
अनुपम सौन्दर्यमयी मुनस्यारी तहसील का पुराना नाम जीवार उर्फ जोहार है। मिलम ग्लेश्यिर के जिस स्थान से गोरी नदी निकलती है, उसके दाहिने तरफ बरफ से ढके पहाड़ का नाम जावार है। इसी जीवार पर्वत के नाम से इस क्षेत्र का नाम कालान्तर में जोहार हो गया। माना जाता है कि गोरी नदी इसी जीवार पर्वत के एक भाग को तोड़ कर हरलिंग (हंसलिंग) पर्वत को छूते हुए मुनस्यारी को दो भागों में सींचती हुई मदकोट जौलजीवी को चली जाती है। हरलिंग इतना उष्मावान है कि उसमें वर्फ टिक नहीं सकता। हरलिंग अर्थात शिवलिंग को गौरी (पार्वती) का नदी रूप में स्पर्श कर बह जाना रहस्यमीय है। शिव पार्वती की विवाह स्थली और पार्वती की तप स्थली हिमालय ही तो है। पहले जोहार एक पगरना थाा। विकट बन्दोबस्त, जो वर्ष 1863 में अल्मोड़ा जिले से प्रारम्भ हुआ था, के दौरान जोहार परगना को तल्ला देश जोहार व मल्ला देश जोहार दो पट्टियों में विभक्त किया गया। बाद में एक पट्टी गोरीपफाट बनया गया। जोहार-मुनस्यारी का एक पुराना नाम भोट प्रदेश भी है। यह भोट शब्द तिब्बत के बोध् शब्द से बना है। तिब्बत देश को वहाँ की स्थानीय भाषा में बोध् कहा जाता है।
कुमाउँ केशरी बी.डी.पाण्डे द्वारा लिखित कुमाउँ का इतिहास के अनुसार वर्ष 1790 तक मुनस्यारी में चंद वंश का शासन था। 1790 से 30 अप्रैल 1815 तक गोरखा राज (नेपालियों का) तथा 3 मई 1815 के बाद मुनस्यारी अंग्रेजों के अधीन हो गया।
प्रसिद्ध चंदवंशी राजा बाज बहादुर चंद ने वर्ष 1670 में भोट के रास्ते चल कर तिब्बतियों पर आक्रमण किया और तिब्बतियों से ताकललाखाल जीत कर आदेश जारी किए कि भोटिए लोग जो टैक्स तिब्बती राजा को देते हैं न दें। बाद में तिब्बत राजा द्वारा निवेदन करने व भविष्य में जोहारियों को रास्ते, व्यापार, धर्म के विषय में परेशान न करने का वचन देने पर पुनः टैक्स देने की सहमति बनी। राजा बाज बहादुर चंद के गाइड के रूप में जोहार भादू बूढ़ा तथा लोरू बिल्ज्वाल तिब्बत गए थे। राजा ने इनाम के रूप में इनको कुछ गाँव (पांछू, बुर्फू, पातू, धपा, तेली) जागीर में दिए। लोरू बिल्ज्वाल को कोश्यारी बाड़ा मिला।
मल्ला देश जोहार समुद्र तल से 330 मीटर से 4500 की उँचाई पर स्थित है। पहले इन दोनों पट्टियों के लोगों के रहन-सहन, खान-पान यहाँ तक कि वेशभूषा में भी अन्तर था। मल्लाजोहार का कुछ भाग 5 माह तक बर्फ से ढका रहता है शेष में शीत लहर का प्रकोप रहता है। लेकिन तल्लाजोहार घाटी में होने से मौसम के हिसाब से गरम रहता है। मुनस्यारी जो कि मल्लाजोहार व गोरी फाट पट्टियों का संयुक्त नाम था, अपने आप में विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम, प्राकृतिक सौन्दर्य, नदी-झरनों, हिमाच्छादित पर्वतों, जाति, वर्ण, धर्म आदि की विविधताओं के लिए प्रसि( रहा है। जो इस कहावत से सि( होता है- आध संसार-एक मुनस्यार।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जोहार के लोग अपने क्षेत्र को बहुत बड़ा समझते थे। यानि जोहारी लोग यह मानते थे कि आधे भाग में तो ईश्वर ने मुनस्यारी-जोहार ग्राम बनाए हैं और आधे भाग में शेष संसार को। लेकिन इतिहासकारों की यह टिप्पणी या व्याख्या सही प्रतीत नहीं होती। इस उक्ति के भावार्थ को इस क्षेत्रा से सम्बन्ध्ति विविधताओं को जोड़ कर समझा जाना चाहिये। मुनस्यारी छोटा क्षेत्र होने के बावजूद संसार के अनेक प्राकृतिक संरचनाओं, जातियों, वंशों की अनेकता को अपने में समेटे हुए है। संसार के अन्य भागों में पायी जाने वाली जातियां मंगोल, शक, गोरखा नेपाली, आर्य, तिब्बती, हूण, नाग, किरात, खस, राजस्थानी, हिमाचली, गढ़वाली, गुजराती आदि जाति धर्म के लोग इस छोटे से क्षेत्रा में रहते हैं। पूर्व में जाति धर्म के अनुसार बोली, भाषा जैसे तिब्बती, गोरखाली, पहाड़ी, गढ़वाली, हिमाचली आदि बोली जाती थी और उसी के अनुरूप विविध् पहनावा भी लोग पहनते थे। वर्तमान में मुनस्यारी में चारों वर्णों के लोग निवास करते हैं। मुनस्यारी तहसील में ब्राह्मणों व ठाकुरों की ही करीब 82 जातियां रहती हैं। यहाँ के शौका व्यापार के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। तिब्बत व नेपाल के अतिरिक्त माल के लिए देश के सभी प्रमुख शहरों तक उनका व्यापार पफैला था। वे भारत का सामान ल्हासा, ज्ञानिमा मण्डी आदि तक बकरियों, घोड़ों से पहँुचा कर तिब्बती सामान भारत लाते थे। विकट रास्तों से कबरियों द्वारा सामान ढुलान करना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए एक बकरी-दस ढकरी की आवश्कता होती थी। इस वंश के सुनपति शौका बहुत बड़े व्यापारी माने जाते थे। मुनस्यारी में विश्वविख्यात मिलम ग्लेश्यिर एवं पंचाचूली, राजरम्भा, हरलिंग, छिपलाकेदार, नन्दादेवी, नन्दाकोट आदि हिमालय पर्वत श्रृंखलाएं हैं। उनकी उपत्यकाओं में वनोषधि अतीश, कटिक, निरविष, गुग्गल, मासी, हाथजड़ी और कस्तूरीमृग, डफिया मुनाल आदि दुर्लभ पशु-पक्षियां पाये जाते हैं। बुग्याल में अनुपम छटा बिखेरते अनेकानेक पुष्प तथा ब्रह्मकमल जैसे नन्दन वन की शोभा बढ़ाते हैं। देवदार, भोजपत्रा, थुनेर, ल्वेंट आदि अनेक ज्ञात अज्ञात पादप तथा जलचर, थलचर व नभचर पाए जाते हैं।
मुनस्यारी रिषि मुनियों की तपोभूमि रही है। शान्ति के लिए रिषि मुनि यहाँ आते थे। प्रेम कथाओं में राजुला मालूशाही की प्रेम गाथा की गिनती- रोमियो-जुलियट, मालती-माध्व, हीर-रांझा की कोटि में होती है, जो इसी धरती से सम्बन्ध् रखते हैं।
उपरोक्त प्राकृतिक व सामाजिक विविधताओं के छोटे से क्षेत्र में विद्यमान होने के कारण आध संसार-एक मुनस्यार का पुरातन कथ्य प्रचलन में आया होगा, ऐसा प्रतीत होता है।
