में उन हूणीयों को प्रभुत्व मध्य तिब्बत तक फैल गया था। जो हूणीयों, बौद्धिकबौद्धिकतावादी और मानववादी लामाओं से अलग व्यक्तित्व वाले लामाएं/ बौद्ध कहे जाते थे। ये अपने समुदाय और क्षेत्र से अलग दूसरे बाहरी लोगों पर जबरदस्ती अधिकार जमाते थे, दूसरे क्षेत्रा में लूटपाट व क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते थे। इनके समुदाय में एक सरदार (मुखिया) होता था और ये सरदार (मुखिया) को राजा समतुल्य मानते थे और बाहरी लोग भी उसे राजा ही समझते थे। ये हूणी लोगों को आतंकित करते हुए, दूसरे क्षेत्रों को जबरदस्ती अपने अधीन करते थे। ये हूण समुदायी लोग मूल तिब्बती नहीं थे। आरम्भ में ये हूणी लोग चीन के पश्चिम क्षेत्र में रहते थे। पहली-दूसरी शताब्दी के मध्य में चीनियों ने इन हूणीयों को हराकर इनके मूल स्थान से पश्चिम और दक्षिण हिमालय क्षेत्रा की ओर भगाया। बाद में इन्हीं हूणीयों ने पश्चिम-दक्षिण हिम क्षेत्रों के मध्य पर अधिकार जमाया और यही क्षेत्र बाद में हूण देश कहलाने लगा। हिन्दू सांस्कृतिक ग्रन्थोें में हूण शब्द अनेकों स्थान में आया है। हूण देश के हूणी व्यापारी, जोहारी व्यापारी को ‘क्योनवा’ कहते थे। उनकी बोली में जोहार और कुमाउफँ का नाम ‘क्योनम’ था। दरमानियों को ‘भोट-भोटिया या श्योण’ के नाम से सम्बोधित करते थे। व्यासियों को ‘ज्यालबू’ कहते थे। भोट देश के भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ की पूर्ण स्वतंत्राता पर ‘प्रथम प्रहार’- हुणियों की क्रूरता का प्रमाण- भोट प्रान्त का मशहूर मालदार व्यापारी सुनपति रं भोट, भोट देश के सीमान्त दारमा प्रान्त के राजा न होते हुए भी उनका यहाँ के सामाजिक नियम-कानून (शासन- प्रशासन) की व्यवस्था में तूती बोलती थी, दबदबा चलता था। इसी कारण हूणी क्रूर, घमण्डी, शादीशुदा, मुख्य सरदार/ राजा विक्खीपाल ने उसकी पुत्री की मोहिनी रूप की सुन्दरता को देखकर सुनपति भोट से पुत्री राजुला का विवाह का प्रस्ताव रखा। मना करने पर रं भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ के साथ पूरे भोट देश को गुलाम कर अपने अधीन करने की धमकी दी थी। सुनपति भोट-भोटिया ने भोट प्रान्त (वर्तमान रं लुंग्बा) और भोट देश को बचाने के लिए हूण देश के मुख्य सरदार/राजा विक्खीपाल का विवाह प्रस्ताव न चाहते हुए भी स्वीकार किया, राजुला ने अपने पिता का मान रखने और प्रान्त के साथ देश को बचाने के खातिर बेमेल विक्खीपाल के साथ विवाह किया। बाद में वर्तमान कुमाउँ मण्डल उत्तर-पूर्व क्षेत्र और पश्चिम तिब्बत का सीमान्त हिम क्षेत्र यानि भोट देश को हूण देश के नये शासन ने कुछ महीनों बाद गुलाम कर अपने अधीन कर लिया। (क्योंकि हूण देश के शासक विक्खीपाल के साथ सुनपति भोट की लड़की राजुला का विवाहिता जीवन ज्यादा दिनों तक सफल न हो सका। कारण- राजुला का जन्मकालीन/बाल्यकालीन मंगेतर बैराठ स्पप्न प्रेमी राजकुमार मालुशाही उसे लेने साधु के भेष में दारमा रं भोट प्रान्त होते हुए हूण देश पहँुचे। विक्खीपाल को मारकर राजुला को अपने राजधानी -बैराठ ‘वर्तमान चैखुटिया’ ले गए।) हूण प्रशासन का जबरदस्ती कर वसूली- मध्य तिब्बती हूण देश के प्रशासन हमारे इस रं भोट रं लुंग्बा से तीन प्रकार कर वसूला करते थे- 1. सिंहथल मालगुजारी (जानवरों की चराई पर कर) 2. थाथल ( धूप सेकने पर टैक्स) 3. क्यूथल (जिजारत में नफा) व्यापार में कर और व्यापार में नफा पर कर। हुमला-झुमला राज्य, नेपाल का जबदस्ती अध्ीन कर/टैक्स, भोट ‘रं लुंग्बा’ की स्वतंत्रता पर द्वितीय प्रहार- यह दारमा परगना का (दारमा, व्यास और चैंदास) तीनों क्षेत्रा पर हुमला-झुमला राज्य ने कुछ महिने-सालों तक जबरदस्ती अपना अध्किार जमाया। वह जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट किया करते थे, और जो भी आवश्यक सामग्री मिले उसे कर/टैक्स के रूप में अपने साथ ले जाया करते थे। नेपाल हुमला-झुमला प्रान्त का जबरदस्ती कर वूसली के बाद में दारमा परगना, दारमा घाटी, व्यास घाटी, चैंदास घाटी, चंद राज्य, गोरखाराज, अंग्रेज राज्य में कुमाउँ प्रान्त के अधीन आ गया। चन्द शासन राज का जबरस्ती अधीन कर टैक्स, रं लुंग्बा की स्वंत्रता पर तृतीय प्रहार- चंद शासक ने दारमा
परगना से सोने-चाँदी के छोटे-छोटे चूरे के रूप में टैक्स लेते थे। गोरखा शासन राज का जबरदस्ती अधीन कर/टैक्स, रं लुंग्बा स्वतंत्रता पर चतुर्थ प्रहार- गोरखा राज के प्रशासन दारमा परगना रं लुंग्बा से जड़ी-बूटी, बाज के पेड़, कस्तूरी, शहद और खेती पर टैक्स/ कर लेते थे। रं लुग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) में रं भोट जनों के द्वारा हूणियों से लेकर हुमला-झुमला, चंद, गोरखा और अंग्रेज राज के शासकों तक कोई हिंसक क्रूरता अप्रिय घटनाक्रम का प्रमाण नहीं मिलता है। इससे हम रं जन यह सि( कर सकते हैं कि इस रं लुंग्बा के रं जन की विचारधारा रागद्वेष, कटुता से काफी दूरी है। इसी मानवीय, बौद्धिक विचार धारा के कारण हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक और सभ्यता अन्य समुदाय की मानसिकता से काफी आगे है। विडम्बना यह है कि हम सब रं जनों को भोटिया और यहाँ की हमारी निवास को भोट कैसे कहा जाता है। सच तो यह है कि सर्वप्रथम इतिहास में तिब्बत को ही भोट/भोत/ बौद्ध नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश भारत के प्रशासकों, लेेखकों, जासूसों और अनुसंधनकर्ताओं ने वर्तमान रं लुंग्बा के इस क्षेत्रा में रहने वाले रं जनों को तिब्बत की भांति हम जनों को भोट और यहाँ रं लुंग्बा के निवासियों को भोटिया उपजाति नाम देकर परिचित कराया। इन्हीं शब्दों का अनुसरण आज तक होता आ रहा है। जबकि हम भोट देश, भोट प्रान्त-रं लुंग्बा के ‘रं-रंस्या’ जन हैं। ब्रिटिश काल के शुरुआत और उससे पहले के राजशाही में यह सब क्षेत्रा स्वतंत्रा और भोट देश का भोट प्रान्त ‘रं-लुंग्बा’ हुआ करता था (रं लुंग्बा जनों का व्यापार भोट देश तिब्बतीय सीमान्त प्रान्त से हुआ करता था।) तिब्बती भोट शब्द को सात समुन्दर पार वाले अंगे्रज अंग्रेजी में भोट ही लिखा करते थे। अतः भोत ठीवज से यह भोट हो गया। ठीक इसी प्रकार ऐसा ह इन अंग्रेजों ने तिब्बत के याक ;चवर गाय) को रोमन में समस्त विश्व में याक को मशहूर कर दिया। जोहारी, व्यासी, चैंदासी, एवं दारमिया को सम्मिलित रूप से पड़ोसी कुमाउंनी एवं नेपाली जन भोटिया और शौक्याण शब्द से भी सम्बोधित करते आ रहे हैं। (पिता श्री मोहन सिंह दताल जी के कथानुसार 20वीं शताब्दी के मध्य तक भी पश्चिमी-तिब्बत प्रान्तीय प्रशासन दारमा घाटी के मध्य ग्रामों तक जबरदस्ती कर वसूली किया करते थे। पिता श्री 9-10 बार व्यापारी सहायक के रूप में व्यापार के लिये प्राचीन भोट देश प्रान्त- रं लुंग्बा और वर्तमान तिब्बत देश प्रान्त- पश्चिम तिब्बत के सीमान्त क्षेत्रा शिल्दी थं, ज्ञानिमा, ठुकर निम्न व्यापारिक मण्डियों में व्यापार के लिये गये थे।) जय हो हमारे पूर्वज, जय हो हमारा रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) ‘‘खा जैनु निसु – खा लिजु – थन गुम निनि’’
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन समय की बात जब रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) के दारमा घाटी में धनधान्य से परिपूर्ण मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहा करते थे। तब लगभग 75 प्रतिशत वर्तमान कुमाउँ में कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन था। पर रं लुंग्बा (दारमा, व्याँस और चैदाँस घाटी) स्वतन्त्र भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। उस समय भोट देश का अलग राजा शासन करता था। तब परगना दारमा के वासी भांट देश का भोट प्रान्त होने के बाद भी वे अपने-अपने ग्रामों के स्वतन्त्र स्वामी थे। उस समय दारमानी, दारमा, रंगपा और जोहारी लोग दारमा और जोहार घाटी आने जाने व पश्चिम तिब्बत प्रान्त ;मल्ला जोहार व्यापार मार्ग से पहलेद्ध। ये हिम दर्रा मार्ग निम्न थे- 1 पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग, 2. सीपू- बलाती हिम दर्रा मार्ग। पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग- दारमा-जोहार घाटी के व्यापारी और अन्य लोग पंचाचूली हिमगिरी शिखर के पंचा हिम दर्रा को पार कर दारमा जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह हिम दर्रा तहसील धरचूला, दारमा घाटी में है। यह दर्रा मार्ग छोटा और खतरनाक था। इस मार्ग का प्रयोग तल्ला और मध्य दारमा के 10-15 ग्राम वाले करते थे। यह पंचा-दाँतू हिम दर्रा साफ मौसम में ही पार किया जा सकता था, जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम दाँतू में प्रवेश किया करते थे, साथ ही दारमा घाटी के वासी रालम-पातों ग्राम क्षेत्रा में पहुंचते थे। कहावत- इस पंचा-दाँतू दर्रा मार्ग को तय करने में इतना कम समय लगता था कि मूल दाँतू ग्राम से जड़ी-बूटी, नमक और घीट से से तैयार मरच्या (नमकीन चाय जड़ी बूटी गरम चाय) पीते हुए, जोहार घाटी के रालम-पातौं क्षेत्र में पहुँचा जा सकता था। सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग- तहसील मुनस्यारी और धारचूला, ग्राम सीपू, अटासी और ग्राम सीपू बलाती के क्षेत्र में पड़ने वाला इस हिमदर्रा को पार करते हुए दारमा-जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह दर्रा मार्ग पंचा दर्रा की अपेक्षा लम्बा और सुरक्षित था। इस मार्ग का प्रयोग मल्ला दारमा के 9-10 ग्राम वाले किया करते थे, यह सीपू-बलाती हिम दर्रा जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम बलाती, अटासी ‘जोहार घाटी’ में पहुंचते थे। कहावत- ऐसी मान्यता है कि इस हिम दर्रा की दारमा-जोहार नजदीक ग्रामों की दूरी तय करने में इतना समय लगता था कि सीपू गाँव में बनी रोटी कपड़े में तय की गयी, गरम रोटी जोहार घाटी के बलाती ग्राम क्षेत्रा तक गरम ही पहँुचती थी। ;जोहार-रालम घाटी और दारमा घाटी के व्यापारी इन दोनों ही पंचा-दाँतू और सीपू-बलाती दर्रा मार्ग का प्रयोग करके दारमा घाटी होते हुए, सीमान्त पश्चिम तिब्बत प्रान्त के निम्नलिखित क्षेत्र- मंगोल, शिल्दी थं, मिसल, चिन, ज्ञानिमा, दरचन, दयाकार, शिनचिलम और ठूकर मण्डियों में सामाग्रियों का व्यापारी विनियम करते थे। पुरंग, पाला किरमेक, डोंग दर्चिन, जोमजिंन, बिल्थी थं तकलाकोट ठुकर (मानसरोवर) गढ़तोक में अधिकतर व्याँसी लोग व्यापारी विनिमय कर व्यापार करते थे और नीति-माना घाटी वासी शिवचिलम, चपराउफ मण्डियों में व्यापारिक विनिमय के लिए जाते थे। इन्हीं मण्डियों के आसपास लला लसुली देवी के धर्म शालाएं विद्यमान हैं। उन धर्मशालाओं के अवशेष/ साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। दारमा घाटी के तरह ही जोहार घार्टी के व्यापारी भी इन्हीं तिब्बती मण्डियों का प्रयोग व्यापारिक विनिमय के लिये करते थे। इन मण्डियों तक पहँुचने के लिए उटाधूरा, जयन्तीधूरा, कुंगरी-बिंगरी धूरा तीनों गिरी द्वारों को पार करना पड़ता था। अंग्रेज समय काल से भारत-तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त व्यापारियों का विनिमय व्यापार केन्द्र दारमा रं लुंग्बा (दारमा प्राचीन भोट प्रान्त क्षेत्र) मंगोल शिल्दी थं, विदांग नामक ग्राम ;वर्तमान ग्राम खिमलिंगद्ध हो गया, और यह विनिमय व्यापार लगभग 1962 तक चलता रहा। वर्तमान समय इस दारमा भारत-पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रा से कोई व्यापार नहीं होता है। विनिमय (आदान-प्रदान) पश्चिम तिब्बत सामग्री- निम्न सामाग्री जैसे स्वर्ण चुरे, सुहागा, तिब्बती बकरियों का उन (पसमीन उन), नमक, बहुमूल्य रत्न, लाचा (लाख), जंगली पशुओं का चोखाल (समूर), पत्थर रत्न और अन्य सामग्री होते थे। साथ ही बकरियों, घोड़े, झुप्पू, याक का भी खरीददारी भोट (रं) जन करते थे। यह व्यापार 16500 से 18500 पिफट उफँचाई पर प्रवास के समय होता था। इन सीमान्त वासियों का मुख्य पेशा तिब्बती व्यापार तथा उफनी शिल्प उद्योग में एक दूसरे के पूरक थे। विनिमय भारतीय (भोट/रं) सामग्री- निम्न सामग्री जैसे- गुड़, मिश्री, चीनी, चाय कपड़ा, तम्बाकू सूती वस्त्रा, सामान्य दवाईयां, ड्राई फूड, लपफो और दैनिक प्रयोग की अन्य सामग्रियों की खरीददारी पश्चिम तिब्बत व्यापारीजन करते थे। सुनपति रं भोट समयकाल से ही जोहार-दारमा घाटी आना-जाना, व्यापार करना व अच्छे व्यवहारिक सामाजिक सम्बन्ध् के कारण शादी-विवाह का भी चलन था। पौराणिक किवदंतियाँ (जनश्रुतियाँ)- दारमा-जोहार-रालम घाटी का पारिवारिक सम्बन्ध्- एक समय की बात है, दारमा घाटी के बेटे का ब्याह जोहार रं, रंगपा लड़की के साथ हुआ, ब्याह के बाद कुछ दिन के लिये अपने मायके जोहार-रालम घाटी रहने जा थी। मायका जोहार घाटी जाते समय वे न्यौला पंचाचूली हिमगिरी पंचा-दाँतू दर्रा को पार करने वाली थी, तब वे उच्च हिम मार्ग पार करने से कुछ पहले कुछ देर आराम करते हुए अपने दोनों तरफ ससुराल व मायका को निहार रही थी, और ससुराल से साथ लायी खाद्य सामग्री (स्यली/फाफर के आटे से तैयार गोलनुमा खाद्य) गंदु, चरपा और पतली/कट्टू आटा से तैयार गुठे, श्यली/ फापफर के आटे से तैयार गंदु (गोलनुमा), चरपा खाद्य पदार्थ पैक वाला निंगाल का टिफिन बाॅक्स ढलान की ओर गिरता ही चला गया। उस महिला ने तुरन्त उस जगह को दोष देते हुए, कोई न खा पाएँ, खा यानु बं (कितनी गन्दी जगह) अपशब्द निकल आया, जिसके कारण उसी वक्त मौसम खराब होते हुए हिमस्खलन व भूस्खलन होने लगा, वह महिला जोड़ी इस हिमस्खलन की चपेट में आकर वहीं मर गयी, साथ ही न्यौला पंचाचूली के निचला भूभाग ‘न्योल्पा बुग्याल थं’ के आसपास रहने वाले मूल दाँतू ग्राम के अधिकतर ग्रामवासी उस हिमस्खलन मं दबकर मर गए, कुछ बचे हुए ग्रामवासी वर्तमान स्थित ग्राम दाँतू में आकर बस गए। ये ग्रामवासी ही यह ग्राम दाँतू के मूल दताल निवासी माने जाते हैं। उसी समय इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग पूर्ण रूप से खण्डित हो गया। जिस कारण इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग से दोनों ‘दारमा-जोहार-रालम घाटी’ का सम्पर्क पूर्ण रूप से टूट गया, तब से आज तक इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग का पता नहीं चल सका। इसी समय में जोहार- दारमा घाटी को मिलाने वाली दूसरी अटासी, बलाती, सीपू हिम दर्रा (बलाती-सीपू हिम दर्रा) के टूटने से यह मार्ग भी बन्द हो गया था। इसके पश्चात जोहार घाटी का व्यापार मल्ला जोहार के रास्ते पश्चिम तिब्बत प्रान्त से होने लगा। पर वर्तमान समय में इस मार्ग का प्रयोग ट्रेकर्स जोहार से दारमा, दारमा से जोहार घाटी ट्रेकिंग किया करते हैं। यह समय काल मीठे, मृदुभाषी, ईमानदार और कर्मठ लोगों का सत्यवादी युक्त समय था।
जै हुरबी रं बाहुबली का गाँव बोंगलींग/बौंग्लींग नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन काल में रंग लुंग्बा के दारमा घाटी, ग्राम- बोंगलींग/बौंग्लींग में बाहुबली मानव ‘हुरबी’ पहलवान रहता था। वे कुश्ती पहलवानी करते-करते इतने पहलवान हो गये कि वह रं लुग्बा का बाहुबली मानव कहलाने लगे। हुरबी पहलवान को रं लुंग्बा के कोई भी पहलवान पहलवानी/कुश्ती में पराजित नहीं कर पाते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने समय में पहलवानी में इतिहास रचा, जिसके कारण आज भी हम उन्हें याद करते हुए और जय दारमा ‘भीम’ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। यह उस सदी की बात है जब रं लुंग्बा के पुरुष अपने कमर में हल की रस्सी बाँधकर खेत की जुताई किया करते थे। प्राचीन समय से ही रं लुंग्बा जनों ने नेपाल हुमला-झुमला प्रान्त के झुमलियों के द्वारा जबरदस्ती कर वसूली व अमानवीय आतंकित लूटपाट का दंश समय-अन्तराल समय-समय पर झेला था। ये लोग रं लुंग्बा जन बहुत ही सीधे-साधे विचार के रहे हैं। पहली घटना- एक बार लगभग 50-60 झुमलियों के समूह ने जबरदस्ती कर वसूली व आतंरिक लूटपाट करने के वास्ते नेपाल देश के हुमला-जुमला प्रान्त से बंगबा चैंदाँस घाटी के रिमझिम, हिमखोला ग्राम के पहाड़ की चढ़ाई कर पहाड़ की दूसरी ओर दारमा क्षेत्र का लंगदारमा, दैर्री /हेरी, फकल, नामक क्षेत्र में पहुँच कर नदी पार कर तल्ला दारमा, ग्राम बौंगलींग में प्रवेश किया। ग्राम जनों ने झुमलियों के द्वारा की जाने वाली जबदस्ती कर वसूली का विरोध् किया, झुमली लोग डराकर आतंकित लूटपाट पर उतारु हो हो गये, उसी पल दोनों गुटों में बहस हो गयी पर कुछ बुद्धिजीवी ग्रामजनों ने जबदरस्ती आतंकित लूटपाट से बचने के लिए एक कूटनीति चाल चली। हम आपको दोगुना टैक्स/कर देंगे, पर जब आप लोग हमारे हुरबी जी को कुश्ती में हरा पाओगे। झुमलियों ने हुरबी पहलवान जी को सामान्य व्यक्ति समझकर इस कुश्ती चुनौती को स्वीकार कर लिया और कुश्ती का मुकाबला ग्राम के चैथरा थंग में शुरु करवाया गया। बाहुबली हुरबी पहलवान ने एक-एक करके अधिकतर झुमलियों को अकेले ही हरा दिया और हारे हुए झुमलियों में से 10-15 झुमलियों को अकेले ही को कुश्ती में क्ररता से इतना घायल कर दिया कि एक-ढेड़ घण्टे के समय अन्तराल में उनकी मृत्यु हो गयी। बाहुबली हुरबी पहलवान जी के इस भयंकर क्रूर रूप को देखकर बचे झुमली लोगांे ने वहाँ से बचकर भागना ही ठीक समझते हुए, बंग्बा ;चैंदाँस की ओर भाग निकले और अन्त में गुस्से से जय श्री हुरबी पहलवान जी ने वहाँ मरे झुमलियों के सिर काट कर उनकी खोपड़ियों को गाँव से दूर जंगलों के मध्य उनका एकान्त नियमित अभ्यास स्थल पर स्थित पर ओखली में डालकर मुसले से कुटे, इस घटना के बाद से ग्राम जन हुरबी पहलवान जी को ग्राम रक्षक देव रूप में पूजते हैं। यह ओखली विशाल ठोस पत्थर पर बनी हुई है, ऐसी मान्यता है। यह खूनमखून लाल रक्त-रंगनुमा ओखली निशान चिन्ह आज भी उस स्थान पर बाहुबली हुरबी पहलवान जी के साक्ष्य के रूप में विद्यमान है। यह लाल रक्त नुमा ओखली बाहुबली हुरबी के नियमित अभ्यास के दौरान मुक्का-मुट्ठी मार-मार कर बना हुआ है। यह बात नागलिंग जैं श्री कल्या लौहार जी के समय काल का ही माना जाता है। इस जबरदस्ती कर वसूली आतंकित लूटपाट घटनाक्रम के बाद शताब्दियों तक पुनरावृत्ति करने की इन झुमलियों ने दुबारा कोशिश नहीं की। दूसरी घटना- एक दिन ग्राम बौंग्लींग, बस्ती के समीप उपर बड़ा सा चट्टानी पत्थर पर जय जय श्री हुरबी पहलवान जी ने गुस्से से जोर से घूंसा जड़ दिया और उस पत्थर पर दरार पड़ गयी। ग्रामवासियों को वह पत्थर के टूटकर मकानों पर गिरने का डर बना रहता था। उस पत्थर को टूटकर गिरने से रोकने के लिए ग्राम जनों ने जय श्री कल्या लोहार जी से टाँका लगाने का अनुरोध् किया और संकट मोहक जै श्री कल्या लोहार जी ने ग्राम जनों को बचाने के वास्ते उस पत्थर में टाँका लगा दिया। यह पत्थर आज भी वैसा ही मौजूद है। बाहुबली जैं श्री हुरबी पहलवान और जैं श्री कल्या लोहार जी को संकट मोचक के रूप में पूज्यनीय माना जाता है।