
सीराकोट का प्राचीन मुख्य प्रवेशद्वार
डाॅ.प्रयाग जोशी
डीडीहाट के भाष्कर स्वामी के ‘वैकुण्ठ धाम’ आश्रम में पहँुच कर सीराकोट का ऐतिहासिक परिदृष्य दिमाग में कौध् जाता है। जब छपनटा की निर्जल पहाड़ी के उपर वह आश्रम बन रहा था, मुझे उधर से होकर सीराकोट जाने के अनेक मौके मिले थे। आज स्वामी जी के अनुसायियों की उगाई हुई सघन बनाली में पानी के स्रोतों के फूट आने से फिजा ही बदल गई है।
पहले उक्त स्थान से सैकड़ों मीटर नीचे था पानी का पाँच सौ वर्ष से भी पुराना एक नौला जिसमें से कलसी या गगरी भरकर पुजारी पनेर-पोडौ मलैनाथ के मन्दिर की विकट चढ़ाई में सीढ़ियों के सहारे ढो-ढो कर ले जाते थे। इसी भाँति श्रद्धालु जन भी ले जाते थे। खाली हाथ जाना बुरा माना जाता था। कैसे-कैसे शाके सुनते थे उस नौले के पानी के। 1585 ई. में उसी नौले पर पहरा बिठाकर पुरखूपन्त ने, पानी के लिये लड़ाई छेड़ी थी। सीरा के दुर्ग को जीतने की रणनीति का हिस्सा हो गया था ‘छनपटा’ का नौला जिस पर कामयाबी हो जाने से राजा रुद्रचंद्र ने उसे सेनापति का पद दिया। कैसी जबर्दस्त कूटचाल थी आज की ही जैसी उस जमाने के पानी की भी। जबकि पानी, हवा, धूप व आकाश जैसा प्रकृति द्वारा प्राणिमात्रा को मिला वरदान माना जाता था। उसको, बेचने और खरीदने की वस्तु बनाने की कल्पना भी नहीं हो सकती थी। पुरुखूपन्त के चैगर्खिया कटकुओं से, पैसौं के महंगे मोल पानी खरीदते-खरीदते राजा का कोष खाली हो गया और हरिमल्ल राजा ने, चन्दराजा के लड़ैतों के सामने हाथ खड़े कर दिये। कोटपाल, पहरी, उघाईदार, नेगी, बजनियाँ, साहूकार, पुरोहित, धर्माध्यक्ष सबको दुर्ग खाली करके युद्ध-विराम करना पड़ा था। राजा डोटी भागा और और सीरा का सम्पन्न राज्य मल्लों के हाथ से चन्दों के हाथ में चला गया। राज रुद्रचन्द सोर और गंगोली अधिराज्यों को पहले ही अपने में मिला चुका था।
अब सीरा के हाथ आ जाने से जोहार-दारमा से लेकर जुमली-हुमली तक के सीमान्तों तक व हिमालय के नाकों के उस पार तिब्बत की मण्डियों से लेन-देन की नीति बनाने की सहूलियत थी। चम्पावत के ‘छोटे कुमाउँ’ से निकल कर अल्मोड़ा के ‘वृहत्तर कुमाउँ’ बनने की बड़ी उपलब्धियों के पीछे, एक तरफ 1585 ई. की, वहाँ दुर्लभ पानी के विक्रय की तुच्छ-टुच्ची सी सैतानियत का योगदान है तो दूसरी तरफ है उस दुरारुढ़ विकट काँठे पर एक तहसील के बराबर के भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित सीरा अधिराज्य की ‘राज्यबूंगी’ से, गंगोली, सोर, अस्कोट-उक्कू से लेकर डोटी दिपायल, जुमला-हुमला आदि बाईसी व चैबीसी राज्यों तक के समस्त राजाओं को अपनी मातहती स्वीकार कराकर हिन्दू राष्ट्र राज्य के बड़े शासक कहलाने की आनन्द मल्ल व संसारमल्ल जैसे राजाओं की सफल महत्वाकांक्षा। बहुत शानदार और व्यवस्थित राजतन्त्र रहा है मल्लों का। कृषि कर के की, उनके समय विकसित हुई प्रणाली और उसकी वसूली का प्रबन्धन्त्र तो अदुतिय ही है।
बैकुण्ठधम आश्रम की बायीं पहाड़ी के उच्चतम शिखर पर मल्लों के ‘देवकोट’ में मलैनाथ का मन्दिर है। जिसे राजा पापनेश्वर के विरूद से पूजते थे। वहाँ आज भी नित्य पूजा होती है। आठबीसी, बारबीसी, माली-कसाण, डीडीहाट, वगला-पोखरी, परगड, कौली-गराली, चुफालदेस, खेतार-महरगों आदि गरखों के इष्ट देवता हैं मलैनाथ स्वामी। मल्लों के बखत मन्दिर-परिसर में ही ‘दिव्य’ प्रथा से न्यायिक-दण्ड के मामलों का सम्पादन होता था। मन्दिर के बायंे, उससे अपेक्षाकृत कमतर उँची पहाड़ी के समतल शिखर पर ‘राजकोट’ था। देवता का मन्दिर होने से ‘देवकोट’ तो आज भी गुलजार है पर ‘राजकोट’ का नामलेवा तक कोई नहीं मिलता।
सीराकोट तीन तरफ से दर्गम्य चट्टानों से रक्षित होने से स्वयं दुर्ग है तथापि चारेक नाली के खेत के बराबर उपलब्ध् उस स्थान को पत्थरों की दीवार देकर प्राचीरवत घेरा गया था। किले जैसे उस राजघर का नामोनिशान मिटाने के इरादे से रुद्रचन्द ने उसे बरबाद करवाया। माल-असवाब, दस्तावेज, कोष-जेवरात जो भी रहे हों, रामगंगा के उस पार गंगोली पहँुचाये गए, कि कहीं मल्लों की फौज डोटी से चलकर उसे फिर से कब्जिया न ले। वीरान हुए राजकोट के निवासों का उपयोग बाद के वर्षों में राजद्रोह के अभियुक्तों को रखने के जेलखाने के रूप में होता रहा। वर्षाती बाटों के रख रखाव के बिना, सीढ़ियों- खडंजों व पटालों के रड़ते खिसकते और बहते जाने से सब कुछ वीरान- खण्डहर होता चला गया। आज सीरा के साथ जुड़े शब्द ‘कोट’ पर किसी का ध्यान नहीं जाता तो नयी पीढ़ी के बच्चों को इतिहास पर यकीन करना कैसे सिखाया जाय? उस गौरवशाली राजकोट में प्रवेश करने के मुख्य गेट का आध हिस्सा भर बचा हुआ है जिसका फोटो आप इस लेख के साथ छपा हुआ देख सकते हैं। उसकी पुरातत्त्व विभाग से मरम्मत कराई जानी है। सीराकोट का एक समृद्ध ऐतिहासिक स्मारक के रूप में पुनर्निर्माण होना जरूरी है।
सन् 1353 ई. से लेकर 1585 ई. तक के 232वर्षों तक आदित्यमल, निरैपाल, नागमल्ल, रिपुमल्ल, कल्याण मल्ल, आनन्द मल्ल, संसार मल्ल, पूरन मल्ल, अर्जुन मल्ला, भूपति मल्ल और दो बसेड़ा राजाओं ने सीरा अधिराज्य पर राज किया। उनकी शासन पद्धति और कार्य संस्कृति पहाड़ों के भूगोल व जीवन संधरिणी स्थितियों के अनुकूल थी। उनकी नागरिक नीतियों में प्राकृतिक संसाधनों को बनाये रखने की प्रेरणा है। जंगल, गौचर, गाड़ गधेरों के निर्मम इस्तेमाल की कोई सूचनाऐं नहीं हैं। जमीनों के वर्षवार बन्दोबस्त, वेतन-विहीन जागीरदारी शासन-प्रबन्ध्,विनिमय आधारित मुद्राविहीन अर्थ व्यवस्था, स्थानीय उत्पादों के उपजन, भण्डारण व उपभोग की पंचायती व्यवस्था और उनके स्वायत्त अर्थशास्त्र की बहुत सी चीजें आज के समय भी प्रासंगिक लगती हैं। उनका, बकरियों, घोड़ों और भार वाहियों पर निर्भर परिवहन रोजगार पैदा करने वाला है। कमाई करने की खातिर गाँव व प्रदेश से पलायन का विरोध् करता है। बंजर पड़े गाँवों को पुनः आबाद करने के सरकारी प्रोत्साहनों की चमत्कृत सूचनाएंे मल्लों के इतिहास में खोजी गई हैं।
मौखिक ख्यातों, बहियों व ताम्रपत्रों के अध्ययनों से सीरा के तत्कालीन सूक्ष्म इतिहास की अपूर्वियत को समझने की गम्भीर कोशिश के साथ उस ‘गढ़ी’ को हरियाली से भरने के लिये भाष्कर स्वामी जैसे समर्पित प्रकृति प्रेमियों को भी मुहिम में लगाने की जरूरत है।
पिघलता हिमालय 3 जुलाई 2017 के अंक से