
डाॅ.पंकज उप्रेती
हिमालय के उत्तरपूर्व में नेपाल सीमान्त पर समुद्रतल से लगभग तीन हजार फीट की ऊँची अन्नपूर्णा की चोटी पर स्थित है करोड़ों भक्तो की आस्था का प्रतीक पूर्णाेिगरी दरबार। उत्तर भारत के इस प्रसिद्ध मेले में इन दिनों भारी भीड़ जुटी हुई है। मान्यता के अनुसार पूर्णागिरी दर्शन करने वाले सीमा पार नेपाल ब्रह्मदेव में सि(बाबा मन्दिर के दर्शन भी जरूर करते हैं। नाचते-झूमते भक्तों के जत्थों को इन दिनों टनकपुर से लेकर मन्दिर तक देखा जा सकता है। मेले का यह क्रम पूरी ग्रीष्म रितु तक चलेगा। जिसमें लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना लिये पहँुचते हैं।
चैत्र मास की प्रतिपदा से लेकर बैसाख के अन्त तक दूर-दूर से आने वाले नर-नारियों का जमघट यहाँ प्रतिवर्ष लगता है। पूर्णागिरी माई की जय, पहाड़ वाली माई की जय, शेरावाली की जय, सच्चे दरवार की जय इत्यादि नारे लगाते हुए यात्री दल मीलों पैदल चलकर पूर्णागिरी मन्दिर दरबार पहँुचते हैं। आरोग्य, गृहस्थ, सुख सन्तान, ऐश्वर्य तथा दर्शन की लालसा लिये यात्रियों की मान्यता है कि उनकी यात्रा से मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण होगी। दुर्गा-सप्तष्ती में देवी की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है- ‘‘जो सिंह की पीठ पर विराजमान है। जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है जो मरकत मणि के समान कान्तिवाली अपने चारों भुजाओं मे शंख, चक्र, धनुष वाण धरण करती है व तीन नेत्रों से सुशोभित होती है। जिनके भिन्न-भिन्न अंग बंध्े हुए बाजूबन्द, कंकण, हार, खनखनाती हुई करघनी व नूपुरों से सुशोभित हैं। जिनके कानों में रत्न जड़ित, कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे भगवती हमारी दुर्गति दूर करने वाली है।’’
पूर्णागिरी नाम क्यों पड़ा, इस बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती द्वारा स्वयं को भस्म कर देने पर क्रुद्ध शिवजी जब सती की क्षत-विक्षत देह को आकाश मार्ग से ले चले तब मार्ग में लगभग 51 स्थलों पर देवी सती के अंग गिरे। पूर्णागिरी शिखर पर देवी का नाभि अंग गिरने से यह शिखर एक पुनीत स्थल माना जाने लगा। देवी के मन्दिर के बीच में एक बाॅबी/सुराख है। वह सती की नाभि ही है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। कहा जाता है कि कालान्तर में काठियाबाड़, गुजरात निवासी श्री चन्द्र तिवारी सम्वत् 1621 मे यवनों के अत्याचार से पीड़ित हो कुमायूं के चन्द्रवंशी राजा ज्ञानचंद के दरबार पहँुचे। इस प्राीचन देवी-स्थल की महिमा व स्वप्न में देवी का आदेश होने पर ब्रह्मकुण्ड/बोम के निकट स्नान कर सम्वत् 1632 में माँ पूर्णागिरी की मूर्ति की स्थापना की। इस प्राचीन मन्दिर का पूजा कार्य बाद में तिवारी और बल्हेड़िया वंश के लोगों ने परस्पर बांट लिया। खिलपति में अखिलतारिणी मन्दिर, उग्रतारा व बाराही मन्दिरों की स्थापना का श्रेय भी श्री चन्द्र तिवारी को है।
ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार अन्नपूर्णा शिखर के निकट सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी में, जो शारदा नदी के दूसरी ओर स्थित थी, एक विशाल यज्ञ आयोजित किया था जिसमें सभी देवताओं सहित भगवान शिव-पार्वती भी पधारे थे। निकटवर्ती पर्वत श्रेणियों की रमणीक दृृृश्यावली ने देवी पार्वती का मन मोह लिया और उन्होंने शिव से वहीं निवास करने की आज्ञा मांगी तभी से ब्रह्माजी की प्राचीन यज्ञ स्थली ब्रह्मदेव मण्डी तथा देवी पार्वती का वास स्थल पूर्णागिरी के नाम से विख्यात हुआ।
शारदा नदी के बायें तट पर बरमदेव/बूम के ठीक सामने सि(नाथ का प्राचीन मन्दिर एवं पूर्णागिरी मन्दिर के ठीक नीेचे देवी के चरण-स्थलों पर बना मन्दिर मार्ग की जटिलता के कारण प्रायः भक्तों की पहंँुच से बाहर ही हैं चैत्र मास में शारदा नदी में नावें डालकर बूम से ठाकुर जी की सवारी असली सिद्ध बाबा मन्दिर तक जाती व पूजन आदि कर वापस लौट आती है। सिद्धबाबा एक सिद्ध सन्त व देवी के अनन्य उपासक थे जिस पर पूर्णागिरी माता की विशेष कृपा थी। शक्ति स्वरूपा देवी भगवती ही उनकी इष्ट थी। दिन रात खड़े रहकर सच्चे मन से देवी की अराधना कर उन्हें सम्पूर्ण सिद्धियां व देवी से प्राप्त साक्षात्कार व संभाषण शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। किवदन्ती है कि देवी उपासक बाबा सदानन्द व सिद्धमणि पर्वत पर तपस्या रत बाबा सिद्धनाथ में परिचय होने पर देवी की महिमा व चमत्कारों को सुन सिद्धनाथ देवी दर्शन को अष्टमी की महारात्रि को सिंह की चिन्ता किए बिना अन्नपूर्णा शिखर की ओर चल दिये। एकान्त-विश्राम के इन क्षणों में पर पुरुष का आभास पाकर देवी क्रोधित हुए बिना न रह सकी और अपने इस भक्त को दो टुकड़ों में खण्डित कर शिखर से उछाल दिया। जिसका एक भाग शारदा नदी के पार नेपाल राज्य में व दूसरा भारत में बनखण्डी स्थान पर गिरा। देवी के इस कृत्य पर नेपथ्य आत्र्तनाद गूंज उठा- ‘‘देवी! क्या तुम्हारे भक्तों की यही दुर्गति होती है।’ देवी ने अपने भक्त सि द्ध नाथ को दर्शन दिये और आशीर्वाद देकर अन्र्तध्यान हो गई। बाबा लम्बे समय तक देवी-चरणों में सेवारत रहकर देवीधम सिधारे। अन्नपूर्णा शिखर के सामने नेपाल राष्ट्र में बाबा सि द्ध नाथ का प्राचीन मन्दिर व समाधि आस्थावानों के लिये श्र द्ध का केन्द्र है।
यात्रा की कठिन चढ़ाई-
माँ पूर्णागिरी के पुनीत स्थल की यात्रा कठिन चढ़ाई वाली है। देश-विदेश से यात्राीगण टनकपुर भाबर मण्डी में रात्रि विश्राम करते हैं। पैदल आने वाले जत्थे व वाहनों, रेल यात्रा द्वारा पहँुचे यात्राी टनकपुर से ठूलीगाड़ नामक स्थान पर पहँुचते हैं। प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी, महावली भीम द्वारा रोपित चीड़ वृक्ष, पाण्डव रसोई तथा उनकी उत्तराखण्ड यात्रा के पड़ाव स्थल इसी के समीप हैं। ठूलीगाड़ में प्रथम पड़ाव के साथ ही लगभग 5 किमी. की पथरीली पहाड़ की चढ़ाई पूरी करनी होती है। इस मार्ग पर बासी की चढ़ाई पूरी कर हनुमान चट्टी, ढलान पर लादी खोलाा, हल्की चढ़ाई पूरी कर पानी की टंकी व पर्यटक आवास दिखाई देता है। कुछ और चलने के बाद भैरोंचट्टी, पुरानी बाँवली व टुन्नास, काली मन्दिर, झूठा मन्दिर के बाद माता का दरबार मिलता है।
मान्यता है कि पहाड़ वाली माई की कृपा अबोध् बालकों, अशक्त महिलाओं तथा वृ(जनों को अपनी शरण में खींच लेती है।
टुन्नास से पवित्रा होकर यात्राीगण काली मन्दिर से आगे लगभग एक किमी की दुर्गम चढ़ाई, जो अब सीढ़ियाँ बनने तथा लोहे के पाइप लगने से सुगम हो गई है, प्रारम्भ करते हैं। इस मार्ग में झूठा मन्दिर, काली मन्दिर इत्यादि के दर्शन के साथ ही नैसर्गिक शोभा को निहारते यात्राी माता के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। सामने की पर्वत श्रृंखला में मित्रा राष्ट्र नेपाल की सीमा पर देवी के अनन्य उपासक सि द्ध बाबा के प्राचीन मन्दिर के दर्शन भी यात्राी जरूर करते हैं। इसके बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
टुन्नास बनाम इन्द्रभवन-
देवराज इन्द्र द्वारा गौतम ट्टषि की पत्नी अहिल्या से छलपूर्वक मिलने की कथा सर्वविदित है। कुपित ट्टषि के शाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान शिव के परामर्श से इन्द्र ने जिस स्थान पर यज्ञ किया वही प्राचीन स्थल इन्द्रभवन या टुन्नास के नाम से जाना जाता है। जो इस मनोहारी यात्रा का मुख्य पड़ाव है। यात्राीगण आते-जाते समय यहीं विश्राम करते है। व बालकों का मुण्डन, पूजा-पाठ व हवन आदि कराते हैं।
झूठे मन्दिर की कहानी-
वर्षों पहले एक सम्पन्न दम्पत्ति सन्तान की कामना लेकर माँ के दरबार में पधरा और सन्तान प्राप्ति पर देवी को सोने का मन्दिर चढ़ाने का वचन दिया। मनोकामना पूर्ण होने पर सेठ ने तांबे का मन्दिर बना उपर से सोने का पानी चढ़वा दिया। कई किमी से बनवाकर लाया गया यह मन्दिर सच्चे दरबार तक नहीं आ सकता और लाख प्रयत्न पर भी नहीं उठा। देवी ने सेठ की भेंट अस्वीकार कर दी, जिसे आज भी झूठे मन्दिर के रूप में जाना जाता है। टुन्नास के निकट रखा यह मन्दिर सच्चे दरबार की महिमा का बखान कर रहा है।
काली मन्दिर व भैरों बाबा-
झूठे मन्दिर से कुछ आगे चलकर काली देवी तथा भैरों बाबा का प्राचीन स्थल है। इसकी स्थापना कूर्मांचल नरेश राजा ज्ञानचन्द के विद्वान दरबारी पण्डित श्री चन्द्र त्रिपाठी ने की थी। राजा ने पण्डित को 6 गाँव उपहार में दिये थे। आज भी इन बिल्हा गाँव के निवासी बल्हेड़िया तथा तिराही गाँव के निवासी त्रिपाठी कहलाते हैं। मन्दिर का समस्त पूजा-कार्य इनके द्वारा किया जाता है। भैरों चट्टी पर देवी के अनन्य उपासक महाकाल भैंरो का प्राचीन स्थल व काली मन्दिर के निकट देवी के काली का रौद्र रूप धरण कर तूर्णा राक्षस का वध् स्थल भी है।
सिद्ध बाबा की समाधि-
एक दिन जब रात्रि में देवी सिंह की सवारी पर निकली तो निर्जन स्थल पर किसी पुरुष की उपस्थिति का आभास पाकर शेर ने गर्जना की और देवी ने समाधिस्थ बाबा सिद्ध मणि के दो टुकड़े कर पफंेक दिये। एक तो नीचे जाकर बनखण्डी नामक स्थान पर गिरा जहाँ आज भी मेला लगता है, दूसरा टुकड़ा सामने पहाड़ पर जाकर गिरा जहाँ समाधि स्थल सिद्ध बाबा का प्राचीन मन्दिर विद्यमान है। देवी के वरदान के कारण ही सिद्ध बाबा के दर्शन किये बिना पूर्णागिरी की यात्रा अपूर्ण समझी जाती है। इस कारण यात्राीगण देवी के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
माँ का दरबार-
चट्टान के उपर-नीचे रास्ते पार कर उँची चोटी पर पूर्णागिरी माता का दरावार है। जिसकी प्रधन शक्ति पीठों में गणना की जाती है। चबूतने पर नाभि, त्रिशूल व मूर्ति आदि चिन्ह हैं, जिसकी पूजा की जाती है। मन्दिर के पाश्र्व भाग में अति प्राचीन पत्रा, पुष्प फल रहित सूखा वृक्ष है। जिस पर अनेकों घंटियाँ व ध्वज पताकायें बंध्ी हैं और पास में त्रिशूल गढ़े हैं। नाभि स्थल ढका है।
