हुणिया मित्र अपने जानवरों के साथ आ रहे थे तभी नदी में छलांग लगा दी

नेत्र सिंह गनघरिया से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
अपनी संस्कृति को बचाने के लिये केवल जमावड़ा करना पर्याप्त नहीं है, इसके लिए जागरूकता ही उपाय है। जागरूकता से ही संस्कृति बचती है। इसी धारणा के साथ चिन्तन-मनन और व्यवहार में लाने वाले डॉ.नेत्र सिंह गनघरिया के साथ बातचीत पर आधारित है पिघलता हिमालय का यह अंक। बातचीत में रोचक जानकारियों से पहले श्रीमान गनघरिया के बारे में जान लेते हैं- इतिहास बताता है कि गढ़वाल से इनकी आवत हुई। इनके पूर्वज कुंवर राजपूत थे। परगना सगरी ग्राम बधान में रहने वाले वाले धनु के दो लड़के माछू और धौलिया जो नन्दादेवी के उपासक थे। दोनों रहते हुए पूजा-पाठ में रत रहते थे लेकिन एक व्यक्ति उन्हें बराबर व्यवधान करता था, उनकी पूजा में बिघ्न करता। ऐसे में उन कुंवर भाईयों ने धनुष उठाया और उसे मार डाला। पकड़े जाने भय से राजा बाजबहादुर के समय यह भाई जोहार घाटी के मिलम में आ गए। मिलम में रहते हुए कुछ समय ही इन्हें हुआ था, मिलम वासियों ने कहा- आप पांछू जाकर रहो। इसके बाद एक भाई धौलिया बिल्जू गया जिन्हें ‘दास्पा’ और एक भाई गनघर गया जिन्हें ‘गनघरिया’ कहा गया। स्थान के अनुसार कुल नाम हुआ करता था। ब्रिटिश काल में कुमाउं के द्वितीय कमिश्नर विलयम ट्रेल जब अपने दौरे में इस सीमान्त क्षेत्र में आए तो उन्होंने गनघर को आबाद करने के लिये प्रोत्साहित किया। मौसम के हिसाब से माइग्रेसन करने वाले परिवार ने गनघर, घोरपट्टा और थाला में अपने रहने की व्यवस्था की। चौकोड़ी से काण्डा-बागेश्वर जाते समय हुदुमधार के पास है- थाला। पहाड़ के पीछे ढलान पर यह ग्राम गनघरिया परिवारों ने अपने लिये उपयुक्त माना और यात्रा पर निकलते समय अपने जानवरों के साथ यहीं डेरा डालने लगे। और अक्टूबर माह से मार्च तक थाला में रहने लगे। थाला में अभी हाल भी कुछ परिवार रहते हैं।
गनघरियाओं के इसी कुनबे में एक हुए- हरमल सिंह। इनके पुत्र हुए- बाला सिंह, कुन्दन सिंह, विशन सिंह, महिमन सिंह और गोकर्ण सिंह। परिवार की शाखाएं काफी फैली हैं। फिर बाला सिंह के सुपुत्र हुए- नेत्र सिंह और राजेन्द्र सिंह। इनकी अगली पीढ़ी की बात करें तो डॉ.नेत्रसिंह के पुत्र- सुजीत और पुत्री नीता हैं जबकि श्रीमान राजेन्द्र सिंह की पुत्रियां किरन, पूजा और पुत्र पंकज सिंह हैं।
पारिवारिक तानेबाने के बाद डाक्टर गनघरिया साहब के बचपन की ओर झांके तो पता चलता है 22 दिसम्बर 1950 को थाला में इनका जन्म हुआ। पधानचारी के परिवार में जन्म लेने वाले नेत्र सिंह, राजेन्द्र सिंह का लालन-पालन साधारण पृष्ठभूमि में हुआ। बचपन की पढ़ाई कमेड़ीदेवी से करने के बाद यह मुनस्यारी चले गये। बचपन के दिनों को याद करते हुए नेत्र सिंह जी बताते हैं- पढ़ने के साथ पाटी लेकर जाते और पाटी में घोटा लगाते हुए उसे दूसरे साथियों की पाटी से ज्यादा चमकदार बनाने का सब साथियों के लिये अनमोल क्षण होता। विद्यालय में छुट्टी से पहले गिनती, पहाड़े जोर-जोर से समूह में पढ़ते, जो सबको याद हो जाता। मुनस्यारी इण्टर कालेज के बाद अल्मोड़ा से बीएससी इन्होंने की और एमएससी करने नैनीताल चले गये। इस बीच कानपुर में एमबीबीएस करने के बाद पैरामिलीट्री फोर्स, बीएसएपफ में चिकित्साधिकारी, सहायक कमाण्डेंट के पद पर इनका चयन हुआ लेकिन अपनी उन मीठी यादों के साथ हमेशा अपने संस्कारों में बंध्े रहे। इन्होंने 31 साल तक फौजी परिवेश में विभिन्न जगहों, पदों पर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा एवं सफलता पूर्वक निर्वहन किया। इसके लिये इन्हें 26 जनवरी 2003 में राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। झेमू हरपाल राठ में गोविन्द सिंह पांगती की सुपुत्री तारा देवी से इनका विवाह हुआ। श्रीमती तारा भी सांगीतिक और साहित्यक अभिरुचि रखती हैं।
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डॉ. एन.एस.गनघरिया को बीएसएफ ग्वालियर की अकादमी में कम्पोजित अस्पताल में सेवा का अवसर मिला। पूर्वात्तर में अरुणाचल, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम सहित तमाम जगह इन्हें सेवा के दौरान जाने का अवसर मिला। बांग्लादेश सीमापर पर सिलचर में इनकी पहली पोस्टिंग रही। अपनी पूरी सेवा में उत्कृष्ट कार्यों के बाद जनवरी 2011 में सी.आई.एस.एफ. के निदेशक मेडिकल के पद से सेवानिवृत्त होकर इन्होंने हल्द्वानी में अपने परिवार के साथ रहना तय किया और जिस स्थान पर यह रहते हैं उसे हिमालय कालौनी के नाम से जाना जाता है। अपनी कालौनी को व्यवस्थित रूप देने से लेकर अपने मूल ग्राम तक की स्थितियों पर चिन्तनशील रहने वाले एन.एस.गनघरिया कहते हैं- ‘हमारा ग्राम गनघर नैसर्गिक सुन्दरता से परिपूर्ण है। इसके उत्तर पश्चिम में नन्दादेवी है। वहीं पास पांछू गाढ़ का मनोरम दृश्य दिखता है। दक्षिण में मापा और पूर्व में बिल्जू ग्राम है। प्राकृतिक रूप से इसकी सीमाएं निर्धारित हैं। अब बुर्फू से गनघर ग्राम तक प्रधानमंत्रा ग्रामीण सड़क योजना के अन्तर्गत सड़क बन रही है। अब मुनस्यारी से गनघर जाना आसान हो जाएगा। अपनी पुरानी यादों का जोरदार किस्सा वह बताते हैं- ‘‘तिब्बत से आने वाले हुणिया मित्रों का दल आ रहा था और हम लोग गनघर से देख रहे थे, पाछू गाड़ पर अस्थायी पुल से हुनिया लोग अपने हुनकारा के साथ आ रहे थे अचानक एक भेड़ ने पाछू गाड़ छलांग लगा दी, उसके बाद एक के बाद एक भेड़ छलांग लगाने लगे। गनघर से गये युवकों ने नदी में डूब चुकी भेड़ों को निकाला।’ गनघर और अपने बुजुर्गों से जुड़ी यादों को चिरस्थाई रखने के लिये इन्होंने हाल ही में माँ नन्दादेवी गनघर धार्मिक ट्रस्ट को बनाया है। इसका उद्देश्य अपनों को जोड़ने की पहल सहित पर्यावरण संरक्षण है। गनघर में नाग मन्दिर भी है जहाँ नाग देवता को पूजा जाता है। गोरखनाथ मन्दिर सहित स्थानीय शक्तियों के मन्दिर हैं।
समय के साथ बदलाव होता रहता है लेकिन समय के साथ अपनी धरोहरों को बचाए रखने की शानदार पहल करने वाले डॉ.गनघरिया अपने काज में सपफल हों यही कामना है।