मोहन उप्रेती के बाद नईमा सींचती रही पर्वतीय कला केन्द्र

डाॅ.पंकज उप्रेती
लोक कलाकार नईमाखान उप्रेती का 15 जून 2018 की प्रातः दिल्ली उनके आवास में निधन हो गया। वह पिछले दो साल से अस्वस्थ्य चल रही थीं। निधन के बाद शरीर दान होने के कारण उनके शव को चिकित्सा शोध् केन्द्र को दे दिया गया। बाद में उनके परिजनों ने शान्ति पाठ करवाते हुए श्रद्धांजलि दी।

‘मोहन उप्रेती-नईमा खान’ चर्चित जोड़ी रही है। लोक कलाकार संघ के साथ ही पर्वतीय लोक ध्ुनों को विश्व स्तर पर स्थापित करने वाले मोहन दा और नईमा की पहचान अल्मोड़ा में हुई थी। 70 के दसक में जब नृत्य सम्राट पं. उदयशंकर अल्मोड़ा प्रवास में थे, नईमा को अवसर मिला कि वह पंडित जी से संगीत के बारीकियां सीखे। नृत्य-गीत- नाट्य की तालीम के साथ ही मोहन उप्रेती के साथ इनकी निकटता अल्मोड़ा शहर को खटकने लगी थी लेकिन यह संयोग तय हो चुका था। लोक कलाकार संघ के बैनर तले स्थानीय कलाकारों को एकजुट कर मोहन उप्रेती ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई थी। उनकी खुशी- उनका आक्रोश गीत- संगीत के माध्यम से ही कोरस के रूप में सुनाई देता था। शास्त्राीय संगीत की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने लोक संगीत को चुना और उनके किये गये प्रयोग आज तक मंचों पर प्रचलित हैं। अल्मोड़ा निवासी नईमा खान के साथ मोहन दा की नजदीकियां बढ़ीं लेकिन घर व समाज के अखरते हुए दिनों में इन्होंने अपने रियाज  पर ही ध्यान दिया। बाद में इन दोनों ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध मेंविवाह कर लिया।

युवा मोहन उप्रेती ने हुड़के थाप पर जिन प्रकार मंचीय प्रस्तुतियों को जीवंत किया था, उतनी की बारीकी से नईमा ने अपने नृत्य-गीत से दर्शकों में सम्मोहन सा कर दिया था।

मोहन उप्रेती, नईमा खान जब दिल्ली में स्थापित हो चुके थे। उस समय नाटककार लेनिन पन्त भी इनके साथ दिल्ली में थे। गीत-संगीत-नाटक के अद्भुत प्रयोग इनके द्वारा कर दिये गये। मोहन उप्रेती राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ड्रामेटिक म्यूजिक के प्रोपफेसर थे तब उन्होंने पर्वतीय कला-नाटक-संगीत को प्रोत्साहन देने के लिये पर्वतीय कला केन्द्र की स्थापना की। इस केन्द्र के नाम से मोहन-नईमा ने जो हलचल की, वह सांस्कृतिक गढ़ के रूप में स्थापित हो गये। मोहन दा के निर्देशन में पर्वतीय लोक कला के अद्भुत प्रदर्शन व्यापक रूप से होने लगे। पचास महत्वपूर्ण नाटक 15 दूरदर्शन नाटक और सीरियल में इस केन्द्र ने योगदान दिया। 22 विदेशी मुल्कों में इस केन्द्र ने धाक जमाई। इसमें कालीदार रचित ‘मेघदूत’ नृत्य नाटिका बेहद लोकप्रिय हुई। पर्वतीय कला केन्द्र द्वारा प्रदर्शित अमीर खुसरो तथा संगीत नाटक ‘इन्द्र सभा’ भी लोकप्रिय रहे हैं। पहाड़ की लोकगाथाओं को नाटक के रूप में मंच पर लाने का ऐतिहासिक कार्य भी इनके द्वारा किया गया। इनमें ‘गोरिया’, ‘राजुला मालूशाही’ मुख्य हैं। ‘बेडू पाको बारहमासा’ को आध्ुनिक स्वरूप व संगीत-स्वर देकर अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनाई। पं.जवाहर लाल नेहरु मोहन दा को प्यार से ‘बेडू पाको ब्वाय’ कहत थे। 5 जून 1997 को उनके निध्न के बाद श्रीमती नईमा ने पर्वतीय कला केन्द्र को सींचा। स्व.मोहन दा की यादों में वह निरन्तर कार्यक्रमों का संचालन करती रहीं। मोहन दा के भाई प्रो.ध्ीरेन्द्र उप्रेती हल्द्वानी में अपनी गृहस्थी में थे, एक दिन वह भी चल दिये। मोहन उप्रेती के छोटे भाई पखावज वादक भगवत उप्रेती ने पर्वतीय कला केन्द्र के कार्य को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। भगवत जी का निध्न होने के बाद नईमा खान पिफर भी अकेले हिम्मत जुटाती रहीं। लेकिन उम्र के साथ-साथ वह हार चुकी थीं और पिछले दो सालों से अस्वस्थ होने के कारण घर में ही थीं। उनकी सेवा के लिये एक नर्स को रखा गया था और उनके निकटस्थ लोग सुध्बुध् लेते रहे। इस बीच वह हम सबसे विदा हो चुकी हैं। परिवार में स्व.ध्ीरेन्द्र उप्रेती के सुपुत्रा डाॅ.मनोज उप्रेती, स्व.भगतव उप्रेती की विववाहित पुत्रियां दीक्षा व दिव्या सहित अन्य लोगों ने जुटकर अपनी ताई का स्मरण और संस्कार किये। रंगकर्म से जुड़े लोगों ने भी नईमा जी के निधन पर शोक जताया है। मोहन दा के भांजे हिमांशु जो की गीत-संगीत की बेहतरीन पकड़ रखते हैं, से उम्मीद की जा रही है कि वह इन मोहन-नईमा की विरासत को विस्तार देंगे।

उल्लेखनीय है कि मोहन उप्रेती मूल रूप से कुंजनपुर, गंगोलीहाट के निवासी थे। इनके दादा अपनी अल्मोड़ा रानीधारा आकर बस चुके थे। मोहन उप्रेती, ध्ीरेन्द्र उप्रेती, भगतव उप्रेती का बचपन अल्मोड़ा में बीता। नईमा खान का परिवार अल्मोड़ा के संभ्रात परिवारों में रहा है। संगीत कला जगत में मोहन उप्रेती और नईमा की पहचान उन्हें करीब लाई परन्तु अपने-अपने घरों की मर्यादा को रखते हुए दोनों ने दूरी रखी। घर के बूढ़े-बुजुर्गों के निधन के पश्चात जीवन  के उत्तराद्र्ध में एक दूजे के हो लिये। पर्वतीय कलाकार केन्द्र के रूप में अपने लोक से जुड़ी एवं यहाँ के गीत-संगीत को संजोने वाली नईमा खान उप्रेती के निधन पर पिघलता हिमालय परिवार श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
अल्मोड़ा। लोककला की वाहक जानीमानी रंगकर्मी नईमा खान उप्रेती के निधन के बाद से उनसे जुड़ी हर स्मृतियाँ का स्मरण करते हुए लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। 15 जून को मयूर विहार फेस 2 के उनके किराए के घर में लम्बी बीमारी के बाद 80 वर्षीय नईमा का निधन हो गया था। उनके शरीर को करारनामे के अनुसार आयुर्विज्ञान संस्थान;एम्सद्ध को दे दिया गया। स्व.नईमा और स्व.मोहन उप्रेती के साथ बीते बचपन का स्मरण करते हुए अल्मोड़ा के वरिष्ठ होल्यार चन्द्रशेखर पाण्डे कहते हैं कि वह दोनों अद्भुत प्रतिभासम्पन्न थे और लोकसंगीत के लिये उन्होंने जबर्दस्त कार्य करते हुए विदेशों में तक हमारे पहाड़ को पहचान दिलवाई।
अल्मोड़ा के रंगकर्मियों ने नईमा जी के निधन पर शोक प्रकट करते हुए श्रद्धांजलि दी। हल्द्वानी में हिमालय संगीत शोध् ने स्व.नईमा को पहाड़ की लोक संस्कृति के लिये प्रतिबद्ध कलाकार बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

पिघलता हिमालय 25 जून 2018 के अंक से

तिब्बत व्यापार के दिनों गढ़वाल में व्यापार का अपना महत्व था

डाॅ.पंकज उप्रेती
आजादी से पूर्व जब भारत-तिब्बत खुला व्यापार चलता था तब व्यापारियों के आन्तरिक व्यापार का नेटवर्क भी जबर्दस्त था। व्यापार के उन दिनों की चर्चा में अक्सर तिब्बत व्यापार की बात होती है जबकि कुमाउॅ-गढ़वाल के बीच होने वाले व्यापार का अपना महत्व था। व्यापार की इन रोचक जानकारियों के साथ 74 वर्षीय मोहन सिंह धर्मशक्तू बताते हैं कि व्यापार के दिनों में एक व्यापार तिब्बत की ओर होता था, दूसरा गढ़वाल की ओर। बरसात में तिब्बत जाते थे ;जुलाई से नवम्बर तक फिर गढ़वाल में व्यापार होता था।
जब माइग्रेशन में परिवारों के पड़ाव लगते थे तब मिलम, दरकोट, लोधिया बगड़ ;टिमटिया, तेजम के प्रसिद्ध इन धर्मशक्तू परिवार का आना-जाना होता था। माता केसी देवी व पिता हीरा सिंह के घर जन्मे मोहन सिंह, भूपेन्द्र सिंह, स्व.प्रद्युमन सिंह की वाल्यकाल का पढ़ाई दरकोट;मुनस्यारी हुई। पठन-पाठन के बाद सभी नौकरी-पेशा में इधर उधर रहे। मोहन सिंह धर्मशक्तू ने रेमजे अल्मोड़ा से हाईस्कूल, नैनीताल से इण्टर और लखनउ से डिप्लोमा करने के बाद विद्युत विभाग में अपनी नई शुरुआत की। गढ़वाल में उन्हें नौकरी का अवसर मिला और चमोली में कई अनुभवन उन्हें हुए। वह बताते हैं कि जब वह गढ़वाल में थे, स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया से चर्चा होती रहती थी। और बात निकल कर आती- ‘हमारा हिमालय पिघल रहा है।’ पिघलता हिमालय के शुरुआती दिनों में इसके नाम को लेकर चर्चा में सुमार था।
श्री धर्मशक्तू व्यापार के दिनों की पुरानी यादों पर लौटते हुए बताते हैं कि गढ़वाल में उनका व्यापार ज्यादा होता रहा है। कार्तिक माह में जब व्यापारियों का मुनस्यारी निवास होता था, तब गढ़वाल को जाते थे। गढ़वाल में ज्यादातर काला उफन की मां थी क्योंकि वहां काला कम्बल-लवादा पहनने का रिवाज है। तब जोहार के व्यापारियों की कई दुकानें भी गढ़वाल व्यापार के लिये थीं। ग्वालदम, थराली, देवाल, मीनगदेरे, उज्जवलपुर, सिमली, आदीबद्री, तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, भुनारघाट, महलचैरी, चैखुटिया में जगह-जगह इनकी दुकानें थीं। अक्टूबर से अप्रैल तक व्यापारी इनमें दुकानदारी करते थे। तब तिब्बत से सीधे बकरियों द्वारा सामग्री पहुंचती थी। दुकानदार सम्पर्क कर इन सामग्री को पहुंचाते। भेड़-बकरियों की पीठ में सामान लादने का ‘बिल्च्या’ ;फांचा निकाल कर इनके द्वारा आलू, कोयला, चूना इत्यादि ढुलान करतवाते थे। तब दानसिंह मालदार के कारोबार भी काफी फैलता जा रहा था और व्यापार का सामान लेकर आये भेड़-बकरी पालक मालदार का सामान भी लदवाकर ले जाते थे। तब घोड़े वाले हल्द्वानी, रामनगर भाबर की मण्डी को जाते थे और भेड़-बकरी से समान ढोने वाले गढ़वाल की ओर ज्यादातर आते। व्यापार में उधारी भी होती थी और वसूली/उघाई करने वाले को ‘पगाली’ कहते थे। इस प्रकार गढ़वाल व्यापार का वृहद इतिहास रहा है। ;श्री मोहनसिंह जी से निवेदन भी है कि इस बारे में वह विस्तृत लेखन करेंगे
पिघलता हिमालय 5 दिसम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित