हंसेश्वर महादेव मठ: अस्कोट के राजा पुष्कर पाल के शासन काल से स्थापित है

पि.हि. प्रतिनिधि
जौलजीवी/पिथौरागढ़। भारत-नेपाल सीमा लगे हंसेश्वर धम को महन्तों की लम्बी श्रृंखला ने व्यवस्थित कर संभाल रखा है वर्ना तो इसे अतिक्रमणकारियों की नज़र लग जाती। जौलजीवी के निकट स्थित हंसेश्वर महादेव मठ तितरी अस्कोट का क्षेत्र समस्त अस्कोट गर्खा तल्लाबगड़ धूरा दौ बास है। यह अस्कोट के राजा पुष्कर पाल के शासन काल से स्थापित है। जिसके संस्थापक महन्त हंसगिरि महाराज थे।
बहुतों को आश्चर्य हो सकता है कि इस निर्जन में मठ के पास घेराबन्दी की 500 नाली भूमि है। आश्रम में महन्तों की परम्परा लम्बी है, इसकी पुष्टि यहाँ बनी हुई 14 समाधियां करती हैं। एक बड़े क्षेत्र की आस्था का केन्द्र हंसेश्वर को नेताओं का आश्वासन मिलता रहा है किन्तु कोई सुध् लेने वाला नहीं है। आश्रम में आज भी एक 92 साल और एक 72 साल की माई रहती है किन्तु इन्हें वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल पाई। बताया जाता है कि इनकी पेंशन के लिये फाइल तैयार की गई लेकिन कागज पूरा करने के पच्चड़ अड़ंगे वाले हैं, इन माईयों से भी आय प्रमाण पत्र मांगा जाता है। मठ में रहकर अपने दिन गिन रही वयोवृद्ध माइयां क्या कर सकती हैं? चुनाव में आशीर्वाद लेने आने वाले नेतागणों को अपनी कथनी-करनी में फर्क नहीं दिखाई देता है। पिथौरागढ़ के तेजतर्रार विधयक मयूख महर ने इस इलाके को स्वर्ग बनाने की बात कही थी तो काशीसिंह ऐरी ने गोवा बनाने की। विधयक विशन सिंह चुफाल भी आश्वस्त करते रहे। जिला पंचायत अध्यक्ष प्रकार जोशी भी कुर्सी मिलने के बाद कम आ पाते हैं। यानी की आशीर्वाद लेने बहुत आते हैं लेकिन सुध् लेने वाला कोई नहीं है। मठ के संचालक परमानन्द गिरी कहते हैं कि धर्मिक पर्यटन का बहुत शोर है किन्तु इस प्राचीन मठ की सुध् विरसा चुकी व्यवस्था से क्या उम्मीद की जाए? मठ के पाास 372 नाली 14 मुट्ठी नाप भूमि है जबकि घेरीबन्दी 500 नाली है। 2013 की आपदा में 50 नाली भूमि को नुकसान हुआ। नदी के कटाव से आश्रम की भूमि बर्बाद हुई जिसमें फलदार वृक्ष आम, लीची, कटहल के लगे थे। पूर्व में कई बार तटबन्ध् की मांग की गई थी लेकिन भूमि कटाव होता रहा लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
उल्लेखनीय है कि पैदल यात्रा और कम साध्नों के जमाने में कैलास यात्रा पर जाने वाले साध्ु-सन्यासी कई पड़ावों में रुकते हुए यहाँ से जाया करते थे। इन्हीं में से शंकर गिरी और नागा प्रेम गिरी भी इलाहाबाद से घूमते हुए हंसेश्वर पहँुच गये। ये दोनों काली नदी के सूरज कुण्ड ;गरम पानी के स्रोतद्ध के पास रुके थे, इन्हें खाने के लिये वेर की झााड़ियां भी मिल गई। जंगली फल और वेर खाकर अपनी दिनचर्या यहीं बीतानी शुरु कर दी। वह समय 18वीं सदी का था जब अस्कोट के राजा पुष्कर बहादुर पाल थे। बताया जाता है कि नदी किनारे शवदाह के लिये आने वाले यदि अधजले शव को छोड़ गये तो ये गुरुभाई शव को ही भोजन के रूप में ग्रहण कर लेते। तब राजा से इस बात की शिकायत हुई। एक दिन राजा ने अचानक छापा मारकर इनसे प्रसाद मांगा। राजा ने सुना था कि मांस पकाया जा रहा है। बाबा ने पक रहा भोजन पूड़े में परोसा तो वह खीर थी। राजा ने बाबाओं से यहीं रहने को कहा और भूमि देने की बात कही।फिर पूड़े में बालू भर दी और कहा जहाँ इस पूड़े की बालू गिरेगी वह सारा क्षेत्रा हंसेश्वर का होगा। मौखिक रूप से हुए इस दाननामे में काली नदी के पार नेपाल के उक्कू ग्राम में शहपालमाणो शिवालय है, वह भी इसी मठ के अधीन है। यह भी बताया जाता है कि 1890 में जब जब शंकर गिरी के शिष्य हंसगिरी आश्रम में थे तब पुष्कर बहादुर के पुत्रा गजेन्द्र पाल गद्दी में थे। गजेन्द्र पाल को स्वप्न आया कि पिता पुष्कर पाल जी की आत्मा को रोक लिया गया है और वह मठ के लिये दी भूमि का निर्धारण की बात कह रहे हैं। सवाल था कि मठ की भूमि कितनी है, इसका निर्धारण कैसे हो? तब महन्त ने एक रात्रि का समय राजा से मांगा। उस रात्रि में भूतों ने मठ के चारों ओर दीवार बना दी और खेत बना दिये। अगले दिन राजा ने यह चमत्कार देखा और लिखित दाननामा किया। भारत की आजादी के बाद इस भूमि की किसानबही बनी। आज भी हंसेश्वर मठ की दीवार को भूतों की दीवार कहा जाता है और कोई भी उसे क्षति नहीं पहुँचाता है।
हंसेश्वर की पूरी कथा को कोई श्रद्धा, कोई चमत्कार और कोई रोमांच के रूप में देखता हो परन्तु यह तो सच है कि राज्य का यह अनूठा मठ है जिसके पास काफी अचल सम्पत्ति है। महन्तों की पूरी श्रृंखला ने यहाँ श्रम कर इसे बचाया। इनके हाथों बनी गूल से खेतों में रोपाई होती थी। इसमें आज भी अन्न उगाया जाता है। ऐसे मठ और आश्रम को संरक्षित करने के लिये सभी को ध्यान देना चाहिये।

पिघलता हिमालय 14 दिसम्बर 2015 अंक से

नारायण स्वामी का पहाड़ आगमन और कैलास यात्रा

मोहन सिंह मर्तोलिया

नारायण स्वामी जी का पहाड़ भ्रमण 1935 में हुआ जब वह कैलास यात्रा पर गये। इस महान सन्त के योगदान को इतिहास हमेशा याद रखेगा। इनकी विरासत को सम्भालना आज चुनौती बना हुआ है। इस दिशा में सभी को जागरुकता दिखानी चाहिये।
स्वामी जी का जन्म 2 दिसम्बर 1914 को उच्च महाराष्ट्रीय गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार में दत्त जयन्ती के दिन बुधवार रोहिणी नक्षत्रा में हुआ। कर्नाटक में जन्मे इस शिशु का नाम राघवेन्द्र रखा गया। पिता जी का नाम माध्वराव था, जो मैसूर राजा के वहाँ दीवान थे। स्वामी जीे बीएससी तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर से निकल गये और आश्रम-मठों में भ्रमण करने लगे। माता-पिता को पता नहीं चला कि उनके पुत्र को वैराग्य आ गया है। स्वामी जी को भ्रमण करते हुए मन में आया कि उत्तराखण्ड चारधाम यात्रा की जाए। वह अपने गुरु योगी रामानन्द जी के साथ निकल पड़े और जुलाई 1935 में अल्मोड़ा पहँुचे। यहीं से उन्होंने कैलास जाना तय कर लिया। नारायण स्वामी और योगी रामानन्द पैदल यात्रा करते हुए जोहार घाटी पहँुच गये। वहाँ से आगे चलकर उटाधूरा, किगड़ी- बिंगड़ एवं जयन्ती को पार कर 16000 फिट पठार तिब्बत के तीर्थपुरी पहँुचे। भस्मासुर पर्वत के तलहटी में स्नान कर आगे बढ़े और 19000 फिट उफंचाई डौल्पा ल्हा टाॅप फिट आगे 18000 फिट में गोरी कुण्ड पहँुचकर स्नान किया।
उन्होंने सुना था और स्कन्द पुराण मानस खण्ड से जाना था कि कोई महात्मा वर्षों से कैलास पर्वत में सिद्ध अवधूत लम्बे केश वाला यदा-कदा मिल जाता है। उसी सि( अवध्ूत सन्त के दर्शन इन सन्तों को हुए। इसके वाद वह अवधूत अन्र्तधान हो गये।
नारायण स्वामी जी ने 1952 तक 13 बार कैलास यात्रा की। 1940 में धरचूला के पांगू सोसा में नारायण आश्रम का वृहद स्तर पर निर्माण किया। जिसमें यात्रियों के रहने व अन्य सुविधओं जुटाई गईं। यहाँ 4-5 कर्मचारी व एक मैनेजर रहता है।
सन् 1938 में दिगतड़ पड़ाव ;डीडीहाट में एक कपड़े की दुकान शेर सिंह जंगपांगी ने खोली। जंगपांगी के साथ मुनस्यारी के उनके पुरोहित का पुत्रा दयाकृष्ण लोहनी दुकान में कार्य करता था। कैलास मानसरोवर यात्रा 1946 में श्री नारायण स्वामी के साथ गुजरात-बंगलौर बड़ौदा के उद्योगपति लोग हरीभाई देसाई, विठ्ठल भाई व अन्य साधू-सन्त दिकतड़ ;डीडीहाट पहँुचे। यहाँ नारायण स्वामी ने जंगपांगी जी व लोहनी जी से कहा कि इस क्षेत्र में एक हाईस्कूल होना चाहिये। आगे चलकर यह स्कूल महाविद्यालय तक होगा। यह बात सबको भली लगी और अस्कोट के रजवार एवं डीडीहाट के थोकदार लोगों को बुलाया गया। बैठक में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमें पाँच लोग इसके सदस्य बनाये गये। जिसमें मदन सिंह कन्याल मनड़ा गाँव, दयाकृष्ण लोहनी, नारायण सिंह कफलिया बिष्ट थोकदार हाट ग्राम, मेजर लक्ष्मण सिंह पाल अस्कोट, लक्ष्मी दत्त अवस्थी गरखा अस्कोट। बैठक की अध्यक्षता शोबन सिंह जीना वकील साहब अल्मोड़ा द्वारा की गई।
इस बैठक के बाद स्वामी जी के साथ पूरी कमेटी अस्कोट रजवार के पास गये। तब अस्कोट में 1946 जुलाई में धर्मशाला में कक्षा पाँच तक स्कूल शुरु किया गया। 1948 में ध्रमघर नामक जगह में हाईस्कूल भवन तैयार हुआ। 1952 में इसे इण्टर तक कर दिया गया। नारायण नगर इण्टर कालेज का नाम ‘बापू महाविद्यालय इण्टर कालेज’ रखा गया। यह इसलिये रखा गया क्योंकि स्वामी जी की इच्छा थी कि इसे शीघ्र ही महाविद्यालय का दर्जा दिया जायेगा। किन्तु स्वामी जी का 1956 में स्वर्गवास हो गया। ऐसे में विद्यालय को चला ले जाना कठिन हो गया और 1958 में राज्य सरकार ने इसका सरकारीकरण किया, जो रा0इ0कालेज नारायणनगर नाम से जाना जाता है।
इसके अलावा भी स्वामी जी ने कई प्रयास इस पहाड़ के लिये किये। आज जरूरत है उनके प्रयासों को संजोने के अलावा उनके कार्यों को आगे बढ़ाया जाए, जो चुनौती के रूप में है। स्वामी जी के भक्त किसी न किसी रूप में आज भी दूर-दराज से यहाँ आते हैं और पांगू के आश्रम को निहारते हैं। जरूरत उन कार्यों को बढ़ाने की है।

भवानसिंह धर्मशक्तू व कुन्दन सिंह धर्मशक्तू स्वामी से प्रभावित हुए
जोहार मिलम निवासी भवान सिंह धर्मशक्तू स्वतंत्रता सेनानी एवं कुन्दन सिंह ध्र्मशक्तू स्वतंत्राता सेनानी नारायण स्वामी से बेहद प्रभावित हुए और समाज सेवा में जुटे। स्वामी भगवतानन्द का 1980 में स्वर्गवास हो गया। कैलासानन्द वर्तमान में सरस्वती आश्रम गढ़ीकैन्ट, देहरादून में हैं।
उल्लेखनीय है कि स्वामी के भक्त विद्यानन्द स्वामी ने 1944 के बाद मुनस्यारी जोहार के रास्ते कैलास गये। 1945 में मुनस्यारी में समाजसेवी रामसिंह पांगती के शान्तिकुन्ज आवास में निवास करने लगे। तब भजन-कीर्तन-सत्संग में आस-पास के लोग जुटा करते थे। भवानसिंह व कुन्दन सिंह भी यहीं रमने लगे थे। 1950 में विद्यानन्द स्वामी हरिद्वार चले गये। तब दोनों धर्मशक्तू भी हरिद्वार गये और सन्यास ले लिया।

हरीभाई देसाई का योगदान रहा है
उद्योगपति हीराभाई देसाई स्वामी जी के अनन्य भक्त थे। सीमान्त में नारायण आश्रम एवं नारायण नगर में आश्रम व जहाँ भी स्वामी जी ने स्कूल इत्यादि स्थापित किये, हीराभाई उनमें संरक्षक की भूमिका में रहे। उन्होंने नारायणनगर में वृदह मन्दिर अपने योगदान से 1975 में बनवाया और 1977 में यहाँ मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उस आयोजन में बंगलौर, गुजरात, बड़ौदरा के उद्योगपति मय संगीत मण्डली के पधारे थे। अस्कोट, डीडीहाट के भक्तजन भी आयोजन में उपस्थित हुए। बाहर से आई कीर्तन मण्डली ने जाने समय अपने बजाने वाले मार्दल/मदृंग को डीडीहाट के संगीत रसिक परसीलाल वर्मा को दिया था। उस दौर में सन् 1975 से 1977 तक धन सिंह पांगती और लेखक ;मोहनसिंह प्रत्येक रविवार को नारायण नगर निरन्तर जाया करते थे। तब हरीभाई व उनकी पत्नी भी नाराणनगर में रहती थीं।

पिघलता हिमालय 27 फरवरी 2017 के अंक से