पुंगराउ घाटी में वृजवालों ने बनाया था पड़ाव जो सिमट चुका है

पि.हि. प्रतिनिध्
पांखू/ध्रमघर। पुंगराउ घाटी कृषि व पशु पालन की दृष्टि से बहुत उपजाउ रही है लेकिन राजनीति के खेल में यहाँ विकास कम घसीटबाजी ज्यादा होती रही है। वर्तमान में विधयक नारायण राम द्वारा क्षेत्रा के लिये तैयार खाके को देखते हुए लग रहा है कि काफी कुछ होगा। दुग्ध् संघ अध्यक्ष विनोद कार्की विधायक द्वारा इस घाटी के लिये दिलाई गई योजनाओं और प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आने वाले चुनावों में विकास कार्य उन्हें हर बूथ में बढ़त दिलायेेंगे।
पुंगराउ घाटी में कोटगाड़ी यानी कोकिला देवी का विख्यात मन्दिर है। इस घाटी के कई गाँवों में सीमान्त क्षेत्र के व्यापारियों ने डेरा डाला था। इनके पड़ावों में तक पशुओं बड़े झुण्डों का आवागमन होता था किन्तु सारी स्थितियां बदल चुकी हैं। जोहार के बिल्जू निवासी वृजवालों ने पुंगराउ घाटी को उपयुक्त माना और यहाँ उनका आना जाना था। निकट ही धरमघर में पंचपालों ने भी अपना डेरा डाला था। वहाँ आज भी शौक्यूड़ा ग्राम है और माइग्रेसन व्यवस्था के तहत संचालित होना स्कूल है।
पंुगराउ घाटी में वृजवालों के जो परिवार हैं उनमें ग्राम मसुरिया में तीन परिवार, फल्याटी में तीन परिवार, डोबगाड़ा में एक, तुराथल में चार, लोहाथल में एक परिवार है। अब इनका मुख्य व्यवसाय कृषि है। पलायन के कारण अधिकांश लोग बाहर ही हैं। ग्राम मसुरिया में जोहार के अग्रणीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्रिलोक सिंह वृजवाल का का मकान भी है, जो अब खण्डहर हाल में है। इनके परिजन वर्तमान में मुनस्यारी में हैं।
मसुरिया ग्राम के निवासी भगत सिंह वृजवाल बताते हैं कि पुराने समय में जोहार के बिल्जू, मुनस्यारी के दुम्मर के बाद व्यापारी परिवार यत्र-तत्र रहते थे। याने तीन जगह उनके घर होते थे। भारत-तिब्बत व्यापार बन्दी के बाद कई परिवार अपनी सुविधनुसार रहने लगे। तल्ला दुम्मर से पांखू के मसुरिया में आये उनके परिवार के अलावा नारायण सिंह और घनश्याम सिंह वृजवाल का परिवार वर्तमान में है। डोबगाड़ा में शेरसिंह प्रहलाद सिंह का परिवार है। फल्याटी में भीम सिंह, ललित सिंह, सुरेन्द्र सिंह वृजवाल का परिवार है। इन्हीं परिवार के प्रकाश सिंह वृजवाल अल्मोड़ा के जिला कार्यक्रम अधिकारी हैं। लोहाथल में एक परिवार अमरनाथ वृजवाल जी का है जो ड्योटी से है। घोरपट्टा से तुराथल में आये परिवारों में चार परिवार वर्तमान में दरपान सिंह, नरेन्द्र सिंह, हुकुम सिंह, नवीन सिंह वृजवाल के हैं।
इस प्रकार पुंगराउ घाटी में भी वृजवालों के परिवार अभी हैं। अपनी मेहनत के बल इन्होंने अपने कृषि कार्य को संभालने के साथ ही संस्कृति को बनाये रखा है। भले ही जोहार से काफी दूर इनका आशियाना बन चुका है किन्तु अपनों को याद करते हुए यह लोग निरन्तर बिल्जू का स्मरण करते हैं। जहाँ से पैदल चलकर इनके पूर्वजों ने अपने कारोबार का विस्तार किया और यथासमय अपने को स्थापित कर लिया। इन परिवारों से कापफी लोग नौकरी-पेशा में बाहर हैं किन्तु इनका योगदान कोटगाड़ी की इस भूमि में भी है।
पिघलता हिमालय 4 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित