कथा- राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम

नरेन्द्र सिंह दताल
उत्तराखण्ड के न्यौला पंचाचूली हिमशिखर के ठीक सामने बसा ग्राम दाँतू ;दंग्तों के टिटम बं-चर्यक्या दं/टाॅप नामक स्थान पर ‘दारमा’ के प्रथम शासक राजा श्री चर्यक्या ह्या का किला था, यह ‘टिटम दं बं- चर्यक्या दं’ स्थित किला ग्राम दाँतू के उच्च पर्वत माला का ऐसा उच्चनुमा समतल भू-भाग पर निर्मित था, मानो यह किला स्वयं में प्रहरी हो। किसी भी आक्रमणकारी दुश्मनों का चारों तरफ से आसानी से किला तक पहुँच पाना असम्भव था। इस कारण यह उच्च पर्वतमाला चर्यक्या दं बं चारों दिशा के स्थलीय मार्गों से सुरक्षित था। ग्राम दाँतू से चर्यक्या दं किला तक पहुँचने का एकमात्र उपयोग सबसे नजदीक खतरनाक चट्टानी चढ़ाई वाला मार्ग है। ये स्वतन्त्र रं शासक थे, इस किले की दीवारों के अवशेष के साक्ष्य आज से दो दशक पूर्व तक स्पष्ट देखने को मिलते थे। इस रं शासक के किले से तीनों दिशाओं में स्थित अधिकतर ग्रामों जैसे- दाँतू, दुग्तू, सौंन, बौंन, फिलम, गौ, होला, ढाकर, दिदंग जो आज भी चर्यक्या टाॅप से दिखाई देते हैंै। इस उच्च टिटम बं थं- चर्यक्या दं स्थल के चयन का भौगोलिक कारण यह भी हो सकता है- यह स्थान पूरे दारमा ग्राम का ऐसा उच्च सुरक्षित स्थल है जहाँ पूरे शीतकाल का अत्यधिक शीत माह दिसम्बर-जनवरी के कुछ दिनों को छोड़कर अन्य शीत माह के चार-पाँच दिन से अधिक दिनों तक बर्फ नहीं जम पाता है क्योंकि इस स्थल पर ‘सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक’ पर्याप्त मात्र में सूर्य का प्रभाव बना रहता है।
‘राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम’ की दो रानियाँ थी, एक पटरानी, दूसरी दासीरानी। दोनों रानियों से एक-एक पुत्र प्राप्त हुए। दोनों ही बाल राजकुमार चर्यक्या ह्या की भाँति नयन-पक्ष, तेजस्वी-आकर्षक, सुन्दर दिखते थे। कुमाउँ के उत्तर-पूर्व हिमालय हिम क्षेत्रों ;सीमान्त परिक्षेत्र व पश्चिम तिब्बत प्रान्तों के शासकों में से ‘राजा चर्यक्या ह्या-प्रथम’ उस काल के ढाल तलवार युद्ध कुशलता से परिपूर्ण शौर्यवान, प्रतिष्ठित शासक थे। राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम के अन्तर्गत आने वाले 18 से 20 ग्रामों के सभी ग्रामवासी सम्पन्न व खुशहाल थे, इसी कारण राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम के राज्य का नाम उत्तर पूर्व हिम क्षेत्र कुमाउँ पश्चिम तिब्बत हिम सीमान्त प्रदेश तक था। उस काल में इस राजा श्री ने कभी भी दूसरे छोटे ग्रामों व अन्य प्रान्तों को युद्ध नीति से जीतने की कोशिश नहीं की, और न ही दूसरों पर अपना जबरदस्ती अधिकार जमाया। माना जाता है कि एक बार राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम के पटरानी के पुत्र गम्भीर रूप से बीमार थे। काफी इलाज करवाने पर भी बाल राजकुमार स्वस्थ नहीं हुए। राजा को पश्चिम तिब्बत प्रान्तीय राजा लामा जी की ‘आध्यात्मिक शक्ति ज्ञान नाड़ी जड़ी विद्या’ के बारे में पता चला और राजा श्री ने पश्चिम तिब्बत प्रान्तीय ‘राजा लामा’ जी को बाल राजकुमार के इलाज हेतु सन्देशवाहक को भेजा। राजा लामा जी रं लुंग्बा, दारमा घाटी भ्रमण दर्शन व उपचार करवाने हेतु ग्राम दाँतू पहुँचे। यहाँ से खूबसूरत दिखाई देने वाला जै न्यौंला सै। पंचाचूली पर्वत श्रृंखला ;पाँच पाण्डव हिम शिखर की नैसर्गिक खूबसूरती को निहारते रहे, साथ ही लामा जी ने ग्राम दाँतू मैदानी खेत के मध्य स्थित ‘प्राचीन नामचिंम बावे जल स्रोत’ से पानी पिया। यहीं आराम करने के लिए रुके। राज श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम के बार-बार उच्च स्थान पर स्थित राज भवन आने के अनुरोध् पर भी वे राज भवन न जाकर ‘नामचिम बावे थं’ से जैं न्यौंला पंचाचूली हिमशिखर की खूबसूरत विहंगम दृश्य को निहारते और आध्यात्मिक का आनन्द लेते हुए यहीं टैन्ट लगवाकर रुके। यहीं से ही अस्वस्थ्य बाल राज कुमार को ‘दूर नाड़ी विद्या ज्ञान’ के माध्यम से उपचार करने की हामी भरी और राजा श्री को चिन्ता न करने की बात कही, साथ ही उपचार शुरु किया। राज लामा जी ने ‘छम बें ;बकरी के उन से बिना हुआ धागा’ का एक सिरा अस्वस्थ बाल राजकुमार के कलाई में बाँध्ने का सन्देश भेजा। राजा श्री चर्यक्या ने सोचा कि इतने दूर से ऐसा कैसे इलाज हो सकता है। इस शंका से राज लामा जी इस ‘आध्यात्मिक शक्ति विद्या-दूर जड़ी ज्ञान’ को परखने के लिए सर्वप्रथम उस धागे को कुत्ते की टाँग में बांधकर दूसरा सिरा नीचे नामचिन बांवे थं स्थित राज लामा जी के पास भिजवाया, राज लामा जी ने उस धगे के दूसरे सिरे को पकड़ देख-परखकर बता दिया कि यह धागा कुत्ते के पैर पर बँध है, इस प्रकार राजा श्री चर्यक्या जी की शंका दूर हो गई। फिर दूसरी बार राजा श्री अपने अस्वस्थ्य बाल राजकुमार की कलाई में धागे का एक सिरा बांधकर धागे के दूसरे सिरे को नीचे राज लामा जी के पास भिजवाया। लामा जी ने उस उस धागे को देख परखकर सही बताते हुए कहा कि यह धागा आपके अस्वस्थ्य बाल राजकुमार की कलाई में बंधा है। अस्वस्थ्य बाल राजकुमार का इलाज ‘आध्यात्मिक शक्ति विद्या-दूर नारी जड़ी-बूटी ज्ञान’ के द्वारा शुरु किया। लगातार 9-10 दिनों का दूर नाड़ी जड़ी ज्ञान के माध्यम से विभिन्न जड़ी अर्च, सर्पगन्ध, अतीस, कटकी, हत्ताजड़ी, छिवी ;गन्द्रायणी, गजरी ;मीठा अतीस गोकुल मासी आदि मुख्य जड़ी औषधियों जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर उपचार किया। धीरे-धीरे अस्वस्थ बाल राजकुमार पूर्ण रूप से स्वस्थ्य हो गया। अन्ततः दारमा राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम इस तिब्बत प्रान्तीय राज लामा के आध्यात्मिक शक्ति विद्या-दूर जड़ीबूटी ज्ञान ;दूर नाड़ी जड़ी ज्ञानद्ध से अअत्यधिक प्रसन्न व उनसे प्रभावित होकर उन्हें बहत सारा उपहार के साथ बहुत सारे चाँदी सोने के सिक्के भेंट स्वरूप दिये और राज लामा जी के ज्ञान को बहुमूल्य सोने से तुलना करते हुए उन्हें ‘जं लामा’ की उपाधि दी गई ‘स्थानीय शब्द ‘‘जं’’ को सोना कहते हैं।’ राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम अत्यधिक प्रसन्न होकर ‘जं लामा’ ;राज लामाद्ध जी से यहीं बस जाने/रहने हेतु निवेदन किया पर ‘जं लामा’ जी ने कुछ दिन और यहाँ आध्यात्मिकता को महसूस कर वापस पश्चिम-तिब्बत अपने प्रान्त, अपने देश लौट गये। उसी कालान्तर में तिब्बत के राजा की यौवनावस्था निःसन्तान ही बुढ़ापे की ओर बढ़ रहा था। तब वहाँ के तत्कालीन धर्म लामाओं के मुख्य राज लामा ने सुझाव दिया क्यांे न चारों दिशाओं से योग्य बाल राजकुमार को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जा सके।
तिब्बत राजा श्री ने सहमति देते हुए, प्रतिनिधि मण्डलों को चारों दिशाओं में भेजा। ऐसा ही एक दल पश्चिम तिब्बत प्रान्तीय राज लामा/जं लामा के सुझाव से रं लुंग्बा दारमा घाटी की ओर आया, वे दल खुफिया रूप से दारमा घाटी के ‘ढावें’ नामक स्थान व पश्चिम तिब्बत प्रान्त के यांग्ती घाटी के ग्राम यानंग के बिल्कुल सीमा पर व्यापारिक शिविर स्थापित करके रहने लगे, ;यह सीमा प्राचीन भोट देश का लगभग मध्य भूभाग क्षेत्र होता थाद्ध और उन्होंने यहाँ के दारमा शासक की जमीनी स्तर की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करते हुए उनकी नजर राज लामा/जं लामा जी के कहे मुताबिक यहाँ के सुन्दर बाल राजकुमार पर पड़ी। उन्होंने इस सुन्दर राजकुमार को चुराने का निर्णय किया। एक दिन योजना के मुताबिक बाल राजकुमार को राज भवन स्वार्थी लोगों के साथ मिलकर चुपचाप चुराने की कोशिश की, पर वे सफल न हो पाए। क्योंकि दोनों ही बाल राजकुमार राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम की भाँति अति सुन्दर तेजस्वी आकर्षक थें पिफर उस प्रतिनिधि मण्डल सदस्यों के साथ मिलकर चुपचाप उठाकर उनकी आँखों में पट्टी बांधकर अपने शिविर ;दारमा घाटी-यांग्ती घाटी के सीमा ले गये और बालकों को बहला फुसलाकर आगे की ओर चलते गये। दोनों बालकों को दारमा-यांग्ती सीमा से आगे ‘चिल्ती’ घाटी के चिलंग नामक स्थान उनके पढ़ाव पर एक खेल खेलते देखा। दोनों बालक राजकुमार समतल बहती नदी के किनारे का पानी को प्रवाहित करने के लिए गूल /कुला बनाते हुए, एक स्थान पर तालाब बनाये और तालाब के ठीक नीचे एक छोटा सा पुल बनाया, उपर बने तालाब के पानी को अकस्मात छोड़कर कौतुलह से देखने लगे कि पानी पुल को बहा सकता है या नहीं। इस खेल में गूल;कूलाद्ध, तालाब और पुल के क्रियाकलाप को प्रतिनिधि मण्डल ने देखा कि एक बाल राजकुमार आदेश दे रहा है व दूसरा बाल राजकुमार आदेशों का पालन कर रहा था। इस घटनाक्रम त्रमें उन प्रतिनिधि मण्डल प्रमुख को विश्वास हो गया कि आदेश देने वाला बालक ही शासक बंश का असली राजकुमार होगा। अतः उन्होंने दूसरे बाल राजकुमार को वापस ग्राम दाँतू के निकट ;जहाँ आज महान दानवीरांगना लला जसुली देवी की मूर्ति स्थापित है, वहाँ से थोड़ा आगे छोड़कर चले गये और दारमा राजबंशी बाल राजकुमार को लेकर पश्चिम तिब्बत प्रान्त की ओर चले गये। चारों ओर दिशाओं से लाए गए बाल राजकुमारों में से ‘च्र्यक्या ह्या-द्वितीय’ बाल राजकुमार को सबसे तेजस्वी आकर्षक और उसकी खेल निपुणता को देखते हुए कुछ महीनों के बाद उस बालक को तिब्बत देश का पश्चिम तिब्बत प्रान्त के राजा का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। बाल राजकुमार चर्यक्या ह्या द्वितीय की देखरेख दारमा दाँतू उपचार हेतु आए ‘राज लामा/जं लामा’ की छत्रा छाया में खूब सेवा होने लगी और धीरे-धीरे बाल राजकुमार दारमा के दाँतू में व्यतीत समय भूलता चला गया। इस बाल राजकुमार को रं लोक परम्परा ;लोक गाथाओं मेें न्युंगु मिनु चर्यक्या ह्या द्वितीय ;हमारा छोटा चर्यक्या ह्या द्वितीय नाम सम्बोधित ;न्युंगु तिब्बत चु चर्यक्या ह्या द्वितीय से भी स्मरण करते हैं। ‘राजा श्री चर्यक्या ह्या-प्रथम’ के दोनों राजकुमारों का चिल्ती घाटी के ग्राम चिलंग नामक स्थान पर खेलने के लिये उस समय बनाया गया पानी के गूल ;कुलाद्ध, तालाब व पुल इत्यादि के निशान आज भी विद्यमान हैं। ;ऐसा प्रागैतिहासिककाल व अंग्रेज समय काल में पश्चिम तिब्बत प्रान्त में व्यापार के लिए जाने वाले हमारे बुजुर्गों ने हमें बताया, उस प्रमाण के बारे में. महिनों-साल बीतने के बाद एक दिन जब बाल राजकुमार चर्यक्या ह्या द्वितीय ने भोज्य पदार्थ के अतिरिक्त अन्य खाद्य भोजन की इच्छा पूछी गई तो च्र्यक्या ह्या-द्वितीय ने कहा ‘जंग गु गंदू/सिल्दू, चरपा व मुल गु गुठे’ ;सोने का गोल डल्ला, चाँदी की रोटी खाने की इच्छा जताई। तात्पर्य है, बें ;फाफर/ओगल के आटा से तैयार पीला सोना रंगनुमा कच्चा गोल डल्ला/चरपा और पलती ;कुट्टू के आटा में तैयार सफेद-सिल्वर रंगनुमा रोटी खाद्य पदार्थ। तिब्बतियों को यह खाद्य पदार्थ का नाम अजीबोागरीब लगा क्योंकि तिब्बत में खेती बहुत ही कम मात्रा में होती है। तिब्बती लोग दूध्, दही, मक्खन और मांस का प्रयोग खेती-खाद्य से अधिक मात्रा में करते हैं। वे इस रहस्यमयी खाद्य पदार्थों की खोज में प्रतिनिधि मण्डल सदस्य, व्यापारी के रूप में दारमा पहँचे। उन्हें ‘जं गु गंदु-मूल गु गुठे’ के बोर में ठीक से ज्ञात हुआ और वे व्यापार में इसे विनिमय कर दारमा-घाटी से बें ;फाफर और पलती ;कट््टु तिब्बत ले गये।
तिब्बत देश जाकर बाल राजकुमार को खोज न कर पाने का कारण-
इस कालान्तर में दोनों अन्तर्राष्ट्रीय प्रान्तों के मध्य परस्पर व्यापार करना कठिन हो गया था।
दोनों परिक्षेत्र के व्यापारियों का व्यापारिक ;आदान-प्रदान मिलन- दारमा रं लुंग्बा और तिब्बत के व्यापारी, दारमा और पश्चिम प्रान्त के सीमान्त यांग्ती और चिल्ती दोनों घाटी के उन अस्थायी ग्रामीण भूभाग तक ही व्यापार विनिमय के लिए जाते थे। जो अस्थायी ग्रामीण भूभाग दारमा रं लुंग्बा के भूभाग से सटे होते थे।
सीमान्त क्षेत्र में खानाबदोश रहन-सहन सा जीवन व्यतीत करने वाले कुछ हुणी समूहों का पश्चिम-तिब्बत प्रान्त अन्तर्राष्ट्रीय सीमा में बहुत अधिक प्रभाव था। वे दूसरे बाहरी व्यापारियों के साथ अहंकारपूर्ण, अमानवीय व्यवहार कर जबरदस्त अतिरिक्त कर वसूली करते थे। नहीं मानने पर आतंकित लूटपाट भी करते थे। इस डर के कारण दारमा व्यापारी उस समय सीमान्त भूभाग के उन स्थाई क्षेत्रों तक में ही व्यापार हेतु जाते थे/व्यापार करते थे जहाँ वे सुरक्षित महसूस करते थे/और अपना क्षेत्र हो।
उस काल में दारमा रं भोट भोट व्यापारी पूर्ण रूप से पश्चिम तिब्बत प्रान्त के सीमान्त में स्थित स्थायी ग्रामों तक व्यापार के लिए नहीं जाते थे। यह व्यापार केवल दोनों के ही अधिकारिक अस्थाई भू क्षेत्र में ही होता था।