पेटशाल, पनुवानौला में रुकते थे पैदल यात्री

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि

अल्मोड़ा जिले के पेटशाल इलाका बहुत चर्चित है। चितई गोलज्यू मन्दिर के कारण तो पेटशाल को लोग जानते ही हैं, लखुडियार के कारण भी इसकी चर्चा होती है। इसके अलावा पेटशाली परिवार भी चर्चा का बड़ा कारण है। कला-साहित्य-संस्कृति के लिये इन लोगों को याद करते हैं। इन्हीं परिवारों में से संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर पेटशाली भी हैं। हंसादत्त पेटशाली के पुत्र- प्रेम बल्लभ ;इनके पुत्र जानकी प्रसाद, लीला हैं, पद्मादत्त ;इनके पुत्र रमेश चन्द्र हैं।, हरिदत्त पेटशाली ;इनके पुत्र हुए जुगलकिशोर, कैलाश, ललितमोहन।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर बताते हैं कि इनके बुजुर्ग मूल रूप से नेपाल से आये। चम्पावत जिले के पुण्यागिरी के पास टुन्यास में वह लोग रहा करते थे। गोरखों की मारकाट में एक बुजुर्ग महिला और सात साल का बालक कृष्णदेव जान बचाकर भाग निकले। समझदार बुजुर्ग ने पेटशाल में 200 रुपये में जमीन खरीद ली। पेटशाली जी कहते हैं- अंग्रेजों के समय स्थान के नाम पर वहाँ के वासियों को पुकारा जाने लगा। जैसे- कपकोट से कपकोटी, बाराकोट से बाराकोटी, पेटशाल से पेटशाली।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर जी ने पेटशाली में पर्वतीय वाद्ययन्त्रों का संग्रहालय स्थापित कर रखा है। कई पुस्तकों का लेखन व सम्पादन इनके द्वारा किया गया है। पहाड़ के गीत-संगीत की वर्तमान स्थिति को देख वह बेहद खिन्न हैं और कहते हैं कि ग्राम्य पृष्ठभूमि में लोक संस्कृति होती है और अब मंचों पर जो कुछ दिखाई-सुनाई दे रहा है अधिकतर वह जानकारी से अनभिज्ञ लोगों का तमाशा है। लोकविधा की जानकारी इन स्टार कलाकारों को नहीं होती है।
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए पेटशाली जी बताते हैं कि पैदल रास्तों के जमाने में गंगोलीहाट से तक लोग नैनी होते हुए पैदल आते थे। कृपालदत्त ताउ की दुकान में रुकने का अड्डा था। पनुवानौला में गंगादत्त बिनवाल का डेरा रुकने का स्थान था। तब चितई में अनावश्यक भीड़ नहीं होती थी। बाद में जब गिनीचुनी बसें चलनी शुरु हुई। यात्राी बस रुकवाकर मन्दिर में भेंट चढ़ाने असिका लेने आते-जाते थे। ग्राम्य जीवन शुद्ध वातावरण का था।