
जगदीश सिंह बृजवाल
जहाँ त्रिदेव के रूप में एक साथ भीमकाय पाषाण खण्ड खुबसूरत जलाशय, कुण्ड बालचन देवता का प्राचीन काल से ही पाषाण निर्मित मन्दिर प्रतिष्ठापित है। इस स्थल का जुड़ाव अवश्य ही अतीत में भी धार्मिक आस्था से है। देवल पाषाण खण्ड का शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ से है। जिस पावन पाषाण की पवित्रता आज के सात्विक पूजा विधि-विधान से स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। प्रतिवर्ष बैशाख पूर्णिमा को पूजा पाठ के लिए श्रृद्धालु द्योल ढुघ पहुँचते हैं। जहाँ पहुँचने पर श्रृद्धालुओं के तन-मन में अलौकिक शक्ति की अनुभूति होती है।
मुनस्यारी तहसील मुख्यालय मुख्यालय से उत्तर दिशा की की ओर जोहार मोटरमार्ग के चिलमधार से लगभग 2 किमी दूरी पश्चिम की ओर लिंक मोटरमार्ग से क्वीरी जिमीया = क्वीरीजिमिया है भारत-तिब्बत सीमा का भी अन्तिम स्थाई गाँव है। यह तहसील मुख्यालय से लगभग 15 किमी की दूरी पर है, जहाँ तक मोटरमार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। क्वीरी गाँव के पश्चिम दिशा की ओर घने जंगलों से कुछ चढ़ाई चढ़ते पैदल मार्ग से लगभग 4 किमी दूरी पर द्योल ढुड. अवस्थित है। जहाँ पहुँचने पर आश्चर्य व अद्भुतता का दर्शन होता हैं। तीन आश्चर्य अवस्थित तीनों का देवत्व के रूप में सदियों से पूजा-अर्चना की जाती है।
क्वीरीजिमिया शब्द में दो गाँवों का समुच्चय बोधक सम्बन्ध स्थापित है। पूर्व मे आने वाला गाँव जिमिया जहाँ के मूल निवासी जिमियाल अब वर्तमान में एक भी परिवर का वसासत यहाँ नहीं है। कालान्तर में ये सब नामिक गाँव के अतिरिक्त अन्य गाँव में विस्थापित हो गये हैं।
जिमियाल जाति के गाँव छोड़ने की जो कहानी के पीछे का राज आज भी लोगों के बीच प्रचलित है। जिमियाल बरपटिया जनजाति जो मुनस्यारी के भी मूल जनजातियो में से एक है, अपने जनजाति लोकदेवता भरारी देव की पूजा-अर्चना करते थे। कारण बस, कुछ दिनों पश्चात उनके कोपभाजन के शिकार भी हो गये थे। लोगो का कथन है कि मन्दिर के पास स्थिति केमू(शहतूत) के बड़े पेड़ के बीचों-बीच लोहे की कील गाढ़ दिया था। जिनका मकसद पेड़ को बढ़ने से रोका जाना था। भरारी देव को यह कार्य रास न आया जिमियालां में खुजली की बीमारी का प्रकोप पफैल गया। जिनको मजबूरी में गांव छोड़ने को भी मजबूर होना पड़ा था। दिवास्वप्न भविष्य में इस गाँव का अस्तित्व मिट जायेगा। आज जीमिया का जमीदोज होना तथा जिमियालो का एक भी परिवार अपने मूल स्थान पर न मिलना, कुछ तो संशय पैदा करता है। आज भी साक्ष रूप में केमू;शहतूत का पेड़ मोटरमार्ग पर हरा-भरा मौजूद है।
क्वीरीयाल अब जो बाद में दोनों गांवों में रहने लगे। तत्पश्चात रावत, मर्तोलिया, लस्पाल, ल्वांल, बृजवाल क्वीरी में बरपटिया पछाई परिवारों की बसासत भी सदीयों पुरानी है।
बालचन देवता के विषय में कहा जाता है कि वह नेपाल से आया हुआ माना जाता है। स्यांकुरी नेपाल में हुस्कर देवता उनके पिता का मंदिर प्रतिष्ठापित है। धारचूला के जुम्मा रांती में भी हुस्कर मन्दिर प्रतिष्ठापित है। जहाँ अजबलि से पूजा-पाठ का विधि-विधान है। बालचन देवता को हुस्कर देवता क पुत्र माना जाता है। पिता के त्याग देने पर जोहार की ओर रुख कर लिया था। जिनका प्रभाव जोहार क्षेत्र में काफी रहा है। आज भी तल्ला जोहार क्षेत्रा में डुंगरी, डोर नामीक गाँव में बालचन देवता का मन्दिर प्रतिष्ठापित है धूम-धाम से पूजापाठ कही बलि प्रथा का चलन भी परम्परागत है। किन्तु द्योल ढुड. स्थित मन्दिर में सात्विक पूजा की ही परम्परा पुरातन काल से चली आ रही है। फल फूल, धूप नवैध, प्रसादी चढ़ावा की मान्यता है जिस पावन भूमि की पवित्रता की परम्परा को यथावत रक्खी गई है।
क्वारी जिमीया से जब आगे लगभग 2 किमी पैदल चलने के पश्चात सुलाधार जगह पड़ता है। जहाँ घने जंगलों के बीच समतल खुबसूरत मैदान लगभग 100 मी लम्बा चौड़ा मैदान जिसके चारों ओर थूनेर, खरसु तिमसू, बांज-बूरांश के घने जंगल, निगाल की कयी प्रजाति की झाड़ियां तथा अति प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्यता, रमणीक स्थान दृष्टिगोचर होती है। जहाँ से दूर गोरी नदी पार का हिमाच्छादित हिमश्रृंखलाएं राजरम्भा, नागनी चोटी, रालमघाटी, पंचचूली हिमालय का विहंगम बर्फानी दृश्य का चित्त को शान्त तथा मन-मस्तिष्क को प्रपफुल्लित कर देती है।
यदि भविष्य में इस स्थल को मुनस्यारी क्षेत्र के पर्यटन व धार्मिक पर्यटन स्थल के स्वरूप में विकसित देखते हैं तो मुनस्यारी के पास नन्दा देवी मन्दिर डाडांधार से प्रकृति का जो विहंगम दृश्य अवलोकन करने का मौका मिलता हैं उसी के सापेक्ष में द्योल ढुड., सुलाधार की सौन्दर्यता को भी आंकलन करेंगे। जिस क्षेत्र का इतिहास भी पौराणिकता से जुड़ा है।
सुलाधार से आगे बढ़ने पर घने जंगलों के बीच स्थित द्योल ढुड., जब दर्शन होता है तो पहले पहल अद्भुत दृश्य देखकर मन के अन्दर कुछ भय सा भी आ जाता है। जहाँ जिसकी सम्भावना ही न हो वहाँ भीमकाय विशाल पाषाण खण्ड, जिसके किनारे जलाशय लम्बाई लगभग 50 मी व चौड़ाई 30 मी दिखाई देती है कुण्ड के बीच में स्थल का कुछ उभरा भाग जिसमें हरा घास उगा हुआ है। सामने छोटा सा प्राचीन पाषाण निर्मित मन्दिर बालचन देवता का जिसे ग्वाला ;पशुपालकद्ध पशुओं का देवता भी माना जाता है।
भीमकाय पाषाण खण्ड (स्तूपनुमा टीलाद्) जिसके तलहटी में चारों ओर से सपाट पाषाण स्पष्ट दिखाई देती है, तथा सिरे वाले भाग में थूनेर के वृक्ष, निगाल की झाड़ियां, दुर्लभ वृक्ष रतङोली जो औषधीयुक्त पर जो छोटा गोलाकार लिए छिद्र से दो भागों में विभाजन करते आधा सुर्ख लाल व आधा काले रंग का होता है फल के रस को आँखों में डालने से आँख के सपफाई तथा रोशनी में इजाफा होने की बात बुजर्गों के मुंहवाणी से आज भी सुनी जा सकती हैं। देवतुल्य पाषाण खण्ड के लोग चारों लोग परिक्रमा कर प्रार्थना, आराधना करते हैं वास्तव में यदि उस पाषाण खण्ड की परिगणना करेंगे तो देश ही नहीं विदेश में भी इसे प्रथम स्थान आसानी से प्राप्त हो सकता है।
जब द्योल ढुड. स्थित प्राचीन धरोहर का दर्शन कर वापस आते हैं तो दुसरे मार्ग का चुनाव करते हैं। अन्य मार्ग से ढलान की ओर बढ़ते हैं तो तब भी हमें एक अलग अंचभित दृश्य देखने को मिलता है लगभग 1 किमी के ढलान के अन्तर में 100 भी लम्बी व 50 भी चौड़ाई का जलाशय ;कुण्डद्ध स्थापित है, जिसे रागस कुंड (राक्षस जलाशय) नाम से भी जाना जाता ह। विशेषता द्योल कुण्ड से इस कुण्ड तक सर्पीली आकार से जल निकासी दिखाई देती है जो ऊपर से नीचे कुण्ड तक जुड़ा हुआ है इसके विषय में भी जो जनश्रुति है की इन जलधाराओं को नागों (सरिसर्प) द्वारा ही खुदवाया गया है, जो नागवंशी लोगों से सम्बन्ध होने का घोतक भी दिखाता है।
बालचन देवता के विषय में जो अनुश्रुति, प्राचीन काल से चली आ रही है उसे उल्लेखित करना भी आवश्यक है।
द्योल ढुड. में कुण्ड(जलाशय) निर्मित किए जाने के बिषय में अनुश्रुति इस कुण्ड का निर्माण पहले पहल साईंपोलू जिमिया गार (नदी) को रेणु नदी के नाम का उल्लेख श्री केदार विष्ट जी द्वारा 1987 के अपने लेख में किया गया था। पार के गाँव जहाँ सांई-पोलू से ऊपर स्थिति साई धुरा में देवताओं के द्वारा किया जा रहा था। जिस स्थल की सौन्दयता, भौगोलिक बनावट द्योल ढुड. समान ही है आज साई धूरा में बिष्ट जाति के लोगों की बसासत है। यह पूर्व मे पशुओं का चारागाह स्थल भी रहा होगा। पशुचारक अपने पशुओं को चुगाने के लिए जब-तब पहुँचे होंगे। जब जलाशय के निर्माण में देवता तथा उनके गण लगे ही थे। बालचन देवता को पशुओं का देवता भी माना जाता है, जिस कारण पशुओं के लिए जलापूर्ति हेतु जलाशय का निर्माण किया जा रहा था। अचानक साई पोलू गाँव के ही बिष्ट जाति की महिला का उस स्थान पर अपने पशुओं के साथ पहुँचना, अजनबियों द्वारा किए जाने वाले दुस्साहसिक कार्य की जानकारी से हतप्रभ रह जाती है। कुछ समझ से परे था। तब देवताओं के द्वारा इस विषय की जानकारी किसी को न बताने का अनुरोध महिला से किया गया था तथा उसे मुंह मांगी वरदान प्राप्ति के लिए आग्रह किया किन्तु महिला का गाँव प्रेम आशंकित खतरे से गाँव की ओर मुंह करके जोर-जोर से आवाज देकर गाँव के लोगों को घटना से अवगत कराया जाने लगा। जिससे क्रोधित देवताओं द्वारा महिला को पाषाण शिला खण्ड में तब्दील कर दिया गया। जिसका प्रमाण साक्ष के रूप साईधूरा में आज भी है।
लोगो के कथनानुसार तब सम्प्रति साईधुरा जिमिया गार के पार क्वीरीजिमिया के द्योल ढुङघ स्थान पर कुण्ड का निर्माण किया गया। देवताओं के कोपभाजन का शिकार बिष्ट जाति के लोगों का अपने ईष्ट देव के रूप में स्वीकारते पूजा-अर्चना करने लगे।
द्योल ढड. स्थित बालचन देवता की पूजा पूर्व में केवल साईं पोलू के बिष्ट जाति के द्वारा ही की जाती थी। गाँव के लोग गाजे-बाजे के साथ क्वीरीजिमिया अवस्थित मन्दिर तक पहुँचकर पूजा आराधना करते थे। धूप-नवैध, फल- फूल, महाभोग प्रसादी चढ़ावा तथा देवतरण प्रथा भी थी। लोगों का वन देवता (बालचन) यक्ष देवता (कुण्ड) प्रकृति देवता (महापाषाण खण्ड) के रूप में असीम आस्था सदैव बनी रही थी। प्रकृति देवता को अनावृष्टि से बचाने की प्रार्थना करते रहते थे। इन्द्र देवता के रूप में भी बारिश से होने वाले कार्य से किसी प्रकार का बिघ्न बाधा न पहुँचे प्रार्थना करते थे। एक भव्य मेले का आयोजन भी होता था, जो प्रथा आज समाप्त हो चुकी है।
एक अन्य जनश्रुति सांई के निवासी बिष्ट जाति के लोग द्योल ढुड. स्थित बालचन मन्दिर में समय समय पर सामुहिक पूजा हेतु गाजे-बाजे के जाते रहते थे मन्दिर में सात्विक पूजा-पाठ देव अवतरण भी हो या कहा जाता है कि एक बार जब मन्दिर में बाजे गाजे के साथ देव अवतरण हो रहा था तो अचानक अवतारी व्यक्ति द्वारा जलकुण्ड में छलांग लगाकर जलसमाधि ले ली गईं। सभी श्रद्धालु इस घटना से हतप्रभ रह गये क्योंकि अवतारी व्यक्ति का सम्बन्ध किसी से पिता, पुत्रा, पति का मानवीय रूप में सम्बन्ध था। सभी निराशा लिए अपने घर वापस आ गए। अवतारी व्यक्ति के घर न पहुँचने पर पत्नी ने लोगों से रहस्य को बताने की अपील की तब लोगों ने घटना की सम्पूर्ण जानकारियों से अवगत कराया। अपनी पति के दुःख से द्रवित महिला को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका पति उससे बिछुड़ चुका है। उसका अन्तर्मन भरोसा दिलाते रहता कि वह एक दिन अवश्य लौट कर घर आयेगा। तब से कुछ वर्षों तक पूजा-पाठ बन्द हो चुका था।
लोगों द्वारा पुनः द्योल ढड. में पूजा-अराधना किया जाने लगा तो बाजे की आवाज के साथ-साथ जलाशय का पानी हिलने लगा तब कुण्ड के बीच से लम्बी दाढ़ी मूंछें वाला जिसके शरीर पर मुंगा घास (मुलायम बारीक घास) उगे थे बाहर आ गया, जिनकी शक्ल अवतारी समाधि लेते व्यक्ति से मिलता-जुलता था। जिसे दूसरा नाम ‘फूकनी बूबू’ दिया गया। जलसमाधि लिए अवतारी व्यक्ति के पत्नी ने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था जो अपने साथ दिव्य पात्र ‘कांसे का कटोरा’ (ब्या्ल) भी संग लाया था।
पति के इन्तजार में लम्बा अर्सा बीतते, महिला का धैर्य भी अब टूटने लगा था। अचानक बारह बरस बीत जाने के उपरान्त महिला का पति अवतारी व्यक्ति पुनः प्रकट हो गया। पत्नी का अपने पति प्राप्ति से प्रशन्नता कोई ठिकाना न रहा। पति के शरीर पर मुगा (बारीक घास) उगे हुए थे। पत्नी ने आदर सत्कार भोजन ग्रहाणादी के पश्चात इतने समय तक कहा रहने के विषय में जानना चाहा किन्तु पति द्वारा उस विषय में किसी प्रकार की बात न करने को कहा गया। पत्नी ने अपने हठ के आगे पति को जुबान खोलने को मजबूर कर दिया। तब पति द्वारा पत्नी से अपने संग लाया कटोरे (ब्याल) में दही लाने की बात कही गई। पत्नी द्वारा दही का कांसे का बड़ा सा कटोरा (ब्याल) पति के सामने रख दिया। पति स्वरूप मानव ने दही में फूंक मारते ही स्वयं भी कटोरी में ही समाहित हो गया पिफर वापस कभी नहीं आया। तब से अनुश्रुति है कि आगे फुकनि बूबू के रूप में देवतुल्य होकर चमत्कारों से प्रभावित करने लगा था। आज भी सांई पोलू गाँव में कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व घर में स्थापित फूकनी बूबू का पूजा-अर्चना सफेद टोपी मन्दिर में चढ़ाये जाने का रीति-रीवाज है।
फूकनि बूबू द्वारा भेंट दिव्य पात्रा जो लोगों के लिए वरदान स्वरूप बन गया था। धूप व वर्षा के रूप में लोगों कथन- जब गाँव में कोई शुभ कार्य के दिन बारीष की सम्भावना पर बारीष को रोकने हेतु तुरन्त कटोरी को सुल्टा कर दिया जाता था, तुरंत मौसम सुहावना, धूप खिलने लगती थी तथा यदि कृषि हेतु बारिश की आवश्यकता होती तो कटोरी को उल्टा कर दिया जाता था. आसमान से बारीश होने लगती थी। चमत्कारी कटोरी का रहस्य के विषय में आसपास के गाँवों के लोगों को आज भी भली-भांति मालूम हैं कि फूंकनी बूबू का कटोरा कितना चमत्कारी था। सदियों का इतिहास, कथा-कहानी जनश्रुति के परम्पराओं ने आज भी लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाया है।
पूर्व का जिमिया गाँव जो तीस-चालीस 40 वर्ष पहले आपदा की भेंट चढ़ गया है। जिस क्षेत्र की उपजाऊ कृषि आलू, राजमा, राई-गौबी मूली सब्जीयां पूरे क्षेत्र में एक अलग नाम क्वीरीजिमिया का होता था। आज केवल क्वीरी गाँव अपने पुराने अस्तित्व को बचाए है। कभी दो बैल की जोड़ी के समान दो गाँव दो होते हुए भी एक जैसे थे। जोडी की विछिन्ता, जोड़ीदार के बिछुड़ जोने से अकेले दूर निगाह लगाए टकटकी शून्य में अपने साथी को निहारते क्वीरी गाँव कल्पनातीत हो जाता है। उसे ऐसा लग रहा है कि कहीं मेरा मित्र भी देव कोपभाजन का शिकार तो नहीं हो गया? जिमिया गाँव में कोई भी सम्भावित आपदा की गुंजाइश ही नहीं थी। चारों ओर से बाज, बुरांश, खरसु तिमसू, निगार के घने जंगलों से घिरा जिमिया गाँव इस तरह भरभराकर कुछ ही समय में सारा गाँव जमीदोज हो जाना इतिहास के पन्नों को भी उलट-पलट देता है।
आज जिमिया गाँव के अधिकांश निवासी अपने गाँव को छोड़कर अन्यत्रा भी चले गए हैं किन्तु कुछ असहाय, गरीब तथा कुछ वे लोग जो अपने गाँव से आत्मीयता से घनिष्ठ सम्बन्ध रखत थे, वे आज भी गाँव के आस-पास बंजर भूमि को आवाद कर अपनी वसासत बनाने में कामयाब हो गए हैं। मेहनत मजदूरी, कृषि,पशुपालन, कार्य कर अपनी आजिविका को साधन बनाकर जीवटता से जीवन व्यतीत करते हैं। द्योल ढुड. (देववल पाषाण खण्ड )शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ है। क्वीरीजिमिया से लगभग तीन, चार किमी दूरी पर स्थित है। जिसकी सिन्धु तल से ऊंचाई लगभग 5000 फिट है। जिसे मुनस्यारी का खूबसूरत पर्यटन व धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है। द्योल ढुड. से ही पर्वतारोहियों के लिए ट्रेकिंग रूट हीरामणि ग्लेशियर, हिमानी नामिक जाने का भी आसान रास्ता है। पर्वतारोही इस मार्ग से अपना अभियान चलाते रहते हैं। आलेखन के लेखन में क्वीरी निवासी प्राध्यापक श्री भगत सिंह पछाई, श्री गोकुल सिंह लस्पाल इंस्पेक्टर आईटीबीपी, मूल निवासी सांई- पोलू के महत्वपूर्ण सहयोग से अतीत की जानकारियां को आप तक पहुँचाने में कामयाब हो सका हूँ। अतीत के सांस्कृतिक परम्पराओ को लिपिबद्ध कर संजोए रखना हम सभी का कर्तव्य बनता है. किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है।
