नमक लेकर बदरीनाथ तक जाते थे

बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल जिले का रामनगर शहर कुमाउँ और गढ़वाल की पुरानी मण्डी है। कुमाउँ कमिश्नर रेमजे ने इस नगरी को 1878 से 82 के बीच बसाया था। मुहान नामक स्थान पर बाघ के हमले से 24 तीर्थयात्रियों की मौत से दुःखी रेमजे ने नामनगर बसाने की सोची। दरअसल यहाँ के प्राचीन रामामन्दिर में चारधाम यात्रियों के ठहहने का पड़ाव था। यहाँ होते हुए यात्री बदरीनाथ को जाते थे।
इसी रामनगर के पुराने व्यापारियों में सुरेश चन्द्र जी का परिवार है। इनके दादा शम्भू दयाल फिर पिता ओमप्रकाश ने जिस फर्म को चलाया वह 1910 में ‘मानकचन्द शम्भूदयाल’ नाम से शुरु हुई। फर्म को नये स्वरूप में अब सुरेशचन्द्र जी के साथ उनके सुपुत्र अनुज और उनके पौते मानस संभाले हुए हैं। सुरेश चन्द्र जी लखनउ से बीएससी करने के बाद अपने कारोबार में जुड़े। इसी प्रकार इनके पुत्रा अनुज कुमाउँ विवि से एकाॅम में टाॅपर हैं। मूल रूप से काशीपुर में व्यवसाय करने वाले इस परिवार ने जब रामनगर में अपना कारोबार शुरु किया था तब गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रा तक गल्ला सप्लाई में इनकी फर्म अग्रणीय रही। श्री सुरेश चन्द्र जी बताते हैं कि उनके देखादेखी बकरियों में राशन लदकर जाता था। लाला ओमप्रकाश जी घोड़े में सवार होकर वसूली के लिये जाते थे। बदरीनाथ तक राशन सप्लाई के लिये उनके पास लाइसेंस था। नमक, चीनी, गल्ला का जिन व्यापारियों को मिलता था उन्हें ‘नोमनी’ कहते थे। राजस्थान के साम्भरलेक से रेलवे मालगाड़ी द्वारा नमक आता था और द्वाराहाट, मासी इत्यादि इलाकों में इसका वितरण किया करते थे। सुरेश चन्द जी बताते हैं कि सन् 1970 में आई बाढ़ के कारण पीपलकोटी का पुल बह गया था, जिस कारण 17 दिन तक मुश्किलों से होते हुए वह रामनगर पहँुचे थे। समय के साथ व्यापार के तरीके बदल चुके हैं लेकिन पुराने परिवारों के संस्कार उनकी पीढ़ियों को एकसूत्र में बांधने के साथ संस्कारों से भी जोड़ते हैं। इनका परिवार भी सामाजिक कार्यों में जुड़ा हुआ है। श्री सुरेश जी अग्रवाल सभा की गतिविधियों से जुड़े हैं। यहाँ के पुराने रामामन्दिर में इनके परिवार का योगदान रहा है। पहले से यहाँ आने वाले साधू-सन्यासियों को इनके नाना लाला श्यामलाल द्वारा संरक्षण दिया जाता रहा है। उनके भोजन की व्यवस्था राजाराम हलवाई के वहाँ करवाई जाती थी। सुरेश जी बताते हैं कि नाना जी चारधाम यात्रा के लिये पैदल आने वाले सन्यासियों को ठहरने के लिये रामा मन्दिर में स्थान मिल जाता था और भोजन-प्रसाद के लिये नाना जी पर्ची लिखकर राजाराम हलवाई से व्यवस्था करवा देते थे। यह पुराना मन्दिर आज भी व्यवस्था के तहत संचालित है। रामामन्दिर इन्तजामिया कमेटी के रूप में गणमान्य जन इससे जुड़े हैं। पं.जोगेन्द्र दत्त शर्मा मन्दिर और रामनगर की कई यादों के साथ मन्दिर में बने हुए हैं।

कर्ण की तप स्थली है अलकनन्दा और पिण्डर नदी का संगम कर्णप्रयाग

ललित नैनवाल
जनपद चमोली का कर्णप्रयाग तीर्थों का तीर्थ है। अलकनन्दा और पिण्डर नदी के संगम स्थल पर बसे कर्णप्रयाग को कर्ण की तपस्थली के रूप में जाना जाता है। यहाँ कर्णशिला ;कर्ण मन्दिर में श्रद्धालु जाते हैं। उमाशंकर मन्दिर समिति द्वारा पूर्व में इस मन्दिर का सौन्दर्यीकरण किया गया था किन्तु उसके बाद से आज तक इसमें एक पत्थर भी नहीं लगना हमारे विकास की पोल खोलता है।
कर्णप्रयाग के बाजार क्षेत्र में ही कर्ण का मन्दिर है जिसमें कर्ण की मूर्ति के साथ ही कृष्ण की मूर्ति है। स्थानीय देवता की पूजा भी यहाँ की जाती है। कर्णप्रयाग तीर्थ के महात्म्य को जानें तो पता चलता है कि गंगा और पिण्डर के संगम पर शिव के क्षेत्र में देवालयों में महाराज कर्ण ने यहाँ दीक्षा ग्रहण की। यहाँ तप करके महादेव के मंत्र से तपकर देवी भवन ;वर्तमान उमा मन्दिर में ठहर गये थे। यहाँ ;वशिष्ठ वामदेव, व्यास देव, शुक, पैल, वैशम्पायन, नारद, तुम्बरु, भृगु अश्वसथामा, सदेव, रन्ति देव, महाहनु कश्यम तथा नदो, गालब, दलभक्षक, पॅर्णशत, महानाद, कुमधन्य, तपोनिधेश शनः, शेफ, भारद्वाज, गौतम, गणरात्रिप ये तथा बहुत से ब्रह्मवादी मुनि एवं सैकड़ों ट्टषि कर्ण के यज्ञ में आये थे। सुन्दरि यजमान राजा ;कर्णद्ध ने यज्ञ में सूर्य की अराधना की। तब कुछ दिनों में ;सूर्य ने महात्मा कर्ण को वर दिया तथा अवेद्य कवच और अक्षय तरोण ;तरकश दिये। महावीरो अजेय ;न जीते जाने योग्य होने का वर दिया तथा उसी के नाम पर उस क्षेत्र का नाम रखा गया तभी यह क्षेत्र कर्णप्रयाग के नाम से स्मरण किया जाता है।

पिघलता हिमालय 23 नवम्बर 2015 अंक से

तिब्बत व्यापार के दिनों गढ़वाल में व्यापार का अपना महत्व था

डाॅ.पंकज उप्रेती
आजादी से पूर्व जब भारत-तिब्बत खुला व्यापार चलता था तब व्यापारियों के आन्तरिक व्यापार का नेटवर्क भी जबर्दस्त था। व्यापार के उन दिनों की चर्चा में अक्सर तिब्बत व्यापार की बात होती है जबकि कुमाउॅ-गढ़वाल के बीच होने वाले व्यापार का अपना महत्व था। व्यापार की इन रोचक जानकारियों के साथ 74 वर्षीय मोहन सिंह धर्मशक्तू बताते हैं कि व्यापार के दिनों में एक व्यापार तिब्बत की ओर होता था, दूसरा गढ़वाल की ओर। बरसात में तिब्बत जाते थे ;जुलाई से नवम्बर तक फिर गढ़वाल में व्यापार होता था।
जब माइग्रेशन में परिवारों के पड़ाव लगते थे तब मिलम, दरकोट, लोधिया बगड़ ;टिमटिया, तेजम के प्रसिद्ध इन धर्मशक्तू परिवार का आना-जाना होता था। माता केसी देवी व पिता हीरा सिंह के घर जन्मे मोहन सिंह, भूपेन्द्र सिंह, स्व.प्रद्युमन सिंह की वाल्यकाल का पढ़ाई दरकोट;मुनस्यारी हुई। पठन-पाठन के बाद सभी नौकरी-पेशा में इधर उधर रहे। मोहन सिंह धर्मशक्तू ने रेमजे अल्मोड़ा से हाईस्कूल, नैनीताल से इण्टर और लखनउ से डिप्लोमा करने के बाद विद्युत विभाग में अपनी नई शुरुआत की। गढ़वाल में उन्हें नौकरी का अवसर मिला और चमोली में कई अनुभवन उन्हें हुए। वह बताते हैं कि जब वह गढ़वाल में थे, स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया से चर्चा होती रहती थी। और बात निकल कर आती- ‘हमारा हिमालय पिघल रहा है।’ पिघलता हिमालय के शुरुआती दिनों में इसके नाम को लेकर चर्चा में सुमार था।
श्री धर्मशक्तू व्यापार के दिनों की पुरानी यादों पर लौटते हुए बताते हैं कि गढ़वाल में उनका व्यापार ज्यादा होता रहा है। कार्तिक माह में जब व्यापारियों का मुनस्यारी निवास होता था, तब गढ़वाल को जाते थे। गढ़वाल में ज्यादातर काला उफन की मां थी क्योंकि वहां काला कम्बल-लवादा पहनने का रिवाज है। तब जोहार के व्यापारियों की कई दुकानें भी गढ़वाल व्यापार के लिये थीं। ग्वालदम, थराली, देवाल, मीनगदेरे, उज्जवलपुर, सिमली, आदीबद्री, तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, भुनारघाट, महलचैरी, चैखुटिया में जगह-जगह इनकी दुकानें थीं। अक्टूबर से अप्रैल तक व्यापारी इनमें दुकानदारी करते थे। तब तिब्बत से सीधे बकरियों द्वारा सामग्री पहुंचती थी। दुकानदार सम्पर्क कर इन सामग्री को पहुंचाते। भेड़-बकरियों की पीठ में सामान लादने का ‘बिल्च्या’ ;फांचा निकाल कर इनके द्वारा आलू, कोयला, चूना इत्यादि ढुलान करतवाते थे। तब दानसिंह मालदार के कारोबार भी काफी फैलता जा रहा था और व्यापार का सामान लेकर आये भेड़-बकरी पालक मालदार का सामान भी लदवाकर ले जाते थे। तब घोड़े वाले हल्द्वानी, रामनगर भाबर की मण्डी को जाते थे और भेड़-बकरी से समान ढोने वाले गढ़वाल की ओर ज्यादातर आते। व्यापार में उधारी भी होती थी और वसूली/उघाई करने वाले को ‘पगाली’ कहते थे। इस प्रकार गढ़वाल व्यापार का वृहद इतिहास रहा है। ;श्री मोहनसिंह जी से निवेदन भी है कि इस बारे में वह विस्तृत लेखन करेंगे
पिघलता हिमालय 5 दिसम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित