गुरुजनों ने जीवन संवार दिया

नारायण सिंह मर्तोलिया से बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
आज जब हम शिक्षा और शिक्षकों की बात करते हैं तो बाजार का कुरूप चित्र दीमांग में बनने लगता है। वैसा बाजार जिसमें किसी को कोई सुनवाई नहीं होती। पैसे के बल पर लेन-देन। किसी को किसी के भविष्य की चिन्ता नहीं। लेकिन असल गुरुजनों का मान-सम्मान हमेशा रहेगा। गुरु की भूमिका अपने शिष्यों को आगे बढ़ाने में पहले होती है। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है। यहाँ पर नारायण सिंह मर्तोलिया जी से उनकी शिक्षा और बचपन की यादों के साथ गुरुजनों की भूमिका पर बातचीज के आधर पर प्रस्तुति है-
मुनस्यारी के मिनाल ग्राम के उमेद सिंह के परिवार से यह कहानी शुरु होती है। उनके दो पुत्र  नारायण सिंह, धरम सिंह हुए। ग्रामीण परिवेश का सीध सरल परिवार अपनी दिनचर्या में रहता। वह ग्राम जिसमें मर्तोलियाओं के कई परिवार रहते थे अब अधिकांश हल्द्वानी आकर बस चुके हैं। जब नारायण सिंह हाईस्कूल में पढ़ रहे थे, उनके पिता का निधन हो गया। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी सहित अपनी पढ़ाई का दबाव इनपर था।  ग्राम्य जीवन के घोर श्रम में नारायणसिंह मर्तोलिया ने इण्टरमीडिएट किया। इस बीच पालीटेक्निक के लिये बाहर चले गये लेकिन मौसम और स्वास्थ्य के साथ न देने से वह मुनस्यारी अपने गाँव लौट आए। घर की स्थिति-परिस्थिति देखते हुए 1967-68 में अध्यापन का कार्य किया। उसके बाद भारतीय पोस्टल विभाग में आ गये।
नारायण सिंह जी अपने जीवन में अपने गुरुजनों का हमेशा स्मरण बनाये रखते हैं और कहते हैं कर्मठ, ईमानदार और परिस्थितियों को जानने वाले वैसे गुरुजनों का मिलना दुर्लभ है। अतीत को याद करते हुए मर्तोलिया जी बताते हैं कि खेतीबाड़ी, पशुपालन का काम ग्राम्य जीवन का पहला हिस्सा होता है। इसके अलावा निजी संघर्ष लगे रहते हैं। वह बताते हैं- ‘‘जब मैं लखनउ से अस्वस्थ्य होकर मुनस्यारी आ चुका था और एक दिन बाजार में टहल रहा था। कवीन्द्र शेखर उप्रेती ने मुझे बुलाया और कहा- 6, 7, 8 में पढ़ाने के लिये कोई नहीं है। तुम जिला विद्यालय निरीक्षक पिथौरागढ़ को मिलो। मैं पत्र बनवाता हूं कि जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं हो जाती है तब तक पढ़ाई के लिये इन्हें अस्थायी रूप से रख दिया जाए। विद्यालय के हैड क्लर्क रमेश उप्रेती जी ने पत्र बनाया। उस पत्र को लेकर मैं पैदल तेजम गया और अगले दिन पिथौरागढ़। सरकारी कार्यालयों की प्रणाली से मैं परिचित नहीं था अतः दो दिन तक चक्कर लगाता रहा। इसके बाद किसी तरह मेरी अस्थायी नियुक्ति का पत्र बन गया।’’ मर्तोलिया जी कहते हैं कि गुरुजनों को अपने शिष्यों का पूरा ध्यान रहता था और वह पग-पग पर मार्गदर्शन करते थे। वह विजय सिंह पांगती जी को भी अपना गुरु मानते हैं, जिनके कहने पर वह डाक विभाग से जुडे़।
मर्तोलिया जी सामने शिक्षा और डाक में से एक विभाग चुनने का अवसर था। विजय सिंह जी ने इन्हें समझाया कि शिक्षा में फिलहाल तो लग चुके हो लेकिन अस्थायी व्यवस्था में न जाने कब तक रहना पड़े। डाक विभाग में जाओ। इसके बाद नारायण सिंह आगरा में पोस्ट क्लर्क बन गये। 1974 में परीक्षा पास करते हुए प्रमोशन की प्रक्रिया में मुनस्यारी आए। अपने गाँव के नारायण को पोस्टआफिस में साहब बनकर आता देख ग्रामीण खुश थे। राजकाज में इधर-उधर तो जाना ही होता है। इसके बाद मर्तोलिया जी पिथौरागढ़, कर्णप्रयाग, बेरीनाग, जलौन कानपुर, इटावा होते हुए शहजहांपुर हैड पोस्टमास्टर बने और कुछ दिन हल्द्वानी भी रहे। इनकी कार्यदक्षता और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए आसाम भेज दिया गया। 1990-92 तक असम में अध्ीक्षक रहने के बाद यूपी के सहारनपुर, बरेली, बदांयू रहे। लखनउ, हरिद्वार सहित देहरादून में सेवा की। 31 मई 2009 को सहा. पोस्ट मास्टर जनरल उत्तराखण्ड के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद हल्द्वानी के दुर्गेश कालोनी में रह रहे हैं। इनके सुपुत्र जीतेन्द्र मर्तोलिया भी पोस्टल डिपार्टमेंट में हैं और अपनी कला-संस्कृति के लिये समर्पित हैं। पुत्र विनोद मर्तोलिया और जगदीश मर्तोलिया भी पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ अपने कर्मक्षेत्र में हैं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े इस परिवार को शुभकामनाएं।

‘तरकेब’ लगाकर होती थी हरि प्रदर्शनी

गोविन्द सिंह जंगपांगी

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त के महान स्वतंत्रता सेनानी हरिसिंह जंगपांगी की याद में प्रतिवर्ष होने वाली प्रदर्शनी इस बार भी नवम्बर में होगी। इस प्रदर्शनी को आजादी के बाद से लगातार मल्लादुम्मर मुनस्यारी में मनाया जा रहा है। इसे बनाये रखने में क्षेत्रावासियों की श्रद्धा और लगन है। प्रदर्शनी के शुरुआती दिनों में जब कोई साधन नहीं थे ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर लोग जुटते थे। उन पुरानी यादों को बताने के लिये 69 वर्षीय गोविन्द सिंह जंगपांगी जी से बातचीत के बाद यह प्रस्तुति है-
जंगपांगियों का गाँव बुर्फू में हुआ। बूबू पद्मसिंह के पुत्रा हुए मान सिंह, पान सिंह और विजय सिंह। इन्हीं मान सिंह के पुत्र हैं- गोविन्द सिंह और मंगल सिंह। विजय सिंह के पुत्र हैं- शेरसिंह और माधे सिंह। पिता मानसिंह माता चन्द्रा जंगपांगी के घर बुर्फु में जन्मे गोविन्द सिंह ने जीवन के कष्टकर दिनों को बचपन में गुजारा है। छोटी उम्र में पिता के निधन के बाद मामा जी संरक्षण में शुरुआती शिक्षा गढ़वाल में हासिल की। लौटकर मुनस्यारी में फिर अल्मोड़ा से शिक्षा ली। 1971 में आर्मी में भर्ती होने के बाद आठ साल नौकरी की और ओंरिएटल इंश्योरेंशन में सेवा के लिये आ गये। यहीं से मण्डलीय प्रबन्धक पद से 2009 में सेवानिवृत्त हुए।
जंगपांगी परिवार भी सीमान्त के अन्य परिवारों की भांति माइग्रेशन में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहे हैं। इनका परिवार बुर्फू, मल्लादुम्मर और भकुंडा;नाचनी के पास में क्रमवार रहता था। अपनी लगन और परिश्रम से मुकाम हासिल करने वाले गोविन्द सिंह जी का विवाह जोहार की महान विभूति रामसिंह पांगती की नातिनी तारा से हुआ। श्रीमती तारा जंगपांगी अध्यापिका होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में शुरु से ही बेहद अभिरुचि रखती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद यह दम्पत्ति जोहार नगर, हल्द्वानी में निवास कर रहा है और दुम्मद की हरिप्रदर्शनी सहित सभी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय है
अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए गोविन्द सिंह जी बताते हैं कि साधन नहीं के बराबर थे लेकिन हरि प्रदर्शनी का उत्साह लोगों में बहुत था। इलाके की एकमात्र अलग तरह की इस प्रदर्शनी में लोग ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर जुट जाते थे। तब लगभग सभी परिवारों के पास तरकेब हुआ करते थे, क्योंकि मल्लाजोहार से लेकर गर्म घाटी तक यात्रा करते समय इनकी आवश्यकता होती है। पुराने लोगों में प्रेम सिंह जंगपांगी, नरसिंह जंगपांगी का नाम उल्लेखनीय है। सक्रियता की इस परम्परा को महेन्द्र सिंह ‘महन्त’ जंगपांगी ने भी निभाया। पुराने समय में नेत्र सिंह ल्वाल सांस्कृतिक प्रस्तुति और बच्चों को सिखाने के लिये आते थे। बम्मई में रहकर शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे नेत्रसिंह जी प्रत्येक वर्ष इस मौके पर दुम्मर आते थे। उनके भाई प्रताप सिंह भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में साथ देते। प्रदर्शनी के लिये घरेलू उत्पादों का बहुत सामान आता रहा है। श्री जंगपांगी चाहते हैं कि परम्परा बन चुकी यह प्रदर्शनी हमेशा चलती रहे और नई पीढ़ियां इससे सीखें।

रामसिंह जागरुक जनों की धुरी थे, एनटीडी अल्मोड़ा को बनाया केन्द्र

लक्ष्मण सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
जोहार के इतिहास-भूगोली की समग्र जानकारी के लिये याद किये जाने वाले रामसिंह पांगती के बारे में पिघलता हिमालय डाॅ.आर.एस.टोलिया का कालम नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है। इस अंक में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया जा रहा है। परिवार के वरिष्ठ सदस्य लक्ष्मण सिंह पांगती से बातचीत के आधार पर यह जानकारियां हैं। 80 वर्षीय लक्ष्मण सिंह पांगती भी हमेशा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने मिडिल मुनस्यारी से करने के बाद हाईस्कूल अल्मोड़ा से किया। आईबी में नौकरी करते हुए नैनीताल, इलाहाबाद, लेह-लद्दाख, लखनउ रहे। असि0डायरेक्टर आईबी से सेवानिवृत्त होकर अब हल्द्वानी में रह रहे हैं। अपनी सरकारी सेवा के दौरान भी सामाजिक मेल-मिलाप में रहने वाले लक्ष्मण सिंह जी ने लखनउफ में काफी समय व्यतीत किया और पहाड़ की संस्कृति से युवाओं को जोड़ने के लिये लेखन भी करते रहे। पिघलता हिमालय में भी आपके द्वारा लेख व उपयोगी सामग्रियां उपलब्ध् करवाई गई।
पिता रामसिंह पांगती व माता हिरमा देवी के कनिष्ठ पुत्रा लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि उनके पिता ने परिवार से ज्यादा समय समाज के लिये दिया। रामसिंह जी जागरुक जनों की धुरी थे, उन्होंने सीमान्त क्षेत्रा के लोगों को मदद के लिये एनटीडी अल्मोड़ा में केन्द्र बनाया। 8 जून 1884 को राडागाडी तहसील मुनस्यारी में जन्मे रामसिंह मिडिल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और 17 अगस्त 1906 में सर्वे आपफ इण्डिया देहरादून में सर्वेयर के पद पर नियुक्त हुए। कुछ वर्षों बाद नौकरी भी छोड़ दी। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आन्दोलन चलाने के साथ ही कई पुस्तकें उन्होंने लिखी। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में- जोहार का इतिहास व वंशावली ;सन् 1936 ई.द्ध, आत्म कहानी, स्त्री शिक्षा ;1910द्ध, जोहारीय उपकारक;भाग 1, भाग 2द्ध हैं। हस्तलिखित पुस्तकों में- होली का अखबार ;सन् 1935, महिला सुधर ;जोहारी बोली में 1936द्ध, देशोपकारक ;जिसमें शौका सेवक मण्डल, जोहार पंचायत, सुधरकों को आदेश, अछूतोद्धाार और मनोभिलाषा शामिल हैद्ध, भूत शंका निवारण है। इन दिनों उनकी हस्तलिखित पुस्तकों के आधर पर जोहारी बोली में ‘छितकू की कथा एवं ऐतिहासिक कथाएं’ पुस्तक तैयार हो रही है। पिता जी ने अल्मोड़ा के लाला बाजार में दुकान भी ले ली थी लेकिन वह नहीं कर सके। रामसिंह जी ने जोहार उपकारिणी महासभा, जोहार सोसाइटी ;सम्वत 1969, नौजवान पांगती पुस्तकालय, जोहार कांग्रेस मण्डल सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं के गठन में सक्रिय सहयोग दिया। महिला उत्थान के लिए 1900 से ही प्रयास करते रहे। बाल विवाह, कन्या विक्रय, अशिक्षा व महिलाओं में पर्दे का प्रचलन रोकने के लिए प्रचार तथा प्रयास किया। 1910 में महिलाओं में जागृति के लिए स्त्रीशिक्षा नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। 12 जुलाई 1951 को जोहार भवन, नारायण तेवाड़ी देवाल ;एनटीडी अल्मोड़ा में उनका निध्न हुआ था।
इस पांगती परिवार की बात करें तो सोबन सिंह, रामसिंह और नरसिंह तीन भाई थे। दरकोट में रहते हुए इन्होंने मुनस्यारी में शान्तिकुन्ज में आसियाना बनाया। शान्तिभवन नाम से बने आवास में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और वंशावली तैयारी के लिये दूर-दूर से लोग आते थे। जागरुक जनों की बैठकें और सामाजिक चेतना के लिये बनने वाली रणनीति के बीच परिवार के छोटे बच्चे लोकरंग में रंगते हुए काफी जागरुक हो चुके थे। रामसिंह के परिवार में पुत्र-पुत्री- मोहनसिंह, उत्तमसिंह, गोविन्द सिंह, तुलसी देवी, लक्ष्मण सिंह हुए। यही वंशावली आगे बढ़ते हुए मोहन सिंह परिजनों में कमला, राजकुमारी पांगती, हरीश, भगवान, राजेन्द्र सिंह। उत्तम सिंह जी के परिजनों में मुन्नी देवी, तारा जंगपांगी, पूरन सिंह। तुलसी रावत के पति श्रीराम सिंह रावत जी हैं। लक्ष्मण सिंह के पुत्र- जयन्त व तनुज पांगती।

पिघलता हिमालय 29 अगस्त 2016 अंक से

तिब्बत के दर्चिन में थी हमारी छोटी सी दुकान

कैप्टन रतन सिंह टोलिया से बातचीत

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
यदि लगन हो तो हम किसी भी कार्य में सफलता पा सकते हैं और समाज में योगदान लायक बन सकते हैं। पहले जब साधन नहीं थे, लोग ज्यादा परिश्रम करते थे। उनका श्रम उन्हें लक्ष्य तक पहँुचाता। ऐसे ही श्रमशील परिवार के सदस्य हैं 79 वर्षीय कैप्टन रतन सिंह टोलिया। मूल रूप से टोला, जोहार के टोलिया जी का जन्म भैंसकोट ;नाचनी के निकटद्ध में हुआ था। इनके पिता जीत सिंह जी 6 भाई हुए- मानसिंह, किशनसिंह, नैनसिंह, जीतसिंह, हयातसिंह माधे सिंह। अपने इलाके में 32 लोगों का संयुक्त परिवार मुख्यतः व्यापारियों का परिवार था। तिब्बत व्यापार के साथ आन्तरिक व्यापार के लिये परिवार के बुजुर्गों ने मजबूत नींव डाल रखी थी।
जोहार नगर, भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी निवासी रतन सिंह जी अपने बचपन का स्मरण करते हुए बताते हैं कि माइग्रेसन में उनका स्कूल भी साथ-साथ चलता था। भैंसकोट, साईं, टोला में उनका प्राइमरी स्कूल चलता था। कक्षा चार की पढ़ाई नाचनी में दी, पंडित बासुदेव जी ने परीक्षा ली थी। मीडिल की पढ़ाई शेर सिंह टोलिया के संरक्षण में डीडीहाट से की। वह बताते हैं- ‘‘कक्षा आठ की पढ़ाई करके अपने ग्राम टोला गया था। व्यापारी परिवार का होने के कारण बड़े व्यापार में जुटो, तिब्बती भाषा का ज्ञान भी लो। मेरा मन पढ़ाई का था। एक दिन घर के सब सयानों के सामने मैंने झोला पकड़ा और जाने की बात करते हुए निकल पड़ा। टोला से पैदल बोगड्यार पहुंच कर रात काटी। शान्त एकान्त रात में डाक लिया हलकारा पहुंचा, वही मेरा साथ था। अगले दिन बरम रुका और फिर नारायण नगर पहुंच गया। जहाँ मेरे मित्र दलजीत सिंह वृजवाल ;स्वतंत्राता सेनानी त्रिलोक सिंह के सुपुत्र और भीमसिंह वृजवाल ;पांखू में निवास कर रहे हैं। मिल गये। नारायणनगर से हाईस्कूल किया’
रतन सिंह जी का सन् 1954 में नानासेम मुनस्यारी के माधो सिंह पांगती की सुपुत्री नन्दा से विवाह हुआ।
टोलिया जी व्यापार के पुराने दिनों की बताते हैं- ‘‘सन् 1954 में पिता के साथ तिब्बत गया। दर्चिन में हमारी छोटी सी दुकान थी। 2-3 माह के लिये वहाँ जाया करते थे। हमारे तिब्बती मित्रा व्यापार के लिये इन्तजार करते थे। दर्चिन में अपनी दुकान से आगे तिब्बती मित्र के गोम/घर वहाँ जाकर उन काटने का काम भी किया। उनका टैंट वाला घर चवर गाय के वालों का बना था, जो गर्म था। वहाँ से उन लेकर अपनी दुकान पर लौटा। बाद में सामान जमा होते ही हम लोग टोला वापस आ गये।’’
व्यापार के इस अनुभव के बाद रतन सिंह पुलिस में भर्ती हो गये। इनके ताउ रतन सिंह टोलिया ने देहरादून में इन्हें भर्ती में मदद की। लेकिन इस समय सन् 55-56 में एक दिन इन्हें टेलीग्राम आया कि पिता जीतसिंह और बड़े भाई उमराव सिंह लकड़ी काटने गये थे, भूस्खलन से मौत हो गई है। इस दुखभरे समाचार के बाद टोलिया जी नौकरी छोड़ घर आ गये। बाद में नौकरी की तलाश में निकले और चकराता में पफौज के एक धर्मगुरु से भेंट हुई। गोरखा बटालियन में कर्नल मानसिंह से उन्होंने रतन सिंह के बारे में बताया और यह भर्ती हो गये। सिपाही से भर्ती होेकर अथक श्रम करते हुए प्रमोशन पाने वाले टोलिया जी बटालियन के ट्रेनिंग सेंटर में शिक्षक की भूमिका में भी रहे। सन् 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई के समय इनकी तैनाती स्यालकोट थी। अपने परिवार के साथ यह लोग स्यालकोट थे। ट्रेनिंग के बहाने इन्हें युद्ध में भेज दिया गया। इनका और इनके जैसे अन्य फौजियों के परिवारों ने काफी नजदीक से सीमा पर गोलाबारी की आवाजें सुनी और धुंआ देखा। इनकी कार्यशैली को देखते हुए आनरेरी कैप्टन के रूप में इन्हें सम्मान मिला। टोलिया जी अपनी यादों के साथ स्वस्थ्य रहें, कामना है।

पिघलता हिमालय 17 सितम्बर 2018 से

वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ.पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल का आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीन भाई बहन ;पंकज, ध्ीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे भवाली सेनेटोरियम में भर्ती करवाना पड़ा। ईजा की बीमारी के समय दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। पहाड़ टूट पड़ा था। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा ;दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपने जीवन संग्राम में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई ध्ीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा फिर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। पिफर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और टेªेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना पराया क्या होता है………..।
मुपफलिसी में दवाईयों तक को पैसे नहीं होते थे लेकिन अखबार निकालना प्रतिब(ता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज ढंग से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आधे रास्ते से लौट कर आई हँू।’’ संघर्षों के इन घोर दिनों को कई जगह किराये के मकान में हमने काटा। इसके अलावा ‘शक्ति प्रेस’ तो हमारा केन्द्र ही रहा। इस पुराने मकान में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेस वार्ता, जुलूस-आन्दोलन वालों की भीड़, बच्चों की पढ़ाई और संगीत सबकुछ एकसाथ चलता रहता था। ईजा का शरीर रोग से घिर चुका था लेकिन उसने संघर्ष नहीं छोड़ा। अपनी और अपने परिवार की परेशानियों के बावजूद वह पिता जी के साथ बराबर की हिस्सेदार थी। बैठकों में भाग लेना, अखबार की तैयारी, आने-जाने वालों का तांता सबकुछ मेला सा लगा रहता था। इतना ही नहीं, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में हमारा शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के कौने-कौने से आने वाले ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों को ईजा अच्छी तरह पहचानती थी। घर में रोटी की समस्या बनी रहती लेकिन ईजा-बाबू के लिये आन्दोलन और अखबार जरूरी था। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के आन्दोलन में ईजा ने कई बसों के सीसे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के सीसे तोड़ने को खेल मानकर तोड़ डालते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग अड्डे से जुड़ चुके थे और वह बस अड्डे को वहीं रखना चाहते थे जहाँ पर हमारा छापाखाना था। उन्होंने लोभ भी दिया कि टिकट बुक आपके छापेखाने में ही छपवायेंगे। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में एसपी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके सीसे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। बीमार ईजा ने मेले के झण्डे तक सिले थे। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्धजनों की बैठक वहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में सार्टहैंड भी सीखा। गायत्री परिवार के अभियान में जुड़कर उन्हें सहयोग किया। ईजा को राजनैतिक पार्टियों की ओर से लगातार पार्टी में शामिल होने के निमंत्राण मिलते रहे लेकिन वह कभी किसी से नहीं जुड़ी। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लखनउ में ईजा को पार्टी से जुड़ने का निवेदन किया लेकिन वह टाल गई। कठोर संघर्षों के बाद एक दिन हमारा छोटा सा घोंसला बना और सारा परिवार एकजुट हो गया। जैसे-तैसे हम भाई-बहिन ने भी अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली। बीच-बीच में बीमारी का सफर भी चलता रहता। सन् 2004 में हल्द्वानी में हमने अपना एक आशियाना बना लिया था- जे.के.पुरम् छोटी मुखानी हल्द्वानी में। इस छोटे से मकान में अपनी नई-पुरानी यादों के साथ पड़ाव डाल दिया। सालों साल की परेशानी के बाद पटरी में आते परिवार को झटका लगा लगा जब बाबू आनन्द बल्लभ जी 22 पफरवरी 2013 को अचानक चल दिये। उनके निधन के 6 माह में ईजा को फालिश/लकवा पड़ गया। अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद ईजा अपने पैरों में खड़ी कर दी गई लेकिन पहले से ही कमजोर शरीर के कारण वह अस्पताल-दवाईयों से बधी रही। इतने के बाद भी ईजा तो ईजा थी। उसकी उपस्थिति हमारे लिये सबकुछ था। 15 सितम्बर 2018 को प्रातः उसने प्राण त्याग दिये। उसे अहसास हो गया था अपने जाना का। सच्चाई की यह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी……

आशा सिंह रावत ने कन्योटी के जोशी परिवार से डोटिला में खरीदी थी भूमि

शेर सिंह रावत से बातचीत

डाॅ.पंकज उप्रेती
आज भारत-चीन व्यापार और कैलास मानसरोवर यात्रा का बहुत हल्ला करने के बाद गिनती भर के लोग सरकारी निगरानी में सीमा पार यात्रा कर पाते हैं। पहले जब सीमाओं के ये बन्धन इतने जटिल नहीं थे, भारत-चीन युद्ध नहीं हुआ था, तिब्बत तक स्वतंत्रत आना-जाना था, धर्मिक यात्राी कैलास-मानसरोवर तक जाते थे, तब के व्यापार और यात्रा का स्वरूप कितना शुरु रहा होगा वह प्रसंग सुनकर नई पीढ़ी परीलोक की सी कहानी मानती है। वाकेई उस दौर के प्रसंग आलौकिक यात्राओं के ही थे और दुरुह में भी यात्राओं का अपना भोलापन था। व्यापार होते हुए भी प्रकृति के साथ नियमों की पालना थी। दुनिया के देश एक-दूसरे पर झपटने लगे, युद्धों का प्रभाव अतिआध्ुनिक तकनीक के साथ होने लगा। तिब्बत चीन ने कब्जा लिया और भारत पर हमला। चीन युद्ध के बाद भारत-तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और दूर-दूर तक पैदल यात्रा करने वाले सीम के व्यापारी जो जहाँ थे, वहीं ठहर गये। माइग्रेशन की बहुत सी परम्पराएं भी सिमट कर रह गई। व्यापार के उन पुराने दिनों में जोहार से मुनस्यार, गिरगांव, रौछाल-क्वीटी, शामा होते हुए भी रुट था और लोगों का आना-जाना था। तब जलद के आशा सिंह रावत ने कन्योटी ग्राम सभा ;अब बागेश्वर जिले में के जोशी परिवार से डोटिला में भूमि खरीदी थी। और व्यापार बन्द होने के बाद रावतों के परिवार यहाँ रहने लगे। वर्तमान में नौकरी या अन्य कारणों से भी ये परिवार शहरों में रहने लगे हैं। डोटिला ग्राम खाली सा हो चुका है।
इसी डोटिला ग्राम में जन्मे 80 वर्षीय शेर सिंह रावत बताते हैं कि करीब सन् 1957 में उनके दादा आशा सिंह रावत ने कन्योटी में भूमि खरीदी। यह डोटिला तोक में है। जलद के रावत परिवार यहाँ पर रहते हैं। पिता दौलत सिंह, दुर्गा सिंह, बाला सिंह के दादा, प्रकाश सिंह के पिता महेन्द्र सिंह, खुशाल सिंह कई नाम स्मृतियों में हैं। भरा-पूरा गाँव था डोटिला। माइग्रेशन में इधर से उधर जाने के दिनों में शेर सिंह जी ने प्राइमरी की पढ़ाई कपकोट से ही की। वह बताते हैं कि यात्रा के उस कठिन समय से पढ़ाई भी अनियमित हो जायाकरती थी। दरकोट ;मुनस्यारीद् में वह पढ़ते थे। स्कूल में वासुदेव जी अध्यापक थे तो जाड़ों में तेजम और वर्षा में मिलम जाते थे। माइग्रेशन के हिसाब से स्कूल भी चलते थे। शेर सिंह जी जब मीडिल में पढ़ते थे, उनके परिवार ने मिलम जाना छोड़ दिया गया। उस समय विद्यानन्द सरस्वती ने तिकसैन, मुनस्यारी में एक स्कूल शुरु किया था।

श्री रावत बताते हैं कि बड़े भाई खुशाल सिंह रावत इस विद्यालय में हैडमास्टर बनकर आये। हिन्दी के लिये कपकोट के शास्त्राी जी थे। लोहाघाट के घनानन्द जोशी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। कक्षा आठ तक तिकसैन में पढ़ाई की। पिफर यह स्कूल नमजला में शिफ्रट हो गया, बाद में कन्या विद्यालय बना। वह बताते हैं कि जिला बोर्ड के हाथ में चले जाने के बाद वह लोग पिफर से पढ़ाई के लिये कपकोट आ गये। उनके साथ दुर्गासिंह रावत थे। लाछुली वाले भवानसिंह-उदयसिंह शामा पढ़ने गये जबकि तेजम वाले ध्रम सिंह-गोकरणसिंह अल्मोड़ा आ गये। इस प्रकार जलद, लाछुली और तेजम के 6 युवा रावत अलग-अलग जगह गये। कपकोट से हाईस्कूल, अल्मोड़ा से इण्टर करने के बाद नैनीताल से पढ़ाई की।

शेरसिंह जी बताते हैं- ‘हमसे पहले गोविन्द सिंह पांगती ने गणित से बीएससी की, जो फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी थे। नैनीताल के बाद लखनउ एमए करने चला गया, खुशाल सिंह भी बीए करने के लिये साथ में थे। तीन साल लखनउफ में रहते हुए पी-एचडी के लिये तैयारी की लेकिन 1959 में बीडीओ के के लिये चयन हो गया। पहली नियुक्ति जखोली;टिहरी में हुई। चार-पांच साल बाद ताड़ीखेत;रानीखे. आया। वह दौर था जब चन्द्रभानु गुप्त मुख्यमंत्राी हुआ करते थे और रानीखेत उपमण्डल में तो रामदत्त पाण्डे-देवकीनन्दन पाण्डे की तूती बोलती थी। लेकिन उस समय की राजनीति व नेता आजकल की तरह नहीं थे। श्री रावत बताते हैं कि 1969 में संघ लोक सेवा आयोग के विज्ञापन इण्डियन इकाॅनमिक सर्विस के लिये पफार्म भर दिया था। बीडीओ की नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उनका चयन हो गया। आईएएस प्रोवेजनल में दो साल तक कई जगह पोस्टिंग हुई और सीखने को मिला। भोपाल ;म0प्र0 में प्लानिंग कमीशन में रहा। बाद में सिविल सप्लाई एण्ड काॅमर्स में डिप्टी डायरेक्टर होकर दिल्ली आया।’

रावत जी का विवाह स्वतंत्राता सेनानी और समाजसेवी ससखेत;थल निवासी नरसिंह जंगपंागी की पुत्र कमला देवी के साथ हुआ। जीवन के उत्तराद्ध में शेरसिंह-कमला रावत खट्टी-मीठी यादों के साथ अब हल्द्वानी में रह रहे हंै।

पिघलता हिमालय 18 जुलाई 2016 के अंक से

सीमान्त ग्रामों का विकास सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम से सम्भव

वाई.एस.पांगती

भारत सरकार ने सीमा क्षेत्र के विकास के लिये बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम चलाया है। सरकार की गाईड लाइन में स्पष्ट किया गया है कि सीमा क्षेत्रा में रहने वाले लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ग्रामवार प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, सड़क, बिजली, सम्पर्क मार्ग, नालियां, पीने का पानी आदि व रोजगार के साध्न उपलब्ध् कराने के लिये प्रस्ताव मांगकर उनको अन्तिम रूप देने के लिये खण्ड विकास कार्यालय के माध्यम से सम्बन्ध्ति विभागों को प्रशिक्षण करने के लिये भेजा जायेगा। यदि विभाग में गाँव की योजना पूर्व से प्लान में है तो सीध् विभाग द्वारा कार्यक्रम को संचालित करने के लिये प्लान में वजट पास करेगा और जो योजना प्लान में नहीं है उसको बी.ए.डी.पी. के माध्यम से प्रस्तावित करेगा।

इस प्रकार की योजनाओं को विकास खण्ड स्तरीय कमेटी बजट के अनुसार अनुमोदन हेतु जिला विकास कार्यालय के माध्यम से शासन को भेजेगा। शासन भारत सरकार मंत्रालय से अनुमोदन प्राप्त कर ग्रामों में योजनाओं का क्रियान्वयन करेगा। इस प्रकार की कमेटी के अध्यक्ष उपजिलाध्किारी, सचिव खण्ड विकास अध्किारी और सदस्य क्षेत्रा प्रमुख के अलावा विभागों के अध्किारीगण व चयनित ग्राम प्रधन व ग्राम पंचायत के अध्किारी सदस्य नामित हैं जो प्रत्येक त्रौमास में समीक्षा/बैठक करेंगे।

हमें यह भी जान लेना चाहिये कि केन्द्रीय गृह मंत्राी भारत सरकार द्वारा अभी हाल में ही जनपदवार बी.ए.डी.पी. की समीक्षा बैठक की गई। उनके द्वारा कहा गया कि सीमान्त में रहने वाले लोग देश के लिये सामरिक लिहाज से कापफी अहम हैं और सुरक्षा की भी अहम कड़ी हैं। जिसके कारण इन इलाकों के विकास को सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सरकार द्वारा देश के सीमावर्ती ग्रामों को माॅडल के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया है और भविष्य में बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम की आनलाइन मानीटरिंग  के साथ ही गाँवों के लिये चयनित योजनाओं को सीध्े आॅनलाइन सिस्टम में डालकर अनुमोदन, राज्य को बजट की अवमुक्त किया जायेगा।

पूर्व अनुभव के आधर पर बी.ए.डी.पी. योजनाओं के बजट का बन्दरबांट किया गया, जिसके कारण ग्रामों का समुचित विकास नहीं हो पाया है। जो चिन्ता का विषय है। जोहार के दुर्गम 14 ग्राम, धरचूला के दुर्गम ग्राम, चमोली, उत्तरकाशी के सीमान्त ग्रामों की टोह लेते हुए जागरुक हो जाना चाहिये। मल्ला जोहार में तो जितनी सुविध मिल पाई है उसका श्रेय मल्ला जोहार विकास समिति को जाता है, जो जागरुक रहकर कार्य कर रही है। यह जागरुकता प्रत्येक नागरिक में होनी चाहिये।

अपेक्षा है सभी लोग जागरुक रहकर विकास के लिये भागीदार होंगे। जिला विकास कार्यालय से सम्पर्क कर पूर्ण जानकारी लेकर बी.ए.डी.पी. के अन्तर्गत आने वाले गाँवों का समुचित विकास में योगदान करेंगे।

पिघलता हिमालय 30 जुलाई 2018 के अंक से

तुलसी देवी का उफनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
ग्वालदम। तुलसी देवी मर्तोलिया ऐसा नाम है जिसने उफनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उपेक्षित लोगों को अवसर दिलाने के लिये उन्होंने अपनों का विरोध् भी सहन किया था। इन्हीं तुलसी देवी की याद में आज मूर्ति स्थापित है और लोग उनकी कर्मठता को याद करते हैं।
अपनी पुरानी यादों के साथ बातचीत करते हुए 70 वर्षीय हीरा सिंह पंचपाल बताते हैं कि करीब 1936 में जोहार के व्यापारी गरुड़ में आकर रहने लगे। ठण्डे स्थान में रहने वाले इन व्यापारियों को गरुड़ में भी गर्म लगने लगा और 1946 में ग्वालदम आ गये। इसमें उनके नाना मोहन सिंह रावत भी थे, जो पौड़ी-चमोली जिले के सम्मानित व्यक्तियों में थे। पिता स्व.राजेश सिंह पंचपाल भी व्यापार के सिलसिले में यत्रा-तत्रा जाते थे। देवाल, वाण, थराली, नारायणबगड़ दूरस्थ क्षेत्रों तक तत्कालीन ढुलान का कारोबार इन लोगों के पास था। श्री पंचपाल बताते हैं कि उनकी बुआ जी बेटी तुलसी देवी के पति की भाबर में मृत्यु के बाद वह असहाय सी महसूस करने लगी थी। तब नाना मोहन सिंह जी उन्हें ग्वालदम ले आये और वह उफनी कारोबार करने लगी। तुलसी दीदी के साथ माँ गंगादेवी पंचपाल भी उफनी फैक्ट्री में सहयोगी थी। 1954 में यू.पी. स्मोल स्केल इंडस्ट्रीज में पांचवे नम्बर का रजिस्ट्रेशन इनकी पफैक्ट्री का ही था। तब उफनी कपड़ों का बहुत चलन था और गढ़वाल के दूर-दूर क्षेत्रों तक इनकी धक थी। तुलसी दीदी जिला बोर्ड की सदस्य के अलावा महिला कांग्रेस चमोली की संयोजिका थी। भारत सरकार के प्रोग्राम कल्याण विस्तार परियोजना के 16 स्थानों में चलने वाले स्कूलों को वह देखती थी। आगनबाड़ी में कताई-बुनाई जैसे कार्य भी सिखाये जाते थे। उस समय यह लोग अवैतनिक कार्यकर्ता होते थे। मात्रा यात्रा भत्ता इन्हें मिलता था।
तुलसी दीदी ने कई धर्मिक अनुष्ठान यहाँ करवाये। साथ ही उपेक्षित लोगों को आगे बढ़ाने के लिये जुटी रहीं। बच्चों की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर करने, ग्रामीणों को स्वावलम्बी बनाने, किसानों को कृषि औजार दिलाने जैसे कार्य में वह लगी रहती थी। 1985 में उन्होंने विद्याभारती संस्था को अपनी पफैक्ट्री दान कर दी, जिसमें आज सरस्वती स्कूल चल रहा है। 1985 में तुलसी देवी का निधन  हुआ। उनकी प्रेरणा से प्रेरित कई लोग आज काफी आगे हैं। ऐसी प्रेरणादायक की याद में स्कूल के पास ही उनकी मूर्ति स्थापित की गई है।
हीरा सिंह जी पुरानी शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्तायुक्त मानते हुए बताते हैं कि तब हर कोई नहीं पढ़ता था। लगनशील बच्चे आगे बढ़ते थे और श्रम करते थे। तब पढ़ाने वाले पण्डित जी बहुत कम मेहनताने में योग्य शिष्यों को तैयार करते थे। समाज का भी उत्तरदायित्व गुरु की ओर ध्यान देने का था। स्कूल जाते समय बच्चे एक लकड़ी जरुर ले जाते थे और गुरुजी की घर के पास डाल देते, ग्रामीण महिलाएं उनके घर की लिपाई-घिसाई कर देती, कोई घी-सब्जी देता, कोई पानी ला देता। यानी कि बड़े ही शुद्ध भाव से गुरु सेवा होती थी और गुरुजन भी समाज को बनाने और सुधरने के लिये समर्पित थे। उनकी इलाके भर में प्रतिष्ठा होती थी, वह स्कूल की छुट्टी के बाद गाँव में घूमकर बकायदा बच्चों के बारे में उनके माता-पिता से बातचीत करते थे। गुरुजी पिटाई भी बहुत करते थे, जो हमें सुधार के लिये ही थी।
पिघलता हिमालय 11 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित

कैलास मानसरोवर को जाने वाले परम्परागत मार्ग के सभी बगड़ रड़ रहे हैं

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

बागेश्वर। उत्तराखण्ड के विकास की कहानी कितनी कोरी है इसका एक उदाहरण कपकोट-विनायक-शामा रोड से पता चलती है। भराड़ी बाजार के बाद पिण्डारी रोड से कटने वाला यह मार्ग कैलास मानसरोवर का परम्परागत मार्ग रहा है लेकिन वर्तमान में इसमें सड़क निर्माण का सुस्त कार्य चल रहा है। दर्जनों गाँव सुविधओं के आभाव में उजाड़ होते जा रहे हैं। यह क्षेत्र बगड़ों का का है। ;नदी किनारे बसे इलाकों को बगड़ कहा जाता है। तिमलाबगड़, कासूबगड़, रीसाबगड़, खारबगड़, देबीबगड़, हरसिंगिया बगड़, डोटिलाबगड़ इत्यादि। यहाँ रेवती गंगा, गांसूगंगा, सरयूगंगा नदियां बहती हैं और इनके संगम स्थान पर तीर्थ है। ये सारे बगड़ रड़ ;बग रहे हैं। पिछली आपदा में तो खारबगड़ में आये मलवे से कापफी नुकसान हुआ था। नदी आर-पार के तमाम ग्रामों का मुख्य व्यवसाय कृषि है लेकिन किसी भी प्रकार की सुविधाओं के न होने से गाँव के गाँव खाली हो चुके हैं। खारबगड़ होते हुए विनायक को जाने वाले मार्ग पर इन दिनों कार्य हो रहा है किन्तु एकदुम दुर्गम के इस क्षेत्र में देखरेख न होने से कार्य की सुस्ती देखने को मिली। यह मार्ग आगे विनायक के बाद शामा तक मिलता है। कैलास मानसरोवर जाने के लिये पुराने मार्गों में इसकी गणना होती है। मानसरोवर में महात्मा गांध्ी की अस्तियां विसर्जन के लिये इसी मार्ग से गये थे। इस मार्ग पर कभी बहुत आवत-जावत थी। पैदल यात्रा के समय घोड़े-खच्चर, भेड़-बकरियों के साथ व्यापारी जाते थे। जोहार के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोपाल सिंह मर्तोलिया के परिजन आज भी देवीबगड़ में निवास करते हैं। धरचूला में बूबू के नाम से विख्यात रहे स्वतंत्राता सेनानी जोगा सिंह मर्तोलिया का भी यहाँ मकान था। इनके परिजन आज धरचूला व हल्द्वानी में रहते हैं।
प्रहलाद सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि तिब्बत को जाने के लिये इस मार्ग का प्रयोग होता था। पुराने समय में अल्मोड़ा से गिनती करते हुए व्यापारी विभिन्न पड़ावों में रुकते हुए जाते थे। इस गिनती में उन्हें मालूम था कि किस गिनती के अंक के बाद कौन सा स्थान आने वाला है। उन स्थानों का नामकरण भी कर दिया गया था जैसे- खारबगड़, मिलमढुंग।
इस क्षेत्रा में उत्तरभारत प्रा.लि. द्वारा जलविद्युत परियोजना का कार्य भी किया जा रहा है। परियोजना के कामकाज के तौर-तरीकों पर आरोप लगते रहे हैं लेकिन बात पिफर वही है कि इस दूरस्थ क्षेत्रा में कोई सुनवाई नहीं। नेतागर्दी का हाल यह है कि छुटभैय्ये से लेकर बड़े नेताओं तक का दबाव रहता है, खनन वाले भी मौका देखते रहते हैं। इन सारे हालातों में दूर-दराज के ग्रामीण विकास की राह जोह रहे हैं। वह चाहते हैं कि सड़क-संचार-शिक्षा जैसी मलभूत समस्या दूर हो जाये तो काफी राहत मिलेगी।
पिघलता हिमालय 9 मई 2016 के अंक में प्रकाशित

यह एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक है

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। श्री हरि स्मारक समिति द्वारा इस बार भी महान स्वतंत्राता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में आयोजन किया गया। मल्ला दुम्मर में हुई हरि प्रदर्शनी में क्षेत्रावासियों ने जबर्दस्त उत्साह के साथ भागीदारी की। साथ ही इस बात पर आश्चर्य कि आजादी के बाद से अपने संसाध्नों पर निरन्तर चलने वाली इस प्रदर्शनी के लिये किसी भी प्रतिनिध् िद्वारा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया गया जबकि उत्तराखण्ड में जगह-जगह महोत्सव के नाम पन घोषणाएं व राशि वितरण करने का रिवाज सा बन गया है।
उल्लेखनीय है कि जंगपांगियों द्वारा मल्ला दुम्मर में बहुत ही उत्साह व क्रम से प्रतिवर्ष करवाये जाने वाला यह आयोजन मात्रा एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक भी है। देश के लिये मर-मिटने वाले जोहार के तमाम स्वतंत्राता सेनानियों का स्मरण इस मौके पर किया जाता है और ध्वजारोहण के साथ दुर्गम क्षेत्रा में रहने वाले सभी लोग मिल-बांटकर आयोजन को सपफल करते हैं। छोटे बच्चे भी ‘हरि बूबू की जै’ जैसे नारे लगाते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ होने वाली सारी गतिविध्यिां अपने देश की सीमा की रक्षा के लिये संकल्प लेने वाली, अपने कुटीर उद्योग ध्न्धें को बनाये रखने, अपनी कृषि व पशुपालन को बढ़ावा देने के लिये हैं। मनोरंजन के लिये सांस्कृतिक मंच भी सजता है और शिक्षाप्रद कार्यक्रम किये जाते हैं। इतना होेने पर भी, हरि प्रदर्शनी के स्वरूप को और भव्यता देने की दिशा में स्थानीय जनप्रतिनिध्यिों का रुचि न लेना आश्चर्यजनक है।
इस बार भी हरि प्रदर्शनी के मौके पर ग्रामवासियों ने सांस्कृतिक मंच पर और अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाकर प्रतिभा का परिचय दिया। मल्ला जोहार आने-जाने के आदी लोगों का भी यहाँ जुटना सुखद है। समिति के संरक्षक विजय सिंह जंगपांगी, अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, सचिव गंगा सिंह जंगपांगी, प्रधन पंकज वृजवाल, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह ध्पवाल, धम सिंह बरपफाल, मंगल सिंह जंगपांगी, मंगल सिंह मर्तोलिया, श्रीरामसिंह ध्र्मशक्तू, गोकर्णसिंह मर्तोलिया, नेत्रासिंह पांगती, खुशाल सिंह, गजराज सिंह, गजेन्द्र सिंह, नरेन्द्र सिंह, भूपेन्द्र जंगपांगी, नारायण सिंह, लक्ष्मण लछबू, राजेन्द्र मर्तोलिया, मनोज ध्र्मशक्तू सहित बड़ी संख्या में लोग जुटे। समाचार लिखे जाने तक प्रदर्शनी जारी थी। ;हरि प्रदर्शनी सम्बन्ध्ी समाचार अगले अंक में भी पढ़ें।द्ध
पिघलता हिमालय 7 नवम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित