
पि.हि.प्रतिनिधि
गाँवों की सैर में आपको आज थल- मुनस्यारी रोड स्थित ‘बला’ ग्राम के बारे में बताते हैं। ग्राम पो. मगरबला में मर्तोली के मर्तोलिया रहते हैं। सीमान्त के मर्तोली से कई ग्रामों में जाकर लोग बसे जिसमें सुरिंग, आमथल, चुड़ियाधर, गुलेर, कारीखेत, मल्लादेश इत्यादि। इसी प्रकार मगरबला में भी एक राठ बस गया। पुराने जमाने में व्यापार के साथ घुमन्तु जीवन बसपाल बूढ़ा को यहाँ ले आया। बला ग्राम में रहने वाले बसपाल बूढ़ा के बंशज हैं। यह वह ग्राम है जहाँ खुदा पूजा का रिवाज है। गोरखा राज में अला-बला से बचाव के लिये की जाने वाली इस विशेष पूजा को अभी तक किया जाता है। मर्तोलियाओं के अलावा धमी, राणा, वृथवाल परिवार ग्राम में हैं। गाँव अधिकांश लोग बाहर हैं, वर्तमान में 35 परिवार यहाँ रह रहे हैं।
बला के पास से ही नामिक को जाने वाला पैदल रास्ता है। 27 किमी के इस मार्ग का प्रयोग पशुचारक, ग्रामीण और विदेशी पर्यटक करते हैं। नामिक में रहने वाले जैम्यिाल परिवार इस रुट से काफी आवागमन करते रहे हैं क्योंकि उनके रिश्ते हरकोट, बोना, तूनी, क्वीरिजिमिया आदि ग्रामों में होने से यही पैदल रास्ता निकट रहा है। बला से करीब 3 किमी दूरी पर विर्थी झरना है। ग्राम के बुजुर्ग दुर्गा सिंह मर्तोलिया उन उद्यमियों में से हैं जो आज भी मिलम तक जाते हैं, जिस कारण इन्हें पुराने और नये इतिहास की खासी जानकारी है। पिघलता हिमालय में इनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जगह सिंह मर्तोलिया अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि एक बार नामिक जाते समय उन्होंने गाय के गोबर में धूप/अगरबत्ती की सी खुशबू लगी। एक टुकड़ा जेब में डाल लिया, वह सुगन्ध् कई दिनों तक महकती रही। वह कहते हैं कि यह इलाका जड़ी-बूटियों का भण्डार है। जब गाय-बकरियां जड़ी-बूटी खायेंगी तो वह पौष्टिक दूध् देंगे। विदेशी छात्रों को शोध् के लिये भ्रमण पर खूब देखा है। एक बार एक दल मौसम में फंस कर उनके वहाँ रुका। वह लोग पेड़ पौधें जड़ी-बूटियों के बारे में जानकारी जुटा रहे थे। वनस्पति विज्ञान के छात्र जिस तल्लीनता के साथ जुटे थे, वैसा यहाँ नहीं हो रहा है। उपेक्षा के चलते सीमान्त को नहीं संवारा जा सका है। आज भी विदेशियों को इस इलाके के बारे में अच्छी जानकारी है क्योंकि वह पर्यटन के नाम पर केवल कूड़ा फैलाने नहीं बल्कि नामिक ग्लेश्यिर सहित अन्य सुरम्य ग्लेश्यिर व स्थानों का भ्रमण व अध्ययन करते हैं। ऐसे स्थानों को विकसित करने की दिशा में कार्य होने चाहिये।
ग्राम के रतन सिंह मर्तोलिया प्राइमरी स्कूल के बारे में बताते हैं कि व्यापार के उन दिनों में स्कूल भी माइग्रेसन के हिसाब से चलता था। मर्तोली के बाद सुरिंग फिर बला में। कई बार पढ़ाने वाले गुरु भी अलग-अलग होते थे। समय के साथ जो जहाँ रुके वहीं बस गये। अब माइग्रेसन का यह स्कूल सरकारी प्राइमरी पाठशाला के रूप में है। वह कहते हैं कि पहले समय के अनपढ़ भी ज्यादा सूझ वाले होते थे। नई पीढ़ी तो जानती भी नहीं है कि अद्ध-पव्वा-डेढ़ो- ढाम। व्यापारी लाखों का हिसाब मौखिक ही कर दिया करते थे। अब जोड़-घटाने के लिये मशीन का सहारा ले रहे हैं।
वाकेई कितना अच्छा होता हमारी शासन-प्रशासन की मशीन ग्रामों की भावनाओं को समझते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देती। प्रत्येक ग्राम के बसने के पीछे कोरे किस्से-कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है।
स्व. दुर्गा सिंह
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया का जन्म बला में ही हुआ था। आज जिस स्थान पर मन्दिर स्थापित है, उस स्थान उमेंदसिंह-दुर्गासिंह-मंगल सिंह इसी परिवार द्वारा ग्राम के लिये दिया गया।
पिघलता हिमालय 27 जून 2016 अंक से

