अल्मोड़ा शहर: जब लोग पान खाने के बहाने शिब्बन की दुकान में जाया करते थे

संस्मरण

नवीन चन्द्र उपाध्याय

बचपन की यादें बहुत मधुर होती हैं जो कोमल हृदय और अपरिपक्व मस्तिष्क में एक सुन्दर सपने की भांति जीवन भर मंडराती रहती हैं। मेरी बचपन व शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा शहर में हुई अतः यह स्वाभाविक है कि उस वक्त की सारी खट्टी-मीठी यादें अभी भी मन को गुदगुदाती रहती हैं। चूंकि यह शहर एक सांस्कृतिक व प्राचीन सम्भ्यता को अपने में संजोये हुए है, जहाँ पर हर मुहल्ले व गली में संगीत की धारा बहती है। खासतौर पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत की झलक यहाँ की बैठकोंहोली में मिलती है। यहाँ कुमाउनी संस्कृति व रीति-रिवाज का सम्पुट अन्य धर्मावलम्बी वर्गों में भी मिलता है। होली, दिवाली, ईद व क्रिसमस साथ-साथ मनाई जाती है। जहाँ दीवाली की बात आती है बचपन में सभी बच्चे शहर की दीवाली देखने जाया करते थे वहाँ उनको खेल-खिलौने मिठाई खाने को मिलती थी। बिजली आने से पूर्व मोमबत्ती व दिये से शहर को रोशन किया जाता था। पचासवें दशक की बात है जब पहले पहल बिजली के बल्बों की रोशनी में दिवाली मनाई गई तो सारा शहर रोशनी से नहा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शहर आसमान के तारों से जा मिला या तारे शहर में उतर आये हों। कुछ भी रहा हो, बच्चों के लिये यह एक आश्चर्यजनक नजारा था। कभी-कभी ऐसा दृश्य तब देखने को मिलता था जब बरसात या जाड़ों में कोहरा आने पर जमीन व आसमान एक ही नजर आते थे। इसीदृश्य को देखते हुए गीतकारों ने भी गीत लिखा था-
‘‘ये आसमां छू रहा है जमीं पर
ये मिलन हमने देखा यहीं पर………..।’’
विद्यार्थी जीवन के कई रोचक प्रसंग अभी भी याद आ रहे हैं। मैं रामजे हाईस्कूल में पढ़ता था, जहाँ पर प्रार्थना सभा में बाइविल की आयात का पाठ किया जाता था क्योंकि स्कूल ईसाई मिशनरी के प्रबन्ध् न में था। अतः अधिकांश शिक्षक क्रिश्चियन वर्ग के थे। एक दिन मेरे गाँव से एक परिचित मुझे विद्यालय में मिलने आये, वे गेट पर से मुझे बाइविल का पाठ करते देख रहे थे जब प्रार्थना सभा समाप्ति पर थी वे अचानक मेरे बगल में खड़े हो गये मुझे बाइविल न पढ़ने के लिये कहने लगे तथा स्कूल बदलने को कहा। इस पर चुप होकर मैं उनको सुनने लगा जब उनका भाषण खत्म हो गया मैं उन्हें विद्यालय के भीतर ले गया जहाँ हर कमरे की दीवार में बाईविल की आयतें लिखी थी वे इस प्रकार से थी-
‘‘ईश्वर सबका एक है। ईश्वर से प्रेम करो। भगवान का भय बुद्धि का प्रारम्भ है।…..।’’ वे सज्जन इनको
पढ़कर कहने लगे- यह तो हमारे धर्मग्रन्थ में भी लिख रहता है। तब मैंने उनसे कहा कि अधिकांश लोग अन्ध्कार में रह कर एक-दूसरे के धर्म की निन्दा करते देखे गये हैं। वे सज्जन सन्तुष्ट होकर वापस चले गये और मैं अपनी कक्षा में। उस समय मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, मेरी हिन्दी की कक्षा थी, हमको हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक श्री केशवदत्त पाण्डे जी थे जो साधरण सा लिवास पहने रहते थे तथा उच्च विचारों के एक योग्य अध्यापक थे। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि कक्षा के बच्चे एकदम शान्तचित्त होकर उनको सुना करते थे, वे बीच-बीच में कुछ कहानियां व रोचक प्रसंग भी सुनाया करते थे। एक बार उन्होंने एक रोचक प्रसंग विद्यालय के बारे में सुनाया। प्रसंग इस प्रकार था कि विद्यालय में कुछ अंग्रेज अधिकारी पैनल मुआयने में आये थे उनमें से एक अधिकारी अंग्रेजी अध्यापक की कक्षा का निरीक्षण करने गया, साथ में काजेल के प्रधनाचार्य मि.रावत भी थे अध्यापक को सम्बोधित करते हुए अधिकारी ने कहा- ‘मि.आपका शाब्दिक उच्चारण ठीक नहीं है, ठीक से अंग्रेजी के शब्द बोलिये।’ रावत जी भी अध्यापक का उच्चारण सुन रहे थे। उन्हें लगा कि उच्चारण
सही हो रहा है। उन्होंने अधिकारी से कहा- महाशय! अध्यापक बिल्कुल सही बोल रहे हैं। इस पर अधिकारी नाराज हो गये। रावत जी ने अंग्रेज से कहा मि. क्या आप कुमाउनी भाषा के शब्दों को ठीक से बोल सकते हैंयदि हाँ तो मैं कुछ शब्द बोलता हँू आप उन्हें ठीक उसी प्रकार दुहरायेंगे
बोलें- मडुवाक रऽवाट’, अंग्रेज अधिकारी के मुख से निकला- ‘मडुवाक ल्वात’। इस पर सभी बच्चे हँसने लगे तब रावत जी ने उन्हें समझाया कि भौगोलिक परिस्थितियों व जलवायुके अनुसार ही हमारी जीभ व मँुह का संचालन होता है। ठण्डी जलवायु के लोग अपना मँुह गर्म जलवायु के व्यक्तियो की अपेक्षा कम खोलते हैं जिससे उनका उच्चारण प्रभावित होता है। इस पर अंग्रेज अफसर चुप होकर चला गया।
मध्यान्तर हुआ हम सभी विद्यार्थी बाहर निकले और इसी प्रसंग की चर्चा में हँसते रहे। बाजार में
कन्हैयालाल नन्दलाल के यहाँ दूध् पीने चले गये जो उस वक्त एकआने में एक गिलास मलाई डालकर मिलता था, वह दूध् आज भी याद आता है। अगली कक्षाओं के लिये कुछ समय अभी बचा था, हम सभी शिब्बन पान वाले की दुकान के सामने रेडियो सुनने चले गये। वहाँ पर अधिकांश लोग पान खाने के बहाने रेडियो समाचार व आजाद कश्मीर रेडियो के गाने सुना करते थे। छुट्टी के दिन या इतवार को हम लोग ब्राइटन कार्नर घूमने जाया करते थे और लौटते समय रीगल सिनेमा के सामने ठेला लगाये बाबा के यहाँ स्वादिष्ट गोलगप्पे का आनन्द लेते हुए बसंल होटल के गुलाब जामुन खाना नहीं भूलते थे।
इस प्रकार विद्यार्थी जीवन की छोटी-मोटी बातें आज भी दिलो-दिमांग में घूमती रहती हैं। एक बार नन्दादेवी के मेले में मुझे अपने फूफा जी केसाथ जाने का अवसर प्राप्त हुआ। फूफा जी मुझे अपने कन्ध्े में बिठा कर बावन सीड़ियां चढ़कर मन्दिर परिसर में ले गये, जहाँ बहुत भीड़ एकत्रित थी कारण था भैंस की बलि चढ़ाना लोग देख रहे थे। मैं फूफा जी के कन्ध्े में बैठा सबसे आगे वाली कतार में था। बलि का भैंसा लाया गया साथ में एक खड्ग हाथ में लिये खटिक भी था। राजा काशीपुर के हाथ में खड्ग पकड़ा कर खटिक ने एक ही बार में भैंस की गरदन से सिर अलग कर दिया, खून की धारा बहने लगी। हृदय विदारक दृश्य को देखकर मेर बाल मन विकल हो उठा और मैं बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। साथ ही मेरे फूफा जी भी गिर पड़े। दोनों को चोटें आई। किसी प्रकार हम लोग घर पहँुच पाये। कई दिनों तक मेरे दिमाग में वह वीभत्स घटना तैरती रही जिससे मुझे रात नींद में चिल्लाने व उठ कर बैठ जाने की शिकायत हो गई। आज भी मैं सोचता हँू कि मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा व मनोकामना के लिये या कहें मनोरंजन के लिये निरीह प्राणियों पर किस प्रकार से अत्याचार करते हैं जो एक जघन्य पाप की श्रेणी में आता है। अभी तक यहप्रथा चली आ रही है। कुछ हद तक सरकार ने इसको प्रतिबन्धित किया है। फिर भी लोग चोरी-छिपे ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं जो अनुचित है।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से