शौका समाज आक्रोशित, मुख्यमंत्री को पत्र भेजा

सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का परिवर्तन कर सम्पूर्ण जनजाति को आहत किया है

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का नाम परिवर्तन करने से शौका समाज बेहद आक्रोशित है। नाराज संगठनोें ने मुख्यमंत्राी सहित उच्च पदों पर बैठे लोगों को पत्रा भेजे हैं। जोहार मिलन केन्द्र हल्द्वानी, जोहार सांस्कृतिक वेलपफेयर सोसाइटी हल्द्वानी, मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी के अलावा उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति देहरादून ने सभी बुद्धिजीवियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते हुए चिन्ता जताई है कि नाम परिवर्तन की नीति अपनाई गई है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का नाम पूर्व मुख्य सचिव व प्रदेश के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त डाॅ. आर.एस.टोलिया के नाम पर रखा था जिसे अब भाजपा शासन ने बदल कर वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर कर दिया है। आक्रोशित लोगों का कहना है कि वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली का वह बहुत सम्मान करते हैं और चाहते हंै उनके नाम पर कई कार्य हों लेकिन डाॅ. टोलिया के नाम पर एकमात्रा सभागार का नाम बदलने की राजनीति बर्दाश्त नहीं होगी।
उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति ने प्रदेश के समस्त बुद्धिजीवियों एवं जनजाति समाज की ओर से सरकार से अनुरोध् किया है कि अपनी उदारचेतना एवं व्यापक दृष्टि का पुनः परिचय देकर राज्य के मंत्राीमण्डल द्वारा पारित प्रस्ताव तथा जनभावनाओं का सम्मान करके उपरोक्त सभागार का नाम पुनः स्व. डाॅ.आर.एस.टोलिया के नाम पर करे। साथ ही शासन द्वारा की इस बारे में की जा रही कार्रवाई से समिति को अवगत करा दें ताकि राज्य के जनजाति समाज को निर्णय से अवगत कराया जा सके। समिति के संरक्षक एस.एस.पांगती, अध्यक्ष चन्द्र सिंह ग्वाल, महासचिव सुश्री विमला ने पत्रा जारी करते हुए जनजाति कल्याण सिमति एवं अ0भा0आदिवासी संगठन, रं कल्याण संस्था, नीतिमाणा घाटी कल्याण समिति, जोहार घाटी कमेटी, पूर्व विधयक गगन रजवार, वनराजि समाज संगठन, जौनसार बाबर समिति, जनजाति मोर्चा, बोक्सा आदिम संगठन, जोहार कल्याण संगठन, थारू विकास समिति खटीमा सहित तमाम जगह सम्पर्क किया है। मामले में संगठनों सरकार से निर्णय लेने की मांग की है।
जोहार सांस्कृतिक बेलपफेयर सोसाइटी हल्द्वानी के अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, जोहार मिलन केन्द्र हल्द्वानी के अध्यक्ष डाॅ. पी.एस.मर्तोलिया की ओर से मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड सरकार को पत्र भेजकर अनुरोध् किया गया है कि डाॅ.टोलिया के नाम को यथावत रखा जाए। पत्रा की प्रतिलिपि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी मामले में हस्तक्षेप करने की उम्मीद के साथ भेजी है। कहा है कि हस्तक्षेप किया जाए ताकि उत्तराखण्ड सरकार के इस अविवेकपूर्ण निर्णय से आहत प्रदेश के जनजाति वर्ग इसे पार्टी का दुर्वल वर्ग के प्रति दुर्भावना न माने और आपकी दूसरी पार्टियां इसका राजनीतिकरण न करें।
पत्र में कहा है कि प्रदेश की वर्तमान सरकार द्वारा बिना किसी कारण व औचित्य के अचानक किये गये इस नाम परिवर्तन से उत्तराखण्ड का सम्पूर्ण जनजाति वर्ग व कुमाउँ निवासी और मुख्य रूप से भोटिया जनजाति व पिथौरागढ़ की जनता स्तब्ध् व आहत है। जोहार सांस्कृतिक एवं बेलफेयर सोससाइटी तथा जोहार मिलन केन्द्र के तत्वावधन में आयोजित वृहद सभा के पश्चात मुख्यमंत्री को सम्बोधित इस पत्र में कहा है कि आपके निर्णय पर आक्रोश व्यक्त करने और आपसे जनजाति और मुख्यरूप से जोहार के शौका समुदाय को आहत व अपमानित करने वाले इस निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध् करने के लिये जनभावनाओं का पत्र प्रेषित है। स्व.टोलिया पर्वू मुख्य सचिव व प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त न केवल उत्तराखण्ड जनजाति बल्कि पूरे प्रदेश के गौरव थे। उत्तर प्रदेश सरकार के उत्तराखण्ड राजधनी चयन आयोग के सचिव के कार्यकाल से ही उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। नये राज्य की स्थापना के निर्णय से ही उन्होंने नवगठित राज्य के प्रशासन व विभिन्न विभागों, निगमों व अन्य संस्थओें को सुव्यवस्थित व सुसंचालित करने और दोनों राज्यों में कर्मियों व परिसम्पत्तियों के बंटवारे के कार्यों को जिस निष्ठा और योग्यता से निष्पादित किया उसके कारण उन्हें राज्य का मुख्य सचिव तथा संस्थापक मुख्य सूचना आयुक्त बनया गया। प्रदेश की विकास योजनाओं की परिकल्पनाओं से लेकर उनके सपफल क्रियान्वयन तथा उनकी जो महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह सर्वविदित है कि प्रशासनिक अकादमी नैनीताल को केन्द्रीय स्तर पर मान सम्मान दिलानाभी उन्हीं का कार्य है। उत्तराखण्ड प्रशासन इतिहास के इतिहास पर उन्होंने जो शोध् किये और अनेकानेक शोध्ग्रन्थ लिखे वे न केवल इतिहास के बहुमूल्य व प्रमाणिक अभिलेख हैं बल्कि नवगठित राज्य के प्रशासकों के लिए मार्ग निर्देशिका भी हैं। सेवा निवृति के बाद भी वे उत्तराखण्ड के विकास और पहाड़ से पलायन रोकने की योजनाओं पर जुड़े रहे। इतना ही नहीं, सेवानिवृति के बाद मुनस्यारी जैसे पहाड़ के गाँव में बसकर उन्होंने पहाड़ के पुनर्वास की बात करने वालों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने जिस योग्यता, निष्ठा और समर्पण की भावना से उत्तराखण्ड के विकास में योगदान दिया उसी के सम्मानस्वरूप उक्त सभागार व कुछ संस्थाएं पूर्ववर्ती सरकार द्वारा उनके नाम पर रखी गयी थी। टोलिया जी गैर राजनैतिक व्यक्ति थे। उनकी निष्ठा अपने राज्य और उसकी जनता के विकास से थी। वे हमेशा धर्म, जाति और क्षेत्रा के संकुचित दायरे से बाहर रहे। उनका सम्मान उत्तराखण्ड की समस्त जनता का सम्मान था और है। इसलिये सभागार से इस तरह नाम हटाया जाना प्रदेश की पूरी जनता और मुख्य रूप से जनजाति वर्ग का अपमान है। सभा के प्रतिभागियों का मानना है कि आदरणीय डाॅ.टोलिया जी को बेवजह कांग्रेस और भाजपा की प्रतिद्वंद्विता में बलि का बकरा बनाने का कृत्य किया गया है। उत्तराखण्ड के अन्य लोगों की तरह जनजाति के लोग भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के स्वतंत्रता संग्राम और उत्तराखण्ड की अस्मिता में योगदान के प्रशंसक हैं। उनके नाम पर किसी भी भवन, संस्था, शहर का नामकरण हमारे लिये हर्ष और गर्व की बात होगी। लेकिन इस कार्य के लिए किसी अन्य का नाम हटाना दुर्भावनापूर्ण और अपमान जनक है और इसलिए हमें स्वीकार नहीं है। यह न केवल दिवंगत आत्मा का अनादर है बल्कि समस्त जनता का और मुख्य रूप से डाॅ. टोलिया के जोहार शौका समुदाय का अपमान है।
सभा के दौरान सभी ने एक स्वर से प्रदेश के मुखिया से अपील दोहराई है कि अपने निर्णय पर अविलम्ब पुनर्विचार कर उक्त सभागार का नाम फिर से स्व.आर.एस.टोलिया के नाम पर रखा जाए। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर उससे भी अध्कि प्रमुख भवन को किया जा सकता है।
मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी ने मुख्यमंत्राी को मामले में पत्रा भेजा है। समिति के अध्यक्ष श्रीराम सिंह धर्मशक्तू के साथ ही नाथूराम वर्मा एडवोकेट, अमरराम आर्या, गौरत पांगती, पूरन लस्पाल, दरपान राम, शंकर सिंह ध्र्मशक्तू, कैलाश सिंहधर्मशक्तू, मनीराम, खड़क सिंह पांगती, दीवान वर्मा, मंगल सिंह मर्तोलिया, कुन्दन सिंह पांगती, गजेन्द्र पांगती, मनोहर दरियाल, माधेसिंह पांगती, बलवन्त सिंह, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, लक्ष्मण सिंह, हरीश सयाना, पूरन सिंह, शेर सिंह वृजवाल, मानसिंह, देवेन्द्र सिंह सहित तमाम लोगांे के हस्ताक्षर पत्र में हैं।

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