मोक्षदायिनी गंगा को है भगीरथ का इंतजार

डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट/प्रो. पुष्पा नेगी
हिमालय से निकलने वाली सदानीरा, पवित्र सलिला, नदियां सभ्यता, संस्कृति के साथ-साथ करोड़ों लोगों को जीवन देने की अनमोल शक्ति रखती है। गंगा और यमुना, सिंधु, सतलुज, काली, रामगंगा जैसी सदाबहार नदियों को हिमालय प्राणवायु देता है। हिमालय जब तक है, ये नदियां लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जरूरतें पूरी करती रहेंगी। हिमालय की विशिष्ट संरचना से इन नदियों को उपयुक्त ढलान मिलने के कारण इनके पानी में आॅक्सीजन की मात्रा भी अधिक होती है। देश में अधिकांश पानी की आवश्यकता की आपूर्ति हिमालय से निकलने वाली नदियों से होती है। पेयजल कृषि के अलावा देश में पनबिजली के उत्पादन में हिमालय से प्राप्त होने वाले पानी का बड़ा महत्व है। पानी के अतिरिक्त हिमालय से बेशकीमती वनोपज भी मिलती है। भारत के अनेक विश्व प्रसिद्ध मनोरम पर्यटन स्थल इसकी गोद में बसे है। हिमालय व उसके आस-पास उगने वाले पेड़ों और वहां रहने वाले जीव-जन्तुओं की विविधता, जलवायु, वर्षा, ऊंचाई और मिट्टी के अनुसार बदलती रहती है। हिमालय का अब तक हमने अपनी आवश्यकता से अधिक दोहन किया है यदि यह गैर जरूरी और अवैज्ञानिक सिलसिला अब भी नहीं रूका तो इस मनोवृति से हिमालय को भारी नुकसान पहुंच सकता है। नौ राज्यों में फैले हिमालय का विस्तार देश की 17 प्रतिशत जमीन पर है जिसके 67 प्रतिशत भू-भाग में जंगल है। जल बैंक के नाम से प्रतिष्ठित हिमालय देश के 65 प्रतिशत लोगों की पानी की आपूर्ति करता है और यह उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण हिमालय को देश का मुकुट कहा गया है जो देश की सीमा का रक्षक है। हिमालय हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है, इसलिए लोकगीतों से लेकर राष्ट्रगान तक में इसे विशेष महत्व दिया गया है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्र को दृष्टिगत रखते हुए पाषाण में भी देवत्व देखने का जो मंत्र दिया, उसके कारण देश में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की परम्परायें जन्मी। वेदों में वर्णित नदी, सागर, सूर्य, चंद्र, जल और वायु हमारी आस्था के स्रोत रहे हैं। हमने तो वृक्षों से वरदान मांगना भी अपनी संस्कृति में समाहित कर लिया है। वृक्षों का समय-समय पर पूजन करके हम यश और कीर्ति के अनुगामी बनते है। अथर्ववेद में वृक्षों एवं वनों को संसार के समस्त सुखों का स्रोत कहा गया है। वन, वायु, जल, भूमि, आकाश हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार हैं और मानव ने अपनी संस्कृति व सभ्यता का सर्वप्रथम विकास इन्हीं नदी-घाटियों के इर्द-गिर्द किया है। नदियां हमारे अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अमृत तुल्य जल देती हैं, इसलिए ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। वायु और जल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए नितांत आवश्यक हैं इनके बिना जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है।
उत्तराखण्ड में विभिन्न निर्माण कार्य जैसे सड़क, बांध परियोजना, रेलवे लाइन के लिए भूवैज्ञानिक फाॅल्ट लाइन, वनों की कटाई, विस्फोटक के इस्तेमाल, भूस्खलन के जोखिम को नजरअंदाज किया जा रहा है। सैकड़ों पनबिजली परियोजनायें यहां निर्माणाधीन है और कुछ प्र्रस्तावित है, जिनके निर्माण ने पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव के साथ-साथ यहां आपदाओं को बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। श्रीनगर परियोजना का मलवा 2013 की आपदा में पूरे शहर में भर गया, जिससे हजारों घर मलवे में दब गये, आई0 टी0 आई0 आज भी उसकी गवाही दे रहा है। वर्षा का होना प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु नदियों के मुहानों पर अनियमित, असुरक्षित और अनियोजित बुनियादी ढांचे का विकास तो मानवजनित है जिसने इन आपदाओं को त्रासदी बनाने का काम किया है। देश में नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता रहा है जिसमें उत्तराखण्ड भी पीछे नही है। यही कारण है कि आपदाओं से जो क्षति होती है उससे स्पष्ट पता चलता है कि प्रकृति प्रलोभन को कभी भी स्वीकार नही करती। उत्तराखण्ड में राज्य प्रशासन द्वारा 15, 16 और 17 जून, 2013 को भारी बारिश की चेतावनी की अनदेखी का नुकसान तीर्थयात्रियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी भुगतना पड़ा था।
वर्तमान में जो प्रकृति से हमें निशुल्क में मिल रहा है यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में उसको भी शुद्धिकरण करके लेना होगा। न हवा शुद्ध, न पानी शुद्ध पूरी प्रकृति ही प्रदूषित होती जा रही है। शहर तो पहले ही प्रदूषण की चपेट में आ चुके थे परन्तु गांव और पहाड़ भी इसकी जद से नही बच पाये हैं। प्रदूषण के कारण धीरे-धीरे जलीय जीव समाप्त होते जा रहे है जो प्रदूषको को निस्तारित करने में महत्पूर्ण योगदान देते हैं। प्रकृति के सफाई करने वाले जीव गिद्ध, चील-कौवे, सियार आदि संकटग्रस्त है जो अब दिखाई देने मुश्किल हो गये हैं। यदि वन धरती को शुद्ध एवं शीतल छाया, हवा प्रदान करते है तो वहां से निकलनी वाली सदावहार नदियां हमें शीतल और निर्मल जल देती है जो जीवन का आधार है यानि जल, थल, नभ हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार है। आज मानव भौतिक रूप से जितना समृद्ध होता जा रहा है सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उतना ही विपन्न हो रहा है।
अनादिकाल से ही गंगा जीवनदायिनी और मोक्ष दायिनी रही है, भारतीय संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता की प्रतीक रही गंगा की अविरल और निर्मल सतत् धारा के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गंगा को सम्पूर्णता में देखने और समझने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल धरती की सतह पर ही नही है, वरन् सतत् तौर पर भूमिगत जल धाराओं, बादलों और वायुमण्डल में भी प्रवाहमान है। समुद्र तटीय क्षेत्रों के आसपास ताजे पानी की धाराओं के गठन और नदी का सागर में मिलन, फिर वाष्पीकरण द्वारा बादलों का निर्माण और भारतीय भूखण्ड में मानसून ये सब घटनायें एक दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। इन सब प्रक्रियाओं को समग्रता से समझना होगा। मनुष्य के हस्तक्षेप ने जाने-अनजाने, लोभ-लिप्सा के वशीभूत होकर कई तरीकों से इस पूरे चक्र को नष्ट और बाधित किया हैं, जिसे ईमानदारी से स्वीकारने और समझने की जरूरत है। सम्भवतः ईश्वर ने मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते प्रकृति का संरक्षक नियुक्त किया, ताकि प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन हो सके। यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो सच्चाई यह है कि हम विपरीत दिशा यानि विध्वंस और विनाश की ओर जा रहें है।
आजादी के बाद आधुनिक विकास के नाम पर कल-कारखाने खुलने शुरू हुए। कस्बों व नगरों मे रहने वालों की संख्या बढ़ी और इसी अनुपात में कूड़ा-करकट व रासायनिक अपशिष्टों में भी बढोतरी हुई और यह सब गंदगी गंगा में समाहित होने से लगातार गंगा मैली होती चली गई। जबकि उसकी सफाई पर कोई विशेष ध्यान नही दिया गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जिन्होंने खुद गंगा की महिमा पर लिखा था “हिमालय और गंगा का नाम आते ही आम भारतीय के मन में उसकी पवित्र और मनोहारी छवि उतर आती है”, परन्तु उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भी गंगा कुछ कम प्रदूषित नही हुई। प्रधानमंत्री राजीव गाॅधी के कार्यकाल में गंगा एक्शन प्लान तथा डाॅ0 मनमोहनसिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर इसकी सफाई के नाम पर अरबों रूपये खर्च तो किये, परन्तु गंगा स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त तो नही हुई परन्तु देश का अरबों रूपये खर्च अवश्य हो गया। भारतवर्ष में समाज, सभ्यता, संस्कृति और अकूत सम्पदा का निर्माण जल-जंगल-जमीन को विस्तार देकर ही हुई है और आज भी इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नही है। धार्मिक अंधविश्वास, स्नान व अस्थि विसर्जन नदियों के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
वनों का बेतहाशा विनाश किया जा रहा है वायु, जल प्रदूषण में व्यापक वृद्धि हुई है, भारी भूस्खलन एवं बाढ़ की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। कृषि में कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग ने प्राकृतिक संतुलन को अपार क्षति पहुंचाई है, अनेक कीट-पतंगों की प्रजातियां समाप्त हो गई हैं या हो रही है, जिनका प्राकृतिक रूप से परागण करने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज स्थिति इतनी विषम हो चुकी है कि परागण को कृत्रिम विधि द्वारा किया जाने लगा है। फूलों का रस चूसने वाले कीट-पतंगे खत्म हो जायेंगे तो परागण की समस्या उत्पन्न हो जायेगी जिससे प्राकृतिक रूप से जंगलों में नई पौधे उत्पन्न नही हो पायेंगी और वृक्षों की कमी के कारण मिटटी का बहाव बढ जायेगा। गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियाँ, जिनको भारतीय संस्कृति में मोक्ष एवं पापों के निवारणकर्ता के रूप में माना गया है और पुराणों में कहा गया है, ”गंगे तव दर्शनात मुक्तिः“। आज सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली में इतना अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया है कि राजा भागीरथ के पुरखों का कलुष धोने वाली गंगा, शहरों का मलमूत्र व फैक्ट्रियों का कचरा ढोते-ढोते इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका पानी पीने योग्य तो दूर नहाने योग्य तक नहीं रहा। यही नही गंगा अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषित हो चुकी है और सारे उत्तरी भारत को सुख समृद्धि देने वाली गंगा-यमुना का उद्गम स्थल भोगवादी पर्यटन के कारण गंदगी एवं कूड़े कचडे के ढेर से प्रदूषित होकर विपन्नता व नाना प्रकार की बीमारियों की प्रतीक बन गई है। गंगा भारतीय संस्कृति एवं आस्था से जुड़ी हुई है जिसकी सफाई पर खरबों रुपये खर्च किये जाने के बाद भी गंगा जस की तस बनी हुई है।
एक तरफ हम नदियों को देवीस्वरूप मानते है तो दूसरी तरफ उन्हें रात-दिन कूड़े-करकट से भर रहे है। गंगा, गोमती, यमुना कोई भी नदी कितनी ही पूजनीय हो सब गंदगी से कराह रही है, इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। गंगा सफाई का अभियान तभी सफल होगा, जब इससे सीधे लोगों को जोड़ा जाएगा। इस अभियान को आंदोलन बनाना होगा। लोगो को यह बताना होगा कि गंगा मानव जीवन के लिए कितनी उपयोगी है कि इनका अस्तित्व में रहना हमारे लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखने जैसा है। इस अभियान की सफलता के लिए सबसे पहला और प्रवाही कदम शहरी और औद्योगिक कचरे को गंगा में गिरने से रोकना होगा। इसके लिए उन प्रमुख शहरों में जो गंगा के किनारे बसे हैं उनसे निकलने वाले नालों के पानी के लिए जल संशोधन संयत्रों की स्थापना करनी होगी। कचरे का रूप परिवर्तित कर उसके उपयोग का विकल्प ढूढना होगा। जल संशोधन के जरिए गंदे पानी को साफ कर फिर उसे सम्बन्धित कम्पनियों के उपयोग लायक बनाना होगा, जिससे गंगा में गिरती रासायनिक गंदगी को रोका जा सके। प्रश्न यहां मात्र गंगा की स्वच्छता का नही बल्कि नदियों की स्वच्छता एवं संरक्षण का है जिससे गंगा एवं अन्य नदियां अविरल एवं अनवरत रूप से बहती रहे। जब तक सभी नदियां प्रदूषण मुक्त एवं संरक्षित नही होगी तब तक गंगा का स्वच्छ एवं संरक्षित होना असम्भव है, क्योंकि गंगा में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियां ही काफी हद तक गंगा को जीवीत रखे हुए है इसलिए यदि गंगा को बचाना है तो उनका संरक्षण, संवर्द्धन किया जाना नितांत आवश्यक है। आज खुद मोक्षदायिनी गंगा भगीरथ के इंतजार में है जो उसे इस गंदगी से मुक्ति दिला सके।
डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट-असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान
प्रो. पुष्पा नेगी प्राचार्य
अनुसुइया प्रसाद बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग

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