दशौली गाँव भी जाते थे माइग्रेसन में

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्तवासियों की घुमन्तू जीवनचर्या में दशौली भी एक पड़ाव था। थल से आगे पुंगराउ घाटी में वृजवाल परिवार जाड़ों में आया करते थे और धरमघर में पंचपाल। उसी प्रकार पांखू के दशौली में गनघरिया परिवार भी आये, जिनकी काफी जमीन आज भी गाँव में है। इन जानकारियों के साथ अल्मोड़ा में जोहार सिंह गनघरिया से बातचीत प्रस्तुत है-
जोहार घाटी के गनघर में व्यापारी धनसिंह गनघरिया हुए। तिब्बत व्यापार सहित स्थानीय व्यापार में यह सक्रिय थे। कहते हैं इस रौबीले व्यापारी के घोड़े-बकरियां जब जाते थे तो अन्य रुक जाते थे। इनकी पत्नी मालती देवी बहुत दयालु प्रवृत्ति की थी और ग्रामीणों को सहयोग में आगे रहती। धनसिंह जी के पुत्र हुए केशर सिंह। फिर इनके तीन पुत्र हुए- त्रिलोक सिंह ;इनके पुत्र हैं- चन्दन और कन्हैया, जगत सिंह ;इनके पुत्र हैं धीरेन्द्र और जोहार सिंह सिंह ;इनके पुत्र हैं राहुल। गनघर से थाला ;बागेश्वर आकर भी गनघरिया परिवार बसे हैं। माइग्रेसन के उस दौर गनघर, तल्लाघोरपट्टा मुनस्यारी और थाला में यह परिवार रहते थे। जोहार सिंह जी बताते हैं कि दशौली में करीब ढाई सौ नाली भूमि उनके परिवार की है। इनके पिता पीएसी में थे, इनके बचपन में ही उनका निधन हो गया। ऐसे में दादी मालती देवी, माता गोपुली देवी, भाईयों के संरक्षण में इनका जीवन बीता। घोरपट्टा में रहकर बचपन की पढ़ाई के बाद पिथौरागढ़ कालेज से पढ़ाई की। बाक्सिंग व फुटबाल के बेहतरीन खिलाड़ी के अलावा यह छात्रासंघ के अध्यक्ष भी चुने गये। अल्मोड़ा आकर बीएड किया।
गनघरिया परिवार स्थित-परिस्थिति में अल्मोड़ा सहित कई जगह फैल चुका है परन्तु इनका मन आज भी अपने गनघर पर है। वाकेई अपने मूल ग्राम के विकास में योगदान के लिये जुड़ना अपनी संस्कृति से सच्चा प्यार है।

बायांगढ़ को बौंगाड़ कहने लगे, कभी चन्द राजाओं का कोट था

पि0हि0प्रतिनिधि
थल। पुंगराउ घाटी का खूबसूरत गाँव है- बौंगाड़। पांखू कस्बे से आधा किमी दूरी पर स्थित इस ग्राम पर कभी बायांगढ़ कहा जाता था। इलाके के बड़े-बुजुुर्ग बताते हैं कि चन्द राजाओं के समय में यहाँ कोट था। आज भी एक टीले के उपर कोट के निशान हैं और मान्यता है कि पुराने समय में अपने विरोधियों को साधने के लिये राजा टीले से हमला कर देते थे। गाँव में कार्की परिवारों की बहुलता है। कई परिवार बाहर बस चुके हैं लेकिन ग्राम की परम्पराओं को शानदार तरीके से बनाया हुआ है।
सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती हरिप्रिया कार्की बताती हैं कि उन्होंने भी अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि उनके पूर्वज नेपाल से यहाँ आये थे। चार भाई बौंगाड़, लोहाथल, दंतौला, चैंसला में रहने लगे। वैसे भी इलाके में शुरु से ही कहा जाता है- ‘‘चार राठ पाठक, चार राठ कार्की।’’
पहले इस ग्राम में प्राचीन ताम्रपत्र प्रधान त्रिलोक सिंह जी के वहाँ पाया जाता था। वर्तमान में व अन्यत्र है। बौंगाड़ की आवादी करीब चार सौ है। प्रधनमंमंत्री सड़क से जुड़े गाँव में शौचालय, कूड़ेदान, पेयजल की उचित व्यवस्था है। इस गाँव के 33 परिवार हल्द्वानी बस चुके हैं। फौज के अलावा अन्य क्षेत्रों में यहाँ के लोग हैं।
इस ग्राम पंचायत में 6 ग्राम आते हैं जिसमें खंडार, नायल, उप्रेतीखोला, बौंगाड़, बोकलकटिया, बंतोला। ग्रामपंचायत से लगा हुआ फल्याटी, तोराथल ग्राम है जहाँ से पैदल रास्ते होते हुए चकौड़ी घूमा जा सकता है। पांखू क्षेत्र के कई ग्रामों में जोहार के वृजवाल परिवार रहते हैं। तिब्बत व्यापार के दिनों में पैदल यात्रा के समय कई परिवार यत्र-तत्र बस थे जो यहाँ भी हैं। पास के इलाके ध्ररमघर में भी जोहार के काफी परिवार हैं। माइग्रेशन के दौरान स्कूल भी यहाँ चलता था, जो वर्तमान की स्थितियों में सरकारी स्कूल के रूप में जारी है।
बौगाड़ ग्राम से थल के लिये पुराना रास्ता भी है, जिसमें अब आवागमन नहीं होता है। पहले ग्रामवासी नियमित रूप से श्रमदान कर मार्ग की सफाई और रख-रखाव करते थे। सर्वोदय संस्था भी यहाँ बहुत सक्रिय रही है। राध बहिन, गोपाल सिंह सहित तमाम लोग बराबर ग्राम विकास के लिये कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में युवा प्रधन द्वारा भी लगातार कार्यों किये जा रहे हैं। धन- धन्य से भरपूर इस ग्राम की उन्नति होती रहे और यह दूसरों के लिये भी प्रेरणा बने, ऐसी कामना है।

कार्की समाज के इतिहास व वंशावली पर पुस्तक
बौगाड़ निवासी लोकमान सिंह कार्की ने कार्की लोगों के इतिहास पर पुस्तक लिखी है। चम्पावत जिले में गाँव के नाम तक खर्ककार्की, मंचकार्की सुनाई देते हैं। तमाम रोचक जानकारियों के साथ बनी पुस्तक में 1970 से कार्की उपजाति का इतिहास इसमें दिया गया है। साथ ही इनकी बंशावली। बताया है कि कार्की कोंकण रिसायत के राजा थे। 12वीं शताब्दी में कार्की लोग नेपाल चले गए। कुमाउॅ मंे लोगों के आदि पुरुष को वह संग्राम सिंह बताते हैं। संग्राम सिंह नेपाल में गोरखा शासन से तंग आकर चम्पावत और लोहाघाट के मध्य कन्यूरी गाँव में रहने लगे। संग्राम सिंह के दो विवाह थे। उनके वंशवृक्ष के लोग बौगाड़, चैसाला, लोहाथल, दंतोला, बैराजुबर, मसूरिया, थर्प, चनकाना, भूलधरा, जजोली, ससिखेत, मुवानी, गणाई, रानीखेत, मनान, गगास समेत कई गाँव में कार्की रहते हैं। कार्की कुमाउँ के राजपूत हैं।
पुस्तक का विगत दिवस जिलाधिकारी पिथौरागढ़ डाॅ. रंजीत सिन्हा ने विमोचन किया। लोकमान सिंह का कहना है कि उक्त पुस्तक नई पीढ़ी को उनकी जड़ों को जानने में मददगार होगी। पुस्तक सामग्री पहले एकत्र हो चुकी थी किन्तु धनाभाव के कारण यह देरी से बन पाई।

पिघलता हिमालय 27 मार्च 2017 अंक से

पुंगराउ घाटी में वृजवालों ने बनाया था पड़ाव जो सिमट चुका है

पि.हि. प्रतिनिध्
पांखू/ध्रमघर। पुंगराउ घाटी कृषि व पशु पालन की दृष्टि से बहुत उपजाउ रही है लेकिन राजनीति के खेल में यहाँ विकास कम घसीटबाजी ज्यादा होती रही है। वर्तमान में विधयक नारायण राम द्वारा क्षेत्रा के लिये तैयार खाके को देखते हुए लग रहा है कि काफी कुछ होगा। दुग्ध् संघ अध्यक्ष विनोद कार्की विधायक द्वारा इस घाटी के लिये दिलाई गई योजनाओं और प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आने वाले चुनावों में विकास कार्य उन्हें हर बूथ में बढ़त दिलायेेंगे।
पुंगराउ घाटी में कोटगाड़ी यानी कोकिला देवी का विख्यात मन्दिर है। इस घाटी के कई गाँवों में सीमान्त क्षेत्र के व्यापारियों ने डेरा डाला था। इनके पड़ावों में तक पशुओं बड़े झुण्डों का आवागमन होता था किन्तु सारी स्थितियां बदल चुकी हैं। जोहार के बिल्जू निवासी वृजवालों ने पुंगराउ घाटी को उपयुक्त माना और यहाँ उनका आना जाना था। निकट ही धरमघर में पंचपालों ने भी अपना डेरा डाला था। वहाँ आज भी शौक्यूड़ा ग्राम है और माइग्रेसन व्यवस्था के तहत संचालित होना स्कूल है।
पंुगराउ घाटी में वृजवालों के जो परिवार हैं उनमें ग्राम मसुरिया में तीन परिवार, फल्याटी में तीन परिवार, डोबगाड़ा में एक, तुराथल में चार, लोहाथल में एक परिवार है। अब इनका मुख्य व्यवसाय कृषि है। पलायन के कारण अधिकांश लोग बाहर ही हैं। ग्राम मसुरिया में जोहार के अग्रणीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्रिलोक सिंह वृजवाल का का मकान भी है, जो अब खण्डहर हाल में है। इनके परिजन वर्तमान में मुनस्यारी में हैं।
मसुरिया ग्राम के निवासी भगत सिंह वृजवाल बताते हैं कि पुराने समय में जोहार के बिल्जू, मुनस्यारी के दुम्मर के बाद व्यापारी परिवार यत्र-तत्र रहते थे। याने तीन जगह उनके घर होते थे। भारत-तिब्बत व्यापार बन्दी के बाद कई परिवार अपनी सुविधनुसार रहने लगे। तल्ला दुम्मर से पांखू के मसुरिया में आये उनके परिवार के अलावा नारायण सिंह और घनश्याम सिंह वृजवाल का परिवार वर्तमान में है। डोबगाड़ा में शेरसिंह प्रहलाद सिंह का परिवार है। फल्याटी में भीम सिंह, ललित सिंह, सुरेन्द्र सिंह वृजवाल का परिवार है। इन्हीं परिवार के प्रकाश सिंह वृजवाल अल्मोड़ा के जिला कार्यक्रम अधिकारी हैं। लोहाथल में एक परिवार अमरनाथ वृजवाल जी का है जो ड्योटी से है। घोरपट्टा से तुराथल में आये परिवारों में चार परिवार वर्तमान में दरपान सिंह, नरेन्द्र सिंह, हुकुम सिंह, नवीन सिंह वृजवाल के हैं।
इस प्रकार पुंगराउ घाटी में भी वृजवालों के परिवार अभी हैं। अपनी मेहनत के बल इन्होंने अपने कृषि कार्य को संभालने के साथ ही संस्कृति को बनाये रखा है। भले ही जोहार से काफी दूर इनका आशियाना बन चुका है किन्तु अपनों को याद करते हुए यह लोग निरन्तर बिल्जू का स्मरण करते हैं। जहाँ से पैदल चलकर इनके पूर्वजों ने अपने कारोबार का विस्तार किया और यथासमय अपने को स्थापित कर लिया। इन परिवारों से कापफी लोग नौकरी-पेशा में बाहर हैं किन्तु इनका योगदान कोटगाड़ी की इस भूमि में भी है।
पिघलता हिमालय 4 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित