पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट आधुनिक समय में वैज्ञानिक हिमालय की तमाम अनुकूलताओं का अध्ययन कर अधिक से अधिक लाभ लेने की खोज में लगे हुए है, परन्तु जब हिमालय की सुरक्षा का प्रश्न उठता है तो उस पर चिंता अवश्य व्यक्त की जाती है पर इस मुद्दे को गम्भीरता से नही लिया जाता है। यही कारण है कि ऐवरेस्ट जैसी दुनिया की सबसे ऊँची पर्वतश्रृंखला भी मानव गतिविधियों का केन्द्र बनी हुई है। उत्तराखण्ड हिमालय से लेकर हिमाचल, जम्मू-ंकश्मीर तथा पूर्वोतर हिमालय की विभिन्न पर्वत श्रृंखलाओं को फतेह करने की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप, पर्वतारोहियों, सौन्दर्य प्रेमियों, पर्यटकों द्वारा हिमालय पर्वत श्रृंखला ओं के साथ-साथ धार-खाल, नदी-नाले, गाड-गदेरे विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक कचरे से पटते जा रही है जो कि पर्यावरणीय दृष्टि से खतरनाक प्रवृति की ओर संकेत कर रहा है। वनों के विनाश से हिमालय की अद्भुत संतुलनकारी शक्ति क्षीण होने से जलवायु में अनेक विघटनकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। भूवैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय पर्वत श्रृंखला अभी नवीनतम पर्वत श्रृंखला है जिसके कारण वह अपनी जगह पर ठीक से स्थिर नहीं हो पाई है। हिमालय की स्थिर दिखने वाली इन चट्टानों की मोटी-मोटी परतों के भीतर बड़ी-बड़ी दरारें है, जिनके संधिस्थलों में भूगर्भिक हलचल के कारण उथल-पुथल होती रहती है। इसी कारण यहां निरन्तर भूकम्प, भूस्खलन, भूक्षरण एवं बा-सजय जैसी घटनायें होती रहती है और इनको बढ़ाने में बाह्य कारक जैसे; सड़क एवं बांध निर्माण में हो रहे विस्फोटों तथा भारी मशीनों का महत्त्वपूर्ण हाथ हैं। क्योंकि पहले से नाजुक चट्टानों के सन्धिस्थल इन विस्फोटों से और भी जीर्ण-शीर्ण हो जाते है जो भूकम्प आदि के झटकों को सहन नही कर पाने के कारण एक बड़ी त्रासदी का कारण बन जाते हैं। एक ओर जहाँ सभ्यता के साथ-साथ मनुष्य ने विकास के कई महत्त्वपूर्ण आयाम खोज निकाले है, तो वहीं दूसरी ओर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करके उसने सारे जैव-मण्डल में पर्यावरण असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है। पर्यावरण में परिवर्तन के प्रमुख कारण बड़े पैमाने पर हो रहे औद्योगिकीकरण के लिए वनों का कटान, परिवहन सुविधाओं के विस्तार के लिए सड़कों का निर्माण, संचार एवं अन्य आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आबादी में बेतहाशा वृद्धि ने स्वच्छ पर्यावरण के संरक्षण में कठिनाइयां पैदा कर दी है। प्राकृतिक रूप से बहने वाली वेगवान नदियों की धारा को मोड़कर मनुष्य ने अपने विकास और उत्थान की अंधी दौड़ में प्राकृतिक नियमों के विरूद्ध जो कार्य किये है। उसी का नतीजा है कि कुछ वर्षों से प्रकृति में ऐसी घटनायें घट रही है जिनका शायद ही किसी को कभी आभास रहा हो। लेकिन जिस प्रकार से प्रकृति धीरे-धीरे अपना विध्वंसक रूप धारण कर रही है उससे स्वंय मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है जिसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। हिमालय हमारी धार्मिक आस्था का आधार ही नही है, वरन् लाखों प्रजाति के पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों और बहुमूल्य जीव-जंतुओं का निवास स्थल भी हैं। हिमालय का आज हम जिस प्रकार दोहन करते जा रहे है उससे हिमालय को भारी नुकसान पहुंच रहा है। गाँधी जी ने कहा था कि ”यह धरती अपने प्रत्येक निवासी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यथेष्ट साधन उपलब्ध करती है परन्तु व्यक्ति के लालच की पूर्ति नही कर सकती है।” हिमालय से निकलनी वाली नदियां जीवन के लिए अमृततुल्य है जिन पर देश की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी का जीवन निर्भर करता है जो उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। देश की जलवायु एवं मौसम को नियंत्रित करने के साथ ही उत्तरी ध्रुव की ओर से आने वाली तेज एवं ठंड़ी हवाओं से भी हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की रक्षा करता हैं। हिमालय अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण भारतीय उपमहाद्वीप के लिए युगों-युगों से एक प्रहरी की भूमिका भी निभाता आ रहा है जो हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है। विश्व में भोगवादी व्यवस्था एवं मनुष्य की प्रकृति पर विजय पाने की प्रतिस्पर्धा ने सम्पूर्ण हिमालयी पर्यावरण को तहस-नहस करके रख दिया है, जिसके कारण आज प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का प्रश्न खड़ा हो गया है। यही नही विभिन्न प्रकार की पादप एवं जीव-जन्तुओं की प्रजातियां जो लगातार इस जैव-ंउचयमण्ड़ल से लुप्त होती जा रही है, उनके अस्तित्व को बचाये रखने के चुनौती भी सबके सामने है। विकास नदियों में बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण, उद्योगों के नाम पर खनन, वन उपज का शोषण एवं दोहन करके वे चीजें चलन में लाना चाहता है जिनकी बुनियादी आवश्यकता तो नही है, परन्तु उनके उपभोग के द्वारा अधिक से अधिक सुख-सुविधायें भोगना चाहता है जिसे विकास की दृष्टिसे प्रगति कहा जाता है। लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से अत्याचार, शोषण एवं विनाश का प्रतीक है। जिसका दण्ड प्रकृति कभी जानलेवा गर्मी, सर्दियों में अत्यधिक ठंड, बरसात में अनियंत्रित वर्षा, भूस्खलन, भूक्षरण, बा-सजय, बादल फटना, हिमालयी सुनामी जैसे प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देती रहती है और यदि यहीं स्थिति बनी रही तो आगे भी मनुष्य को प्रकृति के कोपभाजन बनने से कोई नहीं बचा सकता है। यहां प्रश्न उठता है कि जबसे हमने हिमालय बचाओं प्रतिज्ञा लेनी शुरू की है तब से हिमालय के संरक्षण में क्या कोई परिवर्तन आया है या नही? पर्यावरण दिवस के नाम पर प्रतिवर्ष बरसात के मौसम में स्कूल, कालेज, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों विधानसभाओं, संसद भवन एवं विभिन्न सरकारी सस्थाओं में लाखों पेड़ लगाये जाते है जिनको लगाते हुए खूब फोटो खीची जाती हैं पर इनमें कितने वृक्ष जीवीत हैं इसका किसी को पता है? यदि वृक्षारोपण के समय लगाये गये पेड़ जीवीत है तो इन संस्थाओं में गिनती के ही वृक्ष क्यों नजर आते है? और यदि हम उन वृक्षों को बचा नही पाये हैं तो ऐसे वृक्षारोपण का क्या लाभ है? वन विभाग भी प्रतिवर्ष वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाकर लाखों वृक्षों को लगाता/लगवाता है आखिर हर वर्ष इतनी संख्या में वृक्षारोपण की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? क्या यह मात्र खानापूर्ति तो नही है? ऐसे में हिमालय बचाओं की प्रतिज्ञा भी पर्यावरण दिवस की तरह प्रतिवर्ष प्रतिज्ञा लेने तक ही सीमित न रह जाय? क्योंकि हिमालय में प्रतिवर्ष दावाग्नि से ही लाखों पेड़-पौधे, जीव-जन्तु यानि पूरी जैव-विविधता नष्ट होती है जिसको बचाने का हम कोई उपाय नही ढूंढ पाये है? क्योंकि वैज्ञानिक भी धरती के बजाय दूसरे ग्रंहों पर जीवन की चिंता में रत है। इसीलिए सूर्य, चन्द्रमा पर जीवन की खोज करने में तो सफल हो गये है पर धरती पर जीवन को कैसे बचाया जाय इस पर सोचने का समय ही नही है। भविष्य की चिंता में हम वर्तमान को खोते जा रहे है जबकि आज अगर सुरक्षित होगा तो कल अपने आप खुशहाल होगा, परन्तु वास्तव में हम हिमालय के प्रति गम्भीर नही है। अतः यदि हम हिमालय के वनों को केवल आग से ही बचा पाने में सफल हो गये ंतो यही हिमालय बचाने की सबसे बड़ी प्रतिज्ञा होगी। ( असिस्टेंट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान, अ. प्र. बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग)
डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट/प्रो. पुष्पा नेगी हिमालय से निकलने वाली सदानीरा, पवित्र सलिला, नदियां सभ्यता, संस्कृति के साथ-साथ करोड़ों लोगों को जीवन देने की अनमोल शक्ति रखती है। गंगा और यमुना, सिंधु, सतलुज, काली, रामगंगा जैसी सदाबहार नदियों को हिमालय प्राणवायु देता है। हिमालय जब तक है, ये नदियां लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जरूरतें पूरी करती रहेंगी। हिमालय की विशिष्ट संरचना से इन नदियों को उपयुक्त ढलान मिलने के कारण इनके पानी में आॅक्सीजन की मात्रा भी अधिक होती है। देश में अधिकांश पानी की आवश्यकता की आपूर्ति हिमालय से निकलने वाली नदियों से होती है। पेयजल कृषि के अलावा देश में पनबिजली के उत्पादन में हिमालय से प्राप्त होने वाले पानी का बड़ा महत्व है। पानी के अतिरिक्त हिमालय से बेशकीमती वनोपज भी मिलती है। भारत के अनेक विश्व प्रसिद्ध मनोरम पर्यटन स्थल इसकी गोद में बसे है। हिमालय व उसके आस-पास उगने वाले पेड़ों और वहां रहने वाले जीव-जन्तुओं की विविधता, जलवायु, वर्षा, ऊंचाई और मिट्टी के अनुसार बदलती रहती है। हिमालय का अब तक हमने अपनी आवश्यकता से अधिक दोहन किया है यदि यह गैर जरूरी और अवैज्ञानिक सिलसिला अब भी नहीं रूका तो इस मनोवृति से हिमालय को भारी नुकसान पहुंच सकता है। नौ राज्यों में फैले हिमालय का विस्तार देश की 17 प्रतिशत जमीन पर है जिसके 67 प्रतिशत भू-भाग में जंगल है। जल बैंक के नाम से प्रतिष्ठित हिमालय देश के 65 प्रतिशत लोगों की पानी की आपूर्ति करता है और यह उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण हिमालय को देश का मुकुट कहा गया है जो देश की सीमा का रक्षक है। हिमालय हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है, इसलिए लोकगीतों से लेकर राष्ट्रगान तक में इसे विशेष महत्व दिया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्र को दृष्टिगत रखते हुए पाषाण में भी देवत्व देखने का जो मंत्र दिया, उसके कारण देश में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की परम्परायें जन्मी। वेदों में वर्णित नदी, सागर, सूर्य, चंद्र, जल और वायु हमारी आस्था के स्रोत रहे हैं। हमने तो वृक्षों से वरदान मांगना भी अपनी संस्कृति में समाहित कर लिया है। वृक्षों का समय-समय पर पूजन करके हम यश और कीर्ति के अनुगामी बनते है। अथर्ववेद में वृक्षों एवं वनों को संसार के समस्त सुखों का स्रोत कहा गया है। वन, वायु, जल, भूमि, आकाश हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार हैं और मानव ने अपनी संस्कृति व सभ्यता का सर्वप्रथम विकास इन्हीं नदी-घाटियों के इर्द-गिर्द किया है। नदियां हमारे अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अमृत तुल्य जल देती हैं, इसलिए ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। वायु और जल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए नितांत आवश्यक हैं इनके बिना जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है। उत्तराखण्ड में विभिन्न निर्माण कार्य जैसे सड़क, बांध परियोजना, रेलवे लाइन के लिए भूवैज्ञानिक फाॅल्ट लाइन, वनों की कटाई, विस्फोटक के इस्तेमाल, भूस्खलन के जोखिम को नजरअंदाज किया जा रहा है। सैकड़ों पनबिजली परियोजनायें यहां निर्माणाधीन है और कुछ प्र्रस्तावित है, जिनके निर्माण ने पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव के साथ-साथ यहां आपदाओं को बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। श्रीनगर परियोजना का मलवा 2013 की आपदा में पूरे शहर में भर गया, जिससे हजारों घर मलवे में दब गये, आई0 टी0 आई0 आज भी उसकी गवाही दे रहा है। वर्षा का होना प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु नदियों के मुहानों पर अनियमित, असुरक्षित और अनियोजित बुनियादी ढांचे का विकास तो मानवजनित है जिसने इन आपदाओं को त्रासदी बनाने का काम किया है। देश में नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता रहा है जिसमें उत्तराखण्ड भी पीछे नही है। यही कारण है कि आपदाओं से जो क्षति होती है उससे स्पष्ट पता चलता है कि प्रकृति प्रलोभन को कभी भी स्वीकार नही करती। उत्तराखण्ड में राज्य प्रशासन द्वारा 15, 16 और 17 जून, 2013 को भारी बारिश की चेतावनी की अनदेखी का नुकसान तीर्थयात्रियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी भुगतना पड़ा था। वर्तमान में जो प्रकृति से हमें निशुल्क में मिल रहा है यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में उसको भी शुद्धिकरण करके लेना होगा। न हवा शुद्ध, न पानी शुद्ध पूरी प्रकृति ही प्रदूषित होती जा रही है। शहर तो पहले ही प्रदूषण की चपेट में आ चुके थे परन्तु गांव और पहाड़ भी इसकी जद से नही बच पाये हैं। प्रदूषण के कारण धीरे-धीरे जलीय जीव समाप्त होते जा रहे है जो प्रदूषको को निस्तारित करने में महत्पूर्ण योगदान देते हैं। प्रकृति के सफाई करने वाले जीव गिद्ध, चील-कौवे, सियार आदि संकटग्रस्त है जो अब दिखाई देने मुश्किल हो गये हैं। यदि वन धरती को शुद्ध एवं शीतल छाया, हवा प्रदान करते है तो वहां से निकलनी वाली सदावहार नदियां हमें शीतल और निर्मल जल देती है जो जीवन का आधार है यानि जल, थल, नभ हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार है। आज मानव भौतिक रूप से जितना समृद्ध होता जा रहा है सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उतना ही विपन्न हो रहा है। अनादिकाल से ही गंगा जीवनदायिनी और मोक्ष दायिनी रही है, भारतीय संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता की प्रतीक रही गंगा की अविरल और निर्मल सतत् धारा के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गंगा को सम्पूर्णता में देखने और समझने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल धरती की सतह पर ही नही है, वरन् सतत् तौर पर भूमिगत जल धाराओं, बादलों और वायुमण्डल में भी प्रवाहमान है। समुद्र तटीय क्षेत्रों के आसपास ताजे पानी की धाराओं के गठन और नदी का सागर में मिलन, फिर वाष्पीकरण द्वारा बादलों का निर्माण और भारतीय भूखण्ड में मानसून ये सब घटनायें एक दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। इन सब प्रक्रियाओं को समग्रता से समझना होगा। मनुष्य के हस्तक्षेप ने जाने-अनजाने, लोभ-लिप्सा के वशीभूत होकर कई तरीकों से इस पूरे चक्र को नष्ट और बाधित किया हैं, जिसे ईमानदारी से स्वीकारने और समझने की जरूरत है। सम्भवतः ईश्वर ने मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते प्रकृति का संरक्षक नियुक्त किया, ताकि प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन हो सके। यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो सच्चाई यह है कि हम विपरीत दिशा यानि विध्वंस और विनाश की ओर जा रहें है। आजादी के बाद आधुनिक विकास के नाम पर कल-कारखाने खुलने शुरू हुए। कस्बों व नगरों मे रहने वालों की संख्या बढ़ी और इसी अनुपात में कूड़ा-करकट व रासायनिक अपशिष्टों में भी बढोतरी हुई और यह सब गंदगी गंगा में समाहित होने से लगातार गंगा मैली होती चली गई। जबकि उसकी सफाई पर कोई विशेष ध्यान नही दिया गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जिन्होंने खुद गंगा की महिमा पर लिखा था “हिमालय और गंगा का नाम आते ही आम भारतीय के मन में उसकी पवित्र और मनोहारी छवि उतर आती है”, परन्तु उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भी गंगा कुछ कम प्रदूषित नही हुई। प्रधानमंत्री राजीव गाॅधी के कार्यकाल में गंगा एक्शन प्लान तथा डाॅ0 मनमोहनसिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर इसकी सफाई के नाम पर अरबों रूपये खर्च तो किये, परन्तु गंगा स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त तो नही हुई परन्तु देश का अरबों रूपये खर्च अवश्य हो गया। भारतवर्ष में समाज, सभ्यता, संस्कृति और अकूत सम्पदा का निर्माण जल-जंगल-जमीन को विस्तार देकर ही हुई है और आज भी इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नही है। धार्मिक अंधविश्वास, स्नान व अस्थि विसर्जन नदियों के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। वनों का बेतहाशा विनाश किया जा रहा है वायु, जल प्रदूषण में व्यापक वृद्धि हुई है, भारी भूस्खलन एवं बाढ़ की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। कृषि में कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग ने प्राकृतिक संतुलन को अपार क्षति पहुंचाई है, अनेक कीट-पतंगों की प्रजातियां समाप्त हो गई हैं या हो रही है, जिनका प्राकृतिक रूप से परागण करने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज स्थिति इतनी विषम हो चुकी है कि परागण को कृत्रिम विधि द्वारा किया जाने लगा है। फूलों का रस चूसने वाले कीट-पतंगे खत्म हो जायेंगे तो परागण की समस्या उत्पन्न हो जायेगी जिससे प्राकृतिक रूप से जंगलों में नई पौधे उत्पन्न नही हो पायेंगी और वृक्षों की कमी के कारण मिटटी का बहाव बढ जायेगा। गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियाँ, जिनको भारतीय संस्कृति में मोक्ष एवं पापों के निवारणकर्ता के रूप में माना गया है और पुराणों में कहा गया है, ”गंगे तव दर्शनात मुक्तिः“। आज सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली में इतना अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया है कि राजा भागीरथ के पुरखों का कलुष धोने वाली गंगा, शहरों का मलमूत्र व फैक्ट्रियों का कचरा ढोते-ढोते इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका पानी पीने योग्य तो दूर नहाने योग्य तक नहीं रहा। यही नही गंगा अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषित हो चुकी है और सारे उत्तरी भारत को सुख समृद्धि देने वाली गंगा-यमुना का उद्गम स्थल भोगवादी पर्यटन के कारण गंदगी एवं कूड़े कचडे के ढेर से प्रदूषित होकर विपन्नता व नाना प्रकार की बीमारियों की प्रतीक बन गई है। गंगा भारतीय संस्कृति एवं आस्था से जुड़ी हुई है जिसकी सफाई पर खरबों रुपये खर्च किये जाने के बाद भी गंगा जस की तस बनी हुई है। एक तरफ हम नदियों को देवीस्वरूप मानते है तो दूसरी तरफ उन्हें रात-दिन कूड़े-करकट से भर रहे है। गंगा, गोमती, यमुना कोई भी नदी कितनी ही पूजनीय हो सब गंदगी से कराह रही है, इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। गंगा सफाई का अभियान तभी सफल होगा, जब इससे सीधे लोगों को जोड़ा जाएगा। इस अभियान को आंदोलन बनाना होगा। लोगो को यह बताना होगा कि गंगा मानव जीवन के लिए कितनी उपयोगी है कि इनका अस्तित्व में रहना हमारे लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखने जैसा है। इस अभियान की सफलता के लिए सबसे पहला और प्रवाही कदम शहरी और औद्योगिक कचरे को गंगा में गिरने से रोकना होगा। इसके लिए उन प्रमुख शहरों में जो गंगा के किनारे बसे हैं उनसे निकलने वाले नालों के पानी के लिए जल संशोधन संयत्रों की स्थापना करनी होगी। कचरे का रूप परिवर्तित कर उसके उपयोग का विकल्प ढूढना होगा। जल संशोधन के जरिए गंदे पानी को साफ कर फिर उसे सम्बन्धित कम्पनियों के उपयोग लायक बनाना होगा, जिससे गंगा में गिरती रासायनिक गंदगी को रोका जा सके। प्रश्न यहां मात्र गंगा की स्वच्छता का नही बल्कि नदियों की स्वच्छता एवं संरक्षण का है जिससे गंगा एवं अन्य नदियां अविरल एवं अनवरत रूप से बहती रहे। जब तक सभी नदियां प्रदूषण मुक्त एवं संरक्षित नही होगी तब तक गंगा का स्वच्छ एवं संरक्षित होना असम्भव है, क्योंकि गंगा में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियां ही काफी हद तक गंगा को जीवीत रखे हुए है इसलिए यदि गंगा को बचाना है तो उनका संरक्षण, संवर्द्धन किया जाना नितांत आवश्यक है। आज खुद मोक्षदायिनी गंगा भगीरथ के इंतजार में है जो उसे इस गंदगी से मुक्ति दिला सके। डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट-असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान प्रो. पुष्पा नेगी प्राचार्य अनुसुइया प्रसाद बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग