
शेर सिंह रावत से बातचीत
डाॅ.पंकज उप्रेती
आज भारत-चीन व्यापार और कैलास मानसरोवर यात्रा का बहुत हल्ला करने के बाद गिनती भर के लोग सरकारी निगरानी में सीमा पार यात्रा कर पाते हैं। पहले जब सीमाओं के ये बन्धन इतने जटिल नहीं थे, भारत-चीन युद्ध नहीं हुआ था, तिब्बत तक स्वतंत्रत आना-जाना था, धर्मिक यात्राी कैलास-मानसरोवर तक जाते थे, तब के व्यापार और यात्रा का स्वरूप कितना शुरु रहा होगा वह प्रसंग सुनकर नई पीढ़ी परीलोक की सी कहानी मानती है। वाकेई उस दौर के प्रसंग आलौकिक यात्राओं के ही थे और दुरुह में भी यात्राओं का अपना भोलापन था। व्यापार होते हुए भी प्रकृति के साथ नियमों की पालना थी। दुनिया के देश एक-दूसरे पर झपटने लगे, युद्धों का प्रभाव अतिआध्ुनिक तकनीक के साथ होने लगा। तिब्बत चीन ने कब्जा लिया और भारत पर हमला। चीन युद्ध के बाद भारत-तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और दूर-दूर तक पैदल यात्रा करने वाले सीम के व्यापारी जो जहाँ थे, वहीं ठहर गये। माइग्रेशन की बहुत सी परम्पराएं भी सिमट कर रह गई। व्यापार के उन पुराने दिनों में जोहार से मुनस्यार, गिरगांव, रौछाल-क्वीटी, शामा होते हुए भी रुट था और लोगों का आना-जाना था। तब जलद के आशा सिंह रावत ने कन्योटी ग्राम सभा ;अब बागेश्वर जिले में के जोशी परिवार से डोटिला में भूमि खरीदी थी। और व्यापार बन्द होने के बाद रावतों के परिवार यहाँ रहने लगे। वर्तमान में नौकरी या अन्य कारणों से भी ये परिवार शहरों में रहने लगे हैं। डोटिला ग्राम खाली सा हो चुका है।
इसी डोटिला ग्राम में जन्मे 80 वर्षीय शेर सिंह रावत बताते हैं कि करीब सन् 1957 में उनके दादा आशा सिंह रावत ने कन्योटी में भूमि खरीदी। यह डोटिला तोक में है। जलद के रावत परिवार यहाँ पर रहते हैं। पिता दौलत सिंह, दुर्गा सिंह, बाला सिंह के दादा, प्रकाश सिंह के पिता महेन्द्र सिंह, खुशाल सिंह कई नाम स्मृतियों में हैं। भरा-पूरा गाँव था डोटिला। माइग्रेशन में इधर से उधर जाने के दिनों में शेर सिंह जी ने प्राइमरी की पढ़ाई कपकोट से ही की। वह बताते हैं कि यात्रा के उस कठिन समय से पढ़ाई भी अनियमित हो जायाकरती थी। दरकोट ;मुनस्यारीद् में वह पढ़ते थे। स्कूल में वासुदेव जी अध्यापक थे तो जाड़ों में तेजम और वर्षा में मिलम जाते थे। माइग्रेशन के हिसाब से स्कूल भी चलते थे। शेर सिंह जी जब मीडिल में पढ़ते थे, उनके परिवार ने मिलम जाना छोड़ दिया गया। उस समय विद्यानन्द सरस्वती ने तिकसैन, मुनस्यारी में एक स्कूल शुरु किया था।
श्री रावत बताते हैं कि बड़े भाई खुशाल सिंह रावत इस विद्यालय में हैडमास्टर बनकर आये। हिन्दी के लिये कपकोट के शास्त्राी जी थे। लोहाघाट के घनानन्द जोशी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। कक्षा आठ तक तिकसैन में पढ़ाई की। पिफर यह स्कूल नमजला में शिफ्रट हो गया, बाद में कन्या विद्यालय बना। वह बताते हैं कि जिला बोर्ड के हाथ में चले जाने के बाद वह लोग पिफर से पढ़ाई के लिये कपकोट आ गये। उनके साथ दुर्गासिंह रावत थे। लाछुली वाले भवानसिंह-उदयसिंह शामा पढ़ने गये जबकि तेजम वाले ध्रम सिंह-गोकरणसिंह अल्मोड़ा आ गये। इस प्रकार जलद, लाछुली और तेजम के 6 युवा रावत अलग-अलग जगह गये। कपकोट से हाईस्कूल, अल्मोड़ा से इण्टर करने के बाद नैनीताल से पढ़ाई की।
शेरसिंह जी बताते हैं- ‘हमसे पहले गोविन्द सिंह पांगती ने गणित से बीएससी की, जो फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी थे। नैनीताल के बाद लखनउ एमए करने चला गया, खुशाल सिंह भी बीए करने के लिये साथ में थे। तीन साल लखनउफ में रहते हुए पी-एचडी के लिये तैयारी की लेकिन 1959 में बीडीओ के के लिये चयन हो गया। पहली नियुक्ति जखोली;टिहरी में हुई। चार-पांच साल बाद ताड़ीखेत;रानीखे. आया। वह दौर था जब चन्द्रभानु गुप्त मुख्यमंत्राी हुआ करते थे और रानीखेत उपमण्डल में तो रामदत्त पाण्डे-देवकीनन्दन पाण्डे की तूती बोलती थी। लेकिन उस समय की राजनीति व नेता आजकल की तरह नहीं थे। श्री रावत बताते हैं कि 1969 में संघ लोक सेवा आयोग के विज्ञापन इण्डियन इकाॅनमिक सर्विस के लिये पफार्म भर दिया था। बीडीओ की नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उनका चयन हो गया। आईएएस प्रोवेजनल में दो साल तक कई जगह पोस्टिंग हुई और सीखने को मिला। भोपाल ;म0प्र0 में प्लानिंग कमीशन में रहा। बाद में सिविल सप्लाई एण्ड काॅमर्स में डिप्टी डायरेक्टर होकर दिल्ली आया।’
रावत जी का विवाह स्वतंत्राता सेनानी और समाजसेवी ससखेत;थल निवासी नरसिंह जंगपंागी की पुत्र कमला देवी के साथ हुआ। जीवन के उत्तराद्ध में शेरसिंह-कमला रावत खट्टी-मीठी यादों के साथ अब हल्द्वानी में रह रहे हंै।
पिघलता हिमालय 18 जुलाई 2016 के अंक से

