चंद राजाओं के वीरों के ग्राम करक्यूड़ा को अब खर्ककार्की के नाम से जानते हैं

गाँव का पुराना नौला

पि.हि.प्रतिनिधि
चम्पावत जिले के मुख्यालय से लगे गाँव खर्ककार्की में अब कंक्रीट का जंगल विस्तार लेने लगा है। करक्यूड़ा नाम के इस ग्राम को खर्ककार्की नाम से जाना जाता है। कार्कियों के परिवार यहाँ बहुतायत से हैं। दरअसल चंद शासक के समय कार्की उनके वीरों में सम्मलित थे। चंद शासनकाल में उनके चार बड़े मंत्रियों में कार्की, चैधरी, तड़ागी, बोरा थे। आज भी चम्पावत में चार भागों में इनकी बसासत है। कार्की आल, चैकुनी आल, बोरा आल, चैधयाली। संग्राम कार्की नाम इतिहास में है जो पराक्रमी योद्धा के रूप में जाने जाते हैं।
खर्ककार्की से कई स्थानों पर कार्की परिवार जाकर बसे। इनमें से पुंगराउ घाटी में भी यह बसे। इसी गाँव में शक्टा परिवार इनके आचार्यों के रूप में स्थापित हैं। संस्कृत के विद्वानों शक्टा परिवार आज भी स्वाध्याय व अपने संस्कारों के साथ सामाजिक भागीदारी में संलग्न हैं।
खर्ककार्की गाँव आलू की खेती के लिये भी प्रसिद्ध रहा है लेकिन आजकल सुअरों के आतंक से खेतों को नुकसान होने के कारण क्षेत्रवासी परेशान हैं। गाँव में आज भी पुराने भवन दिखाई देते हैं लेकिन अब अधिकतर सीमेंट-गारे के बनने लगे हैं। पुराने नौलों को भी सौन्दर्यीकरण के सजाया गया है।
चम्पावत मुख्यालय से लगे इस गाँव से कई परिवार अब बाहर जा चुके हैं लेकिन फिर भी उम्मीद है कि कई लोग लौटेंगे। अपने समृ( इतिहास का स्मरण करते हुए अपनी जड़ों को टटोलते हुए वापसी करेंगे। आने जिस प्रकार चम्पावत मुख्यालय फैलता जा रहा है उस अनुपात में खर्ककार्की भी घिरता जायेगा। इसलिये भी जरूरी है यादों को सहेजा जाए।

पिघलता हिमालय 12 फरवरी 2018 अंक से

बायांगढ़ को बौंगाड़ कहने लगे, कभी चन्द राजाओं का कोट था

पि0हि0प्रतिनिधि
थल। पुंगराउ घाटी का खूबसूरत गाँव है- बौंगाड़। पांखू कस्बे से आधा किमी दूरी पर स्थित इस ग्राम पर कभी बायांगढ़ कहा जाता था। इलाके के बड़े-बुजुुर्ग बताते हैं कि चन्द राजाओं के समय में यहाँ कोट था। आज भी एक टीले के उपर कोट के निशान हैं और मान्यता है कि पुराने समय में अपने विरोधियों को साधने के लिये राजा टीले से हमला कर देते थे। गाँव में कार्की परिवारों की बहुलता है। कई परिवार बाहर बस चुके हैं लेकिन ग्राम की परम्पराओं को शानदार तरीके से बनाया हुआ है।
सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती हरिप्रिया कार्की बताती हैं कि उन्होंने भी अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि उनके पूर्वज नेपाल से यहाँ आये थे। चार भाई बौंगाड़, लोहाथल, दंतौला, चैंसला में रहने लगे। वैसे भी इलाके में शुरु से ही कहा जाता है- ‘‘चार राठ पाठक, चार राठ कार्की।’’
पहले इस ग्राम में प्राचीन ताम्रपत्र प्रधान त्रिलोक सिंह जी के वहाँ पाया जाता था। वर्तमान में व अन्यत्र है। बौंगाड़ की आवादी करीब चार सौ है। प्रधनमंमंत्री सड़क से जुड़े गाँव में शौचालय, कूड़ेदान, पेयजल की उचित व्यवस्था है। इस गाँव के 33 परिवार हल्द्वानी बस चुके हैं। फौज के अलावा अन्य क्षेत्रों में यहाँ के लोग हैं।
इस ग्राम पंचायत में 6 ग्राम आते हैं जिसमें खंडार, नायल, उप्रेतीखोला, बौंगाड़, बोकलकटिया, बंतोला। ग्रामपंचायत से लगा हुआ फल्याटी, तोराथल ग्राम है जहाँ से पैदल रास्ते होते हुए चकौड़ी घूमा जा सकता है। पांखू क्षेत्र के कई ग्रामों में जोहार के वृजवाल परिवार रहते हैं। तिब्बत व्यापार के दिनों में पैदल यात्रा के समय कई परिवार यत्र-तत्र बस थे जो यहाँ भी हैं। पास के इलाके ध्ररमघर में भी जोहार के काफी परिवार हैं। माइग्रेशन के दौरान स्कूल भी यहाँ चलता था, जो वर्तमान की स्थितियों में सरकारी स्कूल के रूप में जारी है।
बौगाड़ ग्राम से थल के लिये पुराना रास्ता भी है, जिसमें अब आवागमन नहीं होता है। पहले ग्रामवासी नियमित रूप से श्रमदान कर मार्ग की सफाई और रख-रखाव करते थे। सर्वोदय संस्था भी यहाँ बहुत सक्रिय रही है। राध बहिन, गोपाल सिंह सहित तमाम लोग बराबर ग्राम विकास के लिये कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में युवा प्रधन द्वारा भी लगातार कार्यों किये जा रहे हैं। धन- धन्य से भरपूर इस ग्राम की उन्नति होती रहे और यह दूसरों के लिये भी प्रेरणा बने, ऐसी कामना है।

कार्की समाज के इतिहास व वंशावली पर पुस्तक
बौगाड़ निवासी लोकमान सिंह कार्की ने कार्की लोगों के इतिहास पर पुस्तक लिखी है। चम्पावत जिले में गाँव के नाम तक खर्ककार्की, मंचकार्की सुनाई देते हैं। तमाम रोचक जानकारियों के साथ बनी पुस्तक में 1970 से कार्की उपजाति का इतिहास इसमें दिया गया है। साथ ही इनकी बंशावली। बताया है कि कार्की कोंकण रिसायत के राजा थे। 12वीं शताब्दी में कार्की लोग नेपाल चले गए। कुमाउॅ मंे लोगों के आदि पुरुष को वह संग्राम सिंह बताते हैं। संग्राम सिंह नेपाल में गोरखा शासन से तंग आकर चम्पावत और लोहाघाट के मध्य कन्यूरी गाँव में रहने लगे। संग्राम सिंह के दो विवाह थे। उनके वंशवृक्ष के लोग बौगाड़, चैसाला, लोहाथल, दंतोला, बैराजुबर, मसूरिया, थर्प, चनकाना, भूलधरा, जजोली, ससिखेत, मुवानी, गणाई, रानीखेत, मनान, गगास समेत कई गाँव में कार्की रहते हैं। कार्की कुमाउँ के राजपूत हैं।
पुस्तक का विगत दिवस जिलाधिकारी पिथौरागढ़ डाॅ. रंजीत सिन्हा ने विमोचन किया। लोकमान सिंह का कहना है कि उक्त पुस्तक नई पीढ़ी को उनकी जड़ों को जानने में मददगार होगी। पुस्तक सामग्री पहले एकत्र हो चुकी थी किन्तु धनाभाव के कारण यह देरी से बन पाई।

पिघलता हिमालय 27 मार्च 2017 अंक से

यज्ञ स्थली था जगथली गाँव

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँव की ओर स्तम्भ में आज हम आपको ग्राम जगथली का परिचय करवा रहे हैं। पहाड़ के खाली होते गाँवों की तरह इसकी भी पीड़ा है। महानगर में बस चुके कुछ परिवार अपनी मातृभूमि के लिये सजग हैं किन्तु अधिकांश पलायन का दर्द दिखाई देता है। थल से 14 किमी और बेरीनाग से 15 किमी दूरी पर स्थित है गाँव जगथली। इस ग्रामसभा की बात करें तो लगभग ढाई हजार की आबादी है। गाँव में प्राइमरी और इण्टर कालेज है। वर्तमान में सड़क बनने से यहाँ रहने वालों में उम्मीद जगी है।
जगथली के बारे में कहा जाता है कि यह यज्ञ स्थली हुआ करती थी और दूर-दूर से लोग एकत्रित होकर यज्ञ में भाग लेते थे। यहाँ प्राचीन शिवालय है, बाद में जिसका जीर्णेद्धार कर दिया गया है। मन्दिर के पास वाले खेत को ‘कुन’ ;कोना कहा जाता है और पास में ही ‘ज्यूनारपाट’। कहते हैं ज्योनार बनाकर कुन उतारने के के कारण इनका नाम रखा गया। यह भी मान्यता है कि मन्दिर के पास खेतों के बीचोंबीच विशालकाय पत्थर से शंखध्वनि होती थी, जिसे आज भी ‘बिलाड़ीढंुग’ कहा जाता है।
जगथली में चन्दोला परिवार सहित कई जातियां रहती हैं। बताते हैं चन्दोला लोग गढ़वाल से आकर यहाँ बस गये थे। इन परिवारों में अधिकांश अब शहरों में यत्रा-तत्रा रहने लगे हैं। गाँव के 53 वर्षीय केवलानन्द चन्दोला बताते हैं कि काण्डे में रहने वाले पन्त, लालुका के बिष्ट और उनके बुजुर्ग एकसाथ इस स्थान पर आये थे। जगथली ग्राम सभा में गराउॅ के शाह, उडियारी के महरा, कालिटी के कार्की, किरौली के पन्त, काण्डे के पन्तों की जमीनें हैं। कभी सभी के पूर्वज यज्ञ के लिये यहाँ आते रहे होंगे।
जगथली के सूनेपन को चीरते हुए दुलखोला-सकनोली-गराउॅ तक सड़क बन रही है जो देवीनगर तक मिलेगी, इससे आवत-जावत में राहत मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिये कि बन्द पड़े कई घरों में फिर से चहल-पहल होगी। ग्राम में 12 प्रकार की जातियों का निवास रहा है। जिसमें से खौला गाँव के जोशी परिवार अब हल्द्वानी के पास बिन्दुखत्ता बस चुका है। महरौड़ी का बसखेती परिवार था, जिसमें एकमात्र बुजुर्ग के निधन के बाद कोई नहीं बचा है। जगथली के पहले पूर्वज के रूप में घंघोला जाति यहाँ है। चन्दोला, भट्ट, नौर्की;जोशी लिखने लगे हैंद्ध, कार्की, मेहता, पन्त, बोरा, दुनखोला के जोशी, बिष्ट, मनराल, लोहार, शिल्पकार सभी हिलमिल इसे संवारते रहे हैं। आशा है बनने वाली सड़क रौनक लौटायेगी।

पिघलता हिमालय 26 सितम्बर 2016 अंक से

बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण स्थान का नाम पड़ा टिमटिया

पि.हि.प्रतिनिधि 
थल-मुनस्यारी मार्ग पर स्थित तेजम का टिमटिया क्षेत्र माइग्रेसन काल में धर्मशक्तूओं का पड़ाव हुआ करता था। मिलम, दरकोट और नंगर यानी गरम घाटी में तीन-तीन माह करीब यह लोग रहा करते थे।
केदार सिंह धर्मशक्तू बातचीत करते हुए बताते हैं कि मिलम में मूल रूप से रावत, पांगती, सयाना हुए जिन्हें मिल्मवाल कहते हैं। धर्मशक्तू में से ही सयाने को सयाना कहा गया। तिब्बती में इन्हें च्यूंवायारता कहते हैं। तिब्बत व्यापार के समय से जब व्यापारियों का आना-जाना होता था तब मौसम के अनुसार वह अगल-अलग स्थानों पर रहते थे। नंगर यानी की गरम घाटी के रूप के रूप में नाचनी का यह क्षेत्र भी चुना गया होगा। बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण इस स्थान का नाम टिमटिया पड़ गया। पहले से इसी प्रकार से कई नाम पड़ गये। भैंसखाल में तालाब सा है जिसमें भैंसें जाती थीं, नाम पड़ा भैंसखाल। बुजुर्गवार के नाम पर स्थान का नाम पड़ा- जब्बूखरक। श्री धर्मशक्तू बताते हैं- तेजम तो कोट रहा है, जहाँ रावत लोगों के हाथ में न्याय व्यवस्था थी।
अपने बुजुर्गों से कहे-सुने के अनुसार श्री केदार सिंह जी बताते हैं कि किसी समय टिमटिया में आसा जसपाल आये थे। इन्हीं के बंशज विभिन्न राठों के नाम से जाने जाते हैं। बाद में कुछ लोग माले चले गये और कुछ टिमटिया रह गये। टिमटिया रहने वालों को टिमटिया राठ कहने लगे। पाँच भाईयों का एक राठ हुआ जो शामा के पास ढोलढूंगा गये थे। माले राठों में गिरधर सिंह धर्मशक्तू के परिवार जन आदि हैं। टिमटिया राठों में डाॅ.नारायण सिंह धर्मशक्तू परिवार जन आदि हैं। पाँच भाई राठों में बलवन्त सिंह धर्मशक्तू परिजन आदि हैं।
श्री केदार सिंह बताते हैं कि किन्हीं कारणों से यत्र-तत्र जाकर रहने लगे राठों की नई पीढ़ी भी नौकरी-पेशा के सिलसिले में दूर-दूर तक निकल चुकी है किन्तु अवसर विशेष पर सभी मिलते जुलते हैं। आज भी टिमटिया में अपनी यादों के साथ बने हुए श्री धर्मशक्तू चाहते हैं कि उनके परम्परागत हुनर को नई पीढ़ी बचाये रखे।

पिघलता हिमालय 7 दिसम्बर 2015 के अंक से

चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का प्रसिद्ध इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधाओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई फसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘रितु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की रितु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह रितु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मधुमखी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीधना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीधना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में रितु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रत दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की धनीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 अंक से

बीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट का है इतिहास

इन्द्र सिंह नेगी
नैनीताल। नैनीताल का बीरभट्टी क्षेत्र अतीत से ही अपने इतिहास में कई पन्ने जोड़े हुए है किन्तु त्रासदी तो यह है कि बलियानाले के ट्रीटेमेंट के नाम पर आज तक कोई ठोस कार्य नहीं हो पाया है। जिस कारण गन्दगी फैलने के साथ-साथ रानीबाग से सीधे इस इलाके को जोड़ने वाला मार्ग भी लुप्त हो चुका है और मुख्य हाइवे पर बना पुल भी मजबूत बनने के लिये मजबूर सा बना हुआ है। बलियानाले के ट्रीटमेंट के नाम पर हो रहे कार्यों को आज तक शासन-प्रशासन ने गम्भीरता से लिया होता तो इलाके में खतरा नहीं मंडराता और प्राचीन यात्रा पथ भी यहाँ के इतिहास की परख के लिये सुलभ होता।
जरा इतिहास की ओर नज़र दौड़ायें तो पता चलता है कि इस क्षेत्रा को ब्र्रेवरी कहा जाता था। अंग्रेजों के शासन काल में यहाँ वियन बनाने की भट्टी थी। 1987 में मनोरापीक के भूस्खलन का मलवा वीरभट्टी में आया, जिसमें 27 अंग्रेजों की मौत हो गई थी। अस्तबल, होटल, डाकखाना, पशु भी मलवे में दफन हो गये। तब वीयरभट्टी को भवाली खोल दिया गया। बाद में सिलीगुड़ी;आसाम में उसे शिफ्रट कर दिया गया था। यह इलाका नीमकरौली महाराज की कर्मस्थली भी रही है। पं. नेहरु सहित कई दिग्गज यहाँ आये हैं। पं.गोविन्द बल्लभ पन्त जी तो इसे घर ही मानते थे। ऐसे स्थान को मालदार परिवार ने अपनी कर्मस्थली बनाया। ठाकुर देव सिंह बिष्ट के पुत्र- दानसिंह-मोहनसिंह भाईयों ने जिस तल्लीनता के साथ वीरभट्टी क्षेत्रा में कार्य किये उनकी यादें आज भी हैं। दानसिंह जी की 6 पुत्रियां हुई और मोहन सिंह जी के तीन पुत्र 10 पुत्रियां। इनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज सिंह थे। इस बड़े कुनबे के परिजन यत्र-यत्र के साथ वीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट में भी रहते हैं। मोहन सिंह जी बहु रमा बिष्ट, पृथ्वीराज जी की पुत्री दीप्ति बिष्ट अपने बुजुर्गों की यादों को संजोये हुए हैं।
बिष्ट स्टेट वह क्षेत्र हैं जहाँ से उन्नति कर कई लोगों ने अपने भविष्य को संवारा है। इस प्रकार की धरोहरों को संवारने के लिये व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक कृत्य भी होने चाहिये। 1897 से लेकर 1922 तक यहाँ रामलीला मंचन भी हुआ है। इतिहास के गवाह इस इलाके के विकास की बात छोड़ शासन-प्रशासन अपने में ही उलझा है। यह क्षेत्रा बलियानाले का मुहाना है और रानीबाग तक दस हजार परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्रवासी चाते हैं कि वृटिश कालीन पुराने मार्ग के सौन्दर्यीकरण सहित बलियानाले का ट्रीटमेंट कार्य ठोस हो।

पिघलता हिमलाय 22 फरवरी 2016 के अंक से

अद्भुत है एकहथिया मन्दिर

पि.हि. प्रतिनिधि
थल/मुवानी। उत्तराखण्ड के हजारों गाँवों में हजारों प्रकार की ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की चीजें हैं, जिनके बारे में कथाओं, गाथाओं, किस्से, कहानियों में जानकारी मिलती है। ऐसी ही ऐतिहासिक महत्व की चीज थल से करीब दो किमी दूर स्थित है। ‘एकहथिया मन्दिर’ के रूप में स्थापित इस प्राचीन मन्दिर के बारे में कई प्रकार की चर्चाएं रही हैं और कहा जाता है कि किसी ने एक ही रात में एक हाथ से इस मन्दिर को एक ही पत्थर काटकर बनाया था।
वाकेई मन्दिर की कृति थल के ऐतिहासिक मन्दिर जैसी है किन्तु इसे एक विशाल पत्थर को काटकर ही बनाया गया है। मन्दिर में खूबसूरत नक्कासी के साथ ही पानी का छोटा सा कुण्ड बनाया गया है। पानी आने के लिये रास्ता बनाया गया है। शिवलिंग भी है लेकिन उल्टी दिशा में होने के कारण यहाँ दिया-बाती नहीं की जाती है। एकहथिया मन्दिर के बारे में जानकारी लेने व देखने के लिये दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं। पर्यटन विभाग की ओर से एक टिनशैड इसके पास बनाया गया है लेकिन इस ऐतिहासिक मन्दिर को बचाये रखने के लिये सुरक्षा दीवार अतिआवश्यक है अन्यथा भविष्य में इसे खतरा उत्पन्न हो सकता है।
बलतिर गाँव में स्थित एकहथिया मन्दिर के पास भेलियागाड़ के कारण पहाड़ में काफी जमीन भीतर की ओर कटी हुई है। जंगल और खेतों के बीच यह ऐतिहासिक महत्व की चीज फिलहाल सुरक्षित है लेकिन इसे सौन्दर्यीकरण के साथ संवारना चाहिये। गाड़ के पार अल्मिया गाँव स्थित है। थल से करीब दो किमी की दूरी पर स्थित बलतिर और अल्मिया गाँव कृषि के लिये अग्रणीय हैं किन्तु इनकी सुध् लेने के लिये शासन-प्रशासन ने हाथ हलकाने चाहिये। हाल यह है कि अपने आप से ग्राम संवारने वालों में इतनी उर्जा नहीं है कि वह बजह होने के बाद भी नेताओं को पकड़ कर अपनी समस्याएं हल करवा ले जाएं। न ही जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे हैं। गाँव में पलायन की मार अलग से है। रामगंगा घाटी की इस उपजाउ भूमि में भेलिया गाड़ और सालीखेतगाड़ के कारण पर्याप्त पानी भी है लेकिन कृषि आधारित छुटपुट कार्यों के सिवाय कुछ नहीं हो रहा है।
इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि कभी रामगंगा इसी जगह से होकर जाती थी जिसने बाद में अपनी दिशा बदली होगी। एकहथिया मन्दिर वाले क्षेत्रा में पाये जाने वाले पत्थरों से आसानी से अनुमान लग जाता है कि वह नदी के साथ रहे होंगे।
बलतिर ग्राम में तो दूर-दूर तक खेतों को देखकर प्रसन्नता होती है। यहाँ कुछ प्राचीन पेड़ हैं, जिन्हें पूज्य के रूप में माना गया है। काई इन्हें सतयुगी भी कहते हैं। इन पेड़ों के नीचे प्राचीन मूर्तियां और तराशे गये पत्थर भी रखे गये हैं। बलतिर की आवादी करीब डेढ़ हजार होगी, यहाँ एक प्राइमरी स्कूल है। इसके अलावा विकास के पत्थर नहीं लगे हैं। एकहथिया मन्दिर तक जाने के लिये थल से पैदल चढ़ाई वाला मार्ग तो है ही। थल मुवानी मोटर रोड से एक पक्की सड़क का मार्ग भी कटता है जो बलतिर गाँव पहँंुचाता है। इस प्रकार सड़क से आसान पहँुच वाले इस क्षेत्रा के विकास में अभी बहुत कुछ होना है।

बन्द पड़ा उन-कालीन का कारोबार

बलतिर ग्राम में श्रीमती तुलसी देवी मर्तोलिया ने उफनी कारोबार की जोरदार शुरुआत की थी लेकिन उनके अस्वस्थ्य होने के बाद से यह कारोबार लड़खड़ा गया। मूल रूप से आमथल के रहने वाले मर्तोलिया परिवार ने थल में रहते हुए ग्राम बलतिर में भूमि ली और भवन बनाया ताकि कृषि के साथ साथ उनी वस्त्र, दन-कालीन का कारोबार चलाया जाए। इसके लिये श्रीमती तुलसी मर्तोलिया ने प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया और लोगों को इससे जुड़ने के लिये प्रेरित किया किन्तु उनके अस्वस्थ्य होते ही यह कारोबार रुक गया। श्रीमती मर्तोलिया आज भी कभी कभार बलतिर अपने मकान पर जाती हैं लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनी कारोबार को चला पाना कठिन है। सरकार की ओर से लघु उद्योग के लिये बहुत सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। काश बलतिर में एक परिवार द्वारा छेड़ी गई इस मुहीम को जिन्दा रखने में मदद मिलती।

पिघलता हिमालय 28 दिसम्बर 2015 अंक से

बृजेन्द्र लाल साह ने लोकधुनों को लेकर तिकसैन में तैयार किया था रामलीला नाटक

भूपाल सिंह पांगती

डाॅ.पंकज उप्रेती
अल्मोड़ा निवासी रंगकर्मी स्व.बृजेन्द्र लाल साह को लोक संस्कृति के क्षेत्र में कार्य के लिये याद किया जाता है। विख्यात रंगकर्मी स्व.मोहन उप्रेती के सखा बृजेन्द्र लाल ने कुमाउनी रामलीला नाटक रचकर जो प्रयोग सीमान्त क्षेत्रा में किया, वह अवस्मरणीय है। उन पुरानी यादों को सहेजे हैं- भूपाल सिंह पांगती।
85 वर्षीय श्री भूपाल सिंह पांगती, नानासेम, मुनस्यारी के रहने वाले हैं। बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि माइग्रेसन के पुराने दौर में जब मल्ला जोहार, मुनस्यारी और भैंसखाल में उनका परिवार आवत-जावत करता था, तब भैंसखाल में वह जन्मे। तब मुनस्यारी बाजार को तिकसैन के नाम से ही ज्यादा जाना जाता था। सन् 1952-54 की बात है जब कपकोट और बैजनाथ में दो ब्लाक खुले थे और बड़े भाई कल्याण सिंह पांगती डिप्टी एजूकेटिव आपिफसर के रूप में कपकोट ;वर्तमान में जिला बागेश्वर में नियुक्त हुए। इनके साथ एक सहायक के रूप में श्री साह जी कपकोट आये। जब सन् 1956-57 में मुनस्यारी में ब्लाक खुला तो उस समय बृजेन्द्र लाल साह जी के लिये नया पद सृजित किया गया। वह पद कल्चरल डेवलपमेंट आफिसर का था। तत्कालीन स्थितियों में ब्लाक भवन और रहने के लिये आवासीय सुविधा न होने के कारण साह जी पांगती भवन में ही रहने लगे। भवन के ‘गोठ’ वाले कमरे में बृजेन्द्र साह रहते थे और वहीं लेखन इत्यादि करते। कल्चरल आर्गनाइजर दुर्गा सिंह पांगती और भूपाल सिंह जी के साथ बृजेन्द्र लाल नित चर्चा करते ताकि कोई नाटक लोकभाषा में बने। तब रामायण के ध्नुष यज्ञ प्रसंग का नाटक तैयार किया गया। गीतों के लिये पहाड़ी शब्दों को पिरोया गया और तिकसैन बाजार में हुए किसान मेले में इसका मंचन हुआ। इसी तैयारी को बाद में दुम्मर हरि प्रदर्शनी में भी दिखाया गया, जिसे लोगों ने बहुत सराहा। नाटक में भूपाल सिंह जी राजा जनक बने और बृजेन्द्र लाल जी परशुराम।
भूपाल सिंह जी यादों का स्मरण करते हुए बताते हैं कि बृजेन्द्र लाल साह लोक धुनों के माहिर थे और उन्हें कुमाउॅ गढ़वाल की कई धुनों का ज्ञान था। उन्हीं धुनों में पूरा रामलीला नाटक तैयार किया गया। जिसे बाद में डाॅ.शेर सिंह पांगती ने पुस्तक आकार में लिखा।
लेखक ने अपने शोध् कार्य के दौरान 1998-99 में कुमाउनी रामलीला पर एक अध्याय ही लिखा है। बृजेन्द्र लाल साह जी के साथ लोक धुनों पर शास्त्रीय रागों के सिलसिले में लम्बी वार्ता के बाद इन धुनों की रिकार्डिंग भी की है।

पिघलता हिमालय 28 नवम्बर 2016 अंक से

नारायण स्वामी का पहाड़ आगमन और कैलास यात्रा

मोहन सिंह मर्तोलिया

नारायण स्वामी जी का पहाड़ भ्रमण 1935 में हुआ जब वह कैलास यात्रा पर गये। इस महान सन्त के योगदान को इतिहास हमेशा याद रखेगा। इनकी विरासत को सम्भालना आज चुनौती बना हुआ है। इस दिशा में सभी को जागरुकता दिखानी चाहिये।
स्वामी जी का जन्म 2 दिसम्बर 1914 को उच्च महाराष्ट्रीय गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार में दत्त जयन्ती के दिन बुधवार रोहिणी नक्षत्रा में हुआ। कर्नाटक में जन्मे इस शिशु का नाम राघवेन्द्र रखा गया। पिता जी का नाम माध्वराव था, जो मैसूर राजा के वहाँ दीवान थे। स्वामी जीे बीएससी तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर से निकल गये और आश्रम-मठों में भ्रमण करने लगे। माता-पिता को पता नहीं चला कि उनके पुत्र को वैराग्य आ गया है। स्वामी जी को भ्रमण करते हुए मन में आया कि उत्तराखण्ड चारधाम यात्रा की जाए। वह अपने गुरु योगी रामानन्द जी के साथ निकल पड़े और जुलाई 1935 में अल्मोड़ा पहँुचे। यहीं से उन्होंने कैलास जाना तय कर लिया। नारायण स्वामी और योगी रामानन्द पैदल यात्रा करते हुए जोहार घाटी पहँुच गये। वहाँ से आगे चलकर उटाधूरा, किगड़ी- बिंगड़ एवं जयन्ती को पार कर 16000 फिट पठार तिब्बत के तीर्थपुरी पहँुचे। भस्मासुर पर्वत के तलहटी में स्नान कर आगे बढ़े और 19000 फिट उफंचाई डौल्पा ल्हा टाॅप फिट आगे 18000 फिट में गोरी कुण्ड पहँुचकर स्नान किया।
उन्होंने सुना था और स्कन्द पुराण मानस खण्ड से जाना था कि कोई महात्मा वर्षों से कैलास पर्वत में सिद्ध अवधूत लम्बे केश वाला यदा-कदा मिल जाता है। उसी सि( अवध्ूत सन्त के दर्शन इन सन्तों को हुए। इसके वाद वह अवधूत अन्र्तधान हो गये।
नारायण स्वामी जी ने 1952 तक 13 बार कैलास यात्रा की। 1940 में धरचूला के पांगू सोसा में नारायण आश्रम का वृहद स्तर पर निर्माण किया। जिसमें यात्रियों के रहने व अन्य सुविधओं जुटाई गईं। यहाँ 4-5 कर्मचारी व एक मैनेजर रहता है।
सन् 1938 में दिगतड़ पड़ाव ;डीडीहाट में एक कपड़े की दुकान शेर सिंह जंगपांगी ने खोली। जंगपांगी के साथ मुनस्यारी के उनके पुरोहित का पुत्रा दयाकृष्ण लोहनी दुकान में कार्य करता था। कैलास मानसरोवर यात्रा 1946 में श्री नारायण स्वामी के साथ गुजरात-बंगलौर बड़ौदा के उद्योगपति लोग हरीभाई देसाई, विठ्ठल भाई व अन्य साधू-सन्त दिकतड़ ;डीडीहाट पहँुचे। यहाँ नारायण स्वामी ने जंगपांगी जी व लोहनी जी से कहा कि इस क्षेत्र में एक हाईस्कूल होना चाहिये। आगे चलकर यह स्कूल महाविद्यालय तक होगा। यह बात सबको भली लगी और अस्कोट के रजवार एवं डीडीहाट के थोकदार लोगों को बुलाया गया। बैठक में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमें पाँच लोग इसके सदस्य बनाये गये। जिसमें मदन सिंह कन्याल मनड़ा गाँव, दयाकृष्ण लोहनी, नारायण सिंह कफलिया बिष्ट थोकदार हाट ग्राम, मेजर लक्ष्मण सिंह पाल अस्कोट, लक्ष्मी दत्त अवस्थी गरखा अस्कोट। बैठक की अध्यक्षता शोबन सिंह जीना वकील साहब अल्मोड़ा द्वारा की गई।
इस बैठक के बाद स्वामी जी के साथ पूरी कमेटी अस्कोट रजवार के पास गये। तब अस्कोट में 1946 जुलाई में धर्मशाला में कक्षा पाँच तक स्कूल शुरु किया गया। 1948 में ध्रमघर नामक जगह में हाईस्कूल भवन तैयार हुआ। 1952 में इसे इण्टर तक कर दिया गया। नारायण नगर इण्टर कालेज का नाम ‘बापू महाविद्यालय इण्टर कालेज’ रखा गया। यह इसलिये रखा गया क्योंकि स्वामी जी की इच्छा थी कि इसे शीघ्र ही महाविद्यालय का दर्जा दिया जायेगा। किन्तु स्वामी जी का 1956 में स्वर्गवास हो गया। ऐसे में विद्यालय को चला ले जाना कठिन हो गया और 1958 में राज्य सरकार ने इसका सरकारीकरण किया, जो रा0इ0कालेज नारायणनगर नाम से जाना जाता है।
इसके अलावा भी स्वामी जी ने कई प्रयास इस पहाड़ के लिये किये। आज जरूरत है उनके प्रयासों को संजोने के अलावा उनके कार्यों को आगे बढ़ाया जाए, जो चुनौती के रूप में है। स्वामी जी के भक्त किसी न किसी रूप में आज भी दूर-दराज से यहाँ आते हैं और पांगू के आश्रम को निहारते हैं। जरूरत उन कार्यों को बढ़ाने की है।

भवानसिंह धर्मशक्तू व कुन्दन सिंह धर्मशक्तू स्वामी से प्रभावित हुए
जोहार मिलम निवासी भवान सिंह धर्मशक्तू स्वतंत्रता सेनानी एवं कुन्दन सिंह ध्र्मशक्तू स्वतंत्राता सेनानी नारायण स्वामी से बेहद प्रभावित हुए और समाज सेवा में जुटे। स्वामी भगवतानन्द का 1980 में स्वर्गवास हो गया। कैलासानन्द वर्तमान में सरस्वती आश्रम गढ़ीकैन्ट, देहरादून में हैं।
उल्लेखनीय है कि स्वामी के भक्त विद्यानन्द स्वामी ने 1944 के बाद मुनस्यारी जोहार के रास्ते कैलास गये। 1945 में मुनस्यारी में समाजसेवी रामसिंह पांगती के शान्तिकुन्ज आवास में निवास करने लगे। तब भजन-कीर्तन-सत्संग में आस-पास के लोग जुटा करते थे। भवानसिंह व कुन्दन सिंह भी यहीं रमने लगे थे। 1950 में विद्यानन्द स्वामी हरिद्वार चले गये। तब दोनों धर्मशक्तू भी हरिद्वार गये और सन्यास ले लिया।

हरीभाई देसाई का योगदान रहा है
उद्योगपति हीराभाई देसाई स्वामी जी के अनन्य भक्त थे। सीमान्त में नारायण आश्रम एवं नारायण नगर में आश्रम व जहाँ भी स्वामी जी ने स्कूल इत्यादि स्थापित किये, हीराभाई उनमें संरक्षक की भूमिका में रहे। उन्होंने नारायणनगर में वृदह मन्दिर अपने योगदान से 1975 में बनवाया और 1977 में यहाँ मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उस आयोजन में बंगलौर, गुजरात, बड़ौदरा के उद्योगपति मय संगीत मण्डली के पधारे थे। अस्कोट, डीडीहाट के भक्तजन भी आयोजन में उपस्थित हुए। बाहर से आई कीर्तन मण्डली ने जाने समय अपने बजाने वाले मार्दल/मदृंग को डीडीहाट के संगीत रसिक परसीलाल वर्मा को दिया था। उस दौर में सन् 1975 से 1977 तक धन सिंह पांगती और लेखक ;मोहनसिंह प्रत्येक रविवार को नारायण नगर निरन्तर जाया करते थे। तब हरीभाई व उनकी पत्नी भी नाराणनगर में रहती थीं।

पिघलता हिमालय 27 फरवरी 2017 के अंक से

हरि प्रदर्शनी की तैयारी

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

मुनस्यारी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में मल्ला दुम्मर में प्रतिवर्ष होने वाली हरि प्रदर्शनी इस बार ठीक दीपावली के मौके पर होनी है। इसके लिये हरि स्मारक समिति ने तैयारी कर ली है। आयोजन को लेकर ग्रामीणों में उत्साह है। ऐसे में दीपावली के पटाखे फूटेंगे और प्रदर्शनी में ग्रामीण थिरकेंगे।
उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद से मल्ला दुम्मर में हरिसिंह ज्यू की याद में होने वाली इस प्रदर्शनी पर जोहार घाटी के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। साथ ही ग्रामीण प्रतिभाओं को खेलकूद, सांस्कृतिक मंच के माध्यम से अवसर मिलता है। घरेलू एवं कुटीर उद्योग प्रदर्शनी ग्रामीणों को उत्साहित करने वाली है। जिसमें घरेलू उत्पाद, कृषि, पुष्प, उनी वस्त्र, दन-पंखी कालीन, जड़ी-बूटी की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जानकारों द्वारा इनका निरीक्षण कर विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है। मुख्य रूप से जंगपांगी बन्धुओं द्वारा इस आयोजन को मनाया जाता है परन्तु क्षेत्र के सभी लोगों को इसमें सादर निमंत्राण होता है और सभी के सहयोग से इस प्रदर्शनी को विस्तार दिया जाता है। आजादी के बाद से निरन्तर बिना किसी सरकारी सहायता के इस प्रदर्शनी को करवाना साहस की बात है। अपने बुजुर्गों, स्वतंत्रा सेनानियों का स्मरण के साथ युवा प्रतिभाओं को सम्मान और आपसी भाईचारे के लिहाज से यह अनुकरणीय उदाहरण भी है। समय के साथ कई प्रकार के उत्सव-महोत्सव शहरी ढब में रंगे आयोजन हो रहे हैं लेकिन अपने लोक की खुशबू के साथ होने वाली हरि प्रदर्शनी का सानी नहीं। जिसमें मल्ला दुम्मर, तल्ला दुम्मर, दरकोट, दरांती, रांथी, जलद, तिकसैन से लेकर दूर-दूर तक के लोग पहुंचते हैं। महिला मंगल दलों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखने लायक होती हैं। यह प्रस्तुतियां उन कलाकारों से ज्यादा उम्दा होती हैं जिन्हें स्टार नाइट का ठेका शहरों में दिया जाता है या जो ग्लैमर के साथ शो करने के आदी हो चुके हैं।
हरि प्रदर्शनी को लेकर समिति के अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, गंगा सिंह जंगपांगी, किशन सिंह जंगपांगी, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, नरेन्द्र सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह पांगती, प्रधान पंकज बृजवाल, देवेन्द्र सिंह, हरीश धपवाल, मनोज धर्मशक्तू, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, चन्द्र सिंह लस्पाल, मंगल सिंह मर्तोलिया, मनोज जंगपांगी, राजेन्द्र सिंह मर्तोलिया, शंकरसिंह धर्मशक्तू, लक्ष्मण राम स्थानीय स्तर पर जुट हुए हैं।