तिब्बत के दर्चिन में थी हमारी छोटी सी दुकान

कैप्टन रतन सिंह टोलिया से बातचीत

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
यदि लगन हो तो हम किसी भी कार्य में सफलता पा सकते हैं और समाज में योगदान लायक बन सकते हैं। पहले जब साधन नहीं थे, लोग ज्यादा परिश्रम करते थे। उनका श्रम उन्हें लक्ष्य तक पहँुचाता। ऐसे ही श्रमशील परिवार के सदस्य हैं 79 वर्षीय कैप्टन रतन सिंह टोलिया। मूल रूप से टोला, जोहार के टोलिया जी का जन्म भैंसकोट ;नाचनी के निकटद्ध में हुआ था। इनके पिता जीत सिंह जी 6 भाई हुए- मानसिंह, किशनसिंह, नैनसिंह, जीतसिंह, हयातसिंह माधे सिंह। अपने इलाके में 32 लोगों का संयुक्त परिवार मुख्यतः व्यापारियों का परिवार था। तिब्बत व्यापार के साथ आन्तरिक व्यापार के लिये परिवार के बुजुर्गों ने मजबूत नींव डाल रखी थी।
जोहार नगर, भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी निवासी रतन सिंह जी अपने बचपन का स्मरण करते हुए बताते हैं कि माइग्रेसन में उनका स्कूल भी साथ-साथ चलता था। भैंसकोट, साईं, टोला में उनका प्राइमरी स्कूल चलता था। कक्षा चार की पढ़ाई नाचनी में दी, पंडित बासुदेव जी ने परीक्षा ली थी। मीडिल की पढ़ाई शेर सिंह टोलिया के संरक्षण में डीडीहाट से की। वह बताते हैं- ‘‘कक्षा आठ की पढ़ाई करके अपने ग्राम टोला गया था। व्यापारी परिवार का होने के कारण बड़े व्यापार में जुटो, तिब्बती भाषा का ज्ञान भी लो। मेरा मन पढ़ाई का था। एक दिन घर के सब सयानों के सामने मैंने झोला पकड़ा और जाने की बात करते हुए निकल पड़ा। टोला से पैदल बोगड्यार पहुंच कर रात काटी। शान्त एकान्त रात में डाक लिया हलकारा पहुंचा, वही मेरा साथ था। अगले दिन बरम रुका और फिर नारायण नगर पहुंच गया। जहाँ मेरे मित्र दलजीत सिंह वृजवाल ;स्वतंत्राता सेनानी त्रिलोक सिंह के सुपुत्र और भीमसिंह वृजवाल ;पांखू में निवास कर रहे हैं। मिल गये। नारायणनगर से हाईस्कूल किया’
रतन सिंह जी का सन् 1954 में नानासेम मुनस्यारी के माधो सिंह पांगती की सुपुत्री नन्दा से विवाह हुआ।
टोलिया जी व्यापार के पुराने दिनों की बताते हैं- ‘‘सन् 1954 में पिता के साथ तिब्बत गया। दर्चिन में हमारी छोटी सी दुकान थी। 2-3 माह के लिये वहाँ जाया करते थे। हमारे तिब्बती मित्रा व्यापार के लिये इन्तजार करते थे। दर्चिन में अपनी दुकान से आगे तिब्बती मित्र के गोम/घर वहाँ जाकर उन काटने का काम भी किया। उनका टैंट वाला घर चवर गाय के वालों का बना था, जो गर्म था। वहाँ से उन लेकर अपनी दुकान पर लौटा। बाद में सामान जमा होते ही हम लोग टोला वापस आ गये।’’
व्यापार के इस अनुभव के बाद रतन सिंह पुलिस में भर्ती हो गये। इनके ताउ रतन सिंह टोलिया ने देहरादून में इन्हें भर्ती में मदद की। लेकिन इस समय सन् 55-56 में एक दिन इन्हें टेलीग्राम आया कि पिता जीतसिंह और बड़े भाई उमराव सिंह लकड़ी काटने गये थे, भूस्खलन से मौत हो गई है। इस दुखभरे समाचार के बाद टोलिया जी नौकरी छोड़ घर आ गये। बाद में नौकरी की तलाश में निकले और चकराता में पफौज के एक धर्मगुरु से भेंट हुई। गोरखा बटालियन में कर्नल मानसिंह से उन्होंने रतन सिंह के बारे में बताया और यह भर्ती हो गये। सिपाही से भर्ती होेकर अथक श्रम करते हुए प्रमोशन पाने वाले टोलिया जी बटालियन के ट्रेनिंग सेंटर में शिक्षक की भूमिका में भी रहे। सन् 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई के समय इनकी तैनाती स्यालकोट थी। अपने परिवार के साथ यह लोग स्यालकोट थे। ट्रेनिंग के बहाने इन्हें युद्ध में भेज दिया गया। इनका और इनके जैसे अन्य फौजियों के परिवारों ने काफी नजदीक से सीमा पर गोलाबारी की आवाजें सुनी और धुंआ देखा। इनकी कार्यशैली को देखते हुए आनरेरी कैप्टन के रूप में इन्हें सम्मान मिला। टोलिया जी अपनी यादों के साथ स्वस्थ्य रहें, कामना है।

पिघलता हिमालय 17 सितम्बर 2018 से

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