बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण स्थान का नाम पड़ा टिमटिया

पि.हि.प्रतिनिधि 
थल-मुनस्यारी मार्ग पर स्थित तेजम का टिमटिया क्षेत्र माइग्रेसन काल में धर्मशक्तूओं का पड़ाव हुआ करता था। मिलम, दरकोट और नंगर यानी गरम घाटी में तीन-तीन माह करीब यह लोग रहा करते थे।
केदार सिंह धर्मशक्तू बातचीत करते हुए बताते हैं कि मिलम में मूल रूप से रावत, पांगती, सयाना हुए जिन्हें मिल्मवाल कहते हैं। धर्मशक्तू में से ही सयाने को सयाना कहा गया। तिब्बती में इन्हें च्यूंवायारता कहते हैं। तिब्बत व्यापार के समय से जब व्यापारियों का आना-जाना होता था तब मौसम के अनुसार वह अगल-अलग स्थानों पर रहते थे। नंगर यानी की गरम घाटी के रूप के रूप में नाचनी का यह क्षेत्र भी चुना गया होगा। बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण इस स्थान का नाम टिमटिया पड़ गया। पहले से इसी प्रकार से कई नाम पड़ गये। भैंसखाल में तालाब सा है जिसमें भैंसें जाती थीं, नाम पड़ा भैंसखाल। बुजुर्गवार के नाम पर स्थान का नाम पड़ा- जब्बूखरक। श्री धर्मशक्तू बताते हैं- तेजम तो कोट रहा है, जहाँ रावत लोगों के हाथ में न्याय व्यवस्था थी।
अपने बुजुर्गों से कहे-सुने के अनुसार श्री केदार सिंह जी बताते हैं कि किसी समय टिमटिया में आसा जसपाल आये थे। इन्हीं के बंशज विभिन्न राठों के नाम से जाने जाते हैं। बाद में कुछ लोग माले चले गये और कुछ टिमटिया रह गये। टिमटिया रहने वालों को टिमटिया राठ कहने लगे। पाँच भाईयों का एक राठ हुआ जो शामा के पास ढोलढूंगा गये थे। माले राठों में गिरधर सिंह धर्मशक्तू के परिवार जन आदि हैं। टिमटिया राठों में डाॅ.नारायण सिंह धर्मशक्तू परिवार जन आदि हैं। पाँच भाई राठों में बलवन्त सिंह धर्मशक्तू परिजन आदि हैं।
श्री केदार सिंह बताते हैं कि किन्हीं कारणों से यत्र-तत्र जाकर रहने लगे राठों की नई पीढ़ी भी नौकरी-पेशा के सिलसिले में दूर-दूर तक निकल चुकी है किन्तु अवसर विशेष पर सभी मिलते जुलते हैं। आज भी टिमटिया में अपनी यादों के साथ बने हुए श्री धर्मशक्तू चाहते हैं कि उनके परम्परागत हुनर को नई पीढ़ी बचाये रखे।

पिघलता हिमालय 7 दिसम्बर 2015 के अंक से