पिथौरागढ़

पिथौरागढ़ नगर की चार समस्यायें

मदन चन्द्र भट्ट
पिथौरागढ़ नगर 1380 ई. में कत्यूरी राजा पिथौरा ने बसाया। उसकी तीन रानियाँ थीं- गंगा देवी, धर्मा देवी और मोलादेवी ;जियारानी। तीनों रानियों सेे तीन राजकुमार पैदा हुए- सिंहराज, बागदेव और दुलाशाही ;धमदेव। जागरों और वंशावलियों से ज्ञात होता है कि ‘पिथौरा’ लाड़प्यार का नाम था। इसके अलावा उसके चार नाम और थे- पृथ्वीशाही, पृथ्वीपाल, पृथ्वीमल्ल और प्रीतमदेव। उसका पौत्र और धमदेव का बेटा मालूशाही दारमा के सार्थवाह शुनपति शौक की पुत्री राजुला शौक्याणी के साथ गन्धर्व विवाह के लिए प्रसिद्ध है।
ब्रिटिश शासनकाल ;1815-1947 ई. तक पिथौरागढ़ की सीमा दक्षिण में सुकौली और ऐंचोली से लेकर उत्तर में सात शिलिंग तक तथा पूर्व में भड़कट्या से लेकर पश्चिम में पौण गाँव पैंगउाक शिलिंग तक फैली हुई थी। उस समय थरकोट गाँव में छः थरों ;पट्टी की एक पंचायत बैठती थी और सभी राजनैतिक समस्याओं का निबटारा करती थी। उदाहरण के लिए थरकोट की थर ने 1815 ई. में यह निश्चय किया कि रामेश्वर और थलकेदार के आचार्य होने से बिशाड़ गाँव के भृगुवंशी और विश्वामित्रा गोत्री ब्राह्मणों को अंग्रेजों की कुली बेगार से मुक्त रखा जाय। इस निर्णय को सपफल बनाने के लिए ‘रावल’ और ‘बल्दिया’ पट्टी के सभी थोकदार और जिमदार तलवार और खुखरी पहन कर अलमोड़ा ;प्राचीन लखनपुर में कमिश्नर ट्रेल की अदालत में उपस्थित हुए। जिस तरह ‘गर्खा’ ;परगनाद्ध के अन्तर्गत डीडीहाट, द्वाराहाट, गंगोलीहाट आदि बाजारें थें, उसी तरह कत्यूरी, चन्द, बम, मल्ल, पाल, गोरखा ;1790-1815 ई. आदि के शासन काल में थरकोट और हाट गाँवों में ‘शोरहाट’ थी। शोर का अर्थ है हल्ला। यह शब्द लोक में ‘सोर’ के नाम से प्रचलित है। स्थानीय अनुश्रुति के अनुसार कैलास-मानसरोवर और पशुपतिनाथ के तीर्थयात्रियों के यहाँ ग्रीष्मकाल में आने से भयंकर शोर होता था। जाड़ों में तिब्बती लामा, शौका और भोटिया अपने ढाकरों के साथ चार महिने पिथौरागढ़ में पड़े रहते थे। वैदिक काल में पिथौरागढ़ में वैराज्य ;राजा रहित परम्परा का गणराज्य था जिसकी राजधनी ‘गणकोट’ सोर की हाट के उत्तर मेें नाग नदी के किनारे स्थित है। बिशाड़ गाँव के बिल्वेश्वर महादेव में नाग नदी में ‘बिल्ववती’ और ‘सरस्वती’ नदी के मिलने से ‘त्रिवेणी’ बन जाती है।
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड के अनुसार नाग, यक्ष, असुर, विद्याधर  और  सिद्ध यहाँ के मूल निवासी थे। पिथौरागढ़ नगर के मध्य में बहने वाली ‘ठुलि गाड़’ को ‘यक्षवती’ नदी कहा गया है। इसके समीप स्थित घंटाकरण देवता, जाख और जाखिनी गाँव यक्ष परम्परा के नाम हैं। प्राचीन काल में तिब्बत के ‘ताकलाकोट’ को अलकापुरी कहते थे। शीतकाल में अलकापुरी के यक्ष पिथौरागढ़ में आ जाते थे और यक्षवती नदी के दोनों ओर शीतकाल में रहते थे। इस प्रकार पिथौरागढ़ वैदिक काल में शीतकालीन अलकापुरी था और उत्तराखण्ड का सबसे पहला और चर्चित नगर था। मानसखण्ड के अनुसार यक्षवती नदी ‘असुर’ प्रान्त से निकलती थी। आज भी ठुलियाड़ के उद्गम के समीप दो उँचे ‘असुरचुल’ नाम के पहाड़ हैं जिनमें लोक देवता ‘असुर’ की थापना है। असुर देवता की पूजा जागर प(ति से होती हैं आसपास के ग्रामीणों का विश्वास है कि यह असुर देवता तिब्बत से ‘सोर’ आया। मानसखण्ड में कत्यूरी शैली की मूर्तियों से भरी -घुंसेरा’ गुफा को ‘विश्वकर्मा’ की गुफा कहा गया है।
पिथौरागढ़ नगर में चैतोला, हिलजात्रा, आठूं, होली, रामलीला आदि के आयोजनों में ढोल-नगाड़े के साथ भयंकर भीड़ एकत्र होती है और प्राचीन ‘उत्सव संकेत’ गणराज्य की यादें ताजा हो जाती हैं।
पिथौरागढ़ तीन पीढ़ी तक- राजा पृथ्वीशाही, दुलाशाही और मालूशाही की राजधानी रहा है। उस समय कत्यूरी साम्राज्य उत्तर में कैलास-मानसरोवर से लेकर दक्षिण में सहारनपुर जिले के शाकम्भरी मन्दिर तक तथा पश्चिम में देहरादून जनपद के जौनसार में स्थित बैराटगढ़ से लेकर नेपाल के ‘डोटीगढ़’ तक फैला हुआ था। डाॅ.प्रयाग जोशी ने द्वाराहाट में प्रचलित कत्यूरी वंशावली को एकत्रा किया है। उसमें कहा जाता है कि कत्यूरी साम्राज्य में बारह रजबार और नौ लाख सेना थी-
‘जोत राजा कत्यूराॅ की!
जदोल मनसोर करम चाको पाट।
पफीणी कत्यूर रणचूलीहाट।
सचनी नागनी पूरब।
मालिनी पछम लागो ढांउ।
एकै बीड़ा सब लोगन को बानँू।
छाटछारी बार रजबारी।
नौ लाख कत्यूराॅ ले तपायो।
धरती को तीसरो बानूॅ।
कभी वैराज्य, कभी उत्सव संकेत गण और रंगीली सोर रहा पिथौरागढ़ आज चार ऐसी भीषण समस्याओं से त्रस्त है जिसका समाधन न अपफसरों के पास है और न नेताओं के पास है। उन समस्याओं के समाधन के लिए छात्रा, महिलायें, राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता और ग्रामीण निरन्तर आन्दोलित हैं। यूं कहिये कि उनकी नींद हराम है। ये चार समस्यायें हैं-
1. डिग्री कालेज को कुमाउ वि.वि. का कैम्पस का दर्जा दिया जाना और दिल्ली की तर्ज पर तीन वर्ष का बीए, एलएलबी खोलना।
2. बारहमासी सड़क को ऐंचोली से सप्त शिलिंग तक न जाने देना।
3. प्रस्तावित नगर निगम में आसपास के गाँवों को सम्मिलित न होने देना।
4. पंचेश्वर बांध् को न बनने देना।

पिघलता हिमालय 20 अगस्त 2018 अंक से

पिथौरागढ़ की चार समस्यायें- 2

डाॅ.मदन चन्द्र भट्ट
पिथौरागढ़ डिग्री कालेज तिब्बत पर चीनी आक्रमणसे सीमान्त विकास की नीति के अन्तर्गत खुला। पहले जूनियर हाईस्कूल बजेटी में कक्षायें शुरु हुईं, फिर घुड़साल में टिनशेड बनाये गये। जब कुमाउँ विश्व विद्यालय की स्थापना के लिए आन्दोलन हुआ तो सबसे उग्र आन्दोलन पिथौरागढ़ में हुआ। छात्रों की उग्र भीड़ पर गोली चलानी पड़ी जिससे दो लोगों की मौत हो गई। आगरा विश्वविद्यालय बहुत दूर होने से छात्र-छात्राओं की बहुत परेशानी होती थी लेकिन कुमाउँ विश्वविद्यालय बनने पर नैनीताल और अल्मोड़ा दो कैम्पस बनाये गये, पिथौरागढ़ को छोड़ दिया गया। उसी समय गढ़वाल विश्विद्यालय भी बना। उसके तीन कैम्पस श्रीनगर, पौड़ी और टिहरी बनाये गये। नैनीताल के बजाय अल्मोड़ा में वि.वि. का केन्द्र बनाया जाता तो तब भी पिथौरागढ़ वालों के लिये नजदीक होता। नैनीताल एक पर्यटक नगर है। आज कारों से जाम लग जाने से पर्यटक बेहद परेशान हैं। जब छात्रों ने नैनीताल में विश्वविद्यालय का केन्द्र बनाने के लिए आन्दोलन शुरु किया तो वहाँ के ‘होटल एसोसिएशन’ ने उसका विरोध् किया क्योंकि पर्यटन पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। इसी तरह नैनीताल में ‘हाईकोर्ट’ का बनना भी पर्यटन के लिए बाध्क रहा है। नैनीताल में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि हाईकोर्ट गैरसैंण में नवनिर्मित विधान सभा भवन में डाला जाय और पिथौरागढ़ को विश्वविद्यालय का कैम्पस बनाया जाय।
जब से कुमाउँ विश्वविद्यालय बना है, हर वर्ष पिथौरागढ़ का छात्रसंघ वि.वि. कैम्पस बनाने की मांग करता है। छात्रसंघ के चुनाव की पूर्व वेला में जब जनरल गैदरिंग होती है तो सभी प्रत्याशी वादा करते हैं कि वे महाविद्यालय को विश्वविद्यालय का कैम्पस बनाने के लिए पूरा जोर लगायेंगे। अंक तालिकाओं में गड़बड़ी हो जाने पर छात्र-छात्राओं को नैनीताल दौड़ना पड़ता है, वहां के महंगे होटलों में रहना पड़ता है। पीएचडी की मौखिकी परीक्षा के लिए नैनीताल जाना पड़ता है और वहाँ के महंगे होटलों में रहना पड़ता है। अगर पिथौरागढ़ में वि.वि. का कैम्पस बन जाता तो सीमान्त के सभी डिग्री कालेजों ;नारायण नगर, बलुवाकोट, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, बेरीनाग आदि के छात्रों को अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए नैनीताल न भटकना पड़ता।
कैम्पस बन जाने से उत्तराखण्ड सरकार का आर्थिक बोझ भी कम होता। अध्यापकों के वेतन का अस्सी प्रतिशत व्यय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग वहन करता, केवल बीस प्रतिशत राज्य सरकार को देना पड़ता। शोध् योजनाओं, शोध् छात्रवृत्तियां तथा प्राध्यापकों के विदेश जाने में भी विशेष सुविध होती। सबसे बड़ा काम यह होता कि छात्रासंघ का चुनाव लड़ने वालों को अपने भाषण में कैम्पस बनाने का झूठा वायदा न करना पड़ता।
छात्रों की एक प्रमुख मांग महाविद्यालय में बीए, एलएलबी खोलने की है। इसके लिए आजकल कई छात्र-छात्रायें दिल्ली जा रहे हैं। प्राइवेट कम्पनियों में जिस तरह बी.टैक. करने वाले छात्रों को नौकरी मिल जाती है, उसी तरह एल.एल.बी. करने वालों के लिए भी प्राइवेट कम्पनियों के द्वार खुले हैं। एल.एल.बी. करने वाले ‘जज’ की परीक्षा दे सकते हैं, स्वतंत्र रूप से वकालत कर सकते हैं, राजनैतिक दलों के सदस्य बनकर नगरपालिका, जिला परिषद, ग्राम पंचायत, वन पंचायत, सहकारी बैंक आदि के चुनाव लड़ सकते हैं।
तीसरी भीषण समस्या स्टापफ क्वार्टरों की है। आज महाविद्यालय बने पचपन वर्ष हो गये हैं लेकिन न प्रचार्य के लिए आवास बना, न चपरासियों के लिए। प्राचार्य ‘किंग जार्ज कारोनेसन हाईस्कूल’ के प्रधनाध्यापक के लिए बने मकान में जी.आई.सी. परिसर में रहते हैं। जब महाविद्यालय का भवन बनाते समय कुछ निर्माण सामग्री बच गई तो प्राचार्य डाॅ. छैलबिहारी लाल गुप्ता ने तत्कालीन पिथौरागढ़ के डी.एम. गोबिन्द डबराल से आग्रह कर ठेकेदार श्री रौतेला को पाँच क्वार्टरों के लिए लीज में भूमि दिलायी और डिग्री कालेज रोड में पंचकुटी अस्तित्व में आयी। डी.एम., ठेकेदार और प्राचार्य के बीच एक ‘डील’ बनायी गई कि पंचकुटी में विज्ञान के विभागाध्यक्षों को सीनियर्टी के आधर पर प्राचार्य पंचकुटी में अलाट करता रहेगा और रु. 75/- किराये के रूप में ठेकेदार को मिलेंगे। आज स्थिति यह है यथासम्भव सुविध शुल्क लेकर एक क्वार्टर प्राथिमक शिक्षक संघ के नेता को और एक जीआईसी के एलटी ग्रेड के अध्यापक को दे दिया गया है।
डिग्री कालेज की और भी अनेक समस्यायें हैं। उनके समाधन के लिए अवकाश प्राप्त प्रोफेसरों ने ‘डिग्री कालेज वेलपफेयर एसोसिएशन’ बनाया है। राजकीय महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य डाॅ. हरीश चन्द्र जोशी जी को अध्यक्ष बनाया गया है। डाॅ. हीरा बल्लभ खर्कवाल उपाध्यक्ष, डाॅ.लच्छी लाल वर्मा सचिव, डाॅ. मदन चन्द्र भट्ट कोषाध्यक्ष, डाॅ.परमानन्द चैबे सम्वाददाता और श्रीमती भागीरथी भट्ट महिला उपाध्यक्ष बनायी गई हैं। कार्यकारिणी में डाॅ.त्रिलोचन जोशी, प्रो. के.के.भट्ट, श्रीमती देवकी फर्तयाल और डाॅ. शीतल सिंह भण्डारी रखे गये हैं। सदस्यता शुल्क एक सौ रुपये प्रतिमाह रखा गया है ताकि प्रतिनिधि मण्डल समय-समय पर देहरादून भेजे जा सकें। इस एसोसिएशन की मासिक बैठक रामाश्रय-1, मालूशाही कालोनी, पिथौरागढ़ के सुमेरू संग्रहालय हाल में माह के अन्तिम रविवार को चार बजे से छः बजे तक होगी।

पिघलता हिमलाय 10 सितम्बर 2018 अंक से

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