असाधारण महिला थी डाॅ. इन्दिरा हृदयेश

यादें…..
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुयण्तिथि पर उनके उपन्यास रजनीगंगा का विमोचन करती हुई । फोटो में दायं से सम्पादक स्व. कमला उप्रेती, डाॅ. इन्दिरा , स्व. दुर्गा सिंह रावत, श्री देवेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, सत्यवान सिंह जंगपांगी, श्रीराम सिंह धर्मशक्तू ,श्री क्रान्ति जोशी
डाॅ. पंकज उप्रेती-
उत्तराखण्ड की राजनीति में हमेशा धुरी बनकर रहीं नेता प्रतिपक्ष डाॅ.इन्दिरा हृदयेश असाधारण महिला थी। मूल रूप से बेरीनाग क्षेत्र के दशौली की इन्दिरा जी ने हर विपरीत परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाते हुए जमाने को बता दिया कि यदि आप आगे बढ़ना चाहते हैं तो कोई रोक नहीं सकता।
ऐसी धांकड़ इन्दिरा जी का 13 जून 2021 को प्रातः 10.30 बजे हृदयघात से निधन हो गया। 80 वर्षीय इन्दिरा ने जीवन-जगत के सच को समझते और देखते हुए जो तय किया वह असाधारण ही कर सकता है। हर विपरीत परिस्थितियों को अपना बनाने वाली इस नेता की बात यूपी के जमाने में भी पक्ष-विपक्ष हमेशा मानता था। शिक्षकों की नेता के रूप में एक शिक्षक का एमएलसी बनना और कांग्रेस सहित सभी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच शिष्टता के साथ अपनी बात रखने का इन्दिरा जी का लहजा उन्हें हमेशा श्रेष्ठता की श्रेणी में रखता है। वह जानती थी कि शासन किस प्रकार से चलता है और प्रशासन से कैसे कार्य करवाया जाए। हल्द्वानी के विकास में उनकी अमिट छाप हमेशा रहेगी। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्गज नेता स्व. एन.डी.तिवारी के निकट रही इन्दिरा जी उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी सत्ता पक्ष और विपक्ष में शीर्ष आसन पर रहीं।
पिघलता हिमालय परिवार से डाॅ. इन्दिरा हृदयेश का निकट का सम्बन्ध् था। विलक्षण प्रतिभा की इन्दिरा जी जब शुरुआत में हल्द्वानी में आई तो वह स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को जानती थीं। उस दौर के समाज और पत्रकारिता में जितना सच्चापन और मिठास थी, वह लोगों को जोड़ने वाला था। हल्द्वानी भी बाग-बगीचों का शहर था और हर जगह से लोग आकर बसने लगे थे। स्यौहारा बिजनौर के हृदयेश कुमार से इनका विवाह हुआ और वह हल्द्वानी में रहने लगे।
एक महिला जब समाज में आगे बढ़ना चाहती है तो उसे कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, वह इन्दिरा जी के जीवन से समझा जा सकता है। उनकी इन्हीं खूबियों को स्व. आनन्द बल्लभ जी ने जाना और प्रोत्साहित किया। राजनीति की चतुर और विद्वान इन्दिरा भी जानती थीं कि आनन्द बल्लभ को किसी प्रकार का लोभ-लालच नहीं है इसलिये वह तमाम मुद्दों पर खुलकर सम्वाद कर लेती। सूचना, लोकनिर्माण विभाग, संसदीय कार्य तथा विज्ञान एवं टैक्नालाॅजी मंत्री वह रहीं। बाद में संसदीय कार्य विधायी वित्त, वाणिज्य कर, स्टाम्प व निबन्धन, मनोरंजन कर, निर्वाचन, जनगणना, भाषा व प्रोटोकाल मंत्रालयों को संभाला। नेता प्रतिपक्ष के रूप में भी वह लोकप्रिय रही हैं। वह जानती थीं कि सूचना मंत्री रहते हुए आनन्द बल्लभ ने कभी भी उनसे विज्ञापन या अन्य मदद के लिये हाथ नहीं फैलाए। यही कारण था कि वह पत्रकारिता विषय को लेकर भी बातचीत करती। बाद के सालों में पत्रकारिता के गिरते जा रहे स्तर पर वह चिन्तित थीं लेकिन राजनीतिक दांवपंेच में प्रेसवार्ता का आयोजन करती रहीं। अपना वाहन भेजकर उप्रेती जी को विशेष तौर से बुलाती थी लेकिन पत्रकारिता की रंगीन दुनिया में उप्रेती जी ने प्रेसवार्ता में जाना छोड़ दिया। वह जानते थे कि इन्दिरा जी बोलेंगी और पत्रकार लिखेंगे, सवाल पूछने का साहस कोई नहीं करेगा। ऐसे में इन्दिरा जी स्वयं ही प्रेस में मिलने आईं और सार्वजनिक रूप से कहती थीं कि ‘उप्रेती जी पत्राकार हैं।’ जमाने की रंगीनियत में रंगना और राजनीति में सबको मनाए रखना एक बात है लेकिन इन्दिरा जी आदमी का मिजाज जानती थीं। वह ‘पिघलता हिमालय’ के हर आयोजन में अतिउत्साह से भागीदारी करती थीं। ऐसी विद्वान, दिग्गज नेता, संरक्षक को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजलि।
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;हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से लेखक आनन्द उप्रेती की पुस्तक के
पृष्ठ संख्या 67 से 71 तक में पढ़ें- इन्दिरा जी के जीवन के अनछुए पहलू

महान जनसेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. जगत सिंह पांगती

लक्ष्मण सिंह पांगती
स्व.जगत सिंह पांगती का जन्म 30 जून 1908 को भारत-तिब्बत सीमान्त गाँव मिलम के एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था। उनके पिता स्व.खड्गराय पांगती, आर्य समाजी विचारधारा के प्रबुद्ध एवं कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता थे, जिन्होंने 1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया, उनके ज्येष्ठ भ्राता स्व. भगत सिंह पांगती जोहार के प्रसि द्ध व्यापारी एवं उदार प्रकृति के व्यक्ति थे, जिनके पूर्ण सहयोग से ही वे सामाजिक क्षेत्र में एकाग्र होकर कार्य कर पाए।
जगत सिंह पांगती की प्रारम्भिक शिक्षा जोहार घाटी में सम्पन्न हुई। सन् 1923 की मिडिल स्कूल परीक्षा में पूरे प्रान्त की मेरिड में प्रथम स्थान पर रहे। सन् 1927 की हाईस्कूल परीक्षा में राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए तथा सम्पूर्ण कुमाउँ मण्डल में सर्वश्रेष्ठ छात्र घोषित हुए। इतना ही नहीं वे हाईस्कूल परीक्षा 1927 में सम्पूर्ण प्रान्त की मैरिट सूची में तृतीय स्थान पर भी रहे। राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा के सम्मान-पट्ट;आॅनर बोर्ड में अंकित आपका नाम आज भी देखा जा सकता है।
जगत सिंह पांगती के हृदय में प्रारम्भ से ही आजादी के लिए तड़प थी। मेरिट छात्रवृत्ति प्राप्त होने के बावजूद वे छात्र जीवन को वहीं छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े तथा राष्ट्र को समर्पित होने वाले जोहार के प्रथम तरुण बने। सन् 1928 में ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ आन्दोलन तथा विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार आदि जैसे देशभक्ति के कार्यों में सक्रिय रहे।
यह उनके जीवन का सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहला पड़ाव था। सन् 1929 में लाहौर अधिवेशन में भाग लेने की प्रबल इच्छा होते हुए भी वे सामाजिक कार्य में व्यस्त रहने के कारण उक्त अधिवेशन में न जा सके और उनके पिता स्व. खड्गराय पांगती ने लाहौर अधिवेशन में भाग लिया। इस अधिवेशन में स्व. खड्गराय पांगती के साथ स्व. दुर्गा सिंह रावत, स्व. राम सिंह पांगती तथा स्व. हरिमल सिंह बुर्फाल ने भी भाग लिया। लाहौर अधिवेशन में पारित ‘पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव’ को गाँव गाँव मंे उल्लास से कार्यानवयन में आपका महत्वपूर्ण सहयोग रहा। सन् 1934 तक क्षेत्रा में सार्वजनिक रचनात्मक कार्यों जैसे ग्राम सुधार, ग्राम स्वच्छता, पुस्तकालयों की स्थापना एवं शराबबन्दी आदि जैसे सामाजिक कार्यों में लिप्त रहे। सन् 1935 में कांग्रेस स्वर्ण जयन्ती को सफलतापूर्वक मनाने में पूर्ण सहयोग दिया। 1936 में कांग्रेस का सदस्य बनकर कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय हो गए। सन् 1938 में प्रदेश के कांग्रेस मंत्रिमण्डल ने आपको ग्राम सुधार संयोजक;आर्गनाइजर नियुक्त किया और 1940 तक आपने इस पद पर रहकर कुशलतापूर्वक कार्य सम्पादित किया।
सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन करते हुए स्थान ‘लाबगड़’ में 1 मई 1941 को आपको अन्य साथियों के साथ कैद कर तीन माह का सशक्त कारावास तथा रु. 50/- का आर्थिक दण्ड दिया गया। 12 मई से 2 अगस्त 1941 तक जिला कारागार अल्मोड़ा में आप बन्दी रहे और जेल से मुक्त होने के पश्चात जिला सत्याग्रह का संचालन करने लगे। 24 अगस्त 1942 को मुनस्यारी के दरकोट, देवीधार के मेले में हाथ में तिरंगा झण्डा लेकर आप तथा स्वामी भागवतानन्द जी के साथ पं.बचीराम जोशी के सभापत्तित्व में विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में शामिल हुए। 25 अगस्त 1942 को आन्दोलनकारियों के समूह के साथ मल्ला जोहार गोरीफाट में सत्याग्रह का प्रचार करते हुए मिलम से मुनस्यारी, तेजम आदि स्थानों से होते हुए 28 सितम्बर को अन्य 30 सत्याग्रहियों सहित बांसबगड़ में अंग्रेज पल्टन द्वारा गिरफ्रतार किए गए, जिसके फलस्वरूप उन्हें ग्राम थल में दो वर्ष का कठोर कारावास का दण्ड सुनाकर 11 अक्टूबर से 20 नवम्बर 1942 तक अल्मोड़ा एवं 21 नवम्बर से 5 अगस्त 1943 तक बरेली कारागार में में रखा गया। 6 अगस्त को उन्हें कैम्प जेल लखनउ में स्थानान्तरित कर दिया गया। बाद में आपको 26 जून 1944 को कारागार जीवन से मुक्ति मिली। इसके पश्चात वे अपने क्षेत्र में सहकारिता, कुटीर उद्योग और समाज सुधर जैसे विकास कार्यों के साथ-साथ कांग्रेस संगठन को मजबूत करने का कार्य करने लगे। उन्होंने पूज्य गांध्ी जी के वर्धा आश्रम के अनुरूप कुटीर उद्योगों की स्थापना की और जोहार में सहकारी संघ समितियों के द्वारा जनता को सहकारिता का लाभ दिलाया। इस प्रकार जोहार में सहकारी संघ समिति की स्थापना में आपका प्रमुख योगदान रहा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जोहार मण्डल कांग्रेस कमेटी के अनुरोध् पर शासन से पूज्य महात्मा गांध्ी जी के एक ‘अस्ति कलश को मानसरोवर में विसर्जित करने की स्वीकृति सरकार से प्राप्त की। स्व. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में जोहार के अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधि मण्डल लेकर आप अस्थि कलश के साथ मानसरोवर गए। जोहार के लोगों ने अस्थि कलश का जोदरार स्वागत करते हुए पूज्य बापूजी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सन् 1949 से सन् 1952 तक आप पंचायत राज इंस्पेक्टर के पद पर रह कर आपने देश सेवा की परन्तु सामाजिक सेवा कार्य को अपना जीवन का परम लक्ष्य मानते हुए तथा इस समाजसेवा के कार्य में इस पद को बाधा मानते हुए आपने इस पद को त्याग कर समाज के सामने एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। सरकारी सेवा से पदमुक्त होने के बाद जिला कांग्रेस नियोजन समिति अन्तरिम जिला परिषद अल्मोड़ा के सदस्य तथा विकासखण्ड मुनस्यारी के अध्यक्ष बने। सन् 1962 से से 1971 तक के विधान सभा चुनावों तथा ग्राम सुधार कार्यक्रमों में आपने अपने को व्यस्त रखते हुए उत्तरी सीमान्त की समस्याएं लेकर तथा डेलीगेशन के प्रबन्धकर्ता बनकर दिल्ली तथा लखनउ जाकर कई सुविधाएं प्रदान करवायीं। आप अत्यन्त दूरदर्शी थे। सन् 1962 में भारत चीन युद्ध के कारण सीमान्त क्षेत्रा जोहार, दारमा तथा गढ़वाल नीति-माणा आदि के निवासियों का तिब्बत व्यापार ठप हो गया जिसके कारया तीनों घाटियों के प्रबुद्ध एवं जागरुक समाजसेवियों को साथ लेकर तत्कालीन माननीय प्रधानमंत्री स्व. पं.जवाहरलाल नेहरू जी से मिले, उन्हें सूत से बनी माला पहना कर उनका अभिनन्दन किया तथा उन्हंे ज्ञापन प्रस्तुत किया। जिसमें इन सभी क्षेत्रों की आर्थिक समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हुए इन सभी इलाकों को जनजाति क्षेत्रा घोषित करने का अनुरोध् किया गया था। परिणामस्वरूप ये क्षेत्र जनजाति क्षेत्रा घोषित हुए और तब से आज तक उन्नति की ओर अग्रसर हैं। इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिये पूरा सीमान्त क्षेत्र हमेशा आपका आभारी रहेगा।
भोटिया पड़ाव हल्द्वानी की जमीन की लीज को ‘जोहार संघ’ के नाम स्थानान्तरित करने का पूर्ण श्रेय भी आपको जाता है। भोटिया पड़ाव को आदर्श पड़ाव बनाने का आपका सपना था जो अब एक विकसित आवासीय काॅलोनी बन चुकी है। यह स्वर्गीय जगत सिंह पांगती जी की प्रतिष्ठित सामाजिक धरोहर के रूप में याद की जाती रहेगी। इस प्रकार आप आजीवन जनसेवा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहे। स्व. जगत सिंह पांगती जी का देहावसान 6 मई 1977 को नई दिल्ली में हुआ।