वाद्ययंत्र भौंकर और मलयनाथ के भक्त रावल परिवार

नवीन टोलिया

डीडीहाट। भौंकर वाद्ययन्त्र हमारे लोकवाद्यो में प्रमुख स्थान रखता है। अनुष्ठानों, विवाह इत्यादि आयोजनों पर इसकी धुन सुनाई देती है। एक सपाट सा दिखाई देने वाले इस वाद्ययन्त्र की संख्या सीमित ही रह गई है। कुछ लोक कलाकार जरूर इसके साथ दिखाई देते हैं। इन्हीं में से एक हैं- 76 वर्षीय रूप सिंह रावल। श्री रावल भौंकर के दो वर्ष पुराने इतिहास की गणना करते हैं।
रूप सिंह जी बताते हैं कि 200 वर्ष पूर्व धेलेत ग्राम में मेरे दादा राय सिंह रावल रहते थे, उनकी दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी से 3 पुत्रा व एक पुत्राी पैदा हुई। दूसरी पत्नी से कोई सन्तान नहीं हुई। ऐसे में दूसरी पत्नी हमेशा दुःखी रहती थी। यहाँ के क्षेत्रावासियों की आस्था का केन्द्र मलयनाथ मन्दिर शुरू से रहा है। तब डीडीहाट का आज का बाजार क्षेत्रा दिगतड़ था। 4-5 मवाशे इस जंगल में रहते थे। माइग्रेसन में आने वाले सीमान्त वासियों के जानवरों को ठहराने का पड़ाव भी यह इलाका था। इस घोर जंगल और गौचर में दुःखी रावल दम्पत्ति ने मलयनाथ के पूजन की ठानी और मन्दिर में जागरण शुरु कर दिया। तब गरजते हुए देवचुला ;भानलिंग की ओर देख कर रुदन करने लगे। ऐसे में मलयनाथ शेर के रूप में प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद उनके घर दो पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। उन्होंने सन्तान होने पर भखड़ा ;भौंकर देने का वादा किया था। रूप सिंह का दावा है कि उनके पास जो भौंकर है वह उनके पूर्वजों का है। वह बताते हैं कि पहले इस भौंकर को बजाने से जंगली जानवर, बाघ, सुअर इत्यादि भाग जाते थे। मलयनाथ में असीम श्रद्धा रखते हुए उनका परिवार भौंकर संभाले हुए है, जिसे अनुष्ठानों व विशेष अवसरों पर बजाया जाता है। सरल प्रवृत्ति के रूप सिंह इस वाद्ययन्त्रा को श्रद्धापूर्वक अपने साथ ले जाते हैं।

पिघलता हिमालय 5 मार्च 2018 के अंक से

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