अद्भुत है एकहथिया मन्दिर

पि.हि. प्रतिनिधि
थल/मुवानी। उत्तराखण्ड के हजारों गाँवों में हजारों प्रकार की ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की चीजें हैं, जिनके बारे में कथाओं, गाथाओं, किस्से, कहानियों में जानकारी मिलती है। ऐसी ही ऐतिहासिक महत्व की चीज थल से करीब दो किमी दूर स्थित है। ‘एकहथिया मन्दिर’ के रूप में स्थापित इस प्राचीन मन्दिर के बारे में कई प्रकार की चर्चाएं रही हैं और कहा जाता है कि किसी ने एक ही रात में एक हाथ से इस मन्दिर को एक ही पत्थर काटकर बनाया था।
वाकेई मन्दिर की कृति थल के ऐतिहासिक मन्दिर जैसी है किन्तु इसे एक विशाल पत्थर को काटकर ही बनाया गया है। मन्दिर में खूबसूरत नक्कासी के साथ ही पानी का छोटा सा कुण्ड बनाया गया है। पानी आने के लिये रास्ता बनाया गया है। शिवलिंग भी है लेकिन उल्टी दिशा में होने के कारण यहाँ दिया-बाती नहीं की जाती है। एकहथिया मन्दिर के बारे में जानकारी लेने व देखने के लिये दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं। पर्यटन विभाग की ओर से एक टिनशैड इसके पास बनाया गया है लेकिन इस ऐतिहासिक मन्दिर को बचाये रखने के लिये सुरक्षा दीवार अतिआवश्यक है अन्यथा भविष्य में इसे खतरा उत्पन्न हो सकता है।
बलतिर गाँव में स्थित एकहथिया मन्दिर के पास भेलियागाड़ के कारण पहाड़ में काफी जमीन भीतर की ओर कटी हुई है। जंगल और खेतों के बीच यह ऐतिहासिक महत्व की चीज फिलहाल सुरक्षित है लेकिन इसे सौन्दर्यीकरण के साथ संवारना चाहिये। गाड़ के पार अल्मिया गाँव स्थित है। थल से करीब दो किमी की दूरी पर स्थित बलतिर और अल्मिया गाँव कृषि के लिये अग्रणीय हैं किन्तु इनकी सुध् लेने के लिये शासन-प्रशासन ने हाथ हलकाने चाहिये। हाल यह है कि अपने आप से ग्राम संवारने वालों में इतनी उर्जा नहीं है कि वह बजह होने के बाद भी नेताओं को पकड़ कर अपनी समस्याएं हल करवा ले जाएं। न ही जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे हैं। गाँव में पलायन की मार अलग से है। रामगंगा घाटी की इस उपजाउ भूमि में भेलिया गाड़ और सालीखेतगाड़ के कारण पर्याप्त पानी भी है लेकिन कृषि आधारित छुटपुट कार्यों के सिवाय कुछ नहीं हो रहा है।
इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि कभी रामगंगा इसी जगह से होकर जाती थी जिसने बाद में अपनी दिशा बदली होगी। एकहथिया मन्दिर वाले क्षेत्रा में पाये जाने वाले पत्थरों से आसानी से अनुमान लग जाता है कि वह नदी के साथ रहे होंगे।
बलतिर ग्राम में तो दूर-दूर तक खेतों को देखकर प्रसन्नता होती है। यहाँ कुछ प्राचीन पेड़ हैं, जिन्हें पूज्य के रूप में माना गया है। काई इन्हें सतयुगी भी कहते हैं। इन पेड़ों के नीचे प्राचीन मूर्तियां और तराशे गये पत्थर भी रखे गये हैं। बलतिर की आवादी करीब डेढ़ हजार होगी, यहाँ एक प्राइमरी स्कूल है। इसके अलावा विकास के पत्थर नहीं लगे हैं। एकहथिया मन्दिर तक जाने के लिये थल से पैदल चढ़ाई वाला मार्ग तो है ही। थल मुवानी मोटर रोड से एक पक्की सड़क का मार्ग भी कटता है जो बलतिर गाँव पहँंुचाता है। इस प्रकार सड़क से आसान पहँुच वाले इस क्षेत्रा के विकास में अभी बहुत कुछ होना है।

बन्द पड़ा उन-कालीन का कारोबार

बलतिर ग्राम में श्रीमती तुलसी देवी मर्तोलिया ने उफनी कारोबार की जोरदार शुरुआत की थी लेकिन उनके अस्वस्थ्य होने के बाद से यह कारोबार लड़खड़ा गया। मूल रूप से आमथल के रहने वाले मर्तोलिया परिवार ने थल में रहते हुए ग्राम बलतिर में भूमि ली और भवन बनाया ताकि कृषि के साथ साथ उनी वस्त्र, दन-कालीन का कारोबार चलाया जाए। इसके लिये श्रीमती तुलसी मर्तोलिया ने प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया और लोगों को इससे जुड़ने के लिये प्रेरित किया किन्तु उनके अस्वस्थ्य होते ही यह कारोबार रुक गया। श्रीमती मर्तोलिया आज भी कभी कभार बलतिर अपने मकान पर जाती हैं लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनी कारोबार को चला पाना कठिन है। सरकार की ओर से लघु उद्योग के लिये बहुत सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। काश बलतिर में एक परिवार द्वारा छेड़ी गई इस मुहीम को जिन्दा रखने में मदद मिलती।

पिघलता हिमालय 28 दिसम्बर 2015 अंक से

पुंगराउ घाटी में वृजवालों ने बनाया था पड़ाव जो सिमट चुका है

पि.हि. प्रतिनिध्
पांखू/ध्रमघर। पुंगराउ घाटी कृषि व पशु पालन की दृष्टि से बहुत उपजाउ रही है लेकिन राजनीति के खेल में यहाँ विकास कम घसीटबाजी ज्यादा होती रही है। वर्तमान में विधयक नारायण राम द्वारा क्षेत्रा के लिये तैयार खाके को देखते हुए लग रहा है कि काफी कुछ होगा। दुग्ध् संघ अध्यक्ष विनोद कार्की विधायक द्वारा इस घाटी के लिये दिलाई गई योजनाओं और प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आने वाले चुनावों में विकास कार्य उन्हें हर बूथ में बढ़त दिलायेेंगे।
पुंगराउ घाटी में कोटगाड़ी यानी कोकिला देवी का विख्यात मन्दिर है। इस घाटी के कई गाँवों में सीमान्त क्षेत्र के व्यापारियों ने डेरा डाला था। इनके पड़ावों में तक पशुओं बड़े झुण्डों का आवागमन होता था किन्तु सारी स्थितियां बदल चुकी हैं। जोहार के बिल्जू निवासी वृजवालों ने पुंगराउ घाटी को उपयुक्त माना और यहाँ उनका आना जाना था। निकट ही धरमघर में पंचपालों ने भी अपना डेरा डाला था। वहाँ आज भी शौक्यूड़ा ग्राम है और माइग्रेसन व्यवस्था के तहत संचालित होना स्कूल है।
पंुगराउ घाटी में वृजवालों के जो परिवार हैं उनमें ग्राम मसुरिया में तीन परिवार, फल्याटी में तीन परिवार, डोबगाड़ा में एक, तुराथल में चार, लोहाथल में एक परिवार है। अब इनका मुख्य व्यवसाय कृषि है। पलायन के कारण अधिकांश लोग बाहर ही हैं। ग्राम मसुरिया में जोहार के अग्रणीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्रिलोक सिंह वृजवाल का का मकान भी है, जो अब खण्डहर हाल में है। इनके परिजन वर्तमान में मुनस्यारी में हैं।
मसुरिया ग्राम के निवासी भगत सिंह वृजवाल बताते हैं कि पुराने समय में जोहार के बिल्जू, मुनस्यारी के दुम्मर के बाद व्यापारी परिवार यत्र-तत्र रहते थे। याने तीन जगह उनके घर होते थे। भारत-तिब्बत व्यापार बन्दी के बाद कई परिवार अपनी सुविधनुसार रहने लगे। तल्ला दुम्मर से पांखू के मसुरिया में आये उनके परिवार के अलावा नारायण सिंह और घनश्याम सिंह वृजवाल का परिवार वर्तमान में है। डोबगाड़ा में शेरसिंह प्रहलाद सिंह का परिवार है। फल्याटी में भीम सिंह, ललित सिंह, सुरेन्द्र सिंह वृजवाल का परिवार है। इन्हीं परिवार के प्रकाश सिंह वृजवाल अल्मोड़ा के जिला कार्यक्रम अधिकारी हैं। लोहाथल में एक परिवार अमरनाथ वृजवाल जी का है जो ड्योटी से है। घोरपट्टा से तुराथल में आये परिवारों में चार परिवार वर्तमान में दरपान सिंह, नरेन्द्र सिंह, हुकुम सिंह, नवीन सिंह वृजवाल के हैं।
इस प्रकार पुंगराउ घाटी में भी वृजवालों के परिवार अभी हैं। अपनी मेहनत के बल इन्होंने अपने कृषि कार्य को संभालने के साथ ही संस्कृति को बनाये रखा है। भले ही जोहार से काफी दूर इनका आशियाना बन चुका है किन्तु अपनों को याद करते हुए यह लोग निरन्तर बिल्जू का स्मरण करते हैं। जहाँ से पैदल चलकर इनके पूर्वजों ने अपने कारोबार का विस्तार किया और यथासमय अपने को स्थापित कर लिया। इन परिवारों से कापफी लोग नौकरी-पेशा में बाहर हैं किन्तु इनका योगदान कोटगाड़ी की इस भूमि में भी है।
पिघलता हिमालय 4 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित